हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०२ ☆ आलेख – “डॉ धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टि” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०२ ☆

?  आलेख – डॉ धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

 धर्मवीर भारती के लेखन में व्यंग्य उनकी संवेदना के भीतर घुली हुई वह कसक है जो करुणा, नैतिक बेचैनी और उनके लेखन में ऐतिहासिक दृष्टि के साथ मिलकर प्रकट होती है। वे हँसाने वाले व्यंग्यकार नहीं हैं बल्कि मुस्कान के भीतर छिपी हुई पीड़ा दिखाने वाले रचनाकार हैं। उनके नाटक , उपन्यास , कविता में व्यंग्य पात्रों की सहज अभिव्यक्ति से पाठक की अंतरात्मा को कुरेदता है।

उनका काव्य नाटक अंधा युग इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। महाभारत के युद्ध के बाद की कथा के माध्यम से उन्होंने आधुनिक मनुष्य के नैतिक अंधेरे,  सत्ता की क्रूरता और विजेताओं की खोखली विजय पर ऐसा व्यंग्य किया है जो सीधे किसी व्यक्ति पर नहीं पूरी सभ्यता पर लक्षित है। उनके ये प्रयोग किसी नितांत व्यंग्य का टैग लगाए आज की कई  रचनाओं से अधिक प्रभावी हैं ।

उनकी अभिव्यक्ति में धृतराष्ट्र का अंधापन केवल शारीरिक नहीं रह जाता वह सत्ता में बैठे हर उस व्यक्ति का प्रतीक बन जाता है जो सच जानते हुए भी उसे देखना नहीं चाहता। उदाहरण स्वरूप नाटक में धृतराष्ट्र का संवाद “मैंने कुछ नहीं देखा कुछ नहीं सुना” आधुनिक शासकों की जानबूझकर की अज्ञानता पर तीखा व्यंग्य है जो युद्ध की विभीषिका को नजर अंदाज कर सत्ता की भूलभुलैया में भटकते हैं। गांधारी का क्षोभ और अश्वत्थामा का अंध प्रतिशोध आधुनिक राजनीतिक वर्गों की मानसिकता को उघाड़ते हैं जहाँ एक अन्य पंक्ति “विजय तो हुई पर मनुष्य कहाँ बचा” विजेताओं के खोखले दंभ पर प्रहार करती है।

उनके उपन्यास गुनाहों का देवता में भी व्यंग्य सामाजिक संरचनाओं पर है। स्वयं उपन्यास के नाम में ही व्यंग्य का कंट्रास्ट दिखता है। यह कृति प्रेमकथा का उपन्यास  मानी जाती है किन्तु, इसमें व्यंग्य अंतर्निहित है। प्रेम के नाम पर त्याग का महिमामंडन करने वाला समाज स्वयं प्रेम से डरता है। चंदर और सुधा के संबंधों की विवशताएँ पाठक को द्रवित करती हैं पर साथ ही यह प्रश्न भी उठाती हैं कि क्या हमारी नैतिकता वास्तव में मानवीय है या केवल सामाजिक सुविधा है। एक उदाहरण है चंदर का वह अंतर्मन जहाँ वह सोचता है “प्रेम तो देवत्व है पर समाज इसे गुनाह बना देता है” जो प्रेम को पवित्र बताकर त्याग थोपने वाली सामाजिक मान्यताओं पर सूक्ष्म व्यंग्य है। दूसरा उदाहरण सुधा का विवाह बिंदु है जहाँ प्रेम का बलिदान सामाजिक सम्मान के नाम पर मजबूर किया जाता है यह दर्शाते हुए कि हिन्दू समाज नारी को देवी बनाकर उसी के गुनाहों का देवता कैसे थोप देता है। यहाँ व्यंग्य खुलकर नहीं बोलता बल्कि परिस्थितियों की विडंबना में स्वतः उभरता है।

डॉ भारती की कविताओं विशेषकर कनुप्रिया में भी पारंपरिक प्रेम आख्यानों पर एक सूक्ष्म पुनर्पाठ दिखाई देता है। राधा का स्वर कहीं कहीं उस पुरुष केंद्रित मिथकीय संरचना पर प्रश्न करता हुआ प्रतीत होता है जिसने स्त्री को प्रतीक्षा और विरह की मूर्ति बनाकर स्थापित किया। कनुप्रिया नारी के अंतर्मन की परतें खोलती है जहाँ सुख के क्षणों में घिर आने वाली निर्व्याख्या उदासी और विप्र लब्धा रस की पीड़ा को सौंदर्यपूर्ण ढंग से व्यक्त करती है। यह व्यंग्य आक्रामक नहीं आत्म संवादी है। ठंडा लोहा संग्रह में शहर की उदासीनता अकेलेपन और मूल्य क्षय पर प्रतीकात्मक व्यंग्य है । जैसे मेरी दुखती हुई रगों पर ठंडा लोहा रखना उस व्यवस्था का प्रतीक है जो संवेदनशीलता पर कठोरता चढ़ाती है ।

