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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #94 – मानसून की पहली बूंदे… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ (वरिष्ठ साहित्यकार एवं अग्रज श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण कविता   ‘मानसून की पहली बूंदे….….’। ) ☆  तन्मय साहित्य  # 94 ☆  ☆ मानसून की पहली बूंदे…. ☆ मानसून की पहली बूंदे धरती पर आई महकी सोंधी खुशबू खुशियाँ जन मन में छाई।   बड़े दिनों के बाद सुखद शीतल झोंके आए पशु पक्षी वनचर विभोर मन ही मन हरसाये, बजी बांसुरी ग्वाले की बछड़े ने हाँक लगाई।   ताल तलैया पनघट सरिताओं के पेट भरे पावस की बौछारें प्रेमी जनों के ताप हरे, गाँव गली पगडंडी में बूंदों ने धूम मचाई।   उम्मीदों के बीज चले बोने किसान खेतों में पुलकित है नव युगल प्रीत की बातें संकेतों में, कुक उठी कोकिला गूँजने लगे गीत अमराई। मानसून की पहली बूंदें धरती पर आई महकी सुध खुशबू जन-जन में छाई।   © सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश मो. 9893266014 ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈...
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English Literature – Stories – ☆ Kosi Sutluj Express ☆ Dr. Amitabh Shanker Roy Choudhury

Dr. Amitabh Shanker Roy Choudhury ☆ Story - Kosi Sutluj Express ☆ Dr. Amitabh Shanker Roy Choudhury ☆ One lakh twenty-five thousand cusecs of water! Who knows how much it is! This much is flowing through the river Kosi every day during this flood! Otherwise, every year barely five lakhs would flow in the month of September. Or say, nine lakh cusecs in the month of Kuhar or October. Just some days ago, it was a harmless snake which, a couple of days back, has turned into a giant, ferocious and all engulfing anaconda. And now Kosi is a bit tamed. Its fast-flowing water, washing both the banks, has become a bit subdued. The river Kosi is now flowing gracefully. The colour of all its tributaries – Panar, Lohandra, Mahanadi and Bakra has turned muddy. From orange. As a python becomes listless when it preys upon a deer and swallows it in toto, in the same way Kosi too has become quite gentle...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा –  निश्चय ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) संजय दृष्टि – लघुकथा -  निश्चय उसे ऊँची कूद में भाग लेना था पर परिस्थितियों ने लम्बी छलांग की कतार में लगा दिया। लम्बी छलांग का इच्छुक भाला फेंक रहा था। भालाफेंक को जीवन माननेवाला सौ मीटर की दौड़ में हिस्सा ले रहा था। सौ मीटर का धावक, तीरंदाजी में हाथ आजमा रहा था। आँखों में तीरंदाजी के स्वप्न संजोने वाला...
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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ बच्चे ☆ श्री विजय कुमार, सह सम्पादक (शुभ तारिका)

श्री विजय कुमार (आज प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित पत्रिका शुभ तारिका के सह-संपादक श्री विजय कुमार जी  की लघुकथा  “बच्चे।) ☆ लघुकथा – बच्चे ☆ ऑफिस के सामने खाली पड़े प्लाट में एक कुतिया ने बच्चे दिए हुए थे। अब कॉलोनी का कोई भी व्यक्ति वहां से गुजरता तो वह उस पर भौंकने लगती और काटने को दौड़ती थी। यहाँ तक कि गली से गुजरने वाले कई बाहरी व्यक्तियों को तो वह घायल भी कर चुकी थी। इसीलिए उस गली से लोगों का गुजरना भी कम हो गया था। एक दिन मैं सुबह ऑफिस पहुंचा तो देखा कि वह कुतिया ऑफिस के सामने खड़ी थी। ऑफिस के सामने वाली नाली को ऊपर से सीमेंट की शेल्फ बना कर कवर किया हुआ था और वह कुतिया वहीं ताक रही थी। मैंने गौर किया तो पाया कि उसके नीचे से उसके बच्चों की आवाजें आ रही थीं। मैं समझ गया कि इसके बच्चे उस कवर किए हुए हिस्से में चले गए थे और अब कीचड़ होने की वजह से...
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हिन्दी साहित्य – यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #77 – 15 – जिम उर्फ़ जेम्स एडवर्ड कार्बेट ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक (श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है। इस सन्दर्भ में श्री अरुण डनायक जी हमारे  प्रबुद्ध पाठकों से अपनी कुमायूं यात्रा के संस्मरण साझा कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है  “कुमायूं  – 15 – जिम उर्फ़ जेम्स एडवर्ड कार्बेट”) ☆ यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #77 – 15 – जिम उर्फ़ जेम्स एडवर्ड कार्बेट☆  भारत लम्बे समय तक ब्रिटिश...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 45 ☆ मौत से रूबरू ☆ श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

