हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९९ ☆ जन्माष्टमी विशेष – वृंदावन हरियाली में मुस्कुराते मनमोहन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना वृंदावन हरियाली में मुस्कुराते मनमोहन। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९९ ☆

जन्माष्टमी विशेष – वृंदावन हरियाली में मुस्कुराते मनमोहन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

ग्वाल-बाल के संग नंदलाला,

मुरली मनोहर आ जाओ।

प्यासे-प्यासे इन नयनों को,

मनमोहन अब मत तरसाओ।।

*

भक्त तिहारी राह तके हैं,

यशोदा प्यारे आ जाओ।

माखन-मिश्री के मतवाले,

माधव न्यारे आ जाओ।।

*

कुंज-गलिन में राधा रानी

के मतवाले आ जाओ।

प्यासे-प्यासे इन नयनों को,

मनमोहन अब मत तरसाओ।।

जब भाद्रपद की अँधेरी रात आस्था के दीपों से जगमगाने लगती है, तब मन के आकाश पर एक अनुपम छवि आकार लेती है—मोरपंख मुकुट धारण किए नटखट नंदलाल, अधरों पर सजी बाँसुरी और चारों ओर पसरा हुआ हरा-भरा वृंदावन। यह वही वृंदावन है, जहाँ प्रकृति केवल कृष्ण की लीलाओं की साक्षी नहीं थी, बल्कि स्वयं उनकी लीला का अभिन्न अंग थी।

कदंब की डालियाँ उनके झूलों की सखी थीं, यमुना उनकी चिर-सहचरी और गौवंश उनके वात्सल्य का विस्तार। वन-पथों पर बिखरी दूब, कुंजों की छाया, फूलों की सुगंध और पक्षियों का कलरव—इन सबके बीच कृष्ण का बालपन जैसे प्रकृति के हृदय पर लिखी कोई मधुर कविता था।

श्रीकृष्ण का जीवन हमें उस आत्मीय संबंध की स्मृति कराता है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक होते हैं। उनकी बाल लीलाओं में मिट्टी की सोंधी गंध है, यमुना की कल-कल है, वृक्षों की शीतल छाया है और जीव-जंतुओं के प्रति सहज करुणा है। इसलिए कृष्ण को जानना केवल उनके दर्शन को जानना नहीं, उस प्रकृति को भी समझना है, जिसमें उनकी चेतना ने आकार पाया।

आज हमारे चारों ओर कंक्रीट के जंगल फैलते जा रहे हैं और वास्तविक वन सिमट रहे हैं। नदियाँ अपना निर्मल स्वर खो रही हैं और पक्षियों का कलरव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। ऐसे समय में यह पर्व हमारे भीतर एक सहज प्रश्न जगाता है—क्या हमारी भक्ति केवल मंदिरों और झाँकियों तक सीमित रहेगी, या हम कृष्ण के उस वृंदावन को भी अपने जीवन में स्थान देंगे, जहाँ हरियाली स्वयं उत्सव थी?

उत्सव की सजावट में यदि जीवित पौधों, पत्तियों, फूलों, मिट्टी के दीपों और प्राकृतिक सामग्री को स्थान दिया जाए, तो सौंदर्य के साथ संवेदना भी जुड़ती है। लड्डू गोपाल के समीप रखा गया एक छोटा-सा पौधा केवल सजावट नहीं, बल्कि आने वाले कल के लिए जीवन का संकल्प बन सकता है।

क्यों न इस अवसर पर ‘एक पौधा कान्हा के नाम’ का संकल्प लिया जाए? पौधा लगाएँ, उसे सींचें, उसकी छाया बढ़ते देखें और उसके साथ अपने भीतर प्रकृति के प्रति प्रेम को भी अंकुरित होने दें।

कृष्ण ने हमें प्रेम का विस्तार सिखाया—मनुष्य से प्रेम, जीव-जंतुओं से करुणा और धरती से आत्मीयता। उनकी बाँसुरी की मधुर तान तभी सार्थक होगी, जब यमुना निर्मल बहे, वृक्षों पर फिर पक्षियों के बसेरे हों और हमारी धरती हरियाली की साँस लेती रहे।

कान्हा को केवल झूले में न झुलाएँ,

उनके वृंदावन को भी अपने जीवन में उतारें।

ऐसी भक्ति हो, जिसमें दीप भी जले और कोई पौधा भी रोपा जाए; ऐसी आराधना हो, जिसमें घंटियाँ भी गूँजें और पक्षियों का कलरव भी सुनाई दे; ऐसा उत्सव हो, जिसमें मंदिर ही नहीं, हमारी धरती भी मुस्कुराए।

राह तके हैं गोपी सारी,

रास-रचैया आ जाओ।

संकट की घड़ियों में कृष्णा,

लाज-बचैया आ जाओ।।

*

भक्तों के हिय आन समाने,

मीरा-मोहन आ जाओ।

प्यासे-प्यासे इन नयनों को,

मनमोहन अब मत तरसाओ।।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८५ ⇒ बातों के भूत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बातों के भूत।)

?अभी अभी # १०८५  ⇒ आलेख – बातों के भूत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पहली बात तो भूत होते ही नहीं, और अगर होते भी हैं, तो उनसे डरने की कोई जरूरत नहीं, बस भृगु बनने की है। भूत बातों से नहीं मानते। घोड़ा हवा से बात करता है, और भूत से लातों से ही बात की जाती है। सुना है, भूत के पांव उल्टे होते हैं, जब कुछ लोग उल्टे पांव लौट आते हैं, तो शंका होती है, कहीं ये वो तो नहीं।

भूत के पाँव तो खैर इसलिए उल्टे होते हैं, कि जब उसे लात पड़े, तो भागने में सहूलियत हो। बेचारे भूत की इतनी फजीहत, कि पहले तो उससे लातों से बात करना, और जब वह उल्टे पांव भागने लगे तो उसकी लंगोटी पर भी नज़र रखना। भागते भूत की लंगोटी भली ! वाह रे इंसानियत।।

वैसे भूत अधिकतर किस्से कहानियों और फिल्मों में ही होते हैं, लेकिन क्या पता, कब, किस पर, किस बात का भूत सवार हो जाए। जब हम पर किसी बात का भूत सवार होता है तो फिर हमें भूत से डर नहीं लगता, लोग हमसे डरने लगते हैं। जब हम पर क्रिकेट का भूत सवार होता था तो मोहल्ले के मकानों की खिड़कियों के शीशे तड़ातड़ टूटने लगते थे। शीशे तो जुड़ गए, लेकिन क्रिकेट का भूत आज भी नहीं उतरा।

