डॉ. मुक्ता
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सम्बन्ध बनाम मर्यादा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०१ ☆
☆ सम्बन्ध बनाम मर्यादा… ☆
सम् + बन्ध अर्थात् समान रूप से बंधा हुआ… जहां समता हो; समानता हो; स्वैच्छिक बंधन हो; एक-दूसरे के प्रति सर्वस्य न्यौछावर करने का जज़्बा हो; मर-मिटने का संजीदा भाव हो; पहले आप, पहले आप की शालीनता हो; दूसरों में अच्छाई व गुण तलाशने का प्रयास हो। सो! यह संबंधों में प्रगाढ़ता स्थापित करने के लिए, दूसरों के दु:ख से द्रवित होकर, उन्हें कष्ट से मुक्ति प्रदान करने व करवाने का भाव अहम् भूमिका अदा करता है।
परंतु यह सब तो गुज़रे ज़माने की बातें हो गई हैं। आजकल तो सब संबंध स्वार्थ पर आधारित हैं। हम धन-सम्पत्ति व रुतबा देखकर उसकी ओर आकर्षित होते हैं, क्योंकि आज का युग प्रतिस्पर्द्धा का युग है। हर इंसान अधिकाधिक धन कमाने हेतु मर्यादा को ताक पर रख, सीमाओं को लांघ कर आगे बढ़ जाना चाहता है। पैसे के लिए मानव सब संबंधों को दरक़िनार कर केवल अपनी उन्नति व स्वार्थ-पूर्ति के बारे में सोच-विचार करता है और राह में आने वाली समस्त बाधाओं को रौंदता हुआ लक्ष्य-प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। वह संबंधों की गरिमा व अहमियत को नकार बेतहाशा आगे बढ़ता जाता है और बीच राह आने वाली बाधाओं व किसी के प्रतिरोध करने पर किसी की हत्या करने में भी गुरेज़ नहीं करता।
चलिए! हम दृष्टिपात करते हैं उस मन:स्थिति पर… जब मानव में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की भावना बलवती होती है। उस स्थिति में वह अच्छे-बुरे व उचित-अनुचित के भाव का तिरस्कार कर, अपनी नज़रें लक्ष्य पर केंद्रित कर उस ओर अग्रसर होता है। संवाद संबंधों की जीवन-रेखा है और संबंध सेतु हैं… जीवन का मूलाधार हैं। इनके अभाव में धरा पर जीवन की कल्पना अधूरी है… सर्वथा असंभव है। परंतु आजकल तो पति-पत्नी दाम्पत्य बंधन में बंध, एक छत के नीचे रहते हुए भी अजनबी-सम व्यवहार करते हैं; एक-दूसरे से बेखबर जीवन पथ पर अग्रसर होते हैं; विवशता से अपना जीवन ढोते हैं। इस कारण संयुक्त परिवार- व्यवस्था चरमरा गयी है, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा बच्चों व वृद्धों को भुगतना पड़ रहा है। स्नेह व सुरक्षा के अभाव में बच्चों के कदम अपराध जगत् की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं, जो अपने कुकृत्यों से समाज व देश की जड़ों को खोखला कर रहे हैं।