पत्रकार और संपादक के रूप में जब वे धर्मयुग का संचालन कर रहे थे तब उनके संपादकीय लेखों में सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर संयत किन्तु तीक्ष्ण टिप्पणी मिलती है। वे शोर नहीं मचाते पर शब्दों के बीच ऐसी रिक्ति छोड़ते हैं जहाँ पाठक स्वयं व्यवस्था की विडंबना पहचान लेता है। धर्मयुग के माध्यम से उन्होंने नई पीढ़ी को विसंगति पहचानने की संवेदना दी।

उनके व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह व्यक्ति विरोधी नहीं स्थिति विरोधी है। उसमें क्रोध कम नैतिक पीड़ा अधिक है। वे उपहास नहीं करते बल्कि यह दिखाते हैं कि मनुष्य अपनी ही बनाई संरचनाओं में कैसे फँस गया है। इसलिए उनका व्यंग्य समय के साथ पुराना नहीं पड़ता क्योंकि वह किसी घटना पर नहीं मनुष्य की प्रवृत्ति पर केंद्रित है।

धर्मवीर भारती को पढ़ते हुए लगता है कि व्यंग्य तब सबसे प्रभावी होता है जब वह हँसी पैदा न करे बल्कि भीतर एक असुविधाजनक चुप्पी छोड़ जाए। वही चुप्पी उनकी रचनाओं की वास्तविक शक्ति है और वही उन्हें केवल साहित्यकार नहीं अपने समय का आत्मद्रष्टा बनाती है।

एक प्रसंग डॉ पुष्पा भारती के संस्मरण पढ़ने में मिला, रागदरबारी का प्रारंभिक लेखन श्रीलाल शुक्ल जी ने डॉ धर्मवीर भारती के मुंबई के जुहू वाले समुद्र किनारे के फ्लैट में ही किया था।

पुष्पा जी ने लिखा है, “मुंबई शहर के छोर पर महासागर से अभिप्रेरित ही रागदरबारी की पहली पंक्तियां हैं – महानगर के छोर से ही भारत में देहात का महासागर प्रारंभ हो जाता है…

तो जिन धर्मवीर भारती जी के घर में ही व्यंग्य का राग दरबार उपजा हो , उनके लेखन में व्यंग्य  स्वाभाविक रूप से घुला होना स्वाभाविक ही है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८४ – व्यंग्य – डाइट कंट्रोल और समोसे का सम्मोहन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – डाइट कंट्रोल और समोसे का सम्मोहन)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८४ – व्यंग्य  – डाइट कंट्रोल और समोसे का सम्मोहन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

मनुष्य के जीवन में ‘संकल्प’ और ‘समोसे’ का वही रिश्ता है जो चूहे और बिल्ली का होता है। आप कितनी भी बड़ी ‘डाइट कंट्रोल’ की दीवार खड़ी कर लें, एक गरम समोसा उस दीवार के नीचे से ‘सुरंग’ बनाकर आपके आत्मबल को धराशायी कर देता है। हमारे मित्र ‘गजाधर बाबू’ ने जब से डॉक्टर की यह बात सुनी कि उनका शरीर अब ‘इंसानी शरीर’ कम और ‘फैट का गोदाम’ ज्यादा लग रहा है, उन्होंने ‘डाइट’ का भीषण व्रत ले लिया।

गजाधर बाबू ने घोषणा कर दी कि अब वे केवल ‘घास-फूस’ यानी सलाद पर जीवित रहेंगे। उनके डाइनिंग टेबल पर अब खीरे, ककड़ी और उबली हुई लौकी का साम्राज्य था। वे इन चीजों को ऐसे देखते थे जैसे कोई मुजरिम अपनी हथकड़ियों को देखता है। श्रीलाल शुक्ल के शब्दों में कहें तो, गजाधर बाबू का यह त्याग वैसा ही था जैसे कोई भ्रष्ट अधिकारी रिटायरमेंट के बाद ‘सत्य और अहिंसा’ पर प्रवचन देने लगे।

लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था। एक शाम गजाधर बाबू दफ्तर से लौट रहे थे। रास्ते में ‘मुन्ना हलवाई’ की दुकान थी। मुन्ना हलवाई के यहाँ समोसे तलने की क्रिया किसी ‘यज्ञ’ से कम नहीं होती। कड़ाही में खौलता हुआ तेल, और उसमें गोते खाते हुए सुडौल समोसे—जैसे स्वर्ग की अप्सराएँ अमृत कुंड में स्नान कर रही हों।

समोसे की वह सोंधी खुशबू जब गजाधर बाबू की नासिकाओं से टकराई, तो उनके ‘डाइट संकल्प’ के फेफड़े फूलने लगे। उनका मन चिल्लाया— “भाग गजाधर, ये मायाजाल है!” पर उनका पेट पलटकर बोला— “अबे रुक! देख तो सही, आलू का वो श्रृंगार, मसालों की वो जुगलबंदी!”

