हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १६० ☆ मेरा साया ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “मेरा साया” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १६० ☆

☆ मेरा साया ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

जब भी देखा दर्पन मैंने

मैं ही नज़र आया

मुझसे ही घबराया पल-पल

मेरा ही साया।

 

तृष्णा मरी

न मरा अहम

बिछा मोह सोया

मैली चादर

धोयी मन का

मैल नहीं धोया

 

करता रहा सवाल स्वयं से

जब भी भरमाया।

 

झूठ चाल

शकुनि के जैसी

सत्य युधिष्ठिर सा

भरी सभा में

मौन खड़ा है

धर्म निरुत्तर-सा

 

अट्टहास करता दु:शासन

जनमन थर्राया।

 

रामराज्य की

सुगढ़ कल्पना

बाट जोहता मन

मर्यादा की

लाँघ देहरी

सब संकल्प हवन

 

निर्वासित सा जीवन जीते

निशाचरी माया।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ जब बप्पा के साथ आपकी याद भी घर आई… ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌺 जब बप्पा के साथ आपकी याद भी घर आई… 🌺

(आदरणीय मित्र अ ल देशपांडे को अभी एक संदेश भेजा। उसे आपको भी भेज रहा हूं। आप सभी इसे पढ़कर आनंदित हों! 🙏)

 ˚🪷˚

🌺 जब बप्पा के साथ आपकी याद भी घर आई… 🌺

(कुछ स्मृतियाँ मोदक की मिठास जैसी होती हैं—वर्षों बाद भी वैसी ही मीठी!)

आदरणीय अ. ल. जी, 🙏

आज गणेश चतुर्थी के इस पावन अवसर पर घर में जैसे ही “गणपति बप्पा मोरया!” का जयघोष गूँजा, दिल के किसी कोने से आपकी याद का उभर आना उतना ही स्वाभाविक था, जितना पूजा के बाद मोदक की थाली पर निगाह का जाना! 😊

सच्चाई तो यह है कि जीवन में गणपति जी की पहली विधिवत, भव्य और आत्मीय पूजा का अनुभव आपके ही आँगन में हुआ था। उस समय पूजा के पावन मंत्रों के बीच मेरी नज़रें भले ही गणपति जी पर टिकी हों, लेकिन मन की एकाग्रता बार-बार मोदक और लड्डुओं की थाली की ओर खिंच जाती थी! 😄

और सच मानिए, मैंने और राजू ने मिलकर आपके घर प्रसाद का जो “सफ़ाया अभियान” चलाया था, उसका रिकॉर्ड आज तक कोई नहीं तोड़ पाया! 😂

भाभी जी के हाथों से बने उस सुस्वादु और अनूठे भोजन का स्वाद आज भी जिह्वा ही नहीं, स्मृतियों में भी ताज़ा है। आपकी लाड़ली बच्चियों ने जिस आदर, अपनत्व और अपार स्नेह से वह सब परोसा था, वह केवल भोजन नहीं था—वह रिश्तों की मिठास थी। ❤️

तब हमारा राजू भी बहुत छोटा-सा था। आपकी बेटियों से मिले बहन के उस पावन अनुराग ने उसके बचपन को जो आत्मीयता दी, उसकी स्मृतियाँ आज भी हमारे हृदय में एक अनमोल धरोहर की तरह सुरक्षित हैं। कुछ रिश्ते समय के साथ पुराने नहीं होते; वे समय के साथ और गहरे उतरते जाते हैं। 🌸

स्मृतियों के इस कारवाँ में वह लम्हा भी बार-बार याद आता है, जब मेरे स्थानांतरण के समय आपने मुझे गणेश जी की एक बेहद मोहक और सुंदर प्रतिमा भेंट की थी। 🙏

दुर्भाग्य से ट्रांसपोर्ट वालों की “अद्भुत मूर्तिकारी कला” के कारण वह प्रतिमा रास्ते में थोड़ी क्षतिग्रस्त हो गई थी और हमारा मन बहुत दुखी हुआ था।

लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है—शायद बप्पा ने अपना एक छोटा-सा अंश उसी स्नेह-स्मृति के रूप में हमारे पास रोक लिया था! ❤️🙏

कल जब हम बाज़ार गए और दुकानों पर बप्पा के हज़ारों रूप देखे, तो मन आनंद से भर उठा। एक से बढ़कर एक सुंदर और मनमोहक प्रतिमाएँ सजी थीं। उस विहंगम दृश्य ने जैसे बरसों पुराना उत्साह फिर से जगा दिया।

इस वर्ष हमने भी पूरे भक्ति-भाव से अपने घर में इको-फ्रेंडली गणेश जी की स्थापना करने और विधि-विधान से पूजन का संकल्प लिया है। 🌿🐘🙏

यह जानकर आपको कितनी खुशी होगी, इसका अंदाज़ा हम सहज ही लगा सकते हैं।

इस पावन अवसर पर हमारी ओर से आपको और आपके पूरे परिवार को गणेश चतुर्थी की अनंत और हार्दिक मंगलकामनाएँ! 🌺

बप्पा आपके जीवन में सुख, शान्ति, समृद्धि और स्वास्थ्य के साथ-साथ वही पुरानी मिठास सदा बनाए रखें। 🙏✨

और हाँ…

हमारे घर बप्पा पधार चुके हैं—अब आपका इंतज़ार है! 😊

आप पूरे परिवार सहित सहर्ष सादर आमंत्रित हैं। पधारिए और वर्षों पुरानी इन मधुर स्मृतियों के रिश्ते को एक बार फिर नए मोदकों की मिठास दीजिए। 🪷🍘❤️

🙏 जय गणेश!

🙏 गणपति बप्पा मोरया!

आपका

ज. सिं. बि.

˚⊱🪷⊰˚

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विरोधाभास… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विरोधाभास? ?

किताब पढ़ना

गाने सुनना

टीवी देखना

तेल लगाना

औंधे पड़ना

शवासन करना

चक्कर लगाना

दवाई खाना..,

नींद के लिए रोजाना

हजार हथकंडे

अपनाता है आदमी,

जाने क्या है

आजीवन सोने को उन्मत्त

अंतिम नींद से

घबराता है आदमी!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६७ ☆ छू के फूलों से बदन को  देखू… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “छू के फूलों से बदन को  देखू…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६७ ☆

✍ छू के फूलों से बदन को  देखू… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

लाख मशगूल हों फ़ुर्सत होगी

आपको जब भी ज़रूरत होगी

 *

बच यहाँ सकते गुनाहों से तुम

एक ऊपर भी अदालत होगी

 *

ऐब आयें न नज़र फिर उसके

आपको उससे जो निस्बत होगी

 *

ख़ैर-अंदेश रिआया की बने

कब मुआफ़िक ये हुक़ूमत होगी

 *

छू के फूलों से बदन को  देखू

आपकी जब भी इजाज़त होगी

 *

साथ मज़लूम के जो होगें खड़े

उनमें ही अस्ल जसारत होगी

 *

दिल मेरा लेके अगर बदलोगे

ये अमानत में ख़यानत होगी

 *

उसको कैसे मैं कहूँ ज़िंदा है

ख़ून में जब न हरारत होगी

 *

ऐ अरुण होगी जमीं जन्नत सी

ख़त्म जब सबकी अज़ीयत होगी

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०९४ ⇒ कांच और कैमरा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कांच और कैमरा।)

