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हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ सच्ची सुहागन ☆ श्रीमती सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

श्रीमती सविता मिश्रा 'अक्षजा' ( आदरणीय श्रीमती सविता मिश्रा ' अक्षजा' जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। आप हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं  (लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हायकु-चोका आदि)  की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आप एक अच्छी ब्लॉगर हैं। कई सम्मानों / पुरस्कारों  से सम्मानित / पुरस्कृत / अलंकृत हैं। आपकी कई रचनाएँ राष्ट्रिय स्टार की पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं एवं आकाशवाणी के कार्यक्रमों में प्रसारित हो चुकी हैं।  'रोशनी के अंकुर' लघुकथा एकल-संग्रह प्रकाशित| आज प्रस्तुत है उनकी एक लघुकथा ' सच्ची सुहागन '.   हम भविष्य में आपकी चुनिंदा रचनाएँ अपने पाठकों से साझा करने की अपेक्षा करते हैं । )  ☆ लघुकथा - सच्ची सुहागन ☆ पूरे दिन घर में आवागमन लगा था। दरवाज़ा खोलते, बंद करते, श्यामू परेशान हो गया था। घर की गहमागहमी से वह इतना तो समझ चुका था कि बहूरानी का उपवास है। सारे घर के लोग उनकी तीमारदारी में लगे थे। माँजी के द्वारा लाई गई साड़ी बहूरानी को पसंद...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – तेज धूप ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  ☆ संजय दृष्टि  – तेज धूप ☆   एसी कमरे में अंगुलियों के इशारे पर नाचते तापमान में चेहरे पर लगा लो कितनी ही परतें, पिघलने लगती है सारी कृत्रिमता चमकती धूप के साये में, मैं सूरज की प्रतीक्षा करता हूँ जिससे भी मिलता हूँ चौखट के भीतर नहीं तेज़ धूप में मिलता हूँ।   ©  संजय भारद्वाज, पुणे 7:22 बजे, 25.1.2020   ☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ बालिका दिवस विशेष – बेटियाँ ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “ ‘ (सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी”  जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है। आज प्रस्तुत है श्रीमती  हेमलता मिश्रा जी की  बालिका दिवस पर विशेष कविता  बेटियाँ )   ☆ बालिका दिवस विशेष - बेटियाँ ☆   फूलों की हैं मुस्कान मोतियों की आन-बान सूर्य चंद्र उर्मि की रोशनी है बेटियाँ ।।   आँखो में ब्रम्हांड लिए देवियों सी अवतारी। मात औ पिता के द्वारे कल्याणी सी बेटियाँ।।   काल के कपाल पर कपालिनी दुर्गा सी। ढाल चमकाती काली चामुंडा सी बेटियां।।   नहीं अब अनागतः आस लिए भावी प्रातः। प्राची से उभरती ऊषा की दमक बेटियाँ।।   बालिका वधू ना अब वैष्णवी सी तेजवान। असुर संहारक सी व्योम नापे बेटियां।।   © हेमलता मिश्र “मानवी ”  नागपुर, महाराष्ट्र...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 25 ☆ पतझड़ ☆ सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे (सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है  सादरपूर्वक सौ. सुजाता काळे जी की आज के दौर में स्त्री  जीवन की कठिन परिस्थितियों पर जीवन के कटु सत्य को उजागर करती एक भावप्रवण कविता  “पतझड़ ”।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 25 ☆ ☆ पतझड़ ☆   मैंने देखा, पतझड़ में झड़ते हैं पत्ते, और फल - फूल भी छोड़ देते हैं साथ। बचा रहता है सिर्फ ठूँस किसलय की बाट जोहते हुए।   मैंने देखा उसी ठूँठ पर एक घोंसला गौरैया का, और सुनी उसके बच्चों की, चहचहाट साँझ की। ठूँठ पर भी बसेरा और, जीवन बढ़ते मैंने देखा पतझड़ में ।   © सुजाता काळे पंचगनी, महाराष्ट्र, मोब – 9975577684...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 27 – अश्वत्थामा ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार (युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “ अश्वत्थामा ”।) Amazon Link – Purn Vinashak ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 27 ☆ ☆ अश्वत्थामा ☆ महाभारत के युद्ध में अश्वत्थामा ने सक्रिय भाग लिया था। महाभारत युद्ध में वह कौरव-पक्ष का एक सेनापति था। उसने भीम-पुत्र घटोत्कच (अर्थ : गंजा व्यक्ति,उसका नाम उसके सिर की वजह से मिला था, जो केशो से वहींन था और एक घट, मिट्टी का एक पात्र की तरह के आकार का था, घटोत्कच भीम और हिडिंबा पुत्र था और बहुत बलशाली था) को परास्त किया तथा घटोत्कच पुत्र अंजनपर्वा(अर्थ : अज्ञात त्यौहार, उसे यह नाम मिला क्योंकि उसके जन्म के समय...
