हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०१ ☆ सम्बन्ध बनाम मर्यादा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सम्बन्ध बनाम मर्यादा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०१ ☆

☆ सम्बन्ध बनाम मर्यादा… ☆

सम् + बन्ध अर्थात् समान रूप से बंधा हुआ… जहां समता हो; समानता हो; स्वैच्छिक बंधन हो; एक-दूसरे के प्रति सर्वस्य न्यौछावर करने का जज़्बा हो; मर-मिटने का संजीदा भाव हो; पहले आप, पहले आप की शालीनता हो; दूसरों में अच्छाई व गुण तलाशने का प्रयास हो। सो! यह संबंधों में प्रगाढ़ता स्थापित करने के लिए, दूसरों के दु:ख से द्रवित होकर, उन्हें कष्ट से मुक्ति प्रदान करने व करवाने का भाव अहम् भूमिका अदा करता है।

परंतु यह सब तो गुज़रे ज़माने की बातें हो गई हैं।   आजकल तो सब संबंध स्वार्थ पर आधारित हैं। हम धन-सम्पत्ति व रुतबा देखकर उसकी ओर आकर्षित होते हैं, क्योंकि आज का युग प्रतिस्पर्द्धा का युग है। हर इंसान अधिकाधिक धन कमाने हेतु मर्यादा को ताक पर रख, सीमाओं को लांघ कर आगे बढ़ जाना चाहता है। पैसे के लिए मानव सब संबंधों को दरक़िनार कर केवल अपनी उन्नति व स्वार्थ-पूर्ति के बारे में सोच-विचार करता है और राह में आने वाली समस्त बाधाओं को रौंदता हुआ लक्ष्य-प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। वह संबंधों की गरिमा व अहमियत को नकार बेतहाशा आगे बढ़ता जाता है और बीच राह आने वाली बाधाओं व किसी के प्रतिरोध करने पर किसी की हत्या करने में भी गुरेज़ नहीं करता।

चलिए! हम दृष्टिपात करते हैं उस मन:स्थिति पर… जब मानव में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की भावना बलवती होती है। उस स्थिति में वह अच्छे-बुरे व उचित-अनुचित के भाव का तिरस्कार कर, अपनी नज़रें लक्ष्य पर केंद्रित कर उस ओर अग्रसर होता है। संवाद संबंधों की जीवन-रेखा है और संबंध सेतु हैं… जीवन का मूलाधार हैं। इनके अभाव में धरा पर जीवन की कल्पना अधूरी है… सर्वथा असंभव है। परंतु आजकल तो पति-पत्नी दाम्पत्य बंधन में बंध, एक छत के नीचे रहते हुए भी अजनबी-सम व्यवहार करते हैं; एक-दूसरे से बेखबर जीवन पथ पर अग्रसर होते हैं; विवशता से अपना जीवन ढोते हैं। इस कारण संयुक्त परिवार- व्यवस्था चरमरा गयी है, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा बच्चों व वृद्धों को भुगतना पड़ रहा है। स्नेह व सुरक्षा के अभाव में बच्चों के कदम अपराध जगत् की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं, जो अपने कुकृत्यों से समाज व देश की जड़ों को खोखला कर रहे हैं।

यदि हम संबंधों का वर्गीकरण करें, तो कुछ संबंध जन्मजात होते हैं– जैसे माता-पिता भाई-बहन व अन्य परिवारजन..जिन से हम जन्म से ही रूबरू हो जाते हैं तथा इसमें हम तनिक भी हस्तक्षेप नहीं कर सकते। हमें न चाहते हुए भी उनसे निबाह करना पड़ता है। शायद! यह माता-पिता द्वारा प्रदत्त उपहार स्वरूप होते हैं, जिनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना हमारा कर्तव्य नहीं, दायित्व होता है। हमें न चाहते हुए भी उन संबंधों को सहर्ष स्वीकारना व अहमियत देनी पड़ती है। कई बार बच्चे माता-पिता की ग़लतियों का अंजाम भुगतते हुए, आजीवन एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हो जाते हैं तथा दायित्व-वहन करते हुए अपने जीवन का स्वर्णिम काल नष्ट कर देते हैं।

मानव एक सामाजिक प्राणी है और संबंध स्थापित करना उसकी मजबूरी होती है, क्योंकि अकेले रह कर जीवन जीने की कल्पना करना बेमानी है। तीसरे स्वार्थ के संबंध होते हैं, जिन्हें मानव अपनी खुदगर्ज़ी के लिए स्थापित करता है और उसका प्रयोग वह स्वार्थ-सिद्धि हेतु सीढ़ी के रूप में करता है। उस स्थिति में वह दूसरे को हानि पहुंचाने, यहां तक कि उसकी हत्या करने में तनिक भी संकोच नहीं करता। ऐसे संबंधों का

आजकल संसार में जाल बिछा हुआ है और हर इंसान मुखौटा धारण कर, दोहरा जीवन जीने को विवश है। यह संबंध अस्थायी होते हैं और लक्ष्य-प्राप्ति के पश्चात् अस्तित्वहीन हो जाते हैं; समाप्त हो जाते हैं…जैसे नज़रों से ओझल होने पर, व्यक्ति मन से भी उतर जाता है…बहुत दूर चला जाता है।

मुझे याद आ रहे हैं, ऐसे बहुत से क़िरदार, जो माता- पिता द्वारा प्रदत्त संबंधों की सज़ा आज तक भुगत रहे हैं। पुत्र की लालसा में सात-सात कन्याओं का भरा-पूरा परिवार जुटा लेने का प्रचलन आज भी बदस्तूर जारी है। पहले लोग यह चिंता नहीं करते थे  कि वे अपने बच्चों को धरोहर रूप में इतना बड़ा कर्ज़ अर्थात् उत्तरदायित्व सौंप कर जा रहे हैं, जिसका भुगतान उन्हें तथा आगामी पीढ़ियों को आजीवन अपने हाथों अपने सपनों को होम करके चुकाना पड़ेगा। शायद! इस ओर उनका लेशमात्र ध्यान भी नहीं जाता कि वह मासूम बच्चा कब बड़ा होगा और उसके आत्मनिर्भर होने तक वे जीवित भी रहेंगे या सारा बोझ उसके कंधों पर ज़बरदस्ती लाद कर, इस दुनिया से रुख्सत हो जाएंगे और वह नादान उनकी भयंकर-भीषण कारस्तानियों का फल आजीवन भुगतने को बाध्य होगा। क्या नाम देंगे आप ऐसे माता-पिता को, जन्मदाता…जो सृष्टि- सृजन में भरपूर योगदान देकर अपनी संतान को नरक में अकारण झोंक देते हैं।