?अभी अभी # १०९४ ⇒ आलेख – कांच और कैमरा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिसे दुनिया आइना, शीशा अथवा दर्पण कहती है, हमारे घर में उसे कांच कहा जाता था। तब साधारण घरों में आईने वाली स्टील की आलमारी और दहेज वाली, कांच लगी, ड्रेसिंग टेबल भी नहीं होती थी, ना तो कोई अटैच बाथ होता था और ना ही कोई बैडरूम। हां घरों के आले में एक जगह कांच, कंघा और एक छोटी लोहे की डब्बी, अथवा कांच की शीशी में खोपरे का तेल रखा जाता था। ठंड में खोपरे का तेल ठरक जाता था, यानी जम जाता था। स्कूल जाने की जल्दी में उसे नहाने के गर्म पानी में डुबकी दी जाती थी, वह बेचारा, इस उपकार के फलस्वरूप, अंदर से पिघल जाता था। कभी कभी आपातकाल में सरसों का तेल ही बालों में चुपड़ लिया जाता था। कुछ संपन्न घरों में दीवारों पर फ्रेम में किसी तस्वीर की तरह टंगा, आइना भी नजर आ जाता था।

मुझे कैमरे का शौक ना तब था, न आज है। एक समय था, जब अखबारों और पत्रिकाओं में विज्ञापन आते थे, जापानी कैमरा, वीपीपी डाक से मंगाइए, मात्र ५० रुपए में।

सत्तर और अस्सी के दशक में शादियों के एल्बम धड़ाधड़ बनते थे। जिसके घर भी मिलने जाओ, वह शादी का एल्बम जरूर चाव से दिखाता था। कुछ श्वेत श्याम तस्वीरें तो बाबा आदम के जमाने की लगती थी। लेकिन कितना रंगीन होता था न, शादी का एल्बम।।

गर्मी की छुट्टियां हों अथवा एलटीसी लिया हो, शिमला मसूरी के साथ साथ तीरथ भी ही जाता था। बहती गंगा में कौन हाथ नहीं धोता। बैडिंग अथवा होल्डाल के साथ साथ एक अदद कैमरे की व्यवस्था भी की जाती थी। बाद में तो कैमरे के रोल भी रंगीन मिलने लग गए थे। यात्रा के बाद कैमरे के रोल धुलवाने पड़ते थे, अच्छा खासा इंतजार हुआ करता था। आज की तरह नहीं कि, लिया मोबाइल और खचाखच बीस पच्चीस एक जैसी तस्वीर खींच डाली। कुछ प्रिंट खराब भी निकल जाती थी। यानी बड़ा महंगा शौक था, फोटोग्राफी का।

कुछ टूरिस्ट स्पॉट्स पर तो पेशेवर फोटोग्राफर घूमा करते थे, आपके फोटो खींचकर बाद में डाक से भिजवा दिया करते थे।

अब तो खुदखेंच का जमाना है, आप चाहो तो मोदी जी के साथ सेल्फी हो जाए।।

अगर दर्पण झूठ नहीं बोलता, तो कैमरा भी कड़वा सच नहीं छुपाता। कुछ दिनों से मुझे अपना चेहरा बदला बदला, और सिर के बाल उड़े उड़े, यानी

उजाड़ फसल, और बचे खुचे बाल, मानो धूप में सफेद किये हुए, नजर आने लगे हैं।

अपनों से तो आप नजर छुपा सकते हो, लेकिन अपने आपको कैसे छुपाओगे। कैमरा तो दर्पण का भी बाप है। अगर खुद की सूरत से इतना ही प्यार है, तो बालों को डाई करो, अमिताभ की तरह दाढ़ी रख लो, सफेदी वरदान बन जाएगी।।

यही तो फर्क है, सूरत और सीरत में। पुरानी मशहूर अभिनेत्रियों को ही देख लीजिए, कहां गया उन हूरों का नूर। लेकिन सब कितनी मशहूर। जीवन का

अध्यात्म अपने अंदर झांकने में है, आईने और कैमरे से शिकायत करने में नहीं। बाहर सब कांच ही कांच है, असली हीरा तो हमारे अंदर ही मौजूद है।