गजाधर बाबू दुकान के सामने ऐसे ठिठक कर खड़े हो गए जैसे कोई सन्यासी अपनी पुरानी प्रेमिका को देख ले। उन्होंने सोचा, “एक समोसे से क्या होगा? न्यूटन ने भी तो कहा था कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, तो एक समोसे की प्रतिक्रिया में मैं कल दो किलोमीटर ज्यादा चल लूँगा।” यह वह तर्क है जो दुनिया का हर डाइट करने वाला इंसान खुद को ‘बेवकूफ’ बनाने के लिए इस्तेमाल करता है।

वे दुकान के करीब पहुँचे। समोसा एकदम गरम था, उसकी पपड़ी ऐसी कुरकुरी कि छूने मात्र से ‘साहित्यिक संगीत’ पैदा हो। गजाधर बाबू ने समोसे को हाथ में लिया। वह उनके हाथ में ऐसे थिरक रहा था जैसे कोई नवजात शिशु। उन्होंने उसे चटनी में डुबोया—हरी चटनी यानी तीखा प्रहार और लाल चटनी यानी मीठा धोखा।

जैसे ही उन्होंने पहला निवाला लिया, उन्हें लगा कि उनके भीतर की ‘कैलोरी’ पुलिस ने हड़ताल कर दी है और ‘कोलेस्ट्रॉल’ के गुंडे जश्न मनाने लगे हैं। स्वाद ऐसा कि उन्हें लगा जैसे मोक्ष का द्वार उनके तालू में खुल गया है।

गजाधर बाबू अभी दूसरे समोसे पर हाथ साफ़ कर ही रहे थे कि अचानक उनके पीछे एक परिचित आवाज़ गूँजी— “अरे गजाधर भाई! ये क्या? आप तो कह रहे थे कि अब आप केवल उबला हुआ पानी और हवा खाकर जिएंगे?”

पीछे उनके डॉक्टर खड़े थे, जो खुद हाथ में ‘जलेबी’ का दोना थामे हुए थे। गजाधर बाबू का समोसा उनके हाथ में ही जम गया। वे हड़बड़ाए, पर हार मानने वाले कहाँ थे।

गजाधर बाबू ने बड़ी गंभीरता से कहा, “अरे डॉक्टर साहब, आप गलत समझ रहे हैं। दरअसल मैं तो इस समोसे का ‘पोस्टमार्टम’ कर रहा था। मैं देख रहा था कि मुन्ना हलवाई इसमें कितना ‘हानिकारक’ फैट डालता है, ताकि मैं कल सुबह ग्रुप में सबको इसके नुकसान बता सकूँ। और आप? आप ये जलेबी क्यों ले रहे हैं?”

डॉक्टर साहब ने भी बिना पलक झपकाए जवाब दिया, “मैं? मैं तो इस जलेबी की ‘कुंडली’ चेक कर रहा था कि आखिर ये इतनी टेढ़ी क्यों होती है! विज्ञान के लिए बलिदान देना पड़ता है गजाधर बाबू!” अब दोनों ‘विज्ञानी’ एक-दूसरे की चोरी पर हाथ मिला चुके थे और मुन्ना हलवाई सोच रहा था कि अगर ये दोनों वैज्ञानिक हैं, तो फिर ‘पागल’ कौन है!

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अनौपचारिक ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अनौपचारिक ? ?

मन विदीर्ण हो जाता है

जब कोई ऊपरी

कह-बोल कर

आदर, अपनत्व

बताता-जताता है,

भीतर कुछ दरक जाता है,

जब कोई रिश्तों को

औपचारिकता का

लिबास पहनाता है,

जानता हूँ-

नेह की छटाओं में

होती नहीं एकरसता है

पर मेरी माँ ने कभी नहीं कहा

‘तू मेरे प्राणों में बसता है।’

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८० ☆ फागुन की चिट्ठी… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना फागुन की चिट्ठी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २८० ☆ फागुन की चिट्ठी

मेरे प्रकृति-मित्रों,

मैं फागुन हूँ। हर साल चुपचाप तुम्हारे आँगन में उतर आता हूँ—कभी हल्की हवा बनकर, कभी फूलों की खुशबू बनकर, कभी किसी पेड़ की नई कोपल में छिपकर। जब तुम Holi के रंगों में भीगते हो, तब मुझे सबसे ज़्यादा आनंद होता है।

रंग उड़ते हैं, हँसी गूँजती है, और मन जैसे थोड़ी देर के लिए फिर से बच्चा हो जाता है।

पर इस बार मैं तुमसे एक छोटी-सी विनती करना चाहता हूँ।

जब तुम अपने प्रियजनों को गुलाल लगाओ, तो एक चुटकी गुलाल अपने आँगन के किसी पौधे के नाम भी रख देना। उस तुलसी के पास, उस छोटे से नीम या अमरूद के पेड़ के पास, या उस बेल के पास जो चुपचाप तुम्हारी दीवार थामे खड़ी है।

हल्के से उसके तने को छूकर कहना—

“तुम भी हमारे उत्सव के साथी हो।”