यदि हम इसकी व्याख्या करें, तो उनके इस कर्म को भी अक्षम्य अपराध के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए और ऐसे अंधविश्वासी व स्वार्थी माता-पिता के लिए भी कठोर सज़ा व दण्ड का प्रावधान होना चाहिए। यह देखकर अत्यंत दु:ख होता है कि रिश्तों से अनजान, एक नवजात शिशु को न जाने कितने अटूट रिश्तों-बंधनों में बांध दिया जाता है… मानो उसे चक्रव्यूह में जकड़ दिया जाता है; जहां से मुक्ति पाने का कोई विकल्प-उपाय नहीं होता। वह निरीह औरत की भांति उस अपराध की सज़ा आजीवन भुगतने को विवश होता है, जो उसने किया ही नहीं और न ही समाज द्वारा प्रदत्त होता है–उसे अपना पक्ष रखने का अधिकार। इन परिस्थितियों में वह लड़का हो या लड़की, उसे अपना जीवन प्रतिदान रूप में देना पड़ता है…अपने सपनों-अरमानों को अपने हाथों रौंद कर; उनकी सहर्ष बलि देकर, अपने समस्त जीवन को बहन-भाइयों व माता-पिता के पालन-पोषण हेतु झोंकना पड़ता है। यहां लड़के- लड़की में भेद नहीं होता, क्योंकि यह मसला है, माता-पिता द्वारा की गई ग़लतियों का परिणाम भुगतने का..यहां तक तो समाज में समानाधिकार व्यवस्था लागू है…जिसमें कोई भेदभाव नहीं है। वैसे तो आजकल वृद्धावस्था में माता-पिता के भरण- पोषण का दायित्व, पुत्र न होने की स्थिति में पुत्री को वहन करना लाज़िमी है। ठीक ही तो है, अब तो उसे संपत्ति में समानाधिकार प्राप्त है। अधिकार व कर्त्तव्य का चोली-दामन का साथ है। एक के बिना दूसरा अस्तित्वहीन है। वैसे तो यह संतान का नैतिक दायित्व भी है।

हां! आवश्यकता है, माता-पिता को अपनी सोच बदलने की…सो! अब उन्हें बेटी के घर का अन्न-जल ग्रहण करने की परंपरा का त्याग करना होगा। वैसे भी बड़े-बड़े शहरों में अक्सर माता-पिता बेटियों के घर में रहते हैं। इसका मुख्य कारण है…बेटों का विदेशों में नौकरी करना और माता-पिता को पाश्चात्य  संस्कृति का रास न आना। अक्सर सिंगल चॉइल्ड होने के कारण भी बेटियों के लिए इस दायित्व को निर्वहन करना अनिवार्य हो जाता है।

आधुनिक युग में महिलाएं नौकरी करती हैं और दोहरा जीवन जीती हैं। परन्तु कहां बदल पाए हैं, हम अपनी दकियानूसी सोच; कहां त्याग पाए हैं रूढ़ियों, परंपराओं व प्राचीन मान्यताओं को… जिसका स्पष्ट प्रमाण है…पति व परिवारजनों की अपेक्षाओं में तनिक भी परिवर्तन न आना…जिसका संबंध उनकी सोच में परिवर्तनशीलता से है। परंतु वह सर्वथा असंभव है…ऐसा तो कभी हो नहीं सकता। भले ही हम भौतिक दृष्टि से संपन्न हो गए हैं, परंतु हमारी सोच, विचारधारा व मानसिक धरातल सदियों पहले जैसा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है…कन्या पक्ष के लोगों का वर-पक्ष के लोगों के सम्मुख ता-उम्र नत-मस्तक रहना; उनकी अप्रत्याशित इच्छाओं व मांगों की लंबी फेहरिस्त की पूर्ति करना, भले ही वे उस में सक्षम न हों। इतना ही नहीं, उनके माता-पिता और उनकी आगामी पीढ़ी के साथ न चाहते हुए भी संबंध-निर्वाह करना; उनकी नियति, मजबूरी व विवशता बन जाती है…. यहां तक कि मरणोपरांत मृत्युभोज व कफ़न जुटाना भी वधु के माता-पिता का ही दायित्व होता है। क्या हम चाह कर भी इन प्राचीन परंपराओं से भविष्य में भी मुक्ति पाने में समर्थ हो सकेंगे?

परंतु चंद महिलाएं अपनी संस्कृति को तज, ग़लत राहों पर चल पड़ी हैं। देर रात तक क्लबों में सिगरेट के क़श लगाना, जुआ खेलना तथा नशे की हालत में लड़खड़ाते हुए लौटना उनकी दिनचर्या में शामिल है। अपहरण, फ़िरौती, हत्या व धन-सम्पदा पाने के लिए विवाह रचाना, पति व परिवारजनों पर दहेज की मांग का इल्ज़ाम लगा जेल भिजवाना–उनके शौक में शामिल है’, जिसमें महिला के माता-पिता का भी भरपूर योगदान रहता है। वे ‘तू नहीं, और सही’ और खाओ पीओ, मौज उड़ाओ’ में विश्वास रखने लगी हैं …वे हर पल को खुशी से भरपूर जी लेना चाहती हैं। सो! संबंध-सरोकार अंतिम सांसें ले रहे हैं… मरने के कग़ार पर हैं। लिव-इन के प्रचलन के कारण परिवार टूट रहे हैं; सिंगल पेरेंट की संख्या बढ़ रही है, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा बच्चे भुगत रहे हैं तथा अपराध-जगत् की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। सो! हमें प्रचलित मान्यताओं व अंधविश्वासों से मुक्ति पाने के लिए समाज में विवाह-रूपी संस्था को पुन: जीवन-दान प्रदान करना होगा। लिंग-भेद को नकारना होगा, ताकि तथाकथित माता-पिता ऐसे भीषण ग़ुनाह न करें और बच्चों को उनके कर्मों की सज़ा आजीवन न भुगतनी पड़े और वे अपने सपनों को साकार करने व जीवन को अपने ढंग से जीने को स्वतंत्र हों।