श्री प्रहलाद नारायण माथुर (श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता ‘मौत से रूबरू ’। )    Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>>  मृग  तृष्णा     ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 45 ☆ ☆ मौत से रूबरू ☆ वैसे तो मुझे यहां से जाना ना था, मुझे अभी तो और जीना था, कुछ मुझे अपनों के काम आना था, कुछ अभी दुनियादारी को निभाना था, एक दिन अचानक मौत रूबरू हो गयी, मैं घबरा गया मुझे उसके साथ जाना ना था, मौत ने कहा तुझे इस तरह घबराना ना था, मुझे तुझे अभी साथ ले जाना ना था, सुनकर जान में जान आ गयी, मौत बोली तुझे एक सच बतलाना था, बोली एक बात कहूं तुझसे, यहाँ ना कोई तेरा...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 1 (66-70) ॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 1 (66-70) ॥ ☆ अब मेरे उपरांत क्या होगा श्राद्ध - विधान यह विचार कर पितृगण चिन्तित व्यथित महान ॥66॥   मेरा पय का अर्ध्य भी कर दुख से स्वीकार दिखते हैं चिंतित, किसे दूँगा यह अधिकार ॥ 67॥   संतति क्रम के लोप से में भी हूं परितप्त धूप - छॉव के जाल सम आश - निराश त्रस्त॥68॥   दान तपस्या पुण्य है पारलोक सुख स्रोत्र लोक और परलोक में संतति सुख का स्रोत्र ॥ 69॥   आश्रम पालित वृक्ष सम मुझे देख स्वयमेव ऐसा संतति हीन जो, क्या न दुखी गुरूदेव ॥ 70॥   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈ ...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ ज्येष्ठ ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित

श्री सुहास रघुनाथ पंडित  कवितेचा उत्सव  ☆ ज्येष्ठ ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆ शुष्क धरेवर शुभ्र घनासह पाय रोवले ज्येष्ठाने कपाशीपरी मेघ भासती,की पंख पसरले हंसाने   वसंत सरला,ग्रीष्म भडकला,आग पेटली चोहिकडे गुलमोहर हा उतू चालला,केशर मिश्रित पडती सडे   दिवस लांबले,पवन थांबले,पानोपानी रंग बदलले सर हलकिशी यावी म्हणूनी आसुसलेले हे डोळे   कुटुंबवत्सल कुठे पक्षिणी घरट्यातून विसावे मातीमधुनी क्वचित कोठे मृगकीटक खुणावे   ज्येष्ठ तपस्वी ॠषीमुनीसम या धवल मेघमाला श्यामवर्ण मेघांचा होईल,सुखवी जो बळीराजाला.   ©  श्री सुहास रघुनाथ पंडित सांगली (महाराष्ट्र) मो – 9421225491 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 97 ☆ स्फुट ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 97 ☆ ☆ स्फुट ☆ मी डोळे उघडले सकाळी सात वाजता, तेव्हा नवरा स्वतःचा चहा करून घेऊन, टेरेस वरच्या फुलझाडांना पाणी द्यायला गेलेला! मी फेसबुक, व्हाटस् अॅप वर नजर टाकली..... काल रात्री एक कवयित्री मैत्रीण म्हणाली, "अगं तू "सुंदर" का म्हणालीस त्या पोस्टला? किती खोटं आहे ते सगळं....." खरंतर न वाचताच सांगीवांगी मी त्या पोस्टला "सुंदर" म्हटलेलं, मग फेसबुक वर जाऊन वाचलं ते आणि काढून टाकलं लाईक आणि कमेन्ट खरंतरं न वाचताच मत देत नाही मी कधीच पण अगदी जवळच्या व्यक्तीनं भरभरून कौतुक केलेलं पाहून,  मी ही ठोकून दिलं...."सुंदर"! आता ते ही डाचत रहाणार दिवसभर....!   तिनं सांगितलं....एका कवीनं स्वतःचीच तारीफ करण्यासाठी फेसबुक वर खोटी अकाऊंटस उघडल्याची आणि ते उघडकीस आल्यावर त्याला नोकरीवरून काढून टाकल्याची बातमी! खोट्या पोस्ट टाकणा-यांनाही होईल अशीच काही शिक्षा!   बापरे...आत्मस्तुतीसाठी काहीही.....   काल रात्रीचा भात कावळ्याला ठेवण्यासाठी टेरेसवर गेले तर... नवरा मोबाईल वर कुणाचा तरी "समझौता" घडवून आणत असलेला.... मी खुडली मोग-याची फुलं, वीस मिनिटं कोवळी  उन्हं अंगावर घेत, नाष्टा बनवायला खाली उतरले, पण मोबाईल वाजला... दोन मिनिटं बोलली सखी छानसं...   तर मोबाईल वर दिलीप सायरा ची छबी! आजकाल मला सायरा सती सावित्री वाटायला लागली आहे, पुन्हा...
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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ कर्जदार (भावानुवाद) ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर

श्रीमती उज्ज्वला केळकर जीवनरंग  ☆ कर्जदार (भावानुवाद) ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर☆ ‘बाबांसाठी प्लाज्मा डोनरची आवश्यकता होती. हॉस्पिटलमध्ये चौकशी केल्यावर प्लाज्मा मिळू शकेल, असा कळलं. ती सगळी प्रक्रिया पूर्ण झाली. मी प्लाज्मा डोनरला भेटण्याची इच्छा व्यक्त केली आणि समोर आला, बुधना रहमकर. ‘अरे तुम्ही?’ मला आश्चर्य वाटलं. तुमची कवच कुंडले कुठे गेली?’ तुम्ही करोनाच्या पकडीत कसे सापडलात?’ गेल्या वर्षी ‘सुपर स्पेशालिटी होस्पिटलमध्ये माझी मोठी काकू करोनावरील उपचारासाठी अ‍ॅडमिट होती. ऐंशीच्या वर तिचं वय होतं. अर्थरायटीसमुळे ती तशीही चालू शकत नव्हती. घरातल्या कुणालाही आतमध्ये प्रवेश नव्हता. आमची चिंता होती, तिथे काकूकडे नीट लक्ष दिलं जाईल की नाही? तिची देखभाल नीट होईल ना? कुणी परिचित नर्स मिळेल का,  काकूची नीट देखभाल करण्यासाठी?. एवढ्यात बुधना भेटला. म्हणाला, 'आपण आपल्या काकूची मुळीच काळजी करू नका. मी त्यांची नीट देखभाल कारेन. आपण गेटवर जे काही द्याल, ते मी त्यांच्यापर्यंत पोचवेन. फोनवर आपलं त्यांच्याशी बोलणं करवीन. तुमची काकू आता माझी काकू आहे. मी त्यांची चांगली काळजी घेईन.’ ‘पण तुम्हाला हे लोक आत कसे येऊ देतात?’ ‘ मी त्यांनाही मदत करतो.’ ‘तुला कोरोनीची भीती वाटत नाही?’ ‘नाही....
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