क्योंकि पौधे केवल हरियाली नहीं होते।

वे हमारी साँसों की शांति हैं,

हमारी थकान की छाया हैं,

और हमारे जीवन के मौन संरक्षक हैं।

हमारी परंपराओं में उन्हें कभी देवता माना गया, कभी पूर्वजों का रूप। शायद इसलिए कि वे बिना कुछ कहे, बिना कुछ माँगे, हमें जीवन देते रहते हैं।

अगर इस होली तुम एक चुटकी गुलाल पौधों को भी लगा दोगे, तो यह केवल एक प्रतीक नहीं होगा—यह प्रकृति से दोस्ती का एक छोटा-सा वचन होगा।

और तब शायद तुम्हें महसूस होगा कि हवा भी थोड़ी और मधुर हो गई है,

पत्ते भी हल्के-हल्के मुस्कुरा रहे हैं,

और तुम्हारे आँगन में खड़ा हर पेड़ मन ही मन कह रहा है—

“अब सच में फागुन आया है।”

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “अंतिम पड़ाव में…” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  लघुकथा – अंतिम पड़ाव में… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

गांव से विधुर पिता जी बेटे के पास रहने शहर आ गये थे। उनके आते ही बहू बेगम के चेहरे की भाव भंगिमा बिगड़ी हुई थी। अनुभवी पिता तुरंत ताड़ गये। बहू बेटे को बुला कर बोले- देखो बेटा, तुम दोनों नौकरी पेशा हो और बहुत बिज़ी रहते हो इसलिये

मैं अपने लिये कुछ व्यवस्थाएं प्लान करके आया हूँ। वो ये कि – मेरे नाश्ते, और दोनों टाईम खाने के लिये टिफ़िन सर्विस और कपड़े धुलवाने लांड्री वाला तय कर देना। एक इंडक्शन कुकर ले आया था और चाय बनाने की सामग्री, तो सुबह जल्दी उठता हूं इसलिये चाय अपनी मैं बना लिया करूँगा। अपनी दवाईयां भी होम डिलीवरी से आनलाईन मंगवा लिया करूँगा। अपने सभी खर्च भी अपनी पेंशन से वहन कर लूंगा। जब भी समय मिले मेरे साथ कुछ देर बैठ लिया करना।

बहू बेगम फिर भी चहक पड़ीं -” तो हमारे यहाँ वृद्धाश्रम जैसे रहने का मतलब क्या हुआ,पिता जी ? पिता जी शांत स्वर में बोले- मैं तो बस इस अंतिम समय में तुम लोगों और पोते पोती का साथ और लाड़ दुलार को जीने यहाँ चला आया हूँ। अन्यथा न लेना। तुम लोगों की निजी ज़िंदगी में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता हूं। सेवक तो गाँव में भी बहुत थे पर तुम सबका साथ कहाँ था वहां। इतना हक मुझे दे देना ,बस और कुछ नहीं चाहिए मुझे। अब न केवल बहू बेगम बल्कि बेटा भी पूर्णतः निरुत्तर थे। 

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३४ ⇒ आत्म-स्वीकृति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आत्म-स्वीकृति।)

?अभी अभी # ९३४ ⇒ आलेख – आत्म-स्वीकृति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आत्म, आत्मा का स्थूल स्वरूप है। आत्म-कथा में आत्मा को छोड़कर स्थूल देह का महिमामंडन किया जाता है। केवल स्वामी परमहँस योगानंद की ” योगी की आत्म-कथा (An Autography of a Yogi) ही एक ऐसी आत्मकथा है जिसमें जीवात्मा के साथ परमात्मा का भी विवेचन किया गया है, स्थूल के साथ सूक्ष्म शरीर की व्याख्या की गई है। वहाँ मैं से अधिक आत्म-तत्व की चर्चा की गई है।

मोहनदास करमचंद गाँधी की आत्म-कथा में हम ऐसी आत्म-स्वीकृति पाते हैं, जिन्हें आप स्वीकारोक्ति अथवा कॉन्फेशन कह सकते हैं। अपने गुणों का बढ़ा चढ़ाकर वर्णन और अवगुणों पर पर्दा ही अधिकतर आत्म-कथा की विषय- वस्तु होती है। ग़रीबी और अभाव का वर्णन इफ़राती से किया जाता है। उपलब्धियों का बखान भी नई नवेली दुल्हन के समान लजाकर किया जाता है। महात्मा-गाँधी की आत्म-कथा का शीर्षक, सत्य के प्रयोग है। जिसका अंग्रेज़ी शीर्षक My Confessions with Truth है। सत्य कोई प्रयोग की वस्तु नहीं, आचरण में उतारने वाली नैतिकता है। आप कुछ भी सोचें करें, नैतिकता की मर्यादा में रहकर करें। प्रयोग का प्रदर्शन अथवा स्वीकारोक्ति नैतिकता के दायरे में नहीं आती। शायद इसीलिए बापू की आत्म-कथा आज भी उनके लिए आत्म-घाती ही सिद्ध हो रही है। कहाँ का महात्मा, राष्ट्रपिता, लंपट कहीं का ! जैसे विशेषण भी उपहार-स्वरूप अनादर सहित प्रेषित किये जाते रहे हैं।।