अंध विश्वास की भी हद होती है। लोगों को हवा में भूत नजर आता है। सुनसान हवेली की ओर जाने से मना किया था, लेकिन आज की पीढ़ी कभी किसी की सुनती है, अब आठ रोज से बुखार में पड़े हैं, कुछ भी बड़बड़ा रहे हैं, अजीबोगरीब हरकतें कर रहे हैं। ओझा को बुलाया है, अब तो वही भूत उतारेगा। भूत उतरे, ना उतरे, अच्छी लू उतरने वाली है, जब झाड़ुओं से पूजा होगी। भूत भागता नजर आएगा।।

मैं किसी भी तरह की हिंसा के खिलाफ़ हूं। इंसान हो या भूत ! पहले लातों से नहीं, बातों से ही मामला सुलझाना चाहिए। लेकिन इसमें एक समस्या और आ खड़ी होती है। किसी पर अगर बातों का ही भूत सवार हो, तो क्या करना चाहिए। आप समझ रहे हैं न बात को।

कुछ लोगों पर बातों का भूत सवार होता है। बातें ही बातें। जैसे बरसात में किसी छाते की दुकान में छाते ही छाते ! इतनी बातें, इतनी बातें, कि बस बातें ही बातें। पहले बातों के लिए मुलाकातें जरूरी होती थी। लोग किसी बातूनी इंसान को देखते ही, पतली गली से निकल लेते थे, अभी मिलेगा तो चाट जाएगा। इंसान भूत से नहीं, ऐसे बातूनी इंसान से अधिक डरता था।।

आज भी डर लगता है, क्या भरोसा कब, किस पर, बातों का भूत सवार हो जाए। मैने लोगों को आधे आधे घंटे वॉक एंड टॉक शो में मशगूल देखा है। अनलिमिटेड डाटा और अनलिमिटेड बांतां। बस कान में स्पीकर लगे हैं और अपना स्पीकर, यानी मुंह भी चालू है। ऐसे चलते फिरते बातूनी भूत मॉर्निंग वॉक और इवनिंग वॉक में बहुतायत से देखे जा सकते हैं।

कौन अधिक बात करता है और कौन कम, यह नहीं जानते हम, लेकिन हर व्यक्ति के जीवन में ऐसा समय जरूर आता है, जब उस पर बातों का भूत सवार होता है। कहीं कहीं तो भोजन की तरह बातें भी हजम नहीं होती। बातें ही उनका हाजमोला होती हैं। पेट में गुड़गुड़ होने लगती है। ठीक से किसी से बात हो जाए, तो सब ठीक हो जाता है।।

जिस तरह लातों के भूत बातों से नहीं मानते, बातों के भूत का इलाज भी लातों से संभव है, यह हम नहीं मानते। यह छोटी सी बात नहीं, गंभीर बात है। कुछ लोग बड़ी प्यारी बातें करते हैं, लगता है, जैसे मुंह से फूल झर रहे हों। बच्चों की बातें कितनी प्यारी लगती हैं।

बातों का एक दर्दनाक पहलू भी है ! किसमें कितना दर्द भरा है, कौन जाने। दो घड़ी अगर बात करने से हल्कापन महसूस होता है तो क्या बुरा है। आधी मानसिक बीमारियां मन ही मन घुटते रहने से होती है;

मेरी बात रही मेरे मन में

कुछ कह ना सकी उलझन में;

से तो अच्छा है;

आपके पहलू में आकर रो दिए।

दास्ताने गम सुना कर रो दिए।।

बातों बातों में कभी कभी ऐसा भी हो जाता है;

जो हमने दास्तां अपनी सुनाई

आप क्यूं रोए !

किसी के दुख दर्द को कम करना, अथवा दूर करना ही तो वास्तव में भूत उतारना है ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ – मेघमल्हार धुन सावन की, जयजयकार शिव जी की! ☆ डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

डाॅ. मीना श्रीवास्तव

☆ आलेख ☆

☆ मेघमल्हार धुन सावन की, जयजयकार शिव जी की! ☆ डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

प्रिय पाठकगण,

सादर प्रणाम!

वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थ: प्रतिपत्यये ।

जगत: पितरौ वंदे पार्वतीपरमेश्वरौ ।। १ ।।

(भावार्थ – शब्द और अर्थ का सम्यक ज्ञान प्राप्त हो, इसलिए शब्द और अर्थ के समान ही (परस्पर से भिन्न हो कर भी) परस्पर में समाहित रहने वाले, जो अखिल जगत के जनक जननी हैं, ऐसे पार्वती तथा परमेश्वर {शिव} को मैं प्रणाम करता हूँ।)

महाकवि कालिदास के अमर काव्य ‘रघुवंशम् ‘ का प्रारम्भ शिव-पार्वती स्तुति के इसी श्लोक से होता है। जब मेघों से लरजती रिमझिम फुहार धरती पर बरसने को व्याकुल हो, जब इंद्रधनुषी किनारी से सजी, विविध कुसुमों की भीनी भीनी खुशबू में लिपटी बेलबूटी से सजे वस्त्र ओढ़ कर साँवरी सलोनी वसुंधरा आनन्द गीत गुनगुनाने लगे और जब परमेश्वर की असीम कृपा आप पर हर पल वृद्धिंगत होने को तैयार हो तो, समझ लीजिये कि सावन का महीना आपके द्वार पर दस्तक दे रहा है।

अब कृष्णमेघ नई उमंग के साथ आसमान में छा जाते हैं। जरा सी बारिश हुई नहीं कि मेघों से लुका छुपी खेलती सुनहरी धूप की किरणें झांकती हैं । फिर प्रकृति का एक अनुपम दृश्य, इंद्रधनुष आसमान में तन जाता है। उसके सप्त रंग सुहानी आभा बिखेरते हैं समस्त वातावरण में! जब इंद्रधनुष कहे कि मेरी इस सुंदरता का कोई सानी नहीं, तब कोई है जो कारे कारे बदरा को देख अपने पंखों को फैलाकर अपनी नृत्यकला से समस्त प्रकृति को भावविभोर करे एवं कहे, है कोई मेरा सानी रंगों में और नृत्य में? मित्रों, हमें तो मयूर का नृत्य उतना ही लुभाता है, जितने मोरपखा के रंग। ‘छायावाद’ के शीर्ष लेखक सुमित्रानंदन पंत ने उनकी ‘बरसते बादल’ नामक कविता में सावन के शस्य श्यामल रूप का मनमोहक वर्णन किया है, जो कर्णमधुर भी है।

“झम झम झम झम मेघ बरसते हैं सावन के,

छम छम छम गिरतीं बूँदें तरुओं से छन के।

चम चम बिजली चमक रही रे उर में घन के,

थम थम दिन के तम में सपने जगते मन के।”

वर्षा की फेनिल धाराओं को देख कवि का मन ऐसा डोलने लगता है कि, वह बारम्बार सावन के आने की प्रतीक्षा करने लगता है। 

“पकड़ वारि की धार झूलता है मेरा मन,

आओ रे सब मुझे घेर कर गाओ सावन!

