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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 84 ☆ प्रेम ना जाने कोय ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा (डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है परंपरा और वास्तविकता के संघर्ष  पर आधारित मनोवैज्ञानिक लघुकथा ‘प्रेम ना जाने कोय’. डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस विचारणीय लघुकथा रचने  के लिए सादर नमन।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 84 ☆ ☆ लघुकथा – प्रेम ना जाने कोय ☆ शादी के लिए दो साल से कितनी लडकियां दिखा चुकी हूँ पर तुझे कोई पसंद ही नहीं आती। आखिर कैसी लडकी चाहता है तू, बता तो। मुझे कोई लडकी अच्छी नहीं लगती। मैं क्या करूँ? मैंने आपको कितनी बार कहा  है कि मुझे लडकी देखने जाना ही नहीं है पर आप लोग मेरी...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 104 – मोना जाग गई ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय  कहानी  “मोना जाग गई”।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 104 ☆ ☆ कहानी - मोना जाग गई ☆  मोना चकित थी। जिस सुंदर पक्षी को उसने देखा था वह बोल भी रहा था। एक पक्षी को मानव की भाषा बोलता देखकर मोना बहुत खुश हो गई। उसी पक्षी ने मोना को सुबह-सवेरे यही कहा था, "चिड़िया चहक उठी उठ जाओ मोना।  चलो सैर को तुम  समय व्यर्थ ना खोना।।" यह सुनकर मोना उठ बैठी। पक्षी ने अपने नीले-नीले पंख आपस में जोड़ दिए। मोना अपने को रोक न सकी। इसी के साथ वह हाथ जोड़ते हुए बोली, "नमस्ते।" पक्षी ने भी अपने अंदाज में 'नमस्ते' कहा। फिर बोला, "मंजन कर लो  कुल्ला कर लो।  जूता पहन के उत्साह धर लो।।" यह...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – संतुलन ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  संजय दृष्टि – संतुलन वे सकते में हैं मुझे देखकर वहाँ कल वे थे जहाँ..., मैं देख रहा हूँ कल मेरी जगह कोई और होगा यहाँ..., जानने के बजाय सच को मानना हितकर होता है, यथार्थ का स्वीकार जीवन को सदा संतुलन देता है!   ©  संजय भारद्वाज (शनि. 20 अप्रैल 2019 , संध्या 6.54 बजे) अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 142 ☆ व्यंग्य – जस्ट फारवर्ड ! ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी  द्वारा लिखित एक विचारणीय व्यंग्य कविता  ‘जस्ट फारवर्ड!’ । इस विचारणीय रचना के लिए श्री विवेक रंजन जी की लेखनी को नमन।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 142☆ व्यंग्य  – जस्ट फारवर्ड! सुपर फास्ट इंटरनेट वाला युग है, रचना भेजो तो फटाफट पोर्टल का लिंक चला आता है, कि ये लीजीये छप गई आपकी रचना. हां, अधिकांश अखबार अब प्रकाशित प्रति नही भेजते,उनके पास कथित बुद्धिजीवी लेखक के लिये प्रतियां नही होती । मतलब ई मेल से रचना भेजो,vफिर खुद ही...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ #86 ☆ उम्मीद कायम है…  ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ (ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक सार्थक एवं विचारणीय रचना “उम्मीद कायम है... ”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 86 ☆ उम्मीद कायम है... ☆ कहते हैं हम ही उम्मीद का दामन छोड़ देते हैं, वो हमें कभी भी छोड़कर नहीं जाती। इसके वशीभूत होकर न जाने कितने उम्मीदवार टिकट मिलने के बाद ही अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता तय करते देखे जा सकते हैं। कौन किस दल का घोषणा पत्र पढ़ेगा ये भी सीट निर्धारण के बाद तय होता है। इन सबमें सुखी वे पत्रकार हैं, जो...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 95 ☆ हँसता जीवन ही बचपन ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र’ (हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे ।  आज प्रस्तुत है  आपकी एक भावप्रवण  रचना “हँसता जीवन ही बचपन”.  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 95 ☆ ☆ गीत – हँसता जीवन ही बचपन ☆  भोला बचपन कोमल मन है प्यार तुम्हारा सदा अमर है। मुझको तो बस ऐसा लगता तू पूरा ही गाँव  - नगर है।।   रहें असीमित आशाएँ भी जो मुझको नवजीवन देतीं। जीवन का भी अर्थ यही है मुश्किल में नैया को खेतीं।   हँसता जीवन ही बचपन है दूर सदा पर मन से डर है। भोला बचपन कोमल मन...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 11 (76-80)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #11 (76-80) ॥ ☆ विष्णु ओज विगलित समझ शिवधनु किया दोटूक। सरित वेगविगलित विटप तो वायु भी देता फूँक।।76।।   अतः मेरा धनु चढ़ाओ और चलाओ बाण। तभी तुम्हारी विजय का होगा सफल प्रमाण।।77।।   यदि भय देती हो मेरे अग्नि परशु की धार। तो विनम्र तव प्रार्थना हो सकती स्वीकार।।78।।   क्रुद्ध देख भृगुपुत्र को लिये मधुर मुसकान। लिया धनुष उनसे कि दें, उत्तर चढ़ा कमान।।79।।   पूर्व जन्म का धनुष पा पुलक उठे रघुनाथ। मेघ स्वतः ही है सुखद, अधिक इन्द्रधनु साथ।।80।।   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈ ...
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ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ २७ जानेवारी – संपादकीय – श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

