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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 84 ☆ आत्मविश्वास – अनमोल धरोहर ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय  आलेख आत्मविश्वास – अनमोल धरोहर।  यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 84 ☆ ☆ आत्मविश्वास – अनमोल धरोहर ☆ 'यदि दूसरे आपकी सहायता करने को इनकार कर देते हैं, तो मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं, क्योंकि उनके न कहने के कारण ही मैं उस कार्य को करने में समर्थ हो पाया। इसलिए आत्मविश्वास रखिए; यही आपको उत्साहित करेगा,' आइंस्टीन के उपरोक्त कथन में विरोधाभास है। यदि कोई आपकी सहायता करने से इंकार...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – हरित ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) निठल्ला चिंतन 🌷🌱 ☆ संजय दृष्टि – हरित  ☆   हरा रहने के लिए जड़ों से जुड़ा होना आवश्यक है। जड़ें धरती के भीतर पोषित होती हैं। नश्वर संसार की आभासी उपलब्धियों से लम्बाई बढ़ती है। बढ़ती लम्बाई, जड़ों से दूरी भी बढ़ाती है। समय साक्षी है कि धन, संपदा, अधिकार या मान-सम्मान मिलने के बाद भी जो धरती से जुड़ा रहा, वही ऊँचा हुआ,...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 36 ☆ सोशल मीडिया जनित हत्यायें और जवाबदेही ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’ (डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं।आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक सार्थक एवं विचारणीय आलेख  “सोशल मीडिया जनित हत्यायें और जवाबदेही”.) ☆ किसलय की कलम से # 36 ☆ ☆ सोशल मीडिया जनित हत्यायें और जवाबदेही ☆  वैसे तो हम सोशल मीडिया पर अवांछित खबरें या चित्र छपने पर अप्रिय वारदातों को पढ़ते सुनते आ रहे हैं लेकिन वर्तमान में सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक चित्र, संदेश एवं पोस्ट किए गए वीडियोज के कारण हत्याओं के बढ़ते मामले बेहद चिंता जनक हैं। आज...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 83 ☆ चाँदनी ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल (डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  एक भावप्रवण  कविता “चाँदनी”। )  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 84 – साहित्य निकुंज ☆ ☆ चाँदनी  ☆ आज चाँदनी रात है तुझसे मुलाकात है। चाँद छुपा है चाँदनी के आगोश में चहूँ ओर फैली है चाँदनी बिखर रही रूप की रागिनी तेरा रूप देखकर हूँ मैं खामोश उड़ गये हैं होश चाँदनी रात में निखरा तेरा श्रृंगार लगता है तेरे रोम-रोम से फूट रहा मेरा प्यार । तभी नजर पड़ी चाँद पर वह चाँदनी से कह रहा हो तुम दूर न जाना मेरे साथ ही रहना तेरे साथ ही मेरा वजूद है। तुझमें डूबना चाहता हूँ तुझमें समाना चाहता हूँ। तुझसे मेरा श्रृंगार है। तू ही मेरा जन्मों का प्यार है। तभी निहारा अपने चाँद को उसने नजरे झुका ली सार्थक हुई मुलाकात प्रतीक बन गई चाँदनी रात।   © डॉ.भावना शुक्ल सहसंपादक…प्राची प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307 मोब  9278720311...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 73 ☆ संतोष के दोहे☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष” (आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत हैं  “संतोष के दोहे”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।) ☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 73 ☆ ☆ संतोष के दोहे  ☆ बुरा वक्त ही कराता,  अपनों की पहचान संकट में जो साथ दे, उसको अपना जान   वक्त बदलता है सदा, लें धीरज से काम नई सुबह के साथ ही, मिलता है आराम   चलें वक्त के साथ हम, करें वक्त सम्मान वक्त किसी का सगा नहिं, चलिए ऐसा मान   वक्त बदलते बदल गई, सबकी सारी सोच नजर हटते ही हटा, नजरों का संकोच   वक्त बहुत बलवान...
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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ आत्मकथ्य – ‘लेखकोपयोगी सूत्र और 100 पत्रपत्रिकाएं’ ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

☆ पुस्तक चर्चा ☆ आत्मकथ्य – ‘लेखकोपयोगी सूत्र और 100 पत्रपत्रिकाएं’ ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’☆ पुस्तक – लेखकोपयोगी सूत्र और 100 पत्रपत्रिकाएं लेखक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ प्रकाशक – नोशन प्रेस मूल्य – 200 रु (पेपरबैक)  पृष्ठ संख्या –  156 ISBN:-10-1638324948 ISBN:-13-978-1638324942 इस संस्करण को अमेज़न और नोशन प्रेस से खरीदा जा सकता है। अमेज़न लिंक >> लेखकोपयोगी सूत्र और 100 पत्रपत्रिकाएं नोशन प्रेस लिंक >> लेखकोपयोगी सूत्र और 100 पत्रपत्रिकाएं इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए ई-अभिव्यक्ति परिवार की और से श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” लेखक परिचय नाम- ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश'  जन्मतिथि एवं स्थान- 26 जनवरी 1965, भानपुरा जिला-नीमच (मप्र) प्रकाशन- अनेक पत्रपत्रिकाओं में रचना सहित 141 बालकहानियाँ 8 भाषा में 1128 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ- 1- रोचक विज्ञान बालकहानियाँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक  5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- पहाड़ी की सैर  सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। ☆ पुस्तक चर्चा ☆ आत्मकथ्य – ‘लेखकोपयोगी सूत्र और 100 पत्रपत्रिकाएं’ ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’☆ प्रथम संस्करण से..... अभ्यास...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “मेघदूतम्” श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद # मेघदूत ….पूर्वमेघः ॥१.६३॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

