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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आतिश का तरकश #167 – 53 – “सारी रात गुज़ार देते बातों में ही…” ☆ श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’ ☆

श्री सुरेश पटवा (श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। श्री सुरेश पटवा जी  ‘आतिश’ उपनाम से गज़लें भी लिखते हैं ।प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ आतिश का तरकश।आज प्रस्तुत है आपकी ग़ज़ल “सारी रात गुज़ार देते बातों में ही…”।) ग़ज़ल # 53 – “सारी रात गुज़ार देते बातों में ही…” ☆ श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’  ☆ जो दोस्त करते नहीं सगा करते, सगे दोस्त कभी नहीं दगा करते। ☆ मिल गए तो सँभाल कर रखिए, दोस्त पेड़ों पर नहीं लगा करते। ☆ आँसुओं से सींचना पड़ता इन्हें, दोस्त खेत में नहीं ऊगा करते। ☆ हमेशा साथ रहते वक़्ते मुसीबत, छोड़ कर तुम्हें नहीं भगा करते। ☆ सारी रात गुज़ार देते बातों में ही, कोई इस तरह नहीं जगा करते। ☆ दोस्ती को धर्म की तरह निभाओ, आस्था...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # 44 ☆ मुक्तक ।।हर दिन इक़ नया संग्राम है यह जिन्दगी।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस”☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस” (बहुमुखी प्रतिभा के धनी  श्री एस के कपूर “श्री हंस” जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। आप कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। साहित्य एवं सामाजिक सेवाओं में आपका विशेष योगदान हैं।  आप प्रत्येक शनिवार श्री एस के कपूर जी की रचना आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण मुक्तक ।।हर दिन इक़ नया  संग्राम है यह जिन्दगी।।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # 44 ☆ ☆ मुक्तक  ☆ ।।हर दिन इक़ नया  संग्राम है यह जिन्दगी।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆  [1] बस सुख और   आराम ,नहीं है जिंदगी। ना होना दुख का निशान, नहीं है जिंदगी।। संघर्षों से दाम वसूलती, वह  जिंदगी है। गमों पर  लगे   विराम,  नहीं है जिंदगी।। [2] ऐशो आराम  तामझाम,  नहीं है  जिंदगी। बस खुशियों का ही पैगाम,नहीं है जिंदगी।। कभी खुशी कभी  गम,   का ही नाम यह। कोशिशों से पाना मुकाम ,है यह   जिंदगी।। [3] हर सुख का मिला जाम, नहीं है जिंदगी। बस  यूँ ही गुमनाम,    नहीं  है जिंदगी।। संघर्ष अग्नि पर ,तपकर बनता है सोना। अपने स्वार्थ...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – है और था ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) ☆ आपदां अपहर्तारं ☆ 🕉️ मार्गशीष साधना🌻 आज का साधना मंत्र  - ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (साधको! मार्गशीर्ष साधना आज सम्पन्न हो जाएगी) आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 109 ☆ ग़ज़ल – “हैरान हो रहे हैं सब देखने वाले हैं…”☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध (आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित एक ग़ज़ल – “हैरान हो रहे हैं सब देखने वाले हैं…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।)  ☆ काव्य धारा #110 ☆  ग़ज़ल  – “हैरान हो रहे हैं सब देखने वाले हैं…” ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆ सच आज की दुनियॉं के अन्दाज निराले हैं हैरान हो रहे है सब देखने वाले हैं।   धोखा, दगा, रिश्वत  का यों बढ़ गया चलन है देखों जहॉं भी दिखते बस घपले-घोटाले हैं।   पद ज्ञान प्रतिष्ठा ने तज दी सभी मर्यादा धन कमाने के सबने नये ढंग निकाले हैं।   शोहरत औ’ दिखावों की यों होड़ लग गई है नज़रों में सबकी, होटल, पब, सुरा के प्याले हैं।   महिलायें तंग ओछे कपड़े पहिन के खुश है आँखें  झुका लेते वे जो देखने वाले हैं।   शालीनता सदा से श्रृंगार थी नारी की उसके नयी फैशन ने दीवाले निकाले हैं।   व्यवहार में बेइमानी का रंग चढ़ा ऐसा रहे मन के साफ थोड़े, मन के अधिक काले हैं।   अच्छे-भलों...
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ज्योतिष साहित्य ☆ वार्षिक राशिफल 2023 ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। पाठकों के विशेष अनुरोध पर आज प्रस्तुत है वार्षिक राशिफल 2023।)   ☆ ज्योतिष साहित्य ☆ वार्षिक राशिफल 2023 ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆   निवेदक:- ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय (प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री) सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल  संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश  मो – 8959594400 ईमेल – aasra.jyotish@gmail.com यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष  ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (12 दिसंबर से 18 दिसंबर 2022) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?  ☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (12 दिसंबर से 18 दिसंबर 2022) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆ भाग्य और परिश्रम के बारे में बहुत सारे तक दिए जाते हैं एक तर्क यह भी है की तुम्हारे भाग्य में सब कुछ है देखो । कभी सही मंजिल पहचान के तो देखो ।। वक्त तो लगेगा ही ऊंचाइयों तक पहुंचने में । अपने हौसलों...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ “द्वैत…” ☆ श्री आशिष मुळे ☆