जब हम आत्म-स्वीकृति की बात करते हैं, तो उसमें आत्म-मंथन भी समाहित है। गुण-दोषों का अवलोकन, अन्तरावलोकन का विषय है, जिसके आधार पर आत्म-शुद्धि संभव है। यह चित्त-शुद्धि का एक सूक्ष्म प्रयास है। आत्म-बल इसी चित्त-शुद्धि की देन है।

आत्म-बल, आत्म-विश्वास का परिष्कृत स्वरूप है, जहाँ स्वयं से अधिक उस सर्व-शक्तिमान पर भरोसा किया जाता है। यह आस्था, विश्वास और समर्पण की वह चरम अवस्था है, जिसे नारद-भक्ति-सूत्र में आत्म-निवेदन की संज्ञा दी गई है।।

आत्म-स्वीकृति स्वयं को, अपने गुण-दोषों सहित पहचानने की एक सूक्ष्म प्रक्रिया है। ईश्वर तो हमें हमारे गुण-दोषों सहित स्वीकार कर लेता है लेकिन संसार दोषमुक्त नहीं, दोषयुक्त है। वह आपके दोषों को स्वीकार नहीं करता, केवल गुणों का गाहक है। फलस्वरूप हम अपनी बुराइयों और अवगुणों को छुपा लेते हैं और अच्छाइयों को जग-जाहिर कर देते हैं। और इससे ही हमें मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा और प्रशंसा हासिल होती है। यह सतही अच्छाई ही संसार है, जो आपकी नित्य शुद्ध, बुद्ध आत्मा से कोसों दूर है।

आत्म-स्वीकृति मान्यता प्राप्त धर्म नहीं, सहज, सरल अध्यात्म है, चित्त शुद्धि का एकमात्र ऐसा उपाय है, जहाँ निंदा-स्तुति, छल-कपट के लिए कोई स्थान नहीं। केवल निष्ठा, प्रेम और समर्पण है, जिसके बिना स्वयं का, एवं जगत का वास्तविक कल्याण संभव नहीं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४२ – व्यंग्य- बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४२

☆ व्यंग्य – बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

मन नहीं मान रहा था। स्वयं के लिए स्वयं प्रयास करें। मगर, पुरस्कार की राशि व पुरस्कार का नाम बड़ा था। सो, मन मसोस कर दूसरे साहित्यकार से संपर्क किया। बीस अनुशंसाएं कार्रवाई। जब इक्कीसवे से संपर्क किया तो उसने स्पष्ट मना कर दिया।

“भाई साहब! इस बार आपका नंबर नहीं आएगा।” उन्होंने फोन पर स्पष्ट मना कर दिया, “आपकी उम्र 60 साल से कम है। यह पुरस्कार इससे ज्यादा उम्र वालों को मिलता है।”

हमें तो विश्वास नहीं हुआ। ऐसा भी होता है। तब उधर से जवाब आया, “भाई साहब, वरिष्ठता भी तो कोई चीज होती है। इसलिए आप ‘उनकी’ अनुशंसा कर दीजिए। अगली बार जब आप ‘सठिया’ जाएंगे तो आपको गारंटीड पुरस्कार मिल जाएगा।”

बस! हमें गारंटी मिल गई थी। अंधे को क्या चाहिए? लाठी का सहारा। वह हमें मिल गया था, इसलिए हमने उनकी अनुशंसा कर दी। तब हमने देखा कि कमाल हो गया। वे सठियाए ‘पट्ठे’ पुरस्कार पा गए। तब हमें मालूम हुआ कि पुरस्कार पाने के लिए बहुत कुछ करना होता है।

हमारे मित्र ने इसका ‘गुरु मंत्र’ भी हमें बता दिया। उन्होंने कहा, “आपने कभी विदेश यात्रा की है?” चूंकि हम कभी विदेश क्या, नेपाल तक नहीं गए थे इसलिए स्पष्ट मना कर दिया। तब वे बोले, “मान लीजिए। यह ‘विदेश’ यात्रा यानी आपका पुरस्कार है।”

“जी।” हमने न चाहते हुए हांमी भर दी। “वह आपको प्राप्त करना है।” उनके यह कहते ही हमने ‘जी-जी’ कहना शुरू कर दिया। वे हमें पुरस्कार प्राप्त करने की तरकीबें यानी मशक्कत बताते रहे।

सबसे पहले आपको ‘पासपोर्ट’ बनवाना पड़ेगा। यानी आपकी कोई पहचान हो। यह पहचान योग्यता से नहीं होती है। इसके लिए जुगाड़ की जरूरत पड़ती है। आप किस तरह इधर-उधर से अपने लिए सभी सबूत जुटा सकते हैं। वह कागजी सबूत जिन्हें पासपोर्ट बनवाने के लिए सबसे पहले पेश करना होता है।