यदि हम संबंधों का वर्गीकरण करें, तो कुछ संबंध जन्मजात होते हैं– जैसे माता-पिता भाई-बहन व अन्य परिवारजन..जिन से हम जन्म से ही रूबरू हो जाते हैं तथा इसमें हम तनिक भी हस्तक्षेप नहीं कर सकते। हमें न चाहते हुए भी उनसे निबाह करना पड़ता है। शायद! यह माता-पिता द्वारा प्रदत्त उपहार स्वरूप होते हैं, जिनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना हमारा कर्तव्य नहीं, दायित्व होता है। हमें न चाहते हुए भी उन संबंधों को सहर्ष स्वीकारना व अहमियत देनी पड़ती है। कई बार बच्चे माता-पिता की ग़लतियों का अंजाम भुगतते हुए, आजीवन एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हो जाते हैं तथा दायित्व-वहन करते हुए अपने जीवन का स्वर्णिम काल नष्ट कर देते हैं।
मानव एक सामाजिक प्राणी है और संबंध स्थापित करना उसकी मजबूरी होती है, क्योंकि अकेले रह कर जीवन जीने की कल्पना करना बेमानी है। तीसरे स्वार्थ के संबंध होते हैं, जिन्हें मानव अपनी खुदगर्ज़ी के लिए स्थापित करता है और उसका प्रयोग वह स्वार्थ-सिद्धि हेतु सीढ़ी के रूप में करता है। उस स्थिति में वह दूसरे को हानि पहुंचाने, यहां तक कि उसकी हत्या करने में तनिक भी संकोच नहीं करता। ऐसे संबंधों का
आजकल संसार में जाल बिछा हुआ है और हर इंसान मुखौटा धारण कर, दोहरा जीवन जीने को विवश है। यह संबंध अस्थायी होते हैं और लक्ष्य-प्राप्ति के पश्चात् अस्तित्वहीन हो जाते हैं; समाप्त हो जाते हैं…जैसे नज़रों से ओझल होने पर, व्यक्ति मन से भी उतर जाता है…बहुत दूर चला जाता है।
मुझे याद आ रहे हैं, ऐसे बहुत से क़िरदार, जो माता- पिता द्वारा प्रदत्त संबंधों की सज़ा आज तक भुगत रहे हैं। पुत्र की लालसा में सात-सात कन्याओं का भरा-पूरा परिवार जुटा लेने का प्रचलन आज भी बदस्तूर जारी है। पहले लोग यह चिंता नहीं करते थे कि वे अपने बच्चों को धरोहर रूप में इतना बड़ा कर्ज़ अर्थात् उत्तरदायित्व सौंप कर जा रहे हैं, जिसका भुगतान उन्हें तथा आगामी पीढ़ियों को आजीवन अपने हाथों अपने सपनों को होम करके चुकाना पड़ेगा। शायद! इस ओर उनका लेशमात्र ध्यान भी नहीं जाता कि वह मासूम बच्चा कब बड़ा होगा और उसके आत्मनिर्भर होने तक वे जीवित भी रहेंगे या सारा बोझ उसके कंधों पर ज़बरदस्ती लाद कर, इस दुनिया से रुख्सत हो जाएंगे और वह नादान उनकी भयंकर-भीषण कारस्तानियों का फल आजीवन भुगतने को बाध्य होगा। क्या नाम देंगे आप ऐसे माता-पिता को, जन्मदाता…जो सृष्टि- सृजन में भरपूर योगदान देकर अपनी संतान को नरक में अकारण झोंक देते हैं।
यदि हम इसकी व्याख्या करें, तो उनके इस कर्म को भी अक्षम्य अपराध के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए और ऐसे अंधविश्वासी व स्वार्थी माता-पिता के लिए भी कठोर सज़ा व दण्ड का प्रावधान होना चाहिए। यह देखकर अत्यंत दु:ख होता है कि रिश्तों से अनजान, एक नवजात शिशु को न जाने कितने अटूट रिश्तों-बंधनों में बांध दिया जाता है… मानो उसे चक्रव्यूह में जकड़ दिया जाता