इन्द्रधनुष के झूले में झूलें मिल सब जन,

फिर फिर आए जीवन में सावन मन भावन!”

*

उज्जयिन्यां महाकालं ओम्कारम् अमलेश्वरम्॥

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।

सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।

हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥

मित्रों, बारह  ज्योतिर्लिंगों में ही नहीं, बल्कि हर शिवभक्त के प्राणों में बसे देवों के देव महादेव की आराधना करने के लिए सर्वोत्तम ऐसा सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित है। जिस मनोरम प्रकृति के हर रूप में ईश्वर का निवास है, वहीं प्रकृति अपने सबसे सुन्दर रूप का शृंगार कर भोलेनाथ की पूजा में तल्लीन हो जाती है। इस माह में चंद्रमा श्रवण नक्षत्र में होते हैं, इसलिए इस महीने को श्रावण या सावन कहा जाने लगा। शास्त्र कहते हैं कि सावन के महीने से भगवन विष्णु चौमासे के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिए महादेव सृष्टि का संचालन करने लगते हैं और इस महीने में भूलोक पर आते हैं।

भगवान शिव को सोमनाथ अर्थात सोम (चंद्र के स्वामी) और जलदेव (वर्षा के स्वामी) भी कहा जाता है। जलाभिषेक से सम्बंधित एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, सावन के महीने में समुद्र मंथन के दौरान “हलाहल” नामक विष निकला था। समस्त सृष्टि की रक्षा करने के लिए भगवान शिव ने विष ग्रहण कर लिया था, जिसके कारण उनका गला नीला पड़ गया। तब से वे “नीलकंठ” कहलाए। उस समय उनके गले पर विष का प्रभाव कम करने के लिए देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया था। मुझे तो यहीं प्रतीत होता है कि शिव ऐसे इकलौते अल्पसंतोषी भगवान हैं जो श्रद्धापूर्वक अर्पण किये हुए जल तत्व को ग्रहण कर प्रसन्न होते हैं। भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने के लिए सावन के सोमवार को उपवास, उपासना और जलाभिषेक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। मान्यता है कि इन दिनों में शिवजी को जलाभिषेक करने से सर्वोत्तम फलप्राप्ति होती है और भक्तों की मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं। बेल की पत्तियां और धतूरा भी भोलेनाथ को अतिप्रिय हैं। इस माह के प्रारम्भ से कांवड यात्रा भी प्रारम्भ होती हैं।

श्रावण माह का महत्व इस महीने में आने वाले पूजा अर्चना और त्योहारों के कारण और भी वृद्धिंगत हो जाता है। हर मंगलवार को मंगला गौरी व्रत और श्रावण शुक्ल तृतीया को हरियाली तीज के दिनों में शिव-गौरी को पूजा जाता है। महादेव को प्रसन्न करते करते उनके गले में प्रेम से लिपटे उनके नीलकंठ की शोभा बढ़ाते हुए नागराज वासुकी को कैसे बिसरा दें? इन्होंने ही अमृतमंथन के लिए रस्सी का कार्य किया था। नाग पंचमी का त्यौहार हम इसी सावन में (श्रावण शुक्ल पंचमी) मनाते हैं। देखिये हमारी भारतीय संस्कृति इतनी महान है कि विष उगलने वाले सर्पों को भी हम देवता का दर्जा देकर पूजते हैं। श्रावण पूर्णिमा के दिन मछुआरे सागर को श्रीफल अर्पण कर यह प्रार्थना करते हैं कि वह शान्त रहे। इसी दिन भाई बहन के प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन मनाया जाता है। जन्माष्टमी (श्रावण वद्य अष्टमी) यह कृष्णजन्म का पावन दिवस कृष्णभक्तों के लिए तो आनंदोल्लास का पर्व होता है। हर श्रावण शुक्रवार को किया जाने वाला जरा जीवंतिका पूजन बालकों की मंगल कामना के लिए किया जाता है। इसके आलावा सावन महीने में कामिका एकादशी, सावन पुत्रदा एकादशी, हरियाली अमावस्या आदि व्रत रखे जाते हैं। इन दिनों में नववधुएं मायके में जाने को व्याकुल होती हैं, ऐसे में उन्हें सखियों के साथ बिताये पल याद आते हैं, खास कर ‘सावन के झूले’!

यह मौसम कृषकों को प्राणदान देता है एवं उनकी फसलों को नव-हरीतिमा प्रदान करता है।  

भक्ति और समृद्धि से समाहित यह खुशहाल समां सबको आनंदविभोर करता है। उसकी जलधाराओं के नृत्याविष्कार में ‘ॐ नमः शिवाय’ और नन्हे बालगोपाल की किलकारियां प्रतिध्वनित होती हैं। आइये इस हरित ऋतु का प्रेमोल्लास से स्वागत करें।

© डॉ. मीना श्रीवास्तव

ठाणे 

मोबाईल क्रमांक ९९२०१६७२११, ई-मेल – drmeenashrivastava21@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७७ ☆ आलेख – माह सितंबर और हिंदी… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख – “माह सितंबर और हिंदी“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७७ ☆

✍ आलेख ☆ माह सितंबर और हिंदी☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

लो सितंबर का महीना भी आ गया। सितंबर का महीना मतलब हिंदी का महीना। आम जनता पर तो कोई अंतर नहीं पड़ता परंतु केंद्रीय सरकारी कार्यालयों, राष्ट्रीयकृत बैंकों, उपक्रमों पर पड़ता है और वे हिंदी मय हो जाते हैं। विश्वविद्यालय, महाविद्यालय और हिंदी के प्रचार प्रसार में लगीं संस्थाओं में हिंदी के प्रति एक जागृति की भावना पैदा हो जाती है जो साल भर तक उन्हें अनुप्राणित करती रहती है। हिंदी के सुनामधन्य लेखक व कवि प्रतिस्फूर्त हो जाते हैं और स्वर्गीय लेखक कवि भी जीवन पा जाते हैं। क्या हिंदी और क्या हिंदीतर राज्य व क्षेत्र सभी हिंदीमय हो जाते हैं। किसी समारोह या कार्यक्रम में जिन्हें कोई स्थान नहीं मिल पाता वे हिंदी के साथ हो रहे छल के हिमायती बन जाते हैं। पर सितंबर माह हिंदी का माह तो होता ही है।