शैलेन्द्र ने शायद आज से तिहोत्तर वर्ष पूर्व यानी सन् १९५३ में ही मेरे लिए यह गीत लिखा होगा, फिल्म शिकस्त का, जो मुझे आज भी प्रेरणा दे रहा है, मेरी आंखें खोल रहा है ;

नई जिंदगी से प्यार करके देख।

रूप का सिंगार करके देख।।

इसपे जो भी है,

निसार करके देख।

नई ज़िंदगी से प्यार करके देख।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ७१ – नाव का धर्म… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – नाव का धर्म।)

☆ हेमंत साहित्य # ७१ ☆

✍ नाव का धर्म… ☆ श्री हेमंत तारे  

यूँ तो,

क्यों हो कोई संदेह

नाव का धर्म ही होता है

डूबते को पार लगाना,

निष्पाप, निष्पक्ष रहकर

मदद का हाथ बढ़ाना।

 

पर हर नाव

ऐसी होती नही!

कुछ नावें,

नावों के झुंड में

दबी-छिपी रहती हैं,

कुटिल,

मत्सर,

और विघ्नसंतोषक,

पतवार को समेटे

आस-पास तैरती कातर आंखों से बचाये ।

 

और मुमकिन कहां

उन्हें पहचान पाना

हर समय,

हर दौर,

हर ज़रूरत के पल।

 

बेहतर है,

तय कर ली जाएँ दूरियाँ

अपने ही दम,

उम्र के हर दौर

बिना किसी नाव,

बिना किसी सहारे

अपने ही दम।

 

सीख लिया जाए

तैरना,

लढना,

निपटना,

उलझी गुत्थियाँ

अपने ही हाथों सुलझाना।

 

हर नाव

किनारे नहीं लगाती;

कुछ नावों का धर्म

होता है जुदा

यथा,

 

हम तो डूबेंगे सनम,

तुम्हें भी

ले डूबेंगे साथ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३७ – गुप्ता जी का ऑनलाइन ऑफर – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – गुप्ता जी का ऑनलाइन ऑफर।)  

☆  चुभते तीर # १३७ – व्यंग्य  – गुप्ता जी का ऑनलाइन ऑफर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

गुप्ता जी के जीवन का एक ही स्वर्णिम सिद्धांत था—’छूट चाहे एक रुपये की हो, उसे छोड़ना पाप है।’ उनके फ़ोन में दुनिया भर की शॉपिंग ऐप्स का ऐसा जाल बिछा था कि नोटिफिकेशन आते ही उनका अंगूठा अपने आप ‘बाय नॉव’ पर चला जाता था।

एक दिन अचानक उनके फोन पर लाल अक्षरों में चमचमाता हुआ मैसेज आया—’महा-बचत ऑफर! केवल अगले दस मिनट के लिए, ₹50,000 का प्रीमियम एयर प्योरिफायर पाएं मात्र ₹499 में!’

गुप्ता जी की बाछें खिल गईं। उन्होंने न बाएं देखा न दाएं, तुरंत क्रेडिट कार्ड का नंबर डाला और ऑर्डर कन्फर्म कर दिया। अगले ही पल उनके खाते से ₹499 कटने का मैसेज आ गया। गुप्ता जी ने ऐसे राहत की सांस ली जैसे किसी युद्ध में आख़िरी किला फतह कर लिया हो। वे पूरे मोहल्ले में घूम-घूमकर अपनी इस ‘ऐतिहासिक खरीददारी’ की शेखी बघारने लगे।

तीन दिन बाद कूरियर वाला एक बहुत बड़ा कार्डबोर्ड का बक्सा लेकर आया। बक्से का आकार इतना विशाल था कि उसे ड्राइंग रूम में रखने के लिए गुप्ता जी को अपने सोफ़े की जगह बदलनी पड़ी। पत्नी ने संदेह भरी नजरों से बक्से को देखा, “इस बक्से में सचमुच पंखा और फिल्टर है भी या केवल डिब्बा खरीद लाए हैं?”