है; जहां से मुक्ति पाने का कोई विकल्प-उपाय नहीं होता। वह निरीह औरत की भांति उस अपराध की सज़ा आजीवन भुगतने को विवश होता है, जो उसने किया ही नहीं और न ही समाज द्वारा प्रदत्त होता है–उसे अपना पक्ष रखने का अधिकार। इन परिस्थितियों में वह लड़का हो या लड़की, उसे अपना जीवन प्रतिदान रूप में देना पड़ता है…अपने सपनों-अरमानों को अपने हाथों रौंद कर; उनकी सहर्ष बलि देकर, अपने समस्त जीवन को बहन-भाइयों व माता-पिता के पालन-पोषण हेतु झोंकना पड़ता है। यहां लड़के- लड़की में भेद नहीं होता, क्योंकि यह मसला है, माता-पिता द्वारा की गई ग़लतियों का परिणाम भुगतने का..यहां तक तो समाज में समानाधिकार व्यवस्था लागू है…जिसमें कोई भेदभाव नहीं है। वैसे तो आजकल वृद्धावस्था में माता-पिता के भरण- पोषण का दायित्व, पुत्र न होने की स्थिति में पुत्री को वहन करना लाज़िमी है। ठीक ही तो है, अब तो उसे संपत्ति में समानाधिकार प्राप्त है। अधिकार व कर्त्तव्य का चोली-दामन का साथ है। एक के बिना दूसरा अस्तित्वहीन है। वैसे तो यह संतान का नैतिक दायित्व भी है।
हां! आवश्यकता है, माता-पिता को अपनी सोच बदलने की…सो! अब उन्हें बेटी के घर का अन्न-जल ग्रहण करने की परंपरा का त्याग करना होगा। वैसे भी बड़े-बड़े शहरों में अक्सर माता-पिता बेटियों के घर में रहते हैं। इसका मुख्य कारण है…बेटों का विदेशों में नौकरी करना और माता-पिता को पाश्चात्य संस्कृति का रास न आना। अक्सर सिंगल चॉइल्ड होने के कारण भी बेटियों के लिए इस दायित्व को निर्वहन करना अनिवार्य हो जाता है।
आधुनिक युग में महिलाएं नौकरी करती हैं और दोहरा जीवन जीती हैं। परन्तु कहां बदल पाए हैं, हम अपनी दकियानूसी सोच; कहां त्याग पाए हैं रूढ़ियों, परंपराओं व प्राचीन मान्यताओं को… जिसका स्पष्ट प्रमाण है…पति व परिवारजनों की अपेक्षाओं में तनिक भी परिवर्तन न आना…जिसका संबंध उनकी सोच में परिवर्तनशीलता से है। परंतु वह सर्वथा असंभव है…ऐसा तो कभी हो नहीं सकता। भले ही हम भौतिक दृष्टि से संपन्न हो गए हैं, परंतु हमारी सोच, विचारधारा व मानसिक धरातल सदियों पहले जैसा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है…कन्या पक्ष के लोगों का वर-पक्ष के लोगों के सम्मुख ता-उम्र नत-मस्तक रहना; उनकी अप्रत्याशित इच्छाओं व मांगों की लंबी फेहरिस्त की पूर्ति करना, भले ही वे उस में सक्षम न हों। इतना ही नहीं, उनके माता-पिता और उनकी आगामी पीढ़ी के साथ न चाहते हुए भी संबंध-निर्वाह करना; उनकी नियति, मजबूरी व विवशता बन जाती है…. यहां तक कि मरणोपरांत मृत्युभोज व कफ़न जुटाना भी वधु के माता-पिता का ही दायित्व होता है। क्या हम चाह कर भी इन प्राचीन परंपराओं से भविष्य में भी मुक्ति पाने में समर्थ हो सकेंगे?
