श्री अरुण कुमार दुबे
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “क़लम रुके जो नया सूझता नहीं मिसरा…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # 97 ☆
क़लम रुके जो नया सूझता नहीं मिसरा… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
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मुसीबतों से वो मुझको निकाल देता है
निराश होते ही हिम्मत कमाल देता है
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पनाह जब न मिले कोई भी जहां से तब
कोई तो है जो मुझे अपनी ढाल देता है
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क़लम रुके जो नया सूझता नहीं मिसरा
उतर के ज़हन में तू ही ख़याल देता है
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जो मदरसे न सिखायें वो सीख दे जीवन
बगैर सीखे हुनर बा- कमाल देता है
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सपूत नाम बढ़ाता है पुरखों का अपने
कपूत बाप की पगड़ी उछाल देता है
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उतार ज़ीस्त में ले अपनी थोड़ा भी इंसां
जो दूसरों को हमेशा मिसाल देता है
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ठसक न इतनी दिखा हुस्न की न कुछ तेरा
हसीन होने ख़ुदाया ज़माल देता है
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अजीब वक़्त है करता नहीं मदद कोई
जबाब पूछो तो फ़ौरन सवाल देता है
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हरेक बात पे चर्चा को वक़्त है उस पर
“अरुण “से प्यार है पूछो तो टाल देता है
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© श्री अरुण कुमार दुबे
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