श्रीमती उज्ज्वला केळकर २७ जानेवारी –  संपादकीय    पू. वा. बहरे ऊर्फ राजाभाऊ बेहरे पू. वा. बहरे ऊर्फ राजाभाऊ बेहरे यांचा जन्म ११ जून १९३९मध्ये झाला. त्यांनी मराठी नियतकालिक काढायचे ठरवले, तेव्हा त्यांना निश्चित उत्पन्न देणारी सरकारी नोकरी सोडावी लागली. त्यावेळी विलक्षण जिद्द, आणि आपल्याला  काय करायचे आहे, याचे नक्की भान या व्यतिरिक्त त्यांच्याकडे काही नव्हते. या काळात त्यांची पत्नी सुमनताईंनी त्यांना मोलाची साथ दिली. १९५९ साली  मुंबईहून मेनका मासिक प्रसिद्ध झाले. मेनकाच्या पाहिल्याच अंकावर आचार्य अत्रे यांनी टीका केली. नावावरून हे मासिक काही तरी भयंकर असणार असे वाटे. कृष्णराव मराठे यांनीही त्यांच्यावर खटला भरला. त्याचा भरपूर मनस्ताप बेहरे दांपत्याला झाला. पण या खटल्याचा फायदाही झाला. त्यामुळे मासिकावर चर्चा खूप झाली. आणि त्यामुळे मासिकाला चांगलीच प्रसिद्धी मिळाली. पहिल्या अंकापासून वाचकांनी हात दिला. मेनका प्रकाशित झाल्यावर  राजाभाऊ पुण्याला आले. मग मेनकाच्या जोडीने माहेर इ .सन १९६३ व जत्रा इ. सन १९६५ ही नियतकालिके त्यांनी प्रकाशित केली. पु. भा. भावे, ग.दी. माडगूळकर, व्यंकटेश माडगूळकर , जयवंत दळवी, श्री. ज. जोशी वसुंधरा पटवर्धन, ज्योत्स्ना, देवधर अशा अनेक दर्जेदार लेखन...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ || अमृतभूमी || ☆ सौ.ज्योत्स्ना तानवडे

सौ.ज्योत्स्ना तानवडे  कवितेचा उत्सव  ☆ || अमृतभूमी || ☆ सौ.ज्योत्स्ना तानवडे ☆  भारत आमची देवभूमी उभ्या जगात अमीट ठसा कर्तृत्वाने सदैव जपूया देशभक्तीचा घेतला वसा ||   इतिहासाच्या पानापानांत शौर्य भक्तीची झुंजार वाणी दऱ्या-खोर्‍यातूनी घुमतसे स्वतंत्रतेची मंगलगाणी ||   स्वातंत्र्यास्तव किती झुंजले रक्त सांडले प्राण अर्पिले बली वेदीतून आकारा ये स्वतंत्रतेचे शिल्प साजिरे ||   ज्ञान-विज्ञान संपन्नतेचा थोर वारसा असे लाभला शिखरे गाठून कर्तृत्वाची देऊ झळाळी या वैभवाला ||   जन्म लाभला पवित्र देशी भाग्य आपुले हे अविनाशी तिच्या प्रगतीचे होऊ भोई यश पताका नेऊ आकाशी ||   ही भारतभूच्या स्वातंत्र्याची अमृतमहोत्सवी पर्वणी  आसेतू हिमाचल गर्जती सुरेल मंगल यश गाणी || सुरेल मंगल जय गाणी ||   © सौ.ज्योत्स्ना तानवडे वारजे, पुणे.५८ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ बरे नाही… ☆ श्री तुकाराम दादा पाटील

श्री तुकाराम दादा पाटील  कवितेचा उत्सव  ☆ बरे नाही… ☆ श्री तुकाराम दादा पाटील ☆  (रंगराग) बेगडी रिवाजाना पाळणे बरे नाही देवळात देवाना शोधणे बरे नाही   बेरक्या पुढा-यांंची भाषणे किती खोटी नेहमी दिमाखाने बोलणे बरे नाही   बिघडले असे स्वार्थी सोयरे कसे माझे सारखे मला त्यानी फसवणे बरे नाही   मागच्या रिवाजांची मांडणी पुढे झाली जातपात आताही नोंदणे बरे नाही   कोणत्या चुका आम्ही मागच्या पुढे केल्या दाखवा समाजाला टाळणे बरे नाही   झाड सावली देते सारखी कुणाला ही निंदकाला टाळायला सांगणे बरे नाही    © श्री तुकाराम दादा पाटील मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३ दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈...
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