परंतु चंद महिलाएं अपनी संस्कृति को तज, ग़लत राहों पर चल पड़ी हैं। देर रात तक क्लबों में सिगरेट के क़श लगाना, जुआ खेलना तथा नशे की हालत में लड़खड़ाते हुए लौटना उनकी दिनचर्या में शामिल है। अपहरण, फ़िरौती, हत्या व धन-सम्पदा पाने के लिए विवाह रचाना, पति व परिवारजनों पर दहेज की मांग का इल्ज़ाम लगा जेल भिजवाना–उनके शौक में शामिल है’, जिसमें महिला के माता-पिता का भी भरपूर योगदान रहता है। वे ‘तू नहीं, और सही’ और खाओ पीओ, मौज उड़ाओ’ में विश्वास रखने लगी हैं …वे हर पल को खुशी से भरपूर जी लेना चाहती हैं। सो! संबंध-सरोकार अंतिम सांसें ले रहे हैं… मरने के कग़ार पर हैं। लिव-इन के प्रचलन के कारण परिवार टूट रहे हैं; सिंगल पेरेंट की संख्या बढ़ रही है, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा बच्चे भुगत रहे हैं तथा अपराध-जगत् की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। सो! हमें प्रचलित मान्यताओं व अंधविश्वासों से मुक्ति पाने के लिए समाज में विवाह-रूपी संस्था को पुन: जीवन-दान प्रदान करना होगा। लिंग-भेद को नकारना होगा, ताकि तथाकथित माता-पिता ऐसे भीषण ग़ुनाह न करें और बच्चों को उनके कर्मों की सज़ा आजीवन न भुगतनी पड़े और वे अपने सपनों को साकार करने व जीवन को अपने ढंग से जीने को स्वतंत्र हों।
आइए! हम प्राचीन परंपराओं को तोड़, सामाजिक बुराइयों को दफ़न कर समूल नष्ट कर दें तथा नयी सोच, नयी उमंग व नयी तरंग के साथ, नवीन युग में पदार्पण करें, जहां लघुता-प्रभुता का भेद न हो और सब अपने कर्त्तव्य-दायित्वों का सहर्ष वहन करें। अपनी सीमाओं को लांघ, जीवन में मर्यादा का अतिक्रमण न करें, ताकि त्याग का सर्वोपरि भाव सदैव बना रहे। यही है मानव जीवन की अपेक्षा व पराकाष्ठा…जिसे धारण कर हम मासूमों को आत्महत्या करने से रोक पाएंगे…जो स्वयं को इन दायित्वों के चक्रव्यूह में फंसा हुआ पाते हैं और वे पलायनवादिता की राह पर चल पड़ते हैं, क्योंकि उन्हें अपने जीवन का अंत करने से सुगम, कोई दूसरा उत्तम उपाय-विकल्प दिखाई नहीं पड़ता।
परंतु हमें स्मरण रखना चाहिए कि मानव जीवन अनमोल है, जो हमें चौरासी लाख योनियों की यात्रा करने के पश्चात् प्राप्त होता है। सो! संबंधों को शाश्वत बनाए रखने के लिए दरक़ार है… स्नेह, सहयोग, समर्पण व त्याग की; प्रबल इच्छा-शक्ति, एकाग्रता व अटल विश्वास की… इन्हें जीवन में अपना कर, जहां हम संबधों व सरोकारों को जीवंतता प्रदान कर, समाज व देश को, समुन्नत व समृद्ध बना सकेंगे और स्नेह, प्रेम, सहयोग, सौहार्द, समन्वय व सामंजस्यता द्वारा समरसता का साम्राज्य स्थापित करने में समर्थ हो सकेंगे।
अंतत: मैं यह कहना चाहूंगी कि संबंध….अर्थात् यदि हम समान रूप से बंधे रहेंगे और मर्यादा व सीमाओं का उल्लंघन-अतिक्रमण नहीं करेंगे, तो ग़िले-शिक़वे व शिकायतें स्वत: समाप्त हो जाएंगी… हम अपने-अपने द्वीप से बाहर निकल, सौहार्दपूर्ण ढंग से अपना जीवन बसर कर सकेंगे। स्वार्थहीन संबंध स्थायी होते हैं, क्षणिक नहीं…न उनमें कोई वाद-विवाद व संघर्ष होता है; न ही प्रतिदान की इच्छा व आकांक्षा। सो! यही है संबंधों के स्थायित्व का मात्र उपादान, जिससे मर्यादा भी सुरक्षित रह सकेगी।।
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© डा. मुक्ता
माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी
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