आइए! हम प्राचीन परंपराओं को तोड़, सामाजिक बुराइयों को दफ़न कर समूल नष्ट कर दें तथा नयी सोच, नयी उमंग व नयी तरंग के साथ, नवीन युग में पदार्पण करें, जहां लघुता-प्रभुता का भेद न हो और सब अपने कर्त्तव्य-दायित्वों का सहर्ष वहन करें। अपनी सीमाओं को लांघ, जीवन में मर्यादा का अतिक्रमण न करें, ताकि त्याग का सर्वोपरि भाव सदैव बना रहे। यही है मानव जीवन की अपेक्षा व पराकाष्ठा…जिसे धारण कर हम मासूमों को आत्महत्या करने से रोक पाएंगे…जो स्वयं को इन दायित्वों के चक्रव्यूह में फंसा हुआ पाते हैं और वे पलायनवादिता की राह पर चल पड़ते हैं, क्योंकि उन्हें अपने जीवन का अंत करने से सुगम, कोई दूसरा उत्तम उपाय-विकल्प दिखाई नहीं पड़ता।

परंतु हमें स्मरण रखना चाहिए कि मानव जीवन अनमोल है, जो हमें चौरासी लाख योनियों की यात्रा करने के पश्चात् प्राप्त होता है। सो! संबंधों को शाश्वत बनाए रखने के लिए दरक़ार है… स्नेह, सहयोग, समर्पण व त्याग की; प्रबल इच्छा-शक्ति, एकाग्रता व अटल विश्वास की… इन्हें जीवन में अपना कर, जहां हम संबधों व सरोकारों को जीवंतता प्रदान कर, समाज व देश को, समुन्नत व समृद्ध बना सकेंगे और स्नेह, प्रेम, सहयोग, सौहार्द, समन्वय व सामंजस्यता द्वारा समरसता का साम्राज्य स्थापित करने में समर्थ हो सकेंगे।

अंतत: मैं यह कहना चाहूंगी कि संबंध….अर्थात् यदि हम समान रूप से बंधे रहेंगे और मर्यादा व सीमाओं का उल्लंघन-अतिक्रमण नहीं करेंगे, तो ग़िले-शिक़वे व शिकायतें स्वत: समाप्त हो जाएंगी… हम अपने-अपने द्वीप से बाहर निकल, सौहार्दपूर्ण ढंग से अपना जीवन बसर कर सकेंगे। स्वार्थहीन संबंध स्थायी होते हैं, क्षणिक नहीं…न उनमें कोई वाद-विवाद व संघर्ष होता है; न ही प्रतिदान की इच्छा व आकांक्षा। सो! यही है संबंधों के स्थायित्व का मात्र उपादान, जिससे मर्यादा भी सुरक्षित रह सकेगी।।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – कोरिया की संस्कृतिक लय और मेरी शाम ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – कोरिया की संस्कृतिक लय और मेरी शाम ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆ 

शाम —केवल दिन का अंत नहीं, बल्कि जीवन की लय का विस्तार होती है। दक्षिण कोरिया में रहते मैं लगभग हर रोज़ शाम के समय हुडी पहनकर या विंटर कोट पहनकर लंबे वॉक के लिए चली जाती थी। कान में हेड फोन लगाकर हिंदी गाने सुनते जाना अच्छा लगता था। कभी किसी लंबी सडक पर तो कभी पास ही के एक विश्वविद्यालय के परिसर में या फिर मार्केट में पैदल चली जाती। या कभी किसी छुट्टी के दिन मेट्रो से हान नदी के पुल पर चली जाती या इथेवॉन के इंडियन शॉप चली जाती। भले ही मेट्रो से चले जाए पर पैदल चलना होता ही था जिससे आसपास के मौहोल का आनंद भी लिया जा सकता था। यहाँ की शामें मुझे  धीरे-धीरे खुलती हुई, लय में डूबती हुई, और भीतर कहीं गहराई तक उतरती हुई। यह संस्मरण उन्हीं शामों का है —जो नोरेंबैंग के शोर, हान नदी की शांति, सोजू के स्वाद, और साइकिल पर पैडल करते युवा बच्चे की गति में बसी हैं।

शाम होते ही सियोल की सड़कें जैसे फिर से जीवंत हो उठती हैं। कार्यालयों से लौटते लोग थके हुए नहीं लगते—बल्कि “पल्ली-पल्ली” (जल्दी-जल्दी) संस्कृति में दिनभर की तेज़ी के बाद भी उनके चेहरों पर एक सहज शांति रहती है। मेट्रो, बसें, दफ़्तर, कैफ़े—हर जगह एक तेज़, पर सुंदर लय बहती रहती है। काम से लौटते लोग थके नहीं लगते, बल्कि जैसे दिन का बोझ पीछे छोड़ते हुए किसी नई ताजगी की ओर बढ़ रहे हों। हान नदी के किनारे टहलने वालों की भीड़ होती है। मेट्रो में लोग चुपचाप बैठे रहते—किताब पढ़ते हुए, संगीत सुनते हुए, या सिर्फ खिड़की से शाम को बहते शहर को निहारते हुए।

कोरिया की एक चीज़ जिसने मुझे हमेशा प्रभावित किया, वह है सम्मान की संस्कृति—विशेषकर बुज़ुर्गों के लिए। उनके लिए मेट्रो में सीट तुरंत छोड़ देना, बातचीत में हल्का झुकना,  यह सब उनके सामाजिक व्यवहार की नींव है। कई बार ऐसा होता कि मैं मेट्रो में खड़ी होती और कोई बुज़ुर्ग मुझे देखकर मुस्कुरा देता… उस मुस्कान में ऐसा स्नेह और अपनापन होता कि अपने आप विदेशी होने का अजनीबीपन गायब हो जाता। यह सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, सांस्कृतिक संवेदना है—और कोरिया के जीवन में यह संवेदना हर कदम पर दिखाई देती है।