गुप्ता जी ने मूंछों पर ताव दिया, “अरे तुम क्या जानो कॉर्पोरेट मार्केटिंग के दांव-पेच! कंपनियां कई बार प्रचार के लिए घाटे में सामान बेचती हैं।”

गुप्ता जी ने कैंची उठाई और बक्से को टेप काटकर खोला। अंदर एक और बक्सा था। उस बक्से को खोला तो उसके अंदर एक और छोटा बक्सा निकला। जैसे-जैसे बक्से खुलते गए, गुप्ता जी के माथे पर पसीने की बूंदें गहरी होती गईं। यह किसी जापानी खिलौने की तरह डिब्बे के अंदर डिब्बे का सिलसिला था।

आखिरकार जब छठा और सबसे छोटा बक्सा खुला, तो उसके अंदर से एक छोटा सा प्लास्टिक का पौधा और एक छोटी सी पर्ची निकली।

पर्ची पर लिखा था: “बधाई हो! यह मनी प्लांट का प्राकृतिक एयर प्योरिफायर है। यह हवा में ऑक्सीजन घोलता है और ज़हरीली गैसों को सोखता है। 100% प्राकृतिक और बिना बिजली का!”

पत्नी ने अपना माथा पीट लिया और ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगीं। गुप्ता जी का चेहरा ऐसा उतर गया जैसे किसी ने गरमा-गरम चाय में नींबू का रस निचोड़ दिया हो। ₹499 में उन्होंने दरअसल ₹10 का एक प्लास्टिक का गमला और उसकी पैकिंग का खर्च उठाया था।

तभी दरवाज़े पर पड़ोसी शर्मा जी आ पहुंचे। शर्मा जी ने उस बड़े बक्से और छोटे गमले को देखा और मुस्कुराते हुए बोले, “क्यों गुप्ता जी, हवा शुद्ध हुई या सिर्फ़ पॉकेट हल्की हुई?”

गुप्ता जी ने एक पल का विराम लिया, तुरंत अपना चश्मा ठीक किया और मुस्कुराकर बोले, “शर्मा जी, इसे कहते हैं असली दूरदर्शिता! बिजली का बिल शून्य, ज़ीरो मेंटेनेंस, और देखिए डिब्बों का कबाड़ बेचकर मुझे ₹500 वापस भी मिल गए! यानी प्योरिफायर बिल्कुल मुफ़्त!”

शर्मा जी का मुंह खुला का खुला रह गया और पूरा परिवार गुप्ता जी की इस बेमिसाल जुगाड़-बुद्धि पर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाने लगा।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७९ ☆ लघुकथा – समझ से परे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “समझ से परे“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७९ ☆

✍ लघुकथा ☆ समझ से परे☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

“पापा पापा गणपति बप्पा आने वाले हैं। मैं गणपति बप्पा के आने पर फटाके छुड़ाऊंगा”, चिंटू बोला। पापा ने कहा, “बप्पा घर आएंगे तो तुम फटाके छुडाओगे, पर क्यों?” “बप्पा के आने की खुशी में! जब बड़े लोग बप्पा को लेकर जुलूस निकालते हैं तो खूब जोर जोर से डीजे बजाते हैं तो बप्पा को खुश करने के लिए ही न।”

“तुम्हें कैसे मालूम कि ऊंची आवाज और शोर से बप्पा खुश होते हैं”, पापा ने पूछा।

“खुश होते होंगे तभी तो लोग ऊंची ऊंची आवाज करते हैं और गाते हैं। जैसे शादी ब्याह में बैंड बाजे और डीजे पर ऊंची आवाज में गाने गाकर खुशी मनाते हैं वैसे ही।” चिंटू मासूमियत से बोला।