जहाँ जहाँ हिंदी विभाग हैं उनसे जुड़े अधिकारी, कर्मचारी, प्राध्यापक व अध्यापक स्फूर्ति से भर उठते हैं। सभी किसी न किसी हिंदी के विद्वान को बुला कर अपने संस्थान के अन्य अधिकारियों व कर्मचारियों में हिंदी के प्रति एक नया जोश भर देना चाहते हैं। कोई अपने संस्मरण सुनाते हैं हिंदी की गौरव गाथा व अधोमुखी गाथा के। वे अपने सामने उपस्थित वृंद को मोहित कर देना चाहते हैं।  ऐसा ही एक उदाहरण याद आता है। बात पुरानी है। हिंदीतर क्षेत्र में एक विश्वविद्यालय में हिंदी की एम.फिल के विद्यार्थियों को प्रोफेसर साहब पढा रहे थे कि हम हिंदी दिवस इसलिए मनाते हैं कि 1936 में कांग्रेस ने हिंदी को अपने एक अधिवेशन में राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान की थी।  जब उनसे पूछा गया कि संविधान में हिंदी को  भारत संघ की राजभाषा बनाया गया था लेकिन आप यह क्या बता रहे हैं तो वे प्रोफेसर साहब मायूस होकर बोले कि विभाग बना दिया, प्रयोजन मूलक हिंदी की उच्च शिक्षा भी प्रारंभ कर दी लेकिन उसका न तो कोई पाठ्यक्रम है और न ही पुस्तकें। हम जहाँ तहाँ से नोट्स बनाकर पढ़ाते हैं। संस्थान जो केवल सितंबर में हिंदी संबंधी कार्यक्रम करते हैं वे वक्ताओं से उच्च स्तर की नई बात जानना चाहते हैं।

वाक्पटु वक्ता वाह-वाही पाकर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं और जो श्रोताओं को प्रभावित नहीं कर पाते वे ऐसे आमंत्रण से वंचित हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि न वक्ता अपनी जिम्मेदारी समझते हैं और न ही श्रोता। हिंदी को मान्यता न देने के इच्छुक तो संविधान की ही आलोचना करते हैं कि संविधान में 15 वर्ष तक हिंदी को राजभाषा बनाया गया परंतु अंग्रेजी में काम करते रहने की छूट को अनिश्चितकालीन छूट दे दी तो हिंदी का राजभाषा पद अपने आप ही लुप्त हो गया। तमाम तर्क वितर्क प्रस्तुत होते हैं परंतु हिंदी को भारत संघ की राजभाषा के रुप में सम्मान नहीं देना चाहते। भारत संघ कोई स्थान या क्षेत्र विशेष नहीं है, संपूर्ण भारत है जिसमें सभी प्रदेश व क्षेत्र शामिल हैं और भारत का अस्तित्व उसके सभी मंत्रासय और उनसे संबद्ध अधीनस्थ कार्यालय, विभाग व उपक्रम आदि हैं चाहे वे कहीं भी स्थित हों।  हिंदीतर प्रदेशों में हिंदी को केंद्र सरकार की राजभाषा के रूप में सम्मान दिया जाएगा तो वहाँ की क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान कम नहीं होता।

विश्व के सभी देशों में हिंदी बोली समझी जाती है और वह विश्व में दूसरे स्थान पर है लेकिन भारत में हिंदीतर क्षेत्रों में हिंदी बोलना तक अपराध जैसा माना जाता है, ऐसा महसूस होता है।  विश्व में अनेक देश ऐसे हैं जहाँ राष्ट्रभाषा नहीं है और अनेक राजभाषाएं भी हैं, परंतु नफ़रत की भावना होने का कोई समाचार नहीं मिलता। भारत में यही अफ्सोस  जताया जाता है कि भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। राजभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने नहीं दिया जाता और राष्ट्रभाषा चाहते भी हैं।

प्रौद्योगिकी, कंप्यूटरीकरण और ए.आई. ने विश्व में भाषायी अंतर बहुत कम कर दिया है और एक भाषा न जानने वाला भी उस भाषा में काम कर सकता है। अब जरूरत है हर भाषा के प्रति प्रेम की। फिर भी जिस तरह विश्व के सभी देशों में भारत की भाषा हिंदी मानी जाती है वैसे ही भारत में भारत संघ की राजभाषा को हर नागरिक द्वारा  माना जाए और उसे केंद्र सरकार की राजभाषा के रूप में सम्मान दिया जाए तो हिंदी को संविधान सम्मत स्थान व सम्मान अवश्य प्राप्त होगा। हिंदी का उत्थान चाहने वाले विद्वानों व संस्थाओं के प्रयासों को सम्मान दिया जाए।  विश्व के हर देश में हिंदी का प्रचार प्रसार व उसका उत्थान करने वाली संस्थाओं व उनसे जुड़े विद्वानों को हृदय से सम्मान दिया जाए। फिर केवल सितंबर माह ही हिंदी मय नहीं होगा, पूरा वर्ष हिंदी मय होगा।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८३ ⇒ पाप और पुण्य का खेल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पाप और पुण्य का खेल ।)

?अभी अभी # १०८३ ⇒ आलेख – पाप और पुण्य का खेल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

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ये पाप है क्या, ये पुण्य है क्या !

रीतों पर धर्म की मोहरें है।

– साहिर

हम जो भी अच्छा-बुरा करते हैं, कुछ खुला, कुछ गुप्त करते हैं !नेकी दरिया में जाती है, बदी बदनामी दिलाती है। बैंक की बैलेंस शीट की तरह पुण्य और पाप जमा और नामे में दर्ज हो जाते हैं। देहमुक्त होते ही, चित्रगुप्त के दरबार में खाता खोला जाता है। पाप-पुण्य का हिसाब होता है, फैसला सुनाया जाता है। या तो स्वर्ग, या नर्क।

हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश, विधि हाथ !