कभी कभी लगता कि सियोल साइकिलों की गति से साँस लेने वाला शहर है। पुलों के नीचे, नदी किनारे बने खास ट्रैक्स पर परिवार, युवा, विद्यार्थी—सब साइकिल चलाते मिल जाते हैं। यहाँ साइकिल चलाना जीवन के संतुलन का अभ्यास ही लगता है। कोरियाई लोग कहते हैं— शरीर को गतिमान रखो, मन स्थिर रहेगा। यह दर्शन शाम की हवा में साफ़ महसूस होता है। और हाँ.. साईकिले यहाँ मुख्य सड़क पर नहीं चलाई जाती बल्कि यह मुख्य सडक के किनारे बने फुटपाथ पर ही चलायी जाती है… या फिर बगीचों में साईकिल चलाने के लिए ट्रैक्स हैं। यहाँ रोड के रुल्स बहुत सख्त हैं.. जिनका सारे लोग अनुसरण करते हैं। कहीं भी धक्का मुक्की नहीं।

सियोल के विश्वविद्यालय केवल सीखने की जगह नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक केंद्र हैं। शाम को जैसे ही सूरज ढलता है, कैंपस एक अलग ही दुनिया बन जाता है—कहीं युवा समूह संगीत का अभ्यास करते, कहीं कोई नृत्य का रियाज़ कर रहा है, कहीं छात्र फोटोशूट में व्यस्त। जब मैं विश्वविद्यालय के परिसर में टहलती, तो मुझे लगता मानो भविष्य की धड़कन मेरे आसपास स्पंदित हो रही है। उनकी ऊर्जा, उनकी हँसी, उनकी जिज्ञासा—कैंपस को एक उष्मा देती, और मेरे भीतर भी एक नई लहर जगाती।

कोरिया में कैफ़े केवल कॉफी पीने की जगह नहीं वे पढ़ने, काम करने, बातचीत करने और स्वयं से मिलने की एक जगह हैं। कई कैफ़े 24 घंटे खुले रहते हैं—मद्धम रोशनी, धीमा संगीत, लैपटॉप पर काम करते युवा… शहर की यह शांत रचनात्मकता दिल को छू जाती है।

इनका वर्क कल्चर प्रशंसनीय है। अतः दिनभर यहाँ लोग काम में डूबे रहते हैं, पर शाम होते ही वे अपनी आत्मा को खुली हवा में सांस लेने देते हैं। हर कदम के साथ जैसे वे अपने भीतर से तनाव की एक एक परत उतार देते हैं। कभी-कभी बुज़ुर्ग जोड़े मिलते हैं  जो एक दूसरे का हाथ थामे चुपचाप चलते हैं। उनके चेहरे पर न कोई जल्दी, न कोई चिंता — बस एक स्थिर मुस्कान, जैसे जीवन का अर्थ उन्होंने पा लिया हो।

शहर का दूसरा चेहरा रात में खुलता है। जहाँ दिन में अनुशासन और जिम्मेदारियाँ हैं, वहीं रात में जीवन की सहजता। छोटे-छोटे कमरों में जगमगाती रोशनी — यही हैं ‘नोरेंबैंग” कराओके रूम। एक बार मेरे सहकर्मी मुझे वहाँ ले गए। हम एक दो लोग नहीं थे बल्कि हम भारतीय प्रोफेसर कुछ कोरियाई प्रोफेसर और कुछ छात्रों के साथ गए थे। अच्छा खासा जमघट था। जब हम अंदर गए तो हमारे एक कुलिग ने कहा… “आप गाइए”.. मैंने कहा, “मैं तो अच्छा नहीं गा सकती। ” वे हँस पड़े — “यहाँ गाना अच्छा नहीं, दिल से गाना ज़रूरी है। ” कुछ देर बाद जब सब मिलकर कोरियाई और अंग्रेज़ी गीतों पर झूमने लगे, तो हम भी उनमें शामिल हो गए। संगीत ने भाषाओं की सीमाएँ मिटा दीं। हर व्यक्ति, चाहे उसका पेशा कुछ भी हो, उस क्षण केवल एक गायक होता है — आज़ाद, निश्चिंत, और जीवन से भरपूर। नोरोबैंग दक्षिण कोरिया की लोकप्रिय संस्कृति का एक हिस्सा है। यह एक छोटा, सुकूनभरा और साउंडप्रूफ कमरा होता है जहाँ लोग अपने दोस्तों, परिवार या सहकर्मियों के साथ बैठकर मनचाहे गीत गा सकते हैं। इसके अंदर आमतौर पर एक आरामदायक सोफ़ा, गानों की बड़ी सूची वाला डिजिटल सिस्टम, माइक्रोफ़ोन, स्पीकर और एक बड़ी स्क्रीन होती है जिस पर गानों के बोल चलते रहते हैं। कमरे में हल्की–फुल्की LED रोशनी, रंगीन माहौल और कभी-कभी डिस्को लाइटें भी होती हैं, जिससे एक छोटा-सा निजी संगीत–मंच जैसा अनुभव मिलता है। यहाँ हाथ में ज्यूस, सोजू लेकर ये लोग तनाव मुक्त होकर हँसते गाते झूमते हैं। नोरोबैंग सिर्फ गाने की जगह नहीं है—यह तनाव मुक्त होने, मज़े करने, और साथ में यादें बनाने का एक बहुत खास कोरियाई तरीका माना जाता है। यहाँ संगीत की बीट पर स्टेप्स् करने के विडियों भी होते और सभी उसके अनुसार गाते और नाचते है। खुश होकर अपनी शाम बिताते हैं।

नोरेंबैंग से निकलते ही लगभग हर वीक एंड या किसी खास अवसर पर इन युवाओं की शाम ‘हॉपिंग ड्रिंक’ में बदल जाती है। सड़क के किनारे छोटे-छोटे ‘पोजांगमाचा” (खाने पीने की टपरीनुमा ठेले) रोशनी से जगमगाते हैं। लोग एक जगह नहीं रुकते —एक बार से दूसरे बार, फिर तीसरे, हर जगह थोड़ा खाना, थोड़ा सोजू, और बहुत सारी बातें और हँसी के फव्वारें। सोजू एक प्रकार की शराब है जो कोरिया के सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा है। “गनबे!” कहकर जब गिलास टकराए जाते हैं, तो यह केवल औपचारिक ‘चीयर्स’ नहीं, बल्कि दोस्ती का स्वीकार होता