श्री आशिष मुळे    कवितेचा उत्सव  ☆ “द्वैत…” ☆ श्री आशिष मुळे ☆ खेळून खेळून लपंडाव कंटाळलो आहे घेऊन सारखं सारखं राज्य वैतागलो आहे भिंतीमागे कधी साद देतोस अनाहत नादात नेहमी भासवतोस भास शब्दांच्या गवतात धरायला जातो तुला जेव्हा झाडामागे दिसतात तेव्हा विंचू लपलेले दगडामागे ती माया मला नेहमी लांबून खिजवते धावतो मग चिडून तुझ्या त्या मैत्रिणीच्या मागे   तुला फसवून बाहेर आणायला काय नाही केलं गोड गोड स्तुती करणारी तुझी गाणी म्हटली मंत्रमुग्ध करणारी सुगंधी काडी जाळली पण तू आहेस आपल्या सगळ्यात हुशार घेत नाहीस सहजी कोणाचाही कैवार खरं सांगू, मला तुझा फायदा नको आहे फक्त हात तुझ्या दोस्तीचा हवा आहे   पुरे झाला रे आता हा लपंडावाचा त्रागा फिरवल्यासना मला सगळ्या जागा किती काळ झाला आपण खेळतोय याचा काहीच हिशोब नाहीये किती वेळ अजून खेळणारे याचा काहीच अंदाज नाहीये जाऊ रे आता परत आपल्या घरी संपव क्षणात तुझ्या माझ्यातली दरी... © श्री आशिष मुळे ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 130 – हवा अंत ☆ श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे ☆

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे   कवितेचा उत्सव  ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 130 – हवा अंत ☆ मनी वाचतो मी तुझा ग्रंथ आता। जिवाला जिवाची नको खंत आता।   असावी कृपा रे तुझी माय बापा। नको ही निराशा दयावंत आता।   पताका पहा ही करी घेतली रे। अहंभाव नाशी उरी संत आता ।   सवे पालखीच्या निघालो दयाळा। घडो चाकरी ही नवा पंथ आता।   तुला वाहिला मी अहंभाव सारा। पदी ठाव देई कृपावंत आता।   चिरंजीव भक्ती तुला मागतो मी । नको मोह खोटा हवा अंत आता   ©  रंजना मधुकर लसणे आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली 9960128105 ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈...
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मराठी साहित्य – विविधा ☆ कापणे….एक इव्हेंट… भाग 1 ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