– गोस्वामी तुलसीदास

लीजिए ! स्वर्ग-नरक का हिसाब चित्रगुप्त के हाथ और हानि-लाभ, यश-अपयश विधि हाथ। तब तो फिर अपना हाथ जगन्नाथ। लेकिन यह सब इतना आसान कहाँ ! तुम जैसे कर्म करोगे वैसा फल देंगे भगवान। अब आप या तो हानि-लाभ और यश-अपयश की चिंता कर लो, या पाप और पुण्य की।।

पुण्य का खेल तो बहुत आसान है ! पुण्य को दान-पुण्य भी कहते हैं। दान-पुण्य से स्वर्ग मिलता है। शास्त्रों में लिखा है। गंगा-नहा लेने से पापों से मुक्ति मिल जाती है। तीर्थाटन से पुण्य संचित होता है। कथा-भागवत सुनने से मोक्ष मिलता है और कुम्भ स्नान से न केवल पाप नष्ट होते हैं, अमृत की कुछ बूँदों की भी आप पर वर्षा हो जाती है। मतलब हम सबका न केवल स्वर्ग, अपितु मोक्ष और वैकुण्ठ भी सुरक्षित।

चलिए ! अगर आप से इतना भी नहीं होता तो फिकर नॉट। कलयुग नाम अधारा, सिमर सिमर उतरै पारा। जय श्रीराम।

रुकिए रुकिए कहाँ चले ! अपने पापों का भी तो हिसाब करते जाइए। अरे वाह साहब ! अभी तो आपने कहा था, कि गंगा स्नान से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। उस ग्यारंटी का क्या हुआ ? हमें नहीं पता। लेकिन क्या आपको पता नहीं, झूठ बोलना, चोरी करना, किसी की निंदा करना, हिंसा करना, यह सब पाप है। काम, क्रोध, मद, मत्सर के रहते आप स्वर्ग नहीं जा सकते। आपका चित्त मलिन है, फिल्मी गाने गाया करता है। आप स्वर्ग नहीं घोर नर्क के भागी हो। क्या आपको ज्ञात नहीं, महाभारत के युद्ध के पश्चात, पाँच पांडवों में से केवल धर्मराज युधिष्ठिर ही स्वर्गारोहण कर पाए थे। एक के साथ एक फ्री की स्कीम में उनका वफादार कुत्ता भी स्वर्ग चला गया। उनके खाते में केवल आधा झूठ बरामद हुआ, जब उन्होंने कहा, नरो वा कुंजरो वा। वह भी धर्म की रक्षा के लिए। द्युत क्रीड़ा में शकुनि ने उनके साथ छल किया, इसलिए माफी मिल गई।।

तब आखिर एक सदाचारी की परिभाषा क्या ! क्या उसे दूध से धुला हुआ होना चाहिए ? जहाँ शुद्ध दूध और घी की ही गारण्टी नहीं, वहाँ केवल या तो अभिषेक-युक्त भगवान ही पंचामृत से धुले हुए हो सकते हैं, या फिर ऐश्वर्या-युक्त अभिषेक बच्चन। कितनी पीढ़ियों की पुण्याई है बंदे के पास।

हम लोग पूर्वजन्म में विश्वास नहीं रखते, स्वर्ग-नरक में विश्वास करते हैं, इसलिए या तो हमें स्वर्ग दे दो, वर्ना हमको दूसरा जन्म नहीं मंगता। eat, drink and be merry! नरक में जाएँ हमारे दुश्मन। बस, बात ख़तम।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८९ – देश-परदेश – नाम में क्या रखा है? ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८९ ☆ देश-परदेश – नाम में क्या रखा है? ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे यहां लोग अपने इष्ट देव का पर्यायवाची आदि से नाम रखना पसंद करते थे, ताकि उनका बच्चा भी उन्हीं के सामान गुणकारी बने। इसीलिये रावण, कंस, शूर्पनखा  आदि नाम किसी बच्चे का नहीं सुना हैं। इंसान अपने कर्मो से ही पहचान बना लेता है, नाम महत्वपूर्ण नहीं होता हैं।

इन दिनों चर्चित नाम है, तुकाराम मुंडे जोकि वर्तमान में  महाराष्ट्र के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेटर विभाग में कमिश्नर श्री तुकाराम मुंडे इन दिनों बहुत अधिक चर्चा में चल रहे हैं। मई 2026 में इस पद पर विराजमान होते ही उन्होंने अपने तेवर दिखाने आरंभ कर दिए हैं।

कुछ सप्ताह पूर्व करीब चालीस करोड़ के गुटका मसाले जप्त करने के बाद, उन्होंने मुम्बई के बड़े होटल, खाद्य जिंसों के वितरण आदि संस्थाओं के यहां भी छापा मार कर खाद्य उद्योग में खलबली मचा दी हैं। मुम्बई में अमीर और गरीब सब के प्रिय वड़ा पाव बेचने वाले तक को नहीं छोड़ा हैं। अभी तक सस्ता वडा पाव अखबार के पन्ने को टुकड़े में परोसा जाता हैं। अखबार की स्याही हानिकारक होती है, इस लिए इसको अब प्रतिबंधित कर दिया गया हैं।

मुंबई के रद्दी/भंगार आदि व्यवसाय से जुड़े लोगों को आर्थिक हानि हो गई हैं। पुराने अखबार के स्टॉक रखने वाले सकते में आ गए हैं। एक मित्र से मुंबई में बात हुई, तो उसने बताया रद्दी क्रेताओं ने भी अब बहुत कम रेट कर दिए हैं।

विगत दिन ये अफवाह उड़ी थी, कि तुकाराम को राजस्थान स्थानांतरित कर दिया गया हैं। उनके दो दशक के कार्यकाल में दो दर्जन ट्रांसफर हो चुकी हैं। उपरोक्त चित्र हमारे जयपुर के बहुत सारे परिवारों की रसोई का हैं। अब जयपुर की महिलाएं इंतजार में कब तुकाराम मुंडे उनकी किचेन की गंदगी देखकर, उनके रसोई घर बंद करवा देगा और उनको भी इस बोरिंग सी दिनचर्या के काम से मुक्ति मिलेगी।

तुकाराम नाम में कुछ तो है, 26/11 के हमले में पाकिस्तानी आतंकवादी  दरिंदे कसाब को भी तो मुंबई पुलिस के कांस्टेबल स्वर्गीय तुकाराम अंबाले ने ही जान की बाजी लगा कर जिंदा पकड़ा था। हम तो इस बात को नकारते है, कि नाम में क्या रखा हैं।

© श्री राकेश कुमार

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मोबाईल 9920832096

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ 🏔️ हिमालय में 7,500 ग्लेशियर झीलें ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🏔️ हिमालय में 7,500 ग्लेशियर झीलें 🌱 

🏔️ हिमालय में 7,500 ग्लेशियर झीलें—क्या 189/195 झीलें कभी भी फट सकती हैं?