कई बार ये लोग कभी परिवार के साथ या मित्रों के साथ हान नदी के किनारे जाकर बैठ जाते है साथ में होता है पीज़्ज़ा, बर्गर, और क्रीस्पी चिकन के साथ सोजू या ज्यूस की बोतलें। ये लोग बहुत कम पानी पीते हैं.. अक्सर कोई ज्यूस या आईस कॉफी इनका फेवरिट पेय होता है। पुलों की झिलमिलाती रोशनियों में नदी की लहरें चमकती हैं। ये लोग बातें करते, हँसते, और कभी-कभी बस चुप रहते हैं। उनकी चुप्पी में भी एक मुखरता दिखाई देती है। दोस्ती का सबसे गहरा क्षण वह होता है जब शब्दों की ज़रूरत नहीं होती।

चेरी ब्लॉसम की गुलाबी शामें, शरद की सुनहरी हवा, सर्दियों में सड़क किनारे भुने आलू की खुशबू हर मौसम सियोल को नया व्यक्तित्व दे देता है। यह शहर हर ऋतु में जैसे एक नया गीत गाता है।

एक रविवार को हमारी साथी प्रोफेसर ने मुझे कहा कि, “आज  आप हमारे साथ चलिए, कोरिया का एक और अनुभव कराते हैं आपको। ” और वे वह मुझे एक ‘जिमजिलबांग’ ले गई — एक विशाल सार्वजनिक स्नानगृह। अंदर दृश्य ही अलग था — भाप के कमरे, गर्म और ठंडे जल के स्नान-टब, और लोग — परिवार, मित्र, बच्चे — सब साथ में..हाँ पुरूषों और महिलाओं के अलग अलग कक्ष थे…यहाँ कहीं कोई मसाज ले रहा है, कहीं कोई टीवी देखता हुआ अंडे खा रहा है। शुरुआत में मैं हैरान ही रह गई, वहाँ के उस खुलेपन में मैं सहज ही नहीं हो पायी। यह केवल स्नान नहीं था, यह सामूहिक विश्रांति गृह था। लोग अपने शरीर के साथ-साथ अपने मन को भी धो रहे थे — थकान, तनाव और औपचारिकता से मुक्त होकर। कोरिया की संस्कृति में यह “सामूहिक स्नान” व्यक्तिगत स्वच्छता से आगे जाकर सामाजिक जुड़ाव का माध्यम बन गया है। वहाँ एक साथ नहाते हुए लोग जैसे एक दूसरे के बोझ को भी हल्का करते हैं। किंतु मैं वहाँ  कुछ मिनट भी रुक नहीं सकी.. लौट आयी थी और बाद में मुझे मेरे सहकर्मियों ने इसके बारे में बताया था।

आधुनिक सियोल के बीच भी कोरिया की पारंपरिक कला जीवित है। एक शाम हमने ‘पानसोरी’ सुना … एक गायक, एक ढोल के साथ अपनी भावनाओं के महासागर को राह दे रहा था। प्रेम, पीड़ा, संघर्ष सब उसकी आवाज़ में समाया था। यह केवल संगीत नहीं, कथा का अभिनय था। फिर ‘तालचुम’ — मुखौटा नृत्य। ये कलाकार समाज की बुराइयों पर व्यंग्य करते हैं, राजा, पुजारी, व्यापारी — सब हँसी के पात्र बन जाते हैं। दर्शक हँसते हैं, पर भीतर कुछ सोचते भी हैं। उतनी साहित्यिक कोरियाई भाषा मैं समझी नहीं पर उनके हावभाव से कुछ को पल्ले पड़ा ही था। यह हमारे प्रहसन जैसा ही लगा।

जब रात गहराती है, तो सियोल का दूसरा जीवन शुरू होता है। सड़क किनारे भुने आलू और उबले मक्के की खुशबू, कॉफ़ी कैफ़े में किताबों के बीच बैठे युवा, और पार्कों में गिटार बजाते प्रेमी। शहर जैसे खुद से संवाद कर रहा हो।

कोरिया की यह सामूहिकता अनोखी है —लोग साथ रहते हैं, पर एक-दूसरे को अपना अकेलापन भी जीने देते हैं। यहाँ ‘साथ होना’ और ‘स्वतंत्र रहना’ विरोध नहीं, संतुलन है। शायद यही संतुलन उन्हें इतनी शांति और जीवंतता देता है।

अब जब मुझे कोरिया से लौटकर भी एक अरसा बीत गया है  फिर भी कभी-कभी आँखें बंद करते ही हान नदी की हवा मेरे चेहरे को छू जाती है। नोरेंबैंग की हँसी, जिमजिलबांग की गर्म भाप — सब एक स्मृति बनकर भीतर उतर गए हैं।

देश हो या विदेश जीवन चाहे कितना भी व्यस्त क्यों न हो, हर दिन कुछ पल ऐसे होने चाहिए जहाँ हम अपने भीतर लौट सकें। वॉक, साइकिल, मेट्रो का अकेला सफर, गीत, या नदी किनारे की चुप्पी — ये सब उसी आत्म-यात्रा के पड़ाव हैं। और शायद यही कारण है कि कोरिया की शामें अब मेरे लिए किसी देश की नहीं रहीं — वे मेरे भीतर बस गई हैं, एक स्थायी रोशनी बनकर। यह संस्मरण केवल कोरिया की संस्कृति का चित्र नहीं, बल्कि उस आत्मीय अनुभव का है जिसमें व्यक्ति अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर किसी और जीवन की लय में खुद को खोजता है।

*********

©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लबादा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लबादा ? ?

(कविता-संग्रह ‘यों ही’ से)

लबादे ओढ़े हुए

लोगों का झुण्ड,

लबादों पर दर्पण चिपकाए,

मेरे शहर तक आ पहुँचा है,

मैं ज़मीन पर उतर आया हूँ,

शामिल हो गया हूँ

उस झुण्ड में,

दर्पण वाला लबादा ओढ़कर।

 

झुण्ड, अब

कंदराओं की ओर बढ़ चला है।

  

कंदरा में छिपा बौना आदमी

भाग रहा है दर्पण की चमक से,

पीछा छुड़ा रहा है चमक से जनते अक्स से,

……बेतहाशा भाग रहा है।

 

झुण्ड का कोलाहल बढ़ रहा है,

बौना आदमी हाँफने लगा है,

थक गया है,

ख़ुद ही लौट रहा है

दर्पण वाले लबादों की ओर।

 

झुण्ड,

अब वापसी की यात्रा पर है,

दर्पण की यहाँ-वहाँ

चमकती किरणों से

चौंधिया रही है कंदरा ।

 

मैं,

अचकचा कर जाग उठता हूँ,

पर्दे से छनकर आती

रोशनी देखता हूँऔर सोचता हूँ-

मुझे कंदरा से

यहाँ तक कौन लाया?

