प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित एक भावप्रवण ग़ज़ल “कुछ याद रहे दिन वे…”। हमारे प्रबुद्ध पाठक गण प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे। )
☆ काव्य धारा 74 ☆ गजल – ’कुछ याद रहे दिन वे… ’’ ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
दिन से भी कहीं ज्यादा रातें हमें प्यारी हैं
क्योंकि ये सदा लातीं प्रिय याद तुम्हारी हैं।
मशगूल बहुत दिन हैं, मजबूर बहुत दिन है
रातों ने ही तो दिल की दुनियाँ ये सॅंवारी हैं।
सूरज के उजाले में परदा किया यादों ने
दिन तो रहे दुनियाँ के, रातें पै हमारी है।
कुछ याद रहे दिन वे भड़भड़ में गुजारे जो
है याद मगर रातें तनहाँ जो गुजारी हैं।
कोई ’विदग्ध’ बोले, दिन में कहाँ मिलती है ?
रातों के अँधेरों में जो मीठी खुमारी है।
© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी भोपाल ४६२०२३
मो. 9425484452
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