हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२८ ☆ सुनना और सहना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सुनना और सहना। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – ये कैसा जग का व्यापार  / स्वर- यश कीर्ति , सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२८ ☆

☆ सुनना और सहना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘हालात सिखाते हैं सुनना और सहना/ वरना हर शख्स फ़ितरत से बादशाह ही होता है’ गुलज़ार इस कथन के माध्यम से समय व परिस्थितियों पर प्रकाश डालते हैं। वैसे यह तथ्य महिलाओं पर अधिक लागू होता है, क्योंकि ‘औरत को सहना है, कहना नहीं और यही उसकी नियति है।’ उसे तो अपना पक्ष रखने का अधिकार भी प्राप्त नहीं है। वैसे कोर्ट-कचहरी में भी आरोपी को अपना पक्ष रखने की हिदायत ही नहीं दी जाती; अवसर भी प्रदान किया जाता है। परंतु औरत की नियति तो उससे भी बदतर है। बचपन से उसे समझा दिया जाता है कि यह घर उसका नहीं है और पति का घर उसका होगा। परंतु पहले तो उसे यह सीख दी जाती थी कि ‘जिस घर से डोली उठती है, उस घर से अर्थी नहीं उठती। इसलिए तुम्हें इस घर में अकेले लौट कर नहीं आना है।’ सो! वह मासूम आजीवन उस घर को अपना समझ कर सजाती-संवारती है, परंतु अंत में उस घर से उस अभागिन को दो गज़ कफ़न भी नसीब नहीं होता और उसके नाम की पट्टिका भी कभी उस घर के बाहर दिखाई नहीं पड़ती।

परंतु समय के साथ सोच बदली है और आठ से दस प्रतिशत महिलाएं सशक्त हो गई हैं– शेष वही ढाक के तीन पात। कुछ महिलाएं समानता के अधिकारों का दुरुपयोग भी कर रही हैं। वे ‘लिव इन व मी टू’ के माध्यम से हंसते-खेलते परिवारों में सेंध लगा रही हैं तथा दहेज व घरेलू हिंसा आदि के झूठे इल्ज़ाम लगा पति व परिवारजनों को सीखचों के पीछे पहुंचा अहम् भूमिका वहन कर रही हैं। यह है परिस्थितियों के परिर्वतन का परिणाम, जैसा कि गुलज़ार ने कहा है कि समानता का अधिकार प्राप्त करने के पश्चात् महिलाओं की सोच बदली है। वे अब आधी ज़मीन ही नहीं, आधा आसमान लेने पर  आमादा हो रही हैं। मुझे स्मरण हो रही हैं स्वरचित पंक्तियां ‘मौसम भी बदलते हैं, हालात बदलते हैं/ यह समाँ बदलता है, जज़्बात बदलते हैं/ यादों से महज़ मिलता नहीं, दिल को सुक़ून/  ग़र साथ हो सुरों का, नग़मात बदलते हैं।’ जी हां! यही सत्य है जीवन का– समय के साथ- साथ व्यक्ति की सोच भी बदलती है। वैसे स्मृतियों में विचरण करने से दिल को सुक़ून नहीं मिलता। परंतु यदि सुरों अथवा संगीत का साथ हो, तो उन नग़मों की प्रभाव-क्षमता भी अधिक हो जाती है।

‘संसार में मुस्कुराहट की वजह लोग जानना चाहते हैं; उदासी की वजह कोई नहीं जानना चाहता।’ यहां ‘सुख के सब साथी, दु:ख में ना

कोय।’ सो! इंसान सुखों को इस संसार के लोगों से सांझा नहीं करना चाहता, परंतु दु:खों को बांटना चाहता है। उस स्थिति में वह आत्म- केंद्रित रहते हुए दूसरों से संबंध-सरोकार रखना पसंद नहीं करता। अक्सर लोग सत्ता व धन- सम्पदा व सम्मान वाले व्यक्ति का साथ देना पसंद करते हैं; उसके आसपास मंडराते हैं, परंतु दु:खी व्यक्ति से गुरेज़ करते हैं। यही है ‘दस्तूर- ए-दुनिया।’

‘हौसले भी किसी हक़ीम से कम नहीं होते/ हर तकलीफ़ में ताकत की दवा देते हैं।’ मानव का साहस, धैर्य व आत्मविश्वास किसी वैद्य से कम नहीं होता। वे मानव को मुसीबतों में उनका सामना करने की राह सुझाते हैं। जैसे एक छोटी-सी दवा की गोली रोग-मुक्त करने में सहायक सिद्ध होती है, वैसे ही  संकट काल में सहानुभूति के दो मीठे बोल संजीवनी का कार्य करते हैं। ‘मैं हूं ना’ यह तीन शब्द से उसे संकट-मुक्त कर देते हैं। इसलिए मानव को विषम परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए तथा हार होने से पहले पराजय को नहीं स्वीकारना चाहिए। दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला कहते हैं ‘हिम्मतवान् वह नहीं, जिसे डर नहीं लगता, बल्कि वह है जो डर को जीत लेता है’ तथा वैज्ञानिक मैडम क्यूरी का मानना है कि ‘जीवन डरने के लिए नहीं: समझने के लिए है। सकारात्मक संकल्प से ही हम मुश्किलों से बाहर निकल सकते हैं।’ सो! संसार में वीर पुरुष ही विजयी होते और कायर व्यक्ति का जीना प्रयोजनहीन होता है। इसके साथ हम सकारात्मक सोच व दृढ़-संकल्प से कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। नैपोलियन का यह संदेश अनुकरणीय है कि ‘समस्याएं भय व डर से उत्पन्न होती हैं। यदि डर की जगह विश्वास ले ले, तो वे अवसर बन जाती हैं। वे विश्वास के साथ आपदाओं का सामना कर उन्हें अवसर में बदल डालते थे।’ इसलिए हर इंसान को अपने हृदय से डर को बाहर निकाल फेंकना चाहिए। यदि आप साहस-पूर्वक यह पूछते हैं–’इसके बाद क्या’ तो प्रतिपक्ष के हौसले पस्त हो जाते हैं। जिस दिन मानव के हृदय से भय निकल जाता है; वह आत्मविश्वास से आप्लावित हो जाता है और आकस्मिक आपदाओं का सामना करने में स्वयं को समर्थ पाता है। हमारे हृदय का भय का भाव ही हमें नतमस्तक होने पर विवश करता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में यही संदेश दिया है कि ‘अन्याय करने वाले से अधिक दोषी अन्याय सहन करने वाला होता है।’ हमारी सहनशीलता ही उसे और अधिक ज़ुल्म करने को प्रोत्साहित करती है। जब हम उसके सम्मुख डटकर खड़े हो जाते हैं, तो वह अपनी झेंप मिटाने के लिए अपना रास्ता बदल लेता है। यह अकाट्य सत्य है कि हमारा समर्पण ही प्रतिपक्ष के हौसलों को बुलंद करता है।

मौन नव निधियों की खान है; विनम्रता आभूषण है। परंतु जहां आत्म-सम्मान का प्रश्न हो, वहाँ उसका सामना करना अपेक्षित व श्रेयस्कर है। ऐसी स्थिति में मौन को कायरता का प्रतीक स्वीकारा जाता है। सो! वहाँ समझौता करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। भले ही सुनना व सहना हमें हालात सिखाते हैं, परंतु उन्हें नतमस्तक हो स्वीकार कर लेना पराजय है।

‘यदि तुम स्वयं को कमज़ोर समझते हो, तो कमज़ोर हो जाओगे। यदि ख़ुद को ताकतवर सोचते हो, तो ताकतवर’– स्वामी विवेकानंद जी का यह कथन अत्यंत सार्थक है। हमारी सोच ही हमारा भविष्य निर्धारित करती है। इसलिए जीवन में नकारात्मकता को जीवन में कभी भी घर न बनाने दो। रोयटी बेनेट  के अनुसार चुनौतियाँ व प्रतिकूल परिस्थितियाँ हमें हमारा साक्षात्कार कराने हेतु आती हैं कि हम कहां हैं? तूफ़ान हमारी कमज़ोरियों पर आघात करते हैं, लेकिन तभी हमें अपनी शक्तियों का आभास होता है। समाजशास्त्री प्रौफेसर कुमार सुरेश के शब्दों में ‘अगर हमारा परिवार साथ है, तो हमें मनोबल मिलता है और हम हर संकट का सामना करने को तत्पर रहते हैं।’ अरस्तु के शब्दों में ‘श्रेष्ठ व्यक्ति वही बन सकता है, जो दु:ख और  चुनौतियों को ईश्वर की आज्ञा मानकर आगे बढ़ता है।’ सो! मानव को उन्हें प्रभु-प्रसाद व अपने पूर्वजन्म के कर्मों का फल स्वीकारना चाहिए। माता देवकी व वासुदेव को 14 वर्ष तक काराग़ार में रहना पड़ा। देवकी के कृष्ण से प्रश्न करने पर उसने उत्तर दिया कि इंसान को अपने कृत-कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। आप त्रेतायुग में माता कैकेयी व पिता वासुदेव दशरथ थे। आपने मुझे 14 वर्ष का वनवास दिया था। इसलिए आपकी मुक्ति भी 14 वर्ष पश्चात् ही संभव थी। सो! ‘जो हुआ, जो हो रहा है और जो होगा, अच्छा ही होगा। इसलिए मानव को कभी भी निराशा का दामन नहीं थामना चाहिए और हर परिस्थिति का खुशी से स्वागत् करना चाहिए। समय कभी थमता नहीं; निरंतर गतिशील रहता है। इसलिए मन में कभी मलाल को मत आने दो। यह समाँ भी गुज़र जाएगा और उलझनें भी समयानुसार सुलझ जाएंगी। उसकी रज़ा में अपनी रज़ा मिला दें, तो सब अच्छा ही होगा। औचित्य-अनौचित्य में भेद करना सीखें और विपरीत परिस्थितियों में प्रसन्न रहें, क्योंकि शरणागति ही शांति पाने का सर्वोत्तम साधन है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ बदलते दौर की दहलीज़ पर विवाह: एक सामाजिक मंथन ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ बदलते दौर की दहलीज़ पर विवाह: एक सामाजिक मंथन ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

बदलते दौर की दहलीज़ पर विवाह: एक सामाजिक मंथन

परंपरा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के द्वंद्व में उलझा आज का युवा मन

“बेटा, अब नौकरी भी लग गई है, उम्र भी हो रही है। शादी की बात आगे बढ़ाएँ?”

रात के खाने के बाद पिता ने सहज भाव से पूछा।

बेटे ने कुछ क्षण चुप रहकर पानी का गिलास रखा और धीमे स्वर में कहा, “पापा, शादी से इंकार नहीं है… बस जल्दबाज़ी से डर लगता है।”

माँ ने हैरानी से पूछा, “डर? शादी से भी कोई डरता है?”

बेटा मुस्कुराया, लेकिन उसकी मुस्कान में एक गहरी चिंता छिपी थी।

“डर शादी से नहीं… उस रिश्ते से है जो अगर सही न चला तो दो ज़िंदगियाँ टूट जाएँगी।”

कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

 

यह संवाद केवल एक घर की कहानी नहीं है। आज देश के लाखों घरों में इसी तरह की बातचीत अलग-अलग शब्दों में हो रही है। माता-पिता चिंतित हैं कि बच्चे विवाह में देर क्यों कर रहे हैं, जबकि युवा सोच रहे हैं कि जीवन का इतना बड़ा निर्णय केवल समाज की अपेक्षाओं के आधार पर कैसे लिया जाए।

 

समय बदल रहा है और उसके साथ विवाह को देखने का दृष्टिकोण भी।

एक समय था जब विवाह जीवन का स्वाभाविक पड़ाव माना जाता था। एक निश्चित उम्र आई, परिवार ने रिश्ता देखा और विवाह हो गया। उस समय व्यक्तिगत पसंद से अधिक परिवार, परंपरा और सामाजिक व्यवस्था महत्वपूर्ण होती थी।

 

लेकिन आज का युवा एक बिल्कुल अलग दुनिया में बड़ा हुआ है।

उसने अवसरों की दुनिया देखी है।

उसने स्वतंत्र निर्णय लेना सीखा है।

उसने रिश्तों की सफलता भी देखी है और टूटन भी।

 

शायद इसी कारण वह विवाह को केवल सामाजिक रस्म नहीं, बल्कि जीवनभर की साझेदारी के रूप में देखता है।

कई बुजुर्ग इसे जिम्मेदारी से बचना मान लेते हैं।

 

लेकिन क्या सचमुच ऐसा है?

शायद नहीं।

वास्तव में आज का युवा जिम्मेदारी से भाग नहीं रहा, बल्कि जिम्मेदारी को पहले से अधिक गंभीरता से समझ रहा है। वह जानता है कि केवल सामाजिक दबाव में लिया गया निर्णय दो लोगों का ही नहीं, दो परिवारों का जीवन भी प्रभावित कर सकता है।

आज के युवाओं की सबसे बड़ी चिंता असफल रिश्तों का बढ़ता अनुभव है।

वे अपने आसपास टूटते विवाह, लगातार झगड़े, मानसिक तनाव और तलाक की घटनाएँ देख रहे हैं। वे समझते हैं कि केवल साथ रहना ही सफल विवाह नहीं होता। साथ में सम्मान, विश्वास, संवाद और मानसिक सामंजस्य भी होना चाहिए।

इसीलिए वे विवाह से पहले व्यक्ति को समझना चाहते हैं। वे जल्दबाज़ी से अधिक सही निर्णय को महत्व देते हैं।

इस बदलाव का दूसरा महत्वपूर्ण कारण है आर्थिक आत्मनिर्भरता।

आज बेटियाँ भी उतनी ही पढ़ी-लिखी हैं जितने बेटे। दोनों अपने पैरों पर खड़े हैं। दोनों अपने करियर के लिए मेहनत करते हैं।

ऐसे में विवाह का वह पारंपरिक मॉडल, जिसमें त्याग की अपेक्षा केवल एक पक्ष से की जाती थी, स्वाभाविक रूप से प्रश्नों के घेरे में आ गया है।

आज का प्रश्न यह नहीं है कि “समझौता कौन करेगा?” बल्कि यह है कि “सहयोग दोनों कैसे करेंगे?”

आधुनिक विवाह में बराबरी केवल अधिकारों की नहीं, जिम्मेदारियों की भी होनी चाहिए।

यदि दोनों कमाते हैं, तो दोनों घर भी सँभालें।

यदि दोनों सपने देखते हैं, तो दोनों एक-दूसरे के सपनों का सम्मान भी करें।

यही सोच नए दौर की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

लेकिन इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील पक्ष माता-पिता हैं।

उनकी चिंता भी गलत नहीं है। उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों से सीखा है कि जीवन में साथी का होना कितना महत्वपूर्ण है। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे अकेले न रहें, उन्हें समय पर जीवनसाथी मिले और वे सुरक्षित भविष्य जी सकें।

उनकी चिंता प्रेम से जन्म लेती है। लेकिन कई बार वही चिंता दबाव का रूप ले लेती है। यहीं से पीढ़ियों के बीच दूरी बढ़ने लगती है।

दरअसल, माता-पिता और बच्चों के बीच केवल उम्र का अंतर नहीं है। यह दो अलग-अलग समयों का अंतर है।

 

एक पीढ़ी ने सीमित अवसरों की दुनिया देखी।

दूसरी पीढ़ी असीमित विकल्पों के बीच बड़ी हुई।

 

एक ने स्थिरता को प्राथमिकता दी।

दूसरी अर्थपूर्ण जीवन और मानसिक संतुलन को भी उतना ही महत्व देती है।

 

इसलिए दोनों की सोच अलग होना स्वाभाविक है।

समस्या सोच के अलग होने में नहीं है। समस्या तब होती है जब दोनों एक-दूसरे को सुनना बंद कर देते हैं।

 

हर रिश्ता संवाद से मजबूत होता है और विवाह पर संवाद तो उससे भी अधिक आवश्यक है।

यदि माता-पिता आदेश देने के बजाय बच्चों के मन की चिंता समझें और यदि युवा भी अपने माता-पिता की भावनाओं का सम्मान करें तो आधी दूरियाँ स्वयं समाप्त हो सकती हैं।

किसी भी पीढ़ी के पास सारे उत्तर नहीं होते। अनुभव और नए विचार जब साथ चलते हैं, तभी संतुलन बनता है।

 

विवाह न तो केवल परंपरा है और न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न।

विवाह दो व्यक्तियों, दो परिवारों और दो जीवन-दृष्टियों का मिलन है।

 

इसलिए इसमें जल्दबाज़ी भी उचित नहीं और अनावश्यक भय भी नहीं।

आवश्यकता इस बात की है कि हम विवाह को सामाजिक दबाव से निकालकर संवाद, सम्मान और समानता की नींव पर खड़ा करें।

क्योंकि समय बदलता है तो परंपराएँ भी अपना स्वरूप बदलती हैं। लेकिन उनके मूल मूल्य नहीं बदलते। प्रेम आज भी उतना ही आवश्यक है। विश्वास आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है। साथ निभाने की भावना आज भी उतनी ही अनमोल है।

बस अब इन मूल्यों को नए समय की संवेदनाओं और नई पीढ़ी की आकांक्षाओं के साथ जोड़ने की आवश्यकता है।

शायद तब विवाह केवल एक सामाजिक संस्था नहीं रहेगा, बल्कि दो स्वतंत्र व्यक्तित्वों के बीच ऐसा संबंध बनेगा जहाँ कोई किसी पर हावी न हो, बल्कि दोनों मिलकर एक-दूसरे को बेहतर इंसान बनने का अवसर दें।

और शायद यही बदलते दौर के विवाह की सबसे सुंदर परिभाषा भी है।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – प्रमाणपत्र ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – प्रमाणपत्र  ? ?

जन्म प्रमाणपत्र,

शिक्षा प्रमाणपत्र,

चरित्र प्रमाणपत्र,

आय प्रमाणपत्र,

विवाह प्रमाणपत्र,

निवास प्रमाणपत्र,

जीवन प्रमाणपत्र,

मृत्यु प्रमाणपत्र,

जीते हो या साँस भर भरते हो,

चैतन्य हो या निष्प्राण,

प्रमाणपत्रों की दुनिया में

जीना पड़ता है सप्रमाण..!

?

© संजय भारद्वाज   (2.9.2018, प्रातः 9:45 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Weekly Column ☆ Witful Warmth # 87 – Even if the Deeds are Bare, Let the Ganges Flow Clean… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, known for his wit and wisdom, is a prolific writer, renowned satirist, children’s literature author, and poet. He has undertaken the monumental task of writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Telangana government at the primary school, college, and university levels. His editorial endeavors also include online editions of works by Acharya Ramchandra Shukla.

As a celebrated satirist, Dr. Suresh Kumar Mishra has carved a niche for himself, with over eight million viewers, readers, and listeners tuning in to his literary musings on the demise of a teacher on the Sahitya AajTak channel. His contributions have earned him prestigious accolades such as the Telangana Hindi Academy’s Shreshtha Navyuva Rachnakaar Samman in 2021, presented by the honorable Chief Minister of Telangana, Mr. Chandrashekhar Rao. He has also been honored with the Vyangya Yatra Ravindranath Tyagi Stairway Award and the Sahitya Srijan Samman, alongside recognition from Prime Minister Narendra Modi and various other esteemed institutions.

Dr. Suresh Kumar Mishra’s journey is not merely one of literary accomplishments but also a testament to his unwavering dedication, creativity, and profound impact on society. His story inspires us to strive for excellence, to use our talents for the betterment of others, and to leave an indelible mark on the world.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his SatireEven if the Deeds are Bare, Let the Ganges Flow Clean 

☆ Witful Warmth# 87 ☆

☆ Satire ☆ Even if the Deeds are Bare, Let the Ganges Flow Clean… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆ 

Brother, the Ganges is not just a river; for us Indians, it is a universal washing machine. No detergent required just take a single dip, and the sins of lifetimes vanish like horns from a donkey’s head. Since childhood, we have been hearing the proverb, “If the heart is pure, the holy Ganges resides right in your clay pot.” But we have successfully discovered its practical version: “Even if the deeds are bare, let the Ganges flow clean.”

Go anywhere from Rishikesh to the ghats of Varanasi; standing by the banks of the Ganges, you will feel as if a startup for salvation is running here. People arrive at the ghats as if standing before a bank’s cash-deposit machine. Out comes ‘Scam Number 1’, ‘Lie Number 2’, ‘Gossip about the neighbor Number 3′ from their pockets, and splash!… everything is deposited into Mother Ganges’ account. Mother Ganges herself must be thinking, “Brother, I am the giver of salvation, not your recycle bin, where you wash out the garbage you couldn’t dump into society.”

Our devotion is so heavy that it floats directly in the river enclosed in plastic bags. We call the Ganges ‘Mother’, and our love for her is so profound that we pour flowers, incense wrappers, half-burnt wood, corpses, and toxic chemicals right into her lap. Our claim of being a “Son of the Ganges” remains thunderous only as long as it concerns shouting slogans. The moment it comes to throwing garbage into the dustbin, we all suddenly become “stepchildren.”

Every year, we introduce projects worth thousands of crores like ‘Namami Gange’. Files float, budgets flow, but what about the water of the Ganges? Even today, it waits in anticipation that someone, before washing their faith in it, would also wash in a little bit of ‘common sense’.

Nowadays, you find fewer instances of salvation and more ‘Instagram Reels’ along the banks of the Ganges. A devotee immersed in the evening arati at the ghat focuses less on what the mantras are, and more on whether the background blur in their ‘cinematic shot’ is perfect.

A man was praying to the Ganges with folded hands: “O Mother, wash away all my sins.”
Just then, a voice came from behind, “Brother, move a little to the right, you are blocking the sun in my frame!”

The Ganges flows silently. She brings the purity of the mountains and moves toward the ocean, absorbing the cunning cleverness of our plains. She is not becoming dirty because there is less water; she is becoming dirty because the greed within us to ‘cleanse our sins’ is far too much.

If the Ganges could truly speak in human tongue, the moment you took a dip at the ghat, she wouldn’t utter a curse, but would ask a straightforward question: “Mr. Sharma, are you washing away the filth of the tax evasion you committed last week in me, or have you come straight after shaving your accountant’s head?”

But a mother after all is a mother; she silently drinks the poison and continues to grant the blessing of nectar in the hope that one day, we will extend our hands not to drown in her, but to save her.

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© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०१ – गीत – प्रणय वल्लरी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतप्रणय वल्लरी..

? रचना संसार # १०१ – गीत – प्रणय वल्लरी…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

हिरणी के इस चंचल मन को

हवा वसंती महकाती।

खिलता हरसिंगार चमन में,

हम गाते गीत प्रभाती।।

*

सौरभ सरिता उर में बहती,

खिलती आशा की कलियाँ।

पिया कहे सिंगार सलौना,

चाहत में डूबी अँखियाँ।।

यादें लेतीं हैं अँगड़ाईं,

मुस्कानें सब मदमाती।

*

प्रणय वल्लरी झूम रही है,

अंग-अंग यौवन छाया।

सजा कुंतलों पर गजरा है,

देख मदन भी बौराया।।

प्रेम तूलिका लिखती पाती,

भेद खोलकर हर्षाती।

*

प्रीति हमारी यह मधुमासी,

प्रिय मधुर मुलाकातें हैं।।

संबंधों के गठबंधन में,

भ्रमरों की बारातें हैं।।

मधुरस छलके तृषित अधर से,

धड़कन -धड़कन इतराती।

*

प्रियतम तेरी बनी मेनका,

आशाएँ आलिंगन की।

मन राधा बन बैठा व्याकुल,

राह तके अनुमोदन की।।

लगती आग मिलन की ऐसी,

प्रेम क्षितिज में इठलाती।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२८ ☆ भावना के दोहे – इंतजार ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – इंतजार)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२८ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – इंतजार ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

खिड़की से नित झाँकती, नई नवेली नार ।

सपने मन में सज रहे, चलती मधुर बयार ।।

आकर खिड़की पर दिखी, उसकी मधु मुस्कान।

मन में उसके जग रहे, नये-नये अरमान।।

 *

नयन निहारे प्यार से, देख रही है राह।

आ जाओ मेरे सजन, बस इतनी-सी चाह।।

 *

रस्ता उनका देखती, कब आओगे श्याम।

इंतजार होता नहीं, मिले नहीं आराम।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१० ☆ संतोष के मुक्तक… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – संतोष के मुक्तक  आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१० ☆

संतोष के मुक्तक☆ श्री संतोष नेमा ☆

औरों  को  जो  ज्ञान   बांटते

अपनी सीख से स्वयं भागते

देखें  गर  वो  अपना  अंतस

गुण अवगुण को स्वयं छांटते

*

रंग   बदलते   चेहरे   देखे

घाव  हृदय  पर  गहरे देखे

बहुरुपिया  है यहाँ आदमी

सच  पर हमने  पहरे  देखे

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १५ ☆ राधेय ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  ‘राधेय’।)

☆ मंजिरी साहित्य # १५ ☆

? कविता – राधेय ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में, कल मुझे भी मरना है l

वध तो होगा ही है मेरा, अब फिर क्यूँ पीछे हटना है ll

*

भविष्य कहेगा मित्रता में, क्यों दिया दुर्योधन का साथ?

वचन बद्ध था रहा सदा मैं, सभी अपनों का छूटा हाथ ll

*

रश्मिरथि होकर भी जग में, बहुत हुआ बदनाम l

क्या गुनाह था माधव मेरे, नहीं  मिला पाण्डु पुत्र  नाम ll

*

था अर्जुन से शूरवीर पर, गुरु अहम ने किया दूर l

धर्म अधर्म के बीच धनंजय, आपका व्यवहार रहा सदा ही क्रूर ll

*

माता कुंती ने ममता की, छाँव कभी न डाली थी l

पांचो पुत्र रहे सदा सलामत, यही कसम उन्होंने खाली थी ll

*

आज धंस गया भू में पहिया, परशुराम का श्राप धरे l

तभी केशव ने आज्ञा दी थी, पार्थ गांडीव तीर भरे ll

*

धराशायी ये सूत पुत्र था, करके मैदिनी का आलिंगन l

सूर्यदेव भी देख वत्स को, अस्ताचल  करते चिंतन ll

*

कहती हूँ  जागो जगवालों, बच्चों को इतिहास सुनाओ l

सुर्य पुत्र की सुनो कहानी, क्या था राधेय यह बतलाओ ll

*

कहती हूँ अद्धभुत वीर तुम, अर्पित श्रद्धा सुमन तुम्हें l

द्रवित हुआ है मन मेरा, सदा करूँ मैं नमन तुम्हें ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २९ – कविता – कुछ पता नहीं… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता कुछ पता नहीं…।)

☆ शशि साहित्य # २९ ☆

? कविता – कुछ पता नहीं…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

इस छोर को तो थामा मैंने,

उस छोर का कुछ पता नहीं…

 

क्यों डर रही पतंग हवा में,

पकड़ कुछ ढीली,

कुछ पता नहीं…

 

थी अब तक खुशियां मेरी मुट्ठी में,

रेत की तरह फिसल रही,

कुछ पता नहीं…

 

जो मेरे भी इंतजार में तड़प उठे,

उन तरसती निगाहों का,

कुछ पता नहीं…

 

हम तो चले थे कदम ब कदम पीछे तेरे,

कब मिटा दिए निशां लहरों ने,

कुछ पता नहीं…

 

उतावली हो रही बहारें,

महकने को मचलने को…

मगर अब इंतजार…

कुछ पता नहीं…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०३६ ⇒ कीड़े मकोड़े ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कीड़े मकोड़े।)

?अभी अभी # १०३६ ⇒ आलेख –  कीड़े मकोड़े ? श्री प्रदीप शर्मा ?

worms & insects 

आप इन्हें कीड़े मकोड़े कहें, या कीट पतंग, रेंगने वाले, उड़ने वाले, जमीन के अंदर रहने वाले, ये जीव बेचारे इस सत्य से अनभिज्ञ हैं, कि ये नर्क का जीवन भोग रहे हैं। भोग में रस होता है और इनकी भी यह भोग योनि है। जीवात्मा और परमात्मा के बीच पसरी माया का भेद, एकमात्र केवल मानव ही जान पाया है, क्योंकि उसमें भेद बुद्धि है।

प्राणी मात्र में ईश्वर का वास होते हुए भी, वह ईश्वर तत्व से कोसों दूर है। मनुष्य जन्म हमें कितनी भोग योनियों के बाद प्राप्त हुआ है, विज्ञान इस सत्य को आज तक नहीं जान पाया। डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत एक अलग कहानी कहता है तो हमारे विभिन्न धर्म ग्रंथ कुछ और। कोई मनु की संतान है तो कोई adam eve और आदम हौवा की। लेकिन मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ है और इसीलिए वह अपने आप को ईश्वर के अधिक करीब पाता है।।

सृष्टि के जन्म और प्रलय अथवा कयामत की भी कई गाथाएं हैं। हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मा जी को इस सृष्टि का जन्मदाता, भगवान विष्णु को पालनकर्ता और शिव को संहारकर्ता माना गया है। एक अज्ञात शक्ति है, उसे आप जितना चाहे नाम और स्वरूप दे सकते हैं। सब कुछ जानते हुए भी, इंसान के हाथ में कुछ नहीं है।

एक समझदार प्राणी होने के कारण आज इंसान विश्व की जनसंख्या को लेकर चिंतित और परेशान है। ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी वह इंसान को ही जिम्मेदार मानता है। सभ्यता की कीमत प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद करके ही चुकाई जा सकती है। मनुष्य को अभी और विकसित होना है, उसे मानव से महामानव और खुद से खुदा यानी इंसान से भगवान बनना है।।

वह आज भी अवतारवाद में विश्वास करता है। वो मसीहा आएगा, और हमें कल्कि अवतार की इतनी आस है कि हम हर महान इंसान में उसे ढूंढने लग जाते हैं। भक्तों के अनुसार तो कई कल्कि अवतार अभी भी इस धरा पर विचर रहे होंगे।

एक कीड़ा मकोड़ा बेचारा इन सबसे अनजान है। उसका तो जन्म ही कितने समय के लिए हुआ है, वह नहीं जानता। उसे कहीं भी कहीं भी, मक्खी और मच्छर की तरह मसल दिया जाता है। जीवः जीवस्य भोजनम्, कौन कब किसका आहार बन जाए, क्या पता।।

रेंगने वाले कीड़े अक्सर ज़मीन के अंदर ही रहते हैं, इधर दिन में बाहर आए और किसी का शिकार बने। बेचारे इसलिए रात में ही बाहर आते हैं। मक्खी मच्छर तो गंदगी में ही पनपते हैं, ईश्वर इन पर इतना मेहरबान है कि इनके जनसंख्या नियत्रण की चिंता तो इंसान भी नहीं कर पाता। ये थोक में पैदा होते हैं, और थोक में मुक्ति पाते हैं। ईश्वर जाने उनकी यात्रा कब शुरू हुई और कब तक चलेगी। कितने जन्म उन्हें और लेने पड़ेंगे, अभी इंसान बनने के लिए। क्या पता कभी बन पाएंगे भी या नहीं।

देवताओं को दुर्लभ यह मानव जन्म हमें तो मिल गया, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण के बाद किसको मिलेगा, किसको नहीं मिलेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। इंसान एक समझदार प्राणी है, वह कीड़े मकोड़ों की तरह बच्चे पैदा करके नहीं छोड़ सकता। वह भी जानता है, बच्चे दो ही अच्छे।।

कीड़े मकोड़ों में किसी तरह के विकास की संभावना नहीं, फिर भी वे सृष्टि का एक आवश्यक अंग हैं, वे कभी प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं करते, केवल मनुष्य मात्र ही ऐसा प्राणी है, जो उनका दोहन और शोषण करता है।

जिस दिन हम ईश्वर की अहैतुकी कृपा और इन कीट पतंगों और कीड़े मकोड़ों के अस्तित्व का कारण जान जाएंगे, शायद इस सृष्टि और ब्रह्मांड के रहस्य को भी पहचान पाएंगे। सुबह की इस अमृत वेला में एक कॉकरोच मुझे देखकर मुंह छुपा रहा है, और एक मैं हूं, जो उसे देख यह सोच रहा हूं, क्या इसमें भी परमेश्वर का वास है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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