श्री प्रमोद वामन वर्तक  विविधा   ☆ कापणे....एक इव्हेंट... भाग 1 ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆ कापणे - एक इव्हेंट ! 😂😢😟 माझ्या समवयस्क पिढीतील लोकांना लहानपणी हातात पडलेल्या पहिल्या "शिस पेन्सिलीच" त्या काळी, त्या वयात काय अप्रूप होतं ते नक्कीच आठवत असेल ! मला आज सत्तरीत आठवतंय त्याप्रमाणे तेंव्हा मराठी चौथीपर्यंत काळीशार दगडी पाटी आणि चुन्याची पांढरी षटकोनी किंवा चौकोनी पेन्सिल, यावरच 'लिहित्या हाताच्या' बोटांना आम्हां मुलांना समाधान मानावं लागत असे ! या वाक्यातील 'लिहित्या हाताच्या' या माझ्या शब्दप्रयोगावर आपली वाचनाची गाडी अडखळली असेल, तर त्याबद्दल आपलं समाधान होईल असा खुलासा आधी करतो,  म्हणजे मग तुम्ही पुढचा लेख वाचायला आणि मी पुढे लिहायला मोकळा ! आपण म्हणालं आता हे काय तुमच नवीनच ? "लिहिता हात" म्हणजे काय ?  तर त्याच कसं आहे मंडळी, जसं काही काही लोकं बोलतांना "खाता हात" आणि "धुता हात" असे शब्दप्रयोग करतात, तसा मी "लिहिता हात" असा शब्दप्रयोग केला तर कुठे बिघडलं ? कारण आपल्यापैकी बरेच जण डावरे (का डावखुरे?) असण्याची शक्यता गृहीत धरूनच मी या नवीन हाताचा "शोध" सॉरी,...
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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ डॉ. भाऊ बोत्रेची गोष्ट — (एक सत्यकथा) — डाॅ.शंकर बो-हाडे ☆ प्रस्तुती – श्री मेघ:श्याम सोनावणे ☆

श्री मेघ:श्याम सोनावणे  जीवनरंग  ☆ डॉ. भाऊ बोत्रेची गोष्ट — (एक सत्यकथा)  — डाॅ.शंकर बो-हाडे ☆ प्रस्तुती – श्री मेघ:श्याम सोनावणे ☆ काल परवाची गोष्ट.  शिपाई तास संपता संपता वर्गात आला. म्हणाला, “ सर त्या मुलाला पाय-या चढता येत नाही. तरी त्याला पहिल्या तासाला वर्गात बसायचं आहे.  तुम्हीच त्याला समजावून सांगा.”  मी त्याला भेटलो. तो म्हणाला, “ मला पहिल्या तासाला बसायचं आहे.”  “अरे पण तुला दुस-या मजल्यावर यायला वेळ लागेल.  तुला त्यासाठी लवकर यावे लागेल.” – मी “ सर , मी घरातून तासभर लवकर निघेल. तासाला वेळेवर येईन .” – तो  मी त्याच्या जिद्दीला सलाम केला.  मला आमच्या सैय्यद प्रिप्रीच्या शाळेतील संतोष आठवला. तो न चुकता शाळेत यायचा. त्यासाठी एका लाकडाच्या फळीला त्याने चाकं बसवून त्याची गाडी केलेली होती. एका हाताने तो ती पुढे ढकलत होता. ऊन ,वारा, पाऊस, गारा–  त्याच्या शाळेत खंड पडत नसे. पाय पोलिओने गेलेल्या संतोषने मनात घर केले होते.  पुढे नाशिकमधील समाजसेवेच्या वेडाने झपाटलेल्या रमेश जाधव यांनी गणेश उत्सवाच्या काळात दानपेटी ठेऊन दान जमा केले. त्यातून संतोषसाठी सायकल घेतली.  संतोष तीनचाकी सायकलवर शाळेत येऊ लागला. संतोष फार गोड मुलगा होता. मी पुणे विद्यापीठात होस्टेलला...
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