🇳🇵 नेपाल की त्रासदी से सबक, लेकिन घबराहट नहीं

नेपाल में हुई भीषण हिमालयी त्रासदी ने स्वाभाविक रूप से पूरे हिमालय को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच एक प्रमुख अखबार की यह सुर्खी सामने आई—

“चिंता… देश में 189 ग्लेशियर झीलें फटने की स्थिति में, पूरे हिमालय में 7500 ऐसी झीलें।”

सुर्खी निश्चित ही डर पैदा करती है। लेकिन क्या वास्तविक स्थिति इतनी भयावह है?

थोड़ा तथ्य समझना उपयोगी होगा। 🔍

🏔️ 7,500 का मतलब क्या है?

भारतीय हिमालय में हजारों छोटी-बड़ी ग्लेशियल झीलें हैं। National Remote Sensing Centre (NRSC) ने उपग्रहों की सहायता से 7,500 से अधिक ग्लेशियल झीलों को मैप किया है। ये 7,500 ऐसी झीलें नहीं हैं जिन्हें सरकार ने “फटने के कगार पर” माना है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में कुल संख्या इससे भी काफी अधिक—लगभग 28,000 ग्लेशियल झीलों—की है। 7,500 का आंकड़ा उन झीलों से सम्बद्ध है जिन्हें उपग्रह आधारित अध्ययन में चिन्हित/मैप किया गया है।

🚨 फिर 189 या 195 का क्या अर्थ है?

यहीं पर समाचार की सुर्खी और वास्तविकता के बीच फर्क समझना जरूरी है।

NDMA ने विभिन्न वैज्ञानिक आंकड़ों, उपग्रह चित्रों और अन्य अध्ययनों को मिलाकर जोखिम-प्रधान झीलों की एक dynamic list तैयार की है।

2024 में इस सूची में 195 high-risk glacial lakes थीं। इससे पहले 189 का आंकड़ा प्रचलित था। अर्थात् 189 कोई “189 झीलें अभी फटने वाली हैं” वाली संख्या नहीं थी।

और high-risk का अर्थ “किसी भी क्षण फटने वाली” भी नहीं है।

इसका अर्थ है कि इन झीलों में ऐसे जोखिम-संकेत पाए गए हैं—जैसे क्षेत्रफल में तेजी से वृद्धि—जिनके कारण इनके संभावित GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) का वैज्ञानिक आकलन और जोखिम-निवारण प्राथमिकता से किया जाना चाहिए।

🛰️ क्या सरकार केवल आंकड़े गिन रही है?

नहीं।

सरकार ने इस खतरे को गंभीरता से लेते हुए National Glacial Lake Outburst Flood Risk Mitigation Programme (NGRMP) शुरू किया है। इसके अन्तर्गत high-risk झीलों का ground assessment, जलस्तर और मौसम की निगरानी, bathymetric surveys, early-warning systems तथा आवश्यकता के अनुसार झील का जलस्तर कम करने जैसे उपाय किए जा रहे हैं।

Central Water Commission भी हिमालयी क्षेत्र में बड़ी ग्लेशियल झीलों और जल निकायों की नियमित निगरानी करता है और GLOF के लिए अधिक संवेदनशील अवधि में monitoring bulletins जारी करता है।

🇳🇵 नेपाल की त्रासदी हमें क्या बताती है?

नेपाल में हुई हालिया आपदा को केवल यह कहकर समझना भी सही नहीं होगा कि “एक ग्लेशियर झील फट गई और बाढ़ आ गई।”

उपलब्ध प्रारम्भिक वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, वहां glacier/ice-rock collapse और debris flow की cascading घटना ने नदी में अचानक अत्यन्त शक्तिशाली बाढ़ पैदा की। अर्थात् हिमालयी खतरे अनेक रूपों में सामने आ सकते हैं—glacial lake outburst, glacier collapse, landslide, debris flow अथवा प्राकृतिक अवरोध टूटने के रूप में।

🌡️ फिर असली चिंता क्या है?

चिंता जरूर है—लेकिन घबराने की नहीं, जागरूक होने की।

बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पीछे हटने और कुछ ग्लेशियल झीलों के विस्तार से हिमालय की प्राकृतिक अस्थिरता बढ़ सकती है। इसलिए वैज्ञानिक निगरानी, early-warning systems, downstream hazard mapping, स्थानीय समुदायों की तैयारी और संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण पर सावधानी अत्यन्त आवश्यक है।

लेकिन “हिमालय में 7,500 झीलें हैं और 189 कभी भी फट सकती हैं” कहना उपलब्ध सरकारी आंकड़ों का सही अर्थ नहीं है।

🌱 सही निष्कर्ष

न तो खतरे को नकारना समझदारी है,

न ही आंकड़ों को सनसनी में बदलना।

हिमालय हमें चेतावनी दे रहा है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ की गुंजाइश कम होती जा रही है। इसका उत्तर डर फैलाना नहीं, बल्कि विज्ञान, सतर्कता, बेहतर आपदा-प्रबंधन और पर्यावरण-सम्मत विकास है।

🏔️ हिमालय को डर की नजर से नहीं,

समझ और सम्मान की नजर से देखने का समय है।

🌿 जागरूक रहें। घबराएँ नहीं।

प्रकृति को समझें—और उसकी सीमाओं का सम्मान करें।

प्रस्तुति: जगत सिंह बिष्ट 🪷

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८२ ⇒ बस्ता ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बस्ता…।)

?अभी अभी # १०८२ ⇒ आलेख – बस्ता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अमीरों की टाउनशिप होती है, गरीबों की बस्ती ! बस्ती के बच्चे सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन और छात्रवृत्ति के लिए जाते हैं, और टाउनशिप के बच्चे आईपीएस और डीपीएस में एक अच्छा इंसान बनने। वे भी क्या दिन थे, जब सबके लिए एक ही स्कूल होता था, और एक जैसा ही बस्ता।

घर में हाथ से सिली हुई थैली ही बस्ता कहलाती थी, जिसमें एक पट्टी, पेम, पेंसिल और पढ़ने-लिखने की किताब होती थी।

कुछ सम्पन्न बच्चे तो पानी-पोता भी लेकर आते थे। कुछ गंदे बच्चे थूक से पट्टी पोंछ लेते थे, तो कुछ लट्ठे के कमीज से ही पट्टी साफ कर लिया करते थे। जिस रोज कोई राष्ट्रीय त्योहार होता था, बस्ती-पट्टे की छुट्टी हो जाती थी।।