सबसे पहले एक काम कीजिए। यह पता कीजिए कि पुरस्कार के इस ‘विदेश’ से कौन-कौन जुड़ा है? कहां-कहां से क्या-क्या जुगाड़ लगाना लगाया जा सकता है? उनसे संपर्क कीजिए। चाहे गुप्त मंत्रणा, कॉफी शॉप की बैठक, समीक्षाएं, सोशल मीडिया पर अपने ढोल की पोल, तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें वोट दूंगा, तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊंगा, जैसी सभी रणनीति से काम कीजिए। ताकि आपको एक ‘पासपोर्ट’ मिल जाए। आप कुछ हैं, कुछ लिखते हैं। जिनकी चर्चा होती है। यही आपकी सबसे बड़ी पहचान है। यानी यही आपका ‘पासपोर्ट’ होगा।

अब दूसरा काम कीजिए। इस पुरस्कार यानी विदेश जाने के लिए अर्थात पुरस्कार पाने के लिए वीजा का बंदोबस्त कीजिए। यानी उस अनुशंसा को कबाडिये जो आपको विदेश जाने के लिए वीजा दिला सकें। यानी आपने जो पासपोर्ट से अपनी पहचान बनाई है उसकी सभी चीजें वीजा देने वाले को पहुंचा दीजिए। उससे स्पष्ट तौर पर कह दीजिए। आपको विदेश जाना है। वीजा चाहिए। इसके लिए हर जोड़-तोड़ व खर्चा बता दे। उसे क्या-क्या करना है? उसे समझा दे।

सच मानिए, यह मध्यस्थ है ना, वे वीजा दिलवाने में माहिर होते हैं। वे आपको वीजा प्राप्त करने का तरीका, उसका खर्चा, विदेश जाने के गुण, सब कुछ बता देंगे। बस आपको वीजा प्राप्त करने के लिए कुछ दाम खर्च करने पड़ेंगे। हो सकता है निर्णयको से मिलना पड़े। उनके अनुसार कागज पूर्ति, अनुशंसा या कुछ ऐसा वैसा छपवाना पड़ सकता है जो आपने कभी सोचा व समझ ना हो। मगर इसकी चिंता ना करें। वे इसका भी रास्ता बता देंगे।

बस, आपको उनके कहने अनुसार दो-चार महीने कड़ी मेहनत व मशक्कत करनी पड़ेगी। हो सकता है फोन कॉल, ईमेल, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम आदि पर इच्छित- अनिच्छित व अनुचित चीज पोस्ट करनी पड़े। इसके लिए दिन-रात लगे रहना पड़ सकता है। कारण, आपका लक्ष्य व इच्छा बहुत बड़ी है। इसलिए त्याग भी बड़ा करना पड़ेगा।

इतना सब कुछ हो जाने के बाद, जब आपको विदेश जाने का रास्ता साफ हो जाए और वीजा मिल जाए तब आपको यात्रा-व्यय तैयार रखना पड़ेगा। तभी आप विदेश जा पाएंगे।

उनकी यह बात सुनकर लगा कि वाकई विदेश जाना यानी पुरस्कार पाना किसी पासपोर्ट और वीजा प्राप्त करने से कम नहीं है। यदि इसके बावजूद विदेश यात्रा का व्यय पास में न हो तो विदेश नहीं जा पाएंगे। यह सुनकर हम मित्र की सलाह पर नतमस्तक हो गए। वाकई विदेश जाना किसी योग्यता से काम नहीं है। इसलिए हमने सोचा कि शायद हम इस योग्यता को भविष्य में प्राप्त कर पाएंगे? यही सोचकर अपने आप को मानसिक रूप से तैयार करने लगे हैं।

—– 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

29-01- 2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “सादगी का प्रतीक : लाल बहादुर शास्त्री” ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता “सादगी का प्रतीक : लाल बहादुर शास्त्रीपर चर्चा।

☆ कविता  ☆ सादगी का प्रतीक : लाल बहादुर शास्त्री ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

सादा जीवन अर ऊँचे विचार

यो नारा तो बहुतां नै दिया सै,

पर अगर किसी आदमी के जीण में

इस बात नै साच्चा उतरता देखणा हो,

तो वो थे लाल बहादुर शास्त्री।

प्रधानमंत्री जैसे बड़े पद पै पहुंच कै भी

उनकी सादगी वैसी ही रही

जैसी बचपन में थी।

जो बोल्या, पहले खुद अपनाया—

यो ही उनकी सबसे बड़ी खासियत थी।

अगर महात्मा गांधी कहैं थे

म्हारा जीवन ही म्हारा संदेश सै,

तो शास्त्री जी भी इस कसौटी पै

पूरे उतरै।

इत्तफाक देखो—

दोनों की जयंती एक ही दिन आवै सै।

कई मायनों में

शास्त्री जी भी गांधी जी से

कम ना थे।

प्रधानमंत्री बणण के बाद

देश-विदेश में लोग सोचण लागै

कि यो नन्हा सा आदमी

इतणा बड़ा देश कैसे संभालेगा?”