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ मेरी विरासत : एक अनन्त संवाद ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट (लाफ्टर योगा मास्टर ट्रेनर) ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱 मेरी विरासत : एक अनन्त संवाद 🌷

हर व्यक्ति अपने भीतर एक अदृश्य संसार लिये चलता है—विचारों, अनुभवों, मूल्यों और संवेदनाओं का ऐसा उत्तराधिकार जो हमारे जीवन-मार्ग को चुपचाप दिशा देता है। मेरी अपनी विरासत किसी एक नाम या किसी सीमित परम्परा की नहीं। यह एक बहती हुई धारा है, जो सदियों के शान्त आत्मचिन्तन से उपजी है—ऐसी पंक्तियों में व्यक्त, जो आदेशों जैसी नहीं, बल्कि भीतर छिपे सत्य का स्नेहिल भान कराती हैं।

मेरे लिये इस विरासत का मूल बहुत सरल है—

🌱 “अहं ब्रह्मास्मि – मैं उसी अनन्त सत्ता का अंश हूँ।”

🌱 “तत्त्वमसि – और तुम भी वही हो।”

ये वाक्य मेरे भीतर यही कहते हैं कि मेरी और संसार की सीमाएँ उतनी ठोस नहीं जितनी दिखती हैं। जो मुझमें है, वही तुममें है; जो तुममें है, वही समस्त सृष्टि में स्पंदित है।

जीवन को लेकर मेरा दृष्टिकोण भी इसी सरलता में उतर आता है—

🌱 “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन…”

अर्थात, मनुष्य केवल अपने कर्म का चयन कर सकता है, पर फल पर अधिकार नहीं रख सकता।

यह विचार मुझे हर स्थिति में संतुलित रखता है। बस अपना श्रेष्ठ प्रयास करते रहो—बाक़ी जीवन की लय पर छोड़ दो। अपेक्षा कम हो तो मन हल्का रहता है।

इसी समझ से एक सहज करुणा जन्म लेती है—अपने लिये नहीं, सबके लिये। मेरे भीतर हमेशा इन शुभकामनाओं की ध्वनि गूंजती है:

🌱 “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः…”

सब सुखी हों, सब रोग-शोक से मुक्त हों।

🌱 “सर्वेषां स्वस्तिर् भवतु, सर्वेषां शान्तिर् भवतु…”

सबके लिये कल्याण हो, सबके लिये शान्ति हो।

ये केवल प्रार्थनाएँ नहीं; यह वह संवेदना है जो किसी एक समुदाय या समूह की नहीं होती—यह मनुष्य होने की सामूहिक विरासत है। हम सभी एक-दूसरे के सुख-दुःख से जुड़े हुए हैं।

इसी क्रम में एक गहरी और व्यापक प्रार्थना भी मेरे मन को छूती है:

🌱 “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥”

इसका सरल अर्थ है—यह भी पूर्ण है, वह भी पूर्ण है; पूर्ण से पूर्ण ही उत्पन्न होता है; पूर्ण में से पूर्ण निकाल भी लो तो भी पूर्ण ही शेष रहता है।

यह पंक्तियाँ हमें समग्रता का बोध कराती हैं—कि सृष्टि की नींव कमी नहीं, बल्कि पूर्णता है। जीवन तब सहज हो जाता है जब हम अपने भीतर और बाहर इसी पूर्णता को पहचानने लगते हैं।

मेरी विरासत मुझे यह भी सिखाती है कि ज्ञान कभी एक-रूपी नहीं होता:

🌱 “एकं सत्यं, विप्राः बहुधा वदन्ति।”

सत्य एक है, पर उसकी अभिव्यक्ति अनेक रूपों में हो सकती है।

यह विचार मन को ख़ुला रखता है—सुनने, सीखने और समझने के लिये। कोई भी ज्ञान अंतिम नहीं, और कोई भी मार्ग अकेला नहीं।

और फिर वह अनादि-प्रार्थना, जो हर खोजी हृदय की धुन है—

🌱 “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय…”

असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अज्ञान के अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।

यह जीवन के उस शाश्वत प्रयत्न का स्वर है—साफ़ देखने, स्पष्ट सोचने और भीतर के आलोक तक पहुँचने का।

इस संवाद की शुरुआत क्यों?

मेरा प्रयास किसी विचार-धारा की तुलना करना या किसी मत को परिभाषित करना नहीं है। यह सिर्फ़ एक विनम्र कोशिश है—उस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर को समझने की, जिसने मुझे भीतर से आकार दिया है।

मैं इसे इसलिए साझा कर रहा हूँ, क्योंकि विरासत कोई स्थिर वस्तु नहीं—यह एक जीवित संवाद है। जब हम विचार करते हैं, प्रश्न पूछते हैं, अनुभव बाँटते हैं, तो यह और समृद्ध होती जाती है।

इसी आशा के साथ यह यात्रा आरम्भ की है—अनन्त, मुक्त और सतत्—जहाँ हर व्यक्ति अपनी बात जोड़ सकता है, और हम सब मिलकर अपने भीतर की रोशनी को थोड़ा और स्पष्ट कर सकते हैं।

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७३ – नवगीत – गूँज रहीं बूँदों की सरगम… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – गूँज रहीं बूँदों की सरगम

? रचना संसार # ७३ – गीत – गूँज रहीं बूँदों की सरगम…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।