समय के साथ बस्ता भी बड़ा होता चला गया। हर विषय की कॉपी किताब, परीक्षा के समय स्याही वाला पेन, स्केल, कंपास और न जाने क्या क्या ! जो बस्ता कभी हाथ में रहता था, अचानक वेताल की तरह कंधे पर आ बिराजा। खाने का टिफ़िन और वॉटर बॉटल भी साथ में ही लद लिये।

कभी कभी रेलवे के हम्मालों के कंधों और सर पर बोझा लदा देखकर आज के स्कूली बच्चे निगाहों के सामने आ जाते हैं।

मोटी ताज़ी स्कूल की फीस के साथ बच्चों के कंधों पर बस्ते का बोझ, सर पर पढ़ाई का बोझ, और माता-पिता पर बच्चे के उज्ज्वल भविष्य का बोझ।।

बस्ता बच्चे की पहचान है ! कभी किसी के बस्ते को लात लग जाती, तो उसको छूकर माफी माँगनी पड़ती थी। वह विद्या है। समय कितना भी बदल जाएबस्ते में विद्या है, ज्ञान का भंडार है, सरस्वती का वास है। बच्चों का भविष्य है, माता पिता के सपने इन्हीं बस्तों में बंद है।

यह बस्तों की बस्ती है। यहाँ दिन भर मेहनत है, पढ़ाई है, और आंखों में अच्छे नम्बरों से पास होने की, स्कूल में टॉप करने की उम्मीद बसती है। बच्चा है, तो बस्ता है, जिसमें से ज्ञान बरसता है। हर बस्ते में एक बच्चे का सुनहरा भविष्य बसता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४६ ☆ आलेख – खाप और खूंटा (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय आलेख – ‘खाप और खूंटा (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४६ ☆

☆ आलेख ☆ खाप और खूंटा (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

हाल ही में हरयाणा की एक खाप पंचायत का ब्यौरा टीवी पर देखा। पंचायत में अन्य निर्णयों के अलावा लड़कियों के आचरण के बारे में कुछ निर्णय लिये गये— कि लड़कियां दुपहिया वाहन पर पीछे बैठते वक्त एक ही तरफ पैर रखें, दोनों तरफ नहीं, छोटे कपड़े न पहनें, मोबाइल का इस्तेमाल न करें, भाग कर शादी न करें, शादी में माता-पिता की सहमति लें, ‘लिव इन’ में न रहें। मर्जी की शादी करने वाले और ‘लिव इन’ में रहने वाले जोड़ों के लिए सामाजिक बहिष्कार की सज़ा निर्धारित की गयी।

ज़हिर है कि पितृसत्तात्मक समाज युवाओं, ख़ास तौर से लड़कियों पर अपनी गिरफ्त ढीली नहीं करना चाहता। हमारा संविधान नागरिकों को जो भी अधिकार दे, ये जाति- पंचायतें और ग्राम-पंचायतें समाज को पुरानी, प्रासंगिकता खो चुकी मान्यताओं में ही जकड़ कर रखना चाहती हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक ताज़ा निर्णय के अनुसार लिव-इन रिश्ता शादी जैसा है। माता-पिता इसमें दख़ल नहीं दे सकते।

आज की लड़कियों को देखकर यह समझना मुश्किल है कि वे कितने  संघर्ष और कितनी बाधाओं को लांघ कर वर्तमान स्थिति तक पहुंच पायी हैं। कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, सती प्रथा, कन्या शिक्षा निषेध, विधवा विवाह निषेध, देवदासी प्रथा जैसे जाने कितने सड़े-गले नियम ख़त्म किये गये। इसमें उच्च अंग्रेज़ अधिकारियों और देशी समाज-सुधारकों की बड़ी भूमिका रही, जिन्होंने रूढ़िवादियो के कट्टर विरोध के बाद भी अपने प्रयासों में ढील नहीं आने दी। कहीं पढ़ा  कि प्राचीन बंगाल में पति की मृत्यु के बाद विधवा की दुर्गति हो जाती थी। बहुत दिनों तक मांगलिक कार्यों में विधवाओं को शामिल नहीं किया जाता था। विधवा के द्वारा रंगीन वस्त्र पहनना या आभूषण धारण करना भी अनुचित माना जाता था। उससे जीवन भर सफेद सादा वस्त्र धारण करने की अपेक्षा की जाती थी।

कई साल पहले एक अखबार में सती प्रथा पर एक बड़े धर्मगुरु का वक्तव्य पढ़ा था। वे राजस्थान में सती-प्रथा पर प्रतिबंध लगने से दुखी थे। उनका कथन था— ‘जो स्वेच्छयता से सती होना चाहती है उसे रोकना नहीं चाहिए और जो सती नहीं होना चाहती उसे इस कार्य के लिए बाध्य भी नहीं किया जाना चाहिए।— हमारे यहां आत्महत्या करने से पाप होता है, लेकिन सती को ऐसा कोई पाप नहीं लगता और सती होकर वह पति को भी पापों से मुक्त कर देती है।— सच्ची सती वह है जो पतिव्रता धर्म का पालन करे। ऐसा करने वाली स्त्री वस्तुत: पति के जीवन काल में ही सती हो जाती है।’

हमारे समाज में अगर सड़क पर लड़के लड़कियों के साथ गुंडई करें तो उसके लिए अक्सर लड़कियों के आचरण और उनके छोटे कपड़ों को ही दोषी माना जाता है। हमारे यहां लड़के-लड़की की दोस्ती को अस्वाभाविक माना जाता है। इसीलिए लड़की तभी सुरक्षित महसूस करती है जब वह लड़कें को अपना ‘भाई’ बना लेती है या उसकी कलाई पर राखी बांध देती है। लड़के- लड़की की ‘दोस्ती’ को हमेशा सन्देह की नज़र से देखा जाता है।

लड़कियों के ‘शऊर’ और उनकी ‘पवित्रता’ को लेकर इतनी ज़्यादा चौकन्नी और चिन्तित खापों को यह याद दिलाना ज़रूरी लगता है कि हरयाणा में ही एक सन्त विराजते हैं जो दो शिष्याओं पर कृपा बरसाने के जुर्म में 2017 से सज़ा काट रहे हैं और अब तक आठ साल में सत्रह बार पैरोल या फ़र्लो पर जेल से बाहर आ चुके हैं। जब भी जेल से बाहर आते हैं कारों के काफिले में निकलते हैं और बाहर आकर ऑनलाइन प्रवचन और भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। हरयाणा की खापों की लड़कियों के आचरण पर बारीक नज़र रहती है, लेकिन ऐसे सन्तों के बारे में उनकी ज़बान बन्द रहती है। हरयाणा के एक मंत्री जी भी इन सन्त जी के सामने सिर नवाने के साथ चढ़ावा चढ़ा चुके हैं। कारण यह है कि सन्त जी के करोड़ों शिष्य हैं और उनके इशारे पर करोड़ों वोट पार्टी की झोली में गिर सकते हैं।