महाकवि कालीदास कृत मेघदूतम का श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆ “मेघदूतम्” श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद # मेघदूत ….पूर्वमेघः ॥१.६३॥ ☆   उत्पश्यामि त्वयि तटगते स्निग्धभिन्नाञ्जनाभे सद्यः कृत्तद्विरददशनच्चेदगौरस्य तस्य शोभाम अद्रेः स्तिमितनयनप्रेक्षणीयां भवित्रीम अंसन्यस्ते सति हलभृतो मेचके वाससीव॥१.६३॥   होगी वहाँ , तीर पहुंचे तुम्हारी कज्जल सृदश श्याम स्निग्ध शोभा ताजे तराशे द्विरददंत सम गौर गिरि वह वहाँ और अति रम्य होगा तो कल्पना में बँधी टक नयन से मधुर रम्य दृष्टव्य शोभा तुम्हारी मुझे दीखती , ज्यों गहन नील रंग की लिये स्कंध पर शाल बलराभ भारी   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈ ...
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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 76 – विजय साहित्य – जीवनाचे गीत…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 76 – विजय साहित्य – जीवनाचे गीत...! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆ सांजावला दिनमणी, आता रजनीची शाल. तुझ्या सोबतीने सरे सुखदुःख  भवताल ...!   असा जीवनाचा सुर अंतरात निनादतो आठवांच्या पाखरांनी आसमंती विसावतो ...!   अशा संधीकाली गाऊ जीवनाचे गीत नवे ऐकायला जमलेत आपलेच स्वप्न थवे.....!   तने दोन, एक मन, प्रेम प्रीती जुने नाते. तेजोमय भविष्याची, वाट जोगिया हा गाते ...!   दूर करण्या अंधार, अशी रम्य  वाटचाल कधी ज्ञानाचा प्रकाश, कधी प्रकाशाची शाल...!   सुरमयी सजे आभा, लावू पाठीला या पाठ स्वप्न मयी, कवडसे बांधियली सौख्य गाठ...... !   © विजय यशवंत सातपुते यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009. मोबाईल  9371319798 ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈ ...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ भास तुझ्या स्वप्नांचा ☆ सौ. राही पंढरीनाथ लिमये

सौ. राही पंढरीनाथ लिमये  ☆ कवितेचा उत्सव  ☆ भास तुझ्या स्वप्नांचा ☆ सौ. राही पंढरीनाथ लिमये ☆  गंध दरवळला बकुळी चा इशारा तुझ्या येण्याचा बावरे मन चाचपे कुंतलाना परी भास हा माझ्या मनाचा.   पोर्णिमेचा चंद्र मना मोहवी स्वप्न तुझ्या प्रिती चे जागवी स्वप्न भंगता डोळे ओले तुझ्या आठवांचा झुला झुलवी.   मन वेडे  समजाऊनी समजेना जखमा उरी स्वप्नात  गुंतताना आता भेट आपली पुढील जन्मी तरी मन मोहरे स्वप्नी भेटताना. राही पंढरीनाथ लिमये.   सौ. राही पंढरीनाथ लिमये मो  नं 9860499623 ≈ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈...
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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ अनुवादित लघुकथा – कठपुतली ☆ सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे         ☆ जीवनरंग ☆ अनुवादित लघुकथा – कठपुतली ☆ सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆  "मम्मी, काल आमच्या शाळेत कठपुतलीचा खेळ दाखवला," जमिनीवर बसून वहीत ड्रॉइंग काढत असलेली पारंबी म्हणाली. "अरे वा, काय काय दाखवलं?" गाईला चारा घालून परत घरात येता येता मम्मीने विचारलं. "अगं ए, गाईला चारा-पाणी देऊन झालं असेल तर जरा इकडे ये, आणि माझे पाय दाबून दे," कॉटवर आरामात लोळत पडलेल्या नवऱ्याने हुकूम फर्मावल्यासारख सांगितलं. "सगळं दाखवलं मम्मी--- त्या बाहुल्यांनी विहिरीतून पाणी काढून घरात आणून ठेवणं, चुलीवर स्वैंपाक करणं, मुलांना आंघोळी घालणं, कपडे धुणे, इस्त्री करणं --- सगळं सगळं दाखवलं---" काढलेलं चित्र रंगवता रंगवता पारंबीने सांगितलं. "कसा वाटला तुला तो कठपुतलीचा खेळ?"--- नवऱ्याच्या पायापाशी बसून आता ती बायको त्याचे पाय चेपायला लागली होती. "खूपच छान", पारम्बी उत्साहाने सांगायला लागली. "दोऱ्यांचे एक एक टोक खेळ दाखवणाऱ्या त्या माणसाच्या बोटांना बांधलेले होते, आणि दुसरी टोके त्या बाहुल्यांच्या अंगावर बांधलेली होती. तो माणूस त्या बाहुल्यान्ना इशारा केल्यासारखा बोटं हलवतो, आणि मग त्या बाहुल्यांचे अंग हलायला लागते. मग तुम्ही तुम्हाला जे पाहिजे ते त्यांच्याकडून करून घ्या. उड्या मारायच्या,...
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