“पर इससे यह पता कहां चलता है कि शोर शराबे से गणपति बप्पा खुश होते होंगे। बप्पा के कान तो बड़े होते हैं और उन्हें छोटी सी आवाज भी सुनाई दे जाती होगी तो ज्यादा आवाज से उन्हें तकलीफ़ ही होती होगी। आदमी भी सोचता है कि शोर शराबे से उसे खुशी मिलती है। पर ऐसा है नहीं।” ऊंची आवाज किसी के कानों को अच्छी नहीं लगती।” इतना बोल कर पापा ने चिंटू की ओर देखा।

चिंटू कुछ सोच रहा था।  थोड़ी देर बाद बोला, “पापा आप ठीक कहते हैं। ज्यादा शोर मेरे कानों को अच्छा नहीं लगता तो बप्पा को तो बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। बप्पा के सामने गाने नाचने से वे खुश हो सकते हैं पर ऊंची आवाज से नहीं।”

“नहीं पापा, मैं फटाके नहीं छुड़ाऊंगा और न ही जोर से संगीत बजाऊंगा। जो मेरे कानों को अच्छा लगेगा वही बप्पा के कानों को अच्छा लगेगा। “

“थैंक्यू पापा।”

और पापा के ओठों पर एक मुस्कान आई। उन्होंने गणपति बप्पा की ओर देखा तो उन्हें लगा कि वे भी हल्के से मुस्कुरा रहे हैं। उन्होंने मन ही मन कहा कि बप्पा सब कुछ समझ से परे है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२९ – हिंदी दिवस… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – हिंदी दिवस।)

☆ लघुकथा # १२९ – हिंदी दिवस श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

हिंदी दिवस पर विद्यालय में विशेष समारोह था। मंच पर हिंदी के सम्मान में भाषण हो रहे थे।

शिक्षक ने छात्र से कहा—

“आज हिंदी दिवस है, हिंदी में ही बात करना।”

छात्र ने पूछा—

“सर, आज ही क्यों?”

“क्योंकि आज हिंदी दिवस है।”

छात्र मुस्कराया—

“तो बाकी दिन किसके हैं?”

शिक्षक निरुत्तर हो गए।

छात्र ने फिर पूछा—

“सर, हिंदी को सम्मान भाषणों से मिलेगा या व्यवहार से?”

शिक्षक ने कहा—

“व्यवहार से।”

“तो फिर हम इसे सिर्फ आज क्यों निभाएँ?”

शिक्षक के पास कोई उत्तर नहीं था।

तभी मंच से घोषणा हुई—

“अब हिंदी दिवस पर हिंदी के महत्व पर भाषण दे रहे थे ।”

छात्र ने मंच की ओर देखा और धीमे से कहा—

“सर, हिंदी को आज फिर वही मिला—सम्मान का भाषण और व्यवहार में छुट्टी।”

तालियाँ गूँज उठीं।

शिक्षक चुप थे।

मंच पर हिंदी का सम्मान हो रहा था और मंच से उतरते ही हिंदी फिर अपने घर का रास्ता खोज रही थी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ये मन तुम बिन कहीं और लगता नहीं  ☆ श्री अनिल वमोरकर ☆

श्री अनिल वमोरकर 

☆ कविता – ये मन तुम बिन कहीं और लगता नहीं  ☆ श्री अनिल वमोरकर ☆

ऐ माँ

ये मन

तुम  बिन

कही और

लगता नहीं..

 

ब्राह्ममुहुर्त

मानसपूजा में

ध्यान में

फिर सगुण पूजा में,

जप, विष्णू सहस्त्रनाम में

मन रमता,

तुम  बिन मन….

 

प्रसाद पश्चात

आपके द्वारा लिखीत

पुस्तक में खो जाता,

उसीमे मन मेरा रमता,

तुम बिन मन….

 

सात बजे की

आरती और जाप

रात का सत्संग

आनंदने मन डोलता,

तुम  बिन मन…

 

हनुमान चालीसा

पढकर जब सोता हूॅं

तेरी गोंद में पाता,

भाग्य को नमन करता,

तुम  बिन मन…

 

©  श्री अनिल वामोरकर

अमरावती

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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