श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फूल और पत्थर ।)

?अभी अभी # ९९६ ⇒ आलेख – फूल और पत्थर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सन् १९६६ में धर्मेंद्र और मीना कुमारी की एक फिल्म आई थी, फूल और पत्थर ! एक पत्थर दिल इंसान और कोमल ह्रदय वाली मीनाकुमारी की यह फिल्म थी । उसके बाद से बहुत कुछ बदला है । और बदले की इस आग में एक नए किस्म का पत्थर, शक्ल ले चुका है,जिसका नामकरण किया गया है नफ़रत का पत्थर ।

कितना भाग्यशाली होगा,वह पत्थर,जो रामजी के नाम लेने से तैरने लगता है और पूरी वानर सेना को पुल बनाकर समुद्र के पार पहुंचाता है ।।

पत्थर अभिशप्त है,रास्ते में पड़े रहने के लिए ! जो ठोकर खाता है पत्थर से,वह पत्थर को कोसता भी है और ठोकर खाने के बावजूद उसी पत्थर को एक ठोकर और मारता है । बेजुबान पत्थर हमें यह समझाता है,तुमने मुझे ठोकर मारी । ठीक है, अब तो संभल जाओ । देखकर चलो ! नहीं तो ज़िन्दगी भर ठोकरें ही खाते रहोगे ।

नसीब अपना अपना ! कोई फूल कहाता,कोई पत्थर । कांटों को तो गुलाब अपने गले लगाता है,पत्थर का ऐसा नसीब नहीं । पत्थर को कोई गले नहीं लगाता ।

जब कोई पहाड़ टूटता है ,तब पत्थर का जन्म होता है । अगर बहती नदी में गिरे, तो घिस घिस कर या तो शालिग्राम हो जाता है या फिर कंकर से शंकर । वही

पत्थर जब किसी मूर्तिकार द्वारा तराशा जाता है,तो किसी मंदिर में विराजमान हो जाता है, लोग उसी पत्थर को पूजने लग जाते हैं ,उस पर फूल चढ़ाए जाते हैं ।

पत्थर से इमारतें बनती हैं तो कोई पत्थर मील का पत्थर कहलाता है । सुना है पत्थर दिल इंसान भी होते हैं । वह पत्थर कितना भाग्यशाली होगा,जिस पर रोजाना फूल चढ़ते होंगे ।।

शिव शंकर तो इतने पत्थर दिल है कि एक पत्थर में ही समा गए । कोई कंकर शंकर कहलाया तो कोई पत्थर शिव लिंग । कभी भोले भंडारी तो कभी रौद्र रूप धारी । हम उसी पत्थर का अभिषेक करते हैं ।

श्रृद्धा और भक्ति को पुष्प द्वारा प्रकट किया जाता है और नफरत को ,पत्थर फेंककर । इसमें पत्थर का कोई दोष नहीं ;

इक लोहा पूजा में राख्यो

एक घर बधिक धरयो ।

पारस गुन अवगुन नहिं परखत

कंचन करत खरयो ।।

ठीक इसी प्रकार वही पत्थर जब मंदिर में रखा जाता है तो पूजा जाता है । पत्थर तो इतना बेबस है कि जब तक हम अपना सर उस पर नहीं पटकें,वह हमें हानि नहीं पहुंचा सकता । हमारी हिंसा ही उसे एक अस्त्र बनाती है ।

पत्थर बचपन में हमने भी फेंका है । गणेश चतुर्थी के चंद्रमा को देखना निषेध है । ऐसी मान्यता है कि कोई आप पर झूठी चोरी का इल्ज़ाम लगा देता है । हमारे लिए यह खेल बन गया था । चन्द्रमा को देखना, और किसी की छत पर पत्थर फेंकना । तब अधिकांश छतें पतरे की होती थी ।

बाद में यही पत्थर पहले कुत्तों पर और बाद में भीड़ में बरसने लगे । पत्थरबाजी,पतंगबाजी की तरह एक शौक हो गया । और आज वही पत्थर पूरी तरह बदनाम हो गया,जब उसे नफरत का पत्थर नाम दे दिया गया । नफ़रत हमारी,और बदनाम पत्थर । पत्थर को पत्थर ही रहने दो,उसे बदनाम ना करो । उसे अपनी नफरत का भागीदार तो मत बनाओ ।

आजकल किसी के घर शीशे के नहीं होते । शब्द बाण भी नफरत का पत्थर ही है । प्रेम और भक्ति में पुष्पों की वर्षा होती है,पुष्पगुच्छ का आदान प्रदान होता है । श्रद्धा में पुष्पांजलि भी अर्पित की जाती है । हमारे मुंह से भी शब्द पुष्प की तरह झरें ।

हमारे हाथों में पत्थर की जगह हमेशा फूल हो । जो पाषाण हृदय हैं,उनका हृदय पिघले । उसमें सदा करुणा का वास हो । आमीन ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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