चलो सखी झूला झूलें हम,

शीतल सी बौछारों में।।

*

छोड़ घोंसलें भीगे-भीगे,

पंछी आए आँगन में।

नहीं मिला दाना चुगने को,

अब के देखो सावन में।।

चल झरनों से बात करें हम,

झम-झम करें फुहारों में।

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।।

*

धरती मिलने चली गगन से,

नयनों में काजल डाले।

आलिंगन को व्याकुल सरिता,

प्रीति समंदर-सी पाले।।

सुधि-बुधि खो कलिकाएँ बैठी,

भ्रमरों की गुंजारों में।

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।।

*

मादक अधर मिलन को व्याकुल,

मोहे पुरवाई प्यारी।

सुलगे देह प्रीति में साजन,

काम -बाण से मैं हारी।।

यौवन प्रेम मगन हो नाचे,

चाहत की झंकारों में।

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०२ ☆ भावना के दोहे – मौसम ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – मौसम)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०२ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – मौसम ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

मौसम बदला आज कुछ, धुंध हुई कुछ साफ।

ठंडी -ठंडी चली हवा, हमने ओढ़ लिहाफ।।

 *

सूरज डूबा देख लो, मोहक होती शाम।

रजनी का आमंत्रण है, सपनों में मुलाकात।।

 *

चादर तम की भीतरी, चाँद झाँकता आज।

कितनी सुंदर चाँदनी, बज उठे हैं साज।।

 *

सूरज कंबल ओढ़ता, उसे लगी है ठंड।

चादर कुहरे की बढ़ी, मिला सभी को दंड।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८३ ☆ संतोष के दोहे – (तुलसी माँ की कथा) ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके संतोष के दोहे आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८३ ☆

संतोष के दोहे☆ श्री संतोष नेमा ☆

(तुलसी माँ की कथा) 

तुलसी माँ पिछले जनम, थीं वृंदा का रूप |

ईश विष्णु की भक्ति में, खूब गईं थीं डूब |

जालंधर से जब हुआ, वृंदा का सुविवाह  |

वृंदा पत्नी धर्म का, पूर्ण किया निर्वाह ||

देव-असुर  में जब हुआ, बहुत बड़ा संग्राम |

जालंधर भारी पड़ा, मचा खूब कुहराम ||

वृंदा ने तब ही किया, पूजन वंदन ध्यान |

वृंदा पुण्य प्रताप से, हारे देव महान ||

जगदीश्वर से देवता, करने लगे गुहार |

हमें सुरक्षित कीजिये, जालंधर संहार ||

वृंदा जैसी भक्त से, छल पर करें विचार|

कहें विष्णु इस युद्ध में, विजय मिले या हार ||

देव सभी करने लगे, विनती बारम्बार |

विष्णु जी ने तब लिया, जालन्धर आकार ||

पहुँचे वृंदा महल में, धर जालंधर रूप |

पूजा से वृंदा उठीं, इच्छा हुई विरूप  ||

जब वृंदा ने पग छुए, रूठे सब सत्कर्म |

जालन्धर की मृत्यु का, वृंदा समझीं मर्म ||

वृंदा ने जब क्रोध में, दिया विष्णु को श्राप |

बन जाओ पाषाण तुम, हुईं सती चुपचाप ||

उद्भव पावन स्थान पर, तुलसी पादप आप |

बोल उठे यह देख कर, क्षमा करें सब पाप ||

वृंदा के सुसतीत्व को, दिया बहुत सम्मान |

पूजन मेरे संग हो, सदा मिलेगा मान ||

सतवंती की शक्ति से, चकित स्वयं भगवान |

नारी की महिमा बड़ी, उसका हो सम्मान ||

तुलसी शालिग्राम का, करिए साथ विवाह |

एकादश तिथि में मिले, देवाशीष अथाह ||

आँगन तुलसी राखिये, बिन तुलसी घर सून |

रहता मन “संतोष” तब, खुशियाँ होतीं दून ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३ – कविता – बिरज की ग्वालन की व्यथा… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘बिरज की ग्वालन की व्यथा।)

☆ शशि साहित्य # ३ ☆

? कविता – बिरज की ग्वालन की व्यथा…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

दो दिन बीते ,कान्हा नहीं पहुंचे,

काहे नहीं आया, माखन चोर.. ?

🍚

ए ललना.. तू कहां रह गयो,!

 अब तक क्यों ना आयो रे..

अब तो मैंने नीची कर दी,

क्या मटकी हाथ ना आई रे…

राह तक रही मोरी अखियां,

क्यों बिसरा दी मोरी गलियां..

बेसुध हो रहे प्राण हमारे,

बाट जोहते चांद सितारे,

खो गई रुनझुन पायल से,

बयार ना आई अमराई से..

कान्हा अब तो आजा तू..

ना करुं कभी शिकायत,

अब तोरी मेहतारी से…‍‍।

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – कविता ☆ स्त्री-वजूद ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ कविता ☆ स्त्री-वजूद ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

वजूद स्त्री का तुम क्या परखोगे?

अनुपस्थिति में तुम्हारी उपस्थिति

माथे पे दर्शायें रखती हूं

कहते हो जिसे देखकर तुम ‘ब्याहता’

सिन्दूर की लाली बना चंद्र सा तुम्हें माथे पे बिठाकर रखती हूं

छोटी-बडी खुशियां क्या?

सौन्दर्य ख्वाहिश और अतंस के पोरों पोर तक सौंप

दूजे आंगन को देखो मैं स्त्री इठलाती हूं

वजूद तेरा चलाने को

पीड़ा सह जाती हूं

धो लेती मैल कपडों संग व कैक्टस गमले में लगा लेती हूं

तकिया- कुशन मे कवर चढा़ कर

बहुत-सी बातों पे मौन मोहर लगा देती हूं

हहहहहह

ब्याहता हूं

स्त्री हूं

अपनी उपस्थिति सदा छुपा लेती हूं

चार भागों में बाँट भाग्य बनके सृष्टि

हर रिश्ता मन से निभा लेती  हूं

माना, हुआ जन्म निराश

थे बाबा

कलाई भरा भाई का तब

वचनबद्ध भाई हुआ तब

अंतिम-सांसो का संवाद हुआ था तब

सांसों के डोर जब तक टूटें ना

हर बेटी का अधिकार

तेरहवीं मे भी मायका पे होगा तब तक’