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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होत आहे रे # 18 ☆ वंशाचा दिवा ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे (वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है. श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होत आहे रे ”  की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  उनकी  एक विचारणीय काव्य अभिव्यक्ति  वंशाचा दिवा । इस कविता के सन्दर्भ में उल्लेखनीय  एवं विचारणीय है कि - वंश का  दीप कौन?  पुत्र या पुत्री ? आप  स्वयं निर्णय करें ।  इस अतिसुन्दर रचना के लिए श्रीमती उर्मिला जी की लेखनी को नमन।)   ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 18 ☆   ☆ वंशाचा दिवा ☆ (काव्यप्रकार:- मुक्तछंद)   वंशाचा दिवा लावा वंशाचा दिवा ! अहो प्रत्येक घरात लागायलाच हवा ! सुनेला मुलगा व्हायलाच हवा ! अशी होती समाजात हवा !!   आज काळ बदलला मते बदलली! मुलगी झाली घरे आनंदली ! सासरच्यांची मते बदलली ! मुलगी झाली घरी लक्ष्मी आली !!   मुलगा तर हवाच हवा ! त्याशिवाय कां येणार...
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मराठी साहित्य – कादंबरी ☆ साप्ताहिक स्तम्भ #5 ☆ मित….. (भाग-5) ☆ श्री कपिल साहेबराव इंदवे

श्री कपिल साहेबराव इंदवे  (युवा एवं उत्कृष्ठ कथाकार, कवि, लेखक श्री कपिल साहेबराव इंदवे जी का एक अपना अलग स्थान है. आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशनधीन है. एक युवा लेखक  के रुप  में आप विविध सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने के अतिरिक्त समय समय पर सामाजिक समस्याओं पर भी अपने स्वतंत्र मत रखने से पीछे नहीं हटते. हमें यह प्रसन्नता है कि श्री कपिल जी ने हमारे आग्रह पर उन्होंने अपना नवीन उपन्यास “मित……” हमारे पाठकों के साथ साझा करना स्वीकार किया है। यह उपन्यास वर्तमान इंटरनेट के युग में सोशल मीडिया पर किसी भी अज्ञात व्यक्ति ( स्त्री/पुरुष) से मित्रता के परिणाम को उजागर करती है। अब आप प्रत्येक शनिवार इस उपन्यास की अगली कड़ियाँ पढ़ सकेंगे।)  इस उपन्यास के सन्दर्भ में श्री कपिल जी के ही शब्दों में – “आजच्या आधुनिक काळात इंटरनेट मुळे जग जवळ आले आहे. अनेक सोशल मिडिया अॅप द्वारे अनोळखी लोकांशी गप्पा करणे, एकमेकांच्या सवयी, संस्कृती आदी जाणून घेणे. यात बुडालेल्या तरूण तरूणींचे याच माध्यमातून प्रेमसंबंध जुळतात. पण कोणी अनोळखी...
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आध्यात्म/SPIRITUAL – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – नवम अध्याय (33) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ नवम अध्याय ( निष्काम भगवद् भक्ति की महिमा )   किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्‌।।33।।   फिर ब्रहाम्ण पुण्यात्मा भक्त तथा राजर्षि इनका तो कहना ही क्या !भज तू मुझे सहर्ष।।33।।        भावार्थ :  फिर इसमें कहना ही क्या है, जो पुण्यशील ब्राह्मण था राजर्षि भक्तजन मेरी शरण होकर परम गति को प्राप्त होते हैं। इसलिए तू सुखरहित और क्षणभंगुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर निरंतर मेरा ही भजन कर।।33।।   How much more easily then the holy Brahmins and devoted royal saints (attain the goal); having obtained this impermanent and unhappy world, do thou worship Me.।।33।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 31 ☆ खामोशी और आबरू ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का आलेख “खामोशी और आबरू”.  डॉ मुक्ता जी का यह विचारोत्तेजक लेख  हमें  साधारण मानवीय  व्यवहार से रूबरू कराता है।  इस आलेख का कथन "परिवार, दोस्त व रिश्ते अनमोल होते हैं। उनके न रहने पर उनकी कीमत समझ आती है और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए खामोशी के आवरण की दरक़ार है, क्योंकि वे प्रेम व त्याग की बलि चाहते हैं" ही इस आलेख का सार है। डॉ मुक्त जी की कलम को सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें एवं अपने विचार कमेंट बॉक्स में अवश्य  दर्ज करें )     ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – # 31☆ ☆ खामोशी और आबरू ☆ 'शब्द और सोच दूरियां बढ़ा देते हैं, क्योंकि कभी हम समझ नहीं पाते, कभी...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मनुष्य देह ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  ☆ संजय दृष्टि  – मनुष्य देह  ☆ (श्री संजय भारद्वाज जी द्वारा नव वर्ष पर निमंत्रण (प्रबोधन और सत्संग) से साभार।) (संजय उवाच की प्रस्तुति - तुम्हारे भीतर एक संत बसा है की निम्न पंक्तियाँ अपने आप में ही अद्भुत एवं सशक्त रचना है। )   तुम्हारे भीतर बसा है एक सज्जन और एक दुर्जन।  84 लाख योनियों के बाद मिली मनुष्य देह में दुर्जन को मनमानी...
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