हमारे देश में धर्मगुरुओं के प्रति शिष्यों की आस्था इतनी ज़बरदस्त रहती है कि गंभीर आरोपों के बाद भी गुरूजी के प्रति शिष्यों की भक्ति में ‘डेंट’ नहीं लगता। दरअसल ज़्यादातर लोगों के लिए ज़िन्दगी में कोई न कोई खूंटा पकड़े रहना ज़रूरी होता है। बिना खूंटे के अपने बूते ज़िन्दगी काटने वाले विरले होते हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३५० – चमत्कार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # ३५० चमत्कार… ?

कभी किसी को कहते सुनते हैं कि आज तो चमत्कार हो गया! क्या है चमत्कार होना? स्थूल रूप से विचार करें तो मनुष्य के लिए जो अकल्पनीय है, ‘लार्जर देन लाइफ’ है, वही चमत्कार है। चमत्कार की विशेषता है कि वे सुनने में आते हैं पर दिखते नहीं। यद्यपि प्रकृति इसका अपवाद है। वहाँ हर क्षण चमत्कार उद्घाटित हो रहे होते हैं, बशर्ते हम उन्हें देखना चाहें।

लौटते हैं मूल विषय पर। चमत्कार एक अलग ही प्रकार की विडंबना का शिकार है। यदि वह आँखों से प्रत्यक्ष दिख गया तो फिर उसे चाहे जो नाम दें पर चमत्कार नहीं रह पाता। चमत्कार का दर्शन ही चमत्कार का विसर्जन है। इस संदर्भ में चमत्कार अभागा है, इस संदर्भ में चमत्कार एकमेवाद्वितीय है।

वस्तुत: चमत्कार कोई वाह्य बल या एक्सटर्नल फोर्स नहीं है। अपनी विसंगतियों से जूझते मनुष्य के भीतर कुछ ऐसा कर गुज़रने की इच्छा होती है जो उसे सारी कठिनाइयों से पार कर ऊँचे, बहुत ऊँचे स्थापित कर दे। कभी विवशता के क्षणों में मनुष्य कल्पना करता है कि कुछ ऐसा हो जाए कि सारी समस्याएँ क्षण भर में अदृश्य हो जाएँ। कभी चाहता है कि परेशानियों का सामना किए बिना वे छू-मंतर हो जाएँ। प्राय: कामना करता है कि परिश्रम किए बिना ही रातों-रात उसकी आर्थिक स्थिति बेहतर हो जाए। अपनी सारी वांछनाओं को पलक झपकते ही पाने का मानसिक माध्यम होता है चमत्कार।

ब्रह्मांड में चमत्कार होते हैं या नहीं, यह हमारी चर्चा का विषय नहीं है। तथापि मनन करें तो मनुष्य का अस्तित्व अपने आप में चमत्कार उत्पन्न करने का बहुत बड़ा साधन है। दर्शन की एक धारा देह में ब्रह्मांड का दर्शन करती है। ब्रह्मांड समस्त अस्तित्व  का समुच्चय है। इसमें पदार्थ एवं ऊर्जा के सभी रूप तथा उनके द्वारा निर्मित लघुत्तम से महत्तम सभी संरचनाएँ सम्मिलित हैं।

ब्रह्मांड का लघु रूप पिंड या देह है। देह का विस्तार ब्रह्मांड है। एक तरह से देह, ब्रह्मांड का मॉडल है, छोटे आकार की रेपलिका है। मन, प्राण और देह मिलकर संभावनाओं का समुच्चय बनता है।

प्राण को परिभाषित करते हुए शाखायान आरण्यक कहता है,

यो व प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः।

अर्थात जो प्राण है, वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।

प्रज्ञा मनुष्य में अस्तित्व फूँक देती है। व्यष्टि को समष्टि की व्यापकता प्रदान करने की प्रकृति है प्रज्ञा‌। प्रकृति ब्रह्मांड का एक अंग है। जैसाकि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, प्रकृति में  निरंतर चमत्कार देखने को मिलते हैं। स्वाभाविक है कि प्रकृति के अंश मनुष्य में भी चमत्कार उद्घाटित करने की क्षमता अंतर्निहित है।

चमत्कार फलीभूत करने के लिए कार्य करना होगा।  कार्य को परिभाषित करते हुए विज्ञान कहता है कि  जब किसी वस्तु पर कोई बल लगाया जाता है और वस्तु उस बल की दिशा में विस्थापित होती है तो इसे बल द्वारा किया गया कार्य कहा जाता है। कार्य के लिए संकल्प, कर्मनिष्ठा और कठोर परिश्रम आवश्यक हैं।

अतः चमत्कार की प्रतीक्षा मत करो। चमत्कार के घटने  का माध्यम बनो। मनुज की देह मिली है, प्रज्ञा मिली है। अपार संभावनाएँ तुम्हारे पास हैं।

जैसे रीछपति जामवंत ने हनुमान जी उनकी क्षमताओं का स्मरण कराया था, वैसे ही आवश्यकता है अपनी क्षमताओं को स्मरण करने की, उनके अनुसार अपना समुद्र पार करने की।

‘चमत्कार’ शीर्षक की अपनी एक कविता स्मरण आ रही है-

चमत्कार,

चमत्कार,

चमत्कार..!

 

चमत्कार के किस्से

 

सुने सदा,

चमत्कार घटित होते

देखा नहीं कभी,

अपनी क्षमताओं का

चमत्कार

 

उद्घाटित करो,

फिर  चमत्कार को

अपनी आँख के आगे

घटित होते देखा करो..!।

‘स्मरण करने’ इसलिए कहा कि कोई दूसरा स्मरण नहीं कराएगा। अतः स्मरण रहे कि

जांबवंत तुम्हारे भीतर हैं, और हनुमान जी भी।

अब भी किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता है क्या?

© संजय भारद्वाज 

रात्रि 12:37 बजे, 18.08.2026 (इसी विचार के साथ नींद खुली।)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️💥 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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