रीति-रिवाज के नामों पे

मिलना जुलना होगा

मामा भात भरेगा भाई नाना के नहीं रहने पे तब

दहलीज़ भाई का अधिकार

बहन का जन्म मृत्यु तक अटल सत्य है यह

बेटी के जन्म पे प्रांगण

मौन रहता है हरबार

फिर भी, सुनो एक बात

मै-ब्याहता

हूं स्त्री

तुलसी हूं

वृंदा हूं

निश्चित रूप से कर्त्तव्य वेदी पे चढ़ कर

हिस्से की अपनी दूभ लेकर अपनी

बेटी-कुल, खानदान’

का फर्ज निभा जाऊंगी

शुरू किया जो सफ़र गुड़िया से

उफ्फफ

प्रातःकाल से स्वीकृति लेकर सुनो

जेठ की दोपहर की तपिश

भावनात्मक संबंध निभाऊगी

छूटीं छिपी मौन रहेगा वजूद मेरा सदा

मैं स्त्री

स्वयं को खो कर तेरे

नाम से जानी जाऊंगी

पग फेरी के अग्नि से लेकर

मणिकर्णिका तक तेरे हाथों से मुक्ति पाऊंगी।

~ अभिव्यक्ति की स्याही ~

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४९ ⇒ ड ऽऽ र और भय ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ड ऽऽ र और भय।)

?अभी अभी # ८४९ ⇒ आलेख – ड ऽऽ र और भय ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कैसी कैसी जोड़ी बनाई है भगवान ने, राम और श्याम और जय वीरू की जोड़ी तो ठीक, डर और भय की भी जोड़ी। दोनों बिलकुल जुड़वा लगते हैं, हूबहू डिट्टो एक जैसे, शक्ल सूरत से रंगा बिल्ला माफिक, डरावने और भयंकर।

अजी साहब छोड़िए, सब आपका वहम है, डर और भय की तो कोई शक्ल ही नहीं होती। जंगल मे

अकेले जाओ तो डर लगता है, चिड़ियाघर में कितना मजा आता है। जब तक हम सुरक्षित हैं, निडर और निर्भय हैं, जहां किसी ने सिर्फ बोला सांप, बस हो गया कबाड़ा। भय का सांप अथवा सांप का भय तो हमारे अंदर बैठा है।

कहीं डंडे का डर तो कहीं बंदूक का डर, बेचारे बेजुबान जानवर को भी हम चाबुक से डराते हैं।

वाह रे सर्कस के शेर।।

इतना बड़ा शब्दकोश आखिर बना कैसे! क्या कम से कम शब्दों से काम नहीं लिया जा सकता, प्यार मोहब्बत, लाड़ प्यार! बच्चे को लाड़ मत करो प्यार ही कर लो। हटो जी, ऐसा भी कभी होता है। क्या एक भगवान शब्द से आपका काम चल जाता है। इतने देवी देवता, एक दो से ही क्यों नहीं काम चला लेते।

हर शब्द के पीछे एक अर्थ छुपा होता है। आपको डरावने सपने आते हैं, आपकी नींद खुल जाती है, अरे यह तो सपना था, कोई डर की बात नहीं! आपके अवचेतन में भय के संस्कार है, इसीलिए तो डरावने सपने आते हैं। छोटे छोटे बच्चे नींद में चमक जाते हैं, एकदम रोना शुरू कर देते हैं, उनके सिरहाने चाकू रखा जाता है। चाकू सुरक्षा कवच है और गंडा तावीज भी। मानो या ना मानो।।

डर से ही डरावना शब्द बना है, और भय से भयंकर! जगह जगह भयंकर सड़क दुर्घटना की खबरें मन को व्यथित कर देती हैं। कुछ लोग इतनी तेज गाड़ी चलाते हैं भाई साहब, कि उनके साथ तो बैठने में भी डर लगता है।

खतरों से खेलना कोई समझदारी नहीं। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।

हमें बचपन से ही डराया गया है, कभी भूत से तो कभी बाबा से! आजकल के बच्चे भूत से नहीं डरते, क्योंकि वे ब्ल्यू व्हेल जैसे खेल खेलते हैं। अब हम बाबाओं से डरते नहीं, उनसे ज्ञान प्राप्त करने जाते हैं। वे भी हमें ज्ञान बांटते हैं, भगवान से डरो।।

पढ़ने से कैसा डरना, लेकिन सबक याद नहीं होने पर मास्टरजी की छड़ी से तो डर लगता ही था। कहीं परीक्षा का डर तो कहीं साइंस मैथ्स का डर। हमारे गणित का डर तो अभ्यंकर सर भी दूर नहीं कर पाए।

कोई अमर नहीं, हमारा शरीर नश्वर है, फिर भी कोई मरना नहीं चाहता। शुभ शुभ बोलो। मरने की बात अपनी जुबान पर ही मत लाओ, क्योंकि हम सबको मृत्यु का भय है। हम नचिकेता नहीं जो यम की छाती पर जाकर खड़े हो जाएं।।

क्या आपको नहीं लगता, ये डर और भय और कोई नहीं, जय विजय ही हैं। मैं आपको जय विजय की कथा नहीं सुनाऊंगा, लेकिन ये कभी वैकुंठ के द्वारपाल थे, बेचारे शापग्रस्त हो गए और आसुरी शक्ति बने भगवान विष्णु को फिर भी नहीं छोड़ रहे। कभी रावण कुंभकर्ण तो कभी कंस शिशुपाल। आज के हिटलर स्टालिन भी शायद ये ही हों।

डर और भय ही कलयुग के जय विजय हैं। अगर आपने इन पर काबू पा लिया तो समझो आपका स्वर्ग का नहीं, वैकुंठ का टिकिट कट गया, यानी आप जन्म मृत्यु के चक्कर से बाहर निकल गए।।

ये सब कहने की बातें हैं।

क्या आपको आज के हालात से डर नहीं लगता।

क्या आप नहीं चाहते, लोग निडर होकर चैन की नींद सोएं। इसलिए हमें हमेशा जागरूक रहना होगा, खतरा देश के बाहर से भी है और अंदर भी।

हमें देश की, संविधान की और लोकतंत्र की रक्षा करनी है।

हम पहले लोगों को भयमुक्त वातावरण देंगे और बाद में अपने अंदर के जय विजय यानी डर और भय को भी देख लेंगे। आखिर इतनी जल्दी भी क्या है। सुना है नेटफ्लेक्स पर कोई बढ़िया हॉरर मूवी लगी है, मजेदार है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares