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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #106 ☆ व्यंग्य – ‘मोहब्बतें’ और आर्थिक विकास ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार (वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘'मोहब्बतें' और आर्थिक विकास’। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 106 ☆ ☆ व्यंग्य –  'मोहब्बतें' और आर्थिक विकास ☆ मैं अभी तक इस मुग़ालते में था कि भाववाचक संज्ञा का बहुवचन नहीं होता, लेकिन मरहूम यश चोपड़ा की फिल्म 'मोहब्बतें'...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 105 ☆ समुद्र मंथन ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।” हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।) ☆ संजय उवाच # 105 ☆ समुद्र मंथन ☆ स्वर्ग की स्थिति ऐसी हो चुकी थी जैसे पतझड़ में...
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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 59 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 59 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 59) ☆ Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’. Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 59 ☆ उषा का स्वागत गीत ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ (आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताeह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी द्वारा  रचित  भावप्रवण कविता ‘उषा का स्वागत गीत’। ) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 60 ☆  ☆ उषा का स्वागत गीत ☆  * एक नन्हीं परी का धरा अवतरण पर्व उल्लास का ऐ परिंदो! उड़ो कलरवों से गुँजा दो दिशाएँ सभी लक्ष्य पाए बिना तुम न पीछे मुड़ो * ऐ सलिल धार कलकल सुनाओ मधुर हो लहर का लहर से मिलन रात-दिन झूम गाओ पवन गीत सोहर अथक पर्ण दो ताल, कलियाँ नचें ताक धिन * ऐ घटाओं गगन से उतर आओ री! छाँह पल-पल करो, वृष्टि...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य #89 ☆ कतरनें ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” (आज  “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है  श्री सूबेदार पाण्डेय जी की  एक भावप्रवण एवं विचारणीय कविता “#कतरनें #”। )  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य# #89 ☆ कतरनें ☆ १ --अनुरोध-- फुटपाथों की दुकानों पर टंगे, गद्दों रजाइयों के खोल। तकियों के गिलाफ, और बच्चों के कपड़े। मुझे बुला रहे थे, अपनी राम कहानी सुना रहे थे। मुझे देखो टुकड़ों के रूप में, आपस‌ मे मिला हूं। सही है सुइ‌‌ की चुभन और पीड़ा, कपड़ों के रूप में सिला हूं ।।१।। २--मोलभाव-- उनके रूप में कोई न था आकर्षण, पर आग्रह में छलकी थी अपार‌ वेदनायें। किसी ने उनको हिकारत से देखा, किसी ने अपनी जरूरत से देखा। लोग आते रहे लोग जाते रहे, मोल करते रहे भाव खाते रहे। अचानक से कपड़े बोल पड़े, ओ बाबू जी आप क्यूं है खडे़ ।। ३--आग्रह-- मुझे खरीद लो तुम्हारे न सही, नौकर के काम आ सकता हूं। उसके बिस्तर की शान बढ़ा सकता हूं, उसकी जरूरतें पूरी कर सकता‌हूं । अभी भी इन कतरनों में जान है बाकी, आपकी चुकाई कीमत अदा कर सकता हूं।, ‌‌४--हकीकत-- मेरी जरूरत देखो मेरी बातें सुनो, मेरे बिकने की बारी हकीकत...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 4 (41-45)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #4 (41-45) ॥ ☆   रघु ने किया कलिंग में दुर्दिन शर स्नान तब आई जय लक्ष्मी, संपति यथ, सम्मान ॥ 41॥   पान लताओं में वहाँ बना उचित स्थान ‘नीरा' सा योद्धाओं ने पिया शत्रु सम्मान ॥ 42॥   बंदी कर छोड़े गये झुके कलिंग के नाथ धर्मी रघु ने धन लिया, रखी न धरती साथ ॥ 43॥   फिर दक्षिण की दिशा में रघु ने किया प्रयाण छोड़ सुपारी तट समझ सहज विजय अभियान ॥ 44॥   राजदल औं सैनिको ने कर क्रीडा - स्नान मद औं मल से कर दिया कावेरी जल म्लान ॥ 45॥   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈ ...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ मनं पाखरू! ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक

श्री प्रमोद वामन वर्तक   कवितेचा उत्सव  मनं पाखरू!…..  श्री प्रमोद वामन वर्तक  मनं पाखरू पाखरू पर हलके पिसागत जाई साता सुमद्रापार क्षणी विलक्षण वेगात             मनं पाखरू पाखरू           सारा सयीचा खजिना           इथे दुःखी जखमांना           कधी जागा अपुरी ना   मनं पाखरू पाखरू घर बांधे ना फांदीवर नेहमी शोधित फिरे वृक्ष साजिरा डेरेदार             मनं पाखरू पाखरू           पंख याचे भले मोठे           दृष्टी आडचे सुद्धा           क्षणात कवेत साठे   मनं पाखरू पाखरू वारा प्याले वासरू बसे ना त्या वेसण सांगा कसे आवरू ?   © श्री प्रमोद वामन वर्तक (सिंगापूर) +6594708959 मो – 9892561086 ई-मेल – pradnyavartak3@gmail.com ≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ मैत्री ☆ सुश्री संगीता कुलकर्णी

सुश्री संगीता कुलकर्णी  कवितेचा उत्सव  ☆ मैत्री ☆ सुश्री संगीता कुलकर्णी ☆    ना किनारा समुद्राचा ना क्षितिज आकाशाचे ना हसू आनंदाचे ना रडू दुःखाचे ना तमा कशाची ना भान जगाचे स्वतःतचं हरवलेली खोल खोल समुद्रासारखी मुक्त आकाशात भरारी घेणारी अविरत अशी जळणारी जळून पण मागे धूर व राख ठेवणारी आठवणींच्या धुराने पाणी आणणारी सोबत असते वर्तमानात जोडून ठेवते भूत- भविष्याला अस्तित्वातचं मनसोक्त रमणारी मैत्री... !! ©  सुश्री संगीता कुलकर्णी  लेखिका /कवयित्री ठाणे 9870451020 ≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈...
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मराठी साहित्य – विविधा ☆ देशाची समृद्धी भारतीय रेल्वे – भाग -1 ☆ सौ. पुष्पा नंदकुमार प्रभुदेसाई

सौ. पुष्पा नंदकुमार प्रभुदेसाई   विविधा  ☆ देशाची समृद्धी भारतीय रेल्वे - भाग -1 ☆ सौ. पुष्पा नंदकुमार प्रभुदेसाई ☆ (चरैवेति  चरैवेति) [नागपूर येथून प्रसिद्ध होणा-या 'राष्ट्रसेविका' या अंकासाठी  सौ.पुष्पा प्रभू देसाई यांच्या भारतीय रेल्वेवरील लेखाची निवड झाली आहे. तो आपल्या वाचनासाठी चार भागात देत आहोत.] भा--  र --त - ज्ञान आणि भक्ती मध्ये रमणारा, तो भारत. भारतीयांच्या चौकसबुद्धी मुळे भूमिती शास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, गणित ,रसायन शास्त्र, वैद्यकशास्त्र, संगीत, साहित्य, कला अशा अनेक शास्त्रांनी, भारताला सौंदर्य आणि संपन्न बनविले.  अनेक गोष्टीत भारत समृद्ध होता. आणि आहे .त्यापैकीच आजच्या काळातील समृद्धी म्हणजे भारतीय रेल्वे. भारतीय रेल्वेचे जाळे म्हणजे देशातील रक्ताभिसरण संस्था.' लाईफ लाईन 'असे म्हणायला हरकत नाही .त्याचा श्रीगणेशा झाला तो इंग्रजांच्या कारकीर्दीत. ती एक इंग्रजांनी दिलेली  देणगी आहे असे म्हणायला हरकत नाही. पहिला आराखडा तयार झाला, तो     १८32 मध्ये. पुढे',' रेड हिल' नावाची पहिली रेल्वे  १८ 37 साली धावली . १८४४  मध्ये लॉर्ड हार्डिंग यांनी खाजगी व्यावसायिक मंडळींना रेल्वे चालू करण्याची परवानगी दिली . दोन रेल्वे कंपन्यांना  इस्ट इंडिया मदत करायला लागली.१८५१मधे सोलनी अँक्वाडक्ट रेल्वे ,रुरकी येथे बांधण्यात...
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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ घेणेकरी… भाग १ ☆ सौ राधिका भांडारकर

सौ राधिका भांडारकर  जीवनरंग  ☆ घेणेकरी... भाग १ ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆ ज्या कारणासाठी मी दयाळकडे जाण्याचे ठरवले तेव्हां अशा प्रकारच्या कामासाठी मला त्याच्याकडे जावं लागेल असं वाटलंही नव्हतं ..!! पपांनी तर प्रथम विरोधच केला.त्यांचं म्हणणं, "हा मार्ग आपला नव्हे. कायद्याने जे करायचं ते आपण करु.कायदा हातात घेणं हे आपल्यासारख्यांचे काम नाही. तो आपला पिंडच नव्हे. विलंब लागेल पण सत्य उघडकीस येईल. सत्याचा विजय कधी ना कधी होतोच." "कधी ना कधी म्हणजे कधी? संपूर्ण आयुष्य गेल्यावर? आणि हे बघा, दयाळ माझा बालमित्र आहे.गेल्या काही वर्षात खूप काही बदललं असलं तरी तो मैत्री विसरणार नाही. शिवाय तसा एकेकाळी तो आपल्या कुटुंबाशी ही जवळचा होता...!" "कर तुला काय करायचे ते.." पपा एकच वाक्य म्हणाले आणि माझ्यासमोरुन उठून गेले मला माहीत होतं ,हा मार्ग खोटे पणाचा धोक्याचाही आहे. पण ज्या गोपाळकाकांना धडा शिकवण्यासाठी मी दयाळकडे जाणार होते त्यांनी तर आपल्याशी खोटेपणाच केला नं..?धोका दिला..धोक्याला धोक्यानेच ऊत्तर. हेच बरोबर.चांगुलपणा शिष्टाचार नीतीमत्ता यांच्या व्याख्या बदलल्यात.आपल्याला जर दुनियेत टिकायचं असेल तर आपणही आपले मार्ग बदलले पाहिजेत. त्यामुळे पपांच्या विरोधाला न जुमानता मी दयाळची भेट घ्यायचं ठरवलं. जी....
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