डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम कालजयी दोहे।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # 81 – दोहे
प्यार- प्यार की याद में, आकुल होता प्यार।
प्यार -प्यार की आंख से, ढुलक पढ़ा लो प्यार।।
शब्द नहीं मुख से कहे, सिसक रही है सांस ।
प्रेमिल अनुभूति यों, मिसरी की फांस।।
रेशम -रेशम तो कहा, हुई रेशमी शाम।
रेशम- रेशम सुन कहा, रेशम किसका नाम।।
किसे बताएं कौन अब, किसका क्या संबंध।
हृदय बसे हो इस तरह, सुमन ज्यों सुमनों गंध।।
मन मोती यों चुन लिया, जैसे चुने मराल।
ह्रदय सम्हाला इस तरह, ज्यों पूजा का थाल।।
© डॉ राजकुमार “सुमित्र”
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
बेहतरीन अभिव्यक्ति