श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – आँखें
(लघु कविता संग्रह – चुप्पियाँ से)
आँखें,
जिन्होंने देखे नहीं
कभी उजाले
कैसे बुनती होंगी
आकृतियाँ-
भवन, झोपड़ी,
सड़क, फुटपाथ,
कार, दुपहिया,
चूल्हा, आग,
बादल, बारिश,
पेड़, घास,
धरती, आकाश
दैहिक या
प्राकृतिक सौंदर्य की,
‘रंग’ शब्द से
कौनसे चित्र
बनते होंगे
मन के दृष्टिपटल पर,
भूकम्प से
कैसा विनाश चितरता होगा,
बाढ़ की परिभाषा क्या होगी,
इंजेक्शन लगने से पूर्व
भय से आँखें मूँदने का
विकल्प क्या होगा,
आवाज़ को
घटना में बदलने का
पैमाना क्या होगा,
चूल्हे की आँच
और चिता की आग में
अंतर कैसे खोजा जाता होगा,
दृश्य या अदृश्य का
सिद्धांत कैसे समझा जाता होगा,
और तो और
ऐसी दो जोड़ी आँखें
जब मिलती होंगी
तो भला आँखें
मिलती कैसे होंगी..,
और उनकी दुनिया में
वस्त्र पहनने के मायने
केवल लज्जा ढकने भर के
तो नहीं होंगे…!
कुछ भी हो
इतना निश्चित है
ये आँखें
बुन लेती हैं
अद्वैत भाव,
समरस हो जाती हैं
प्रकृति के साथ,
सोचता हूँ
काश!
हो पाती वे आँखें भी
अद्वैत और
समरस
जो देखती तो हैं उजाले
पर बुनती रहती हैं अँधेरे!
© संजय भारद्वाज
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रवण मास साधना में जपमाला, रुद्राष्टकम्, आत्मपरिष्कार मूल्याकंन एवं ध्यानसाधना करना है
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