पर जब पाकिस्तान नै हमला किया,

तो शास्त्री जी नै ऐसा करारा जवाब दिया

कि अयूब खान घबरा गया।

जिस आदमी नै वो सीधा,

सरल अर मृदुभाषी समझै था,

उसे यो पता ही ना था

कि उसके पीछे

लोहे जैसा मजबूत आदमी छुपा सै।

घुसपैठ करकै हार्या हुआ दुश्मन

अर कर भी क्या सकता था—

अपने ही लगाई आग में

उसके हाथ जल चुके थे।

ऐसी सादगी की प्रतिमूर्ति

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म

2 अक्टूबर 1904 नै

बनारस के पास रामनगर कस्बे में हुआ।

उनके पिता शारदा प्रसाद

इलाहाबाद की कायस्थ पाठशाला में

अध्यापक थे।

शारदा प्रसाद अर उनकी घरवाली

रामदुलारी—

दोनों ही बड़े धार्मिक अर संस्कारी थे।

बचपन में ही पिता गुजर गए,

तो मां के सारे संस्कार

उनके जीण में बस गए।

उनकी परवरिश

ननिहाल में नाना हजारीलाल के साए में हुई,

जो खुद स्कूल मास्टर

अर सुसंस्कृत आदमी थे।

शास्त्री जी का बचपन

घणी गरीबी में बीता।

खेलण का मन था—

हॉकी अर फुटबॉल खेलणा चाहते थे,

पर जब घर में खाने के पैसे ना हों,

तो खेल का सामान कहां से आवै?

पर उनकी तेज बुद्धि नै रास्ता ढूंढ लिया।

खजूर के फूल बटोर कै,

फटे-पुराणे कपड़े में लपेट कै

वो खुद गेंद बणा ले।

मजबूत पेड़ की टहनी तोड़ कै

हॉकी स्टिक बणा ले।

परिस्थितियां चाहे जैसी हों,

लाल बहादुर नै

उन्हें अपने अनुकूल बणाण की

पूरी कोशिश की।

वो जानै थे

कि कर्म का रास्ता

कभी फूलां की सेज ना होया।

उन्होंने कभी

अपने लक्ष्य के लिए

आसान राह ना पकड़ी।

कद छोटा था,

शरीर कमजोर था,

पर हिम्मत बला की थी।

इतिहास गवाह सै—

आसान काम करै वाला

कभी महान काम ना कर सके।

लाल बहादुर जी

संघर्ष की मिट्टी से बने थे।

प्रेम देना अर पाणा

उन्होंने ननिहाल से सीखा।

दुखी आदमी नै देख कै

पिघल जाणे का गुण

उन्हें मां से मिला।

शिक्षा का मान

उन्हें पिता के खून से मिला।

जैसी भी हालत आई,

उन्होंने खुद नै

उसी में ढाल लिया।

दुख सहे,

पर टूटे ना—

बल्कि और निखर गए।

वो कहा करै थे—

संतोष के किले नै

कोई भेद ना सके।

थोड़े में खुश रहणा

उनकी बड़ी ताकत थी।

परेशानियां साथ चलती रहीं,

फिर भी उन्होंने लिखा—

कुल मिलाकै

म्हारा स्कूली जीवन

हंसी-खुशी बीता।

उनकी बोली मीठी थी

अर व्यवहार दोस्ताना।

मित्रता के लिए बढ़ा हाथ

कभी ठुकराया ना।

अर जब जरूरत पड़ी,

तो दोस्ती का हाथ

आगे बढ़ाण में

कभी हिचकिचाए ना।

कर्म के मामले में

वो हमेशा गंभीर रहे।

उन्होंने अपने जीण में

छोटे-बड़े घणे काम किए,

पर किसी काम नै

नीचा समझ कै ना देख्या।

हर काम नै

कुशल कारीगर की तरह

पूरे मन से किया।

जो आदमी कर्म में

सावधान अर साहसी हो,

वही सबसे आगे निकले सै—

अर यो दोनों गुण

शास्त्री जी में भरपूर थे।

घर की हालत

कुछ खास ना थी,

पर देशसेवा

उन्हें सबसे ऊपर लागै थी।

कर्म नै पूजा मानण वाले

गांधी जी से

उनका गहरा लगाव था।

पहली बार

गांधी जी का भाषण सुना,

तो वो पूरी तरह

मंत्रमुग्ध हो गए।

लाल बहादुर

मां की इजाजत जरूरी समझै थे।

जब उन्होंने देशसेवा की बात कही,

तो मां बोल्ली—

बेटा, मन्नै तुझ पै पूरा भरोसा सै।

तू कोई भी फैसला

सोच-समझ कै ही करेगा।

मां की यो बात

उनके दिल का बोझ उतार गई।

इजाजत मिलते ही

वो छात्र आंदोलन में कूद पड़े।

1921 में

उन्हें पहली बार जेल जाना पड़ा,

पर रत्ती भर भी अफसोस ना हुआ।

कुछ घंट्यां बाद

चेतावनी देकै

उन्हें छोड़ दिया गया।

एक बार

उन्हें साइकिल खरीदणी थी,

पर पैसे ना थे।

पर लाल बहादुर

मुश्किलां नै

जिंदगी की परीक्षा मानै थे

अर मुस्कुरा कै सह ले।

उनकी सोच

इन पंक्त्यां में दिखै सै—

मुश्किलें आदमी का हौसला परखैं सै,

सपणां पै पड़्या पर्दा हटावैं सै।

गिर जावै, गिर कै संभल जा,

ठोकरां ही चाल सिखावैं सै।

जिंदगी की सच्चाई यो सै

कि गिरणा अर गिर कै संभलणा

ही चलणा सिखावै सै।

लाल बहादुर

भीड़ से अलग सोचै थे,

इसीलिए

अपणी अलग पहचान बना सके।

उनकी घरवाली

ललिता देवी

भी सादगी की मिसाल थीं।

जब शास्त्री जी

केंद्रीय मंत्री बने,

तो भी ललिता जी के कपड़े

दो-चार से ज्यादा ना बढ़े—

वो भी तब,

जब बेट्यां नै

साड़ी पहनाण की जिम्मेदारी ले ली।

आजादी के बाद

शास्त्री जी नै

पुलिस अर यातायात मंत्री बनाया गया।

उत्तर प्रदेश में

सड़क यातायात का राष्ट्रीयकरण

उनका बड़ा फैसला था।

बाद में

दूसरे राज्यां में भी

यो लागू हुआ।

नेहरू जी

शास्त्री जी की काबिलियत

अच्छी तरह जानै थे।

27 मई 1964 नै

नेहरू जी के गुजर जाण के बाद

देश में सवाल उठ्या—

अब देश नै

कौन संभालेगा?

भारत का भविष्य

कौन संवारेगा?

नेहरू जी पहले ही

लाल बहादुर शास्त्री नै

भावी प्रधानमंत्री

मान चुके थे।

पर किस्मत नै

ज्यादा मौका ना दिया।

10 जनवरी 1966 की रात

दिल का दौरा पड़ा

अर 11 जनवरी की सवेरे

वो परमात्मा में

लीन हो गए।

देह चली गई,

पर सादगी, ईमानदारी बच गई

© श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८८ ☆ बाल गीत – सुंदर-सुंदर लिखतीं लेख… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८८ ☆ 

बाल गीत – सुंदर-सुंदर लिखतीं लेख ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

चिड़ियाँ आईं पास अनेक।

सुंदर – सुंदर लिखतीं लेख।।

 *

कोई लिखती नया पहाड़ा।

नहीं सताए उनको जाड़ा।

सुख – दुख में वे रहतीं एक।

सुंदर – सुंदर लिखतीं लेख।।

 *

प्रकृति उनकी जीवन साथी।

भोर जगें वे करें सुप्रभाती।

सादा जीवन करता नेक।

सुंदर – सुंदर लिखतीं लेख।।

 *

पंखों का नित कम्बल ओढ़ें।

नहीं कभी वे रुपया जोड़ें।

करतीं हैं सबका अभिषेक।

सुंदर – सुंदर लिखतीं लेख।।

 *

झूठ न बोलें कभी बिचारी।

सदा रखें अपनी हुशियारी।

कभी न खाएँ , चाउमीन केक।

सुंदर – सुंदर लिखतीं लेख।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८४ – सोबती…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८४ – विजय साहित्य ?

☆ सोबती…!

वेळ द्यायचा कुणाला

वैयक्तीक गोष्ट ठरे

जिवलग मित्रासाठी

पाझरती स्नेहझरे..! १

*

नसे मैत्रीत हिशोब

असे प्रेम जीवापाड

नाही लपू देत कुणा

संशयाच्या दाराआड…!२

*

मैत्री नाही व्यवहार

नाही‌ स्वार्थी देणे घेणे

निरालस अपेक्षांचे

जाते देऊनीया देणे…!३

*

शब्दाविना जिथे जिथे

काढी आवर्जून वेळ

त्याच नात्यामधे जमे

जीवलग मैत्री मेळ…!४

*

कोणत्याही अटीविना

नाते मैत्रीचे टिकेल

अविश्वास संशयाला

तिथे निरोप मिळेल…!५

*

कुणासाठी द्यावा वेळ

नाही सांगावे लागत

जिथे वाहे स्नेह झरा

तिथे येतसे धावत…!६

*

त्याच त्याच चुका जेव्हा

सवयींचा होती भाग

नाते निखळ मैत्रीचे

जाते लावूनीया आग..!७

*

नको अपेक्षांचे ओझे

करा मित्रांची कदर

वेळ वाईट‌ येताच

धरा मैत्रीचा पदर…! ८

*

समर्थन पडे थिटे

फाटे कारणांची झोळी

दोष स्वभावाचे करी

सुखी जीवनाची होळी…!९

*

आहे ताकद तोवर

पैसा खेळतो हातात

आयुष्याच्या‌ संध्याकाळी

हवा‌ सोबती दारात…!१०

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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