हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६४ ☆ लघुकथा – गणेश चौथ ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा गणेश चौथ। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६४ ☆

☆ लघुकथा – गणेश चौथ ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

‘आज गणेश चौथ है आप भी व्रत होंगी?’ सासूजी खुद तो व्रत रखती ही थीं आस-पड़ोसवालों से भी पूछती रहतीं –‘ नहीं’ या ‘हाँ’ के उत्तर में सामने से एक प्रश्न दग जाता – ‘और आपकी बहू?’ ‘उसके लड़का नहीं है ना? हमारे यहाँ लड़के की माँ ही गणेशचौथ का व्रत रखती है। ‘

ना चाहते हुए भी मेरे कानों में आवाज पड़ ही जाती थी। तभी मैंने सुना आस्था दादी से उलझ रही है – ‘दादी। लड़के के लिए व्रत रखती हैं आप! लड़की के लिए कौन-सा व्रत होता है?’

‘ऐं — लड़कियों के लिए कोई व्रत रखता है क्या?’- दादी बोलीं

‘पर क्यों नहीं रखता’ – रुआँसी होती आस्था ने पूछा।

‘अरे, हमें का पता। जाकर अपनी मम्मी से पूछो, बहुत पढ़ी-लिखी हैं वही बताएंगी। ’

आस्था रोनी सूरत बनाकर मेरे सामने खड़ी थी। आस्था के गाल पर स्नेह भरी हल्की चपत मैं लगाकर बोली – ‘ये पूजा- पाठ संतान के लिए होती है। ’

‘संतान मतलब?’

‘हमारे बच्चे और क्या। ‘

आस्था के चेहरे पर भाव आँख – मिचौली खेल रहे थे। सासूजी पूजा करने बैठीं, तिल के लड्डूओं का भोग बना था। उन्होंने अपने बेटे रजत को टीका करने के लिए आरती का थाल उठाया ही था कि रजत ने अपनी बेटियों को आगे कर दिया – ‘पहले इन्हें माँ’। तिल की सौंधी महक घर भर में पसर गयी थी।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ करफिआँल (फूलगोभी) जैसा रोजा (गुलाब) ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆

डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी एक संवेदनशील एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार के अतिरिक्त वरिष्ठ चिकित्सक  के रूप में समाज को अपनी सेवाओं दे रहे हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें (दो  हिंदी  तथा एक अंग्रेजी और एक बांग्ला भाषा में ) प्रकाशित हो चुकी हैं।  आपकी रचनाओं का अंग्रेजी, उड़िया, मराठी और गुजराती  भाषाओं में अनुवाद हो  चुकाहै। आप कथाबिंब ‘ द्वारा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (2013, 2017 और 2019) से पुरस्कृत हैं एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा “हिंदी सेवी सम्मान “ से सम्मानित हैं।)

☆ कथा कहानी ☆ करफिआँल (फूलगोभी) जैसा रोजा (गुलाब) ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी 

ऽखिड़की के काँच से इस तरह सटी हैं कि दोनों आँखें फैल गयीं हैं। बाँसुरी सी नाक हो गयी है चप्टी। बाहर बर्फ गिर रही है। देखते देखते सामने के आड़ू के पेड़ सान्ताक्लाज की तरह सफेद हो गये। पापा बता रहे थे – दिसंबर जनवरी में तो बुल्गारिया में -30.सेल्सिअस तक तापमान चला जाता है। बाप रे! इस समय तो फिर भी गनीमत है।

वो – वो रही एक ब्रवचे – यानी गौरैया – आड़ू के पेड़ से उड़ कर नीचे आ गयी। पंख फड़फड़ा रही है। परों के बीच हवा भर कर कैसी गेंद सी हो गयी है। पापा कहते हैं, ‘‘अनु, कोई चीज देखो तो उसका बल्गारियाई शब्द याद करो। तभी न इस भाषा को जल्दी सीख पाओगे। ”तो, पेड़ नहीं दरवाँ। और पत्तियाँ नहीं लीत्स पर बरफ जमी है।

अनुराग मन ही मन मुस्कराने लगा। पापा को उसकी जैसी बुल्गारिआई आती नहीं। मम्मी को तो बिल्कुल नहीं। उनसे अच्छी तो छोटी बहन तूलिका है। यहाँ – राजधानी सोफिआ में आये हुये दिन ही कितने हुए हैं? बस में जाओ, तो अनु। बाजार में जाओ, तो अनु – सभी उसे ही बुलाते हैं।

अचानक एक सोकोल – यानी बाज आकाश में चक्कर लगाने लगा। क्या उसने ब्रवचे को देख लिया? जीव विज्ञान के शिक्षक दिमितिर कहते हैं – यही भोजन श्रृंखला है। एकमात्र इंसान ही सिर्फ शौक के लिए दूसरे प्राणिओं की हत्या करता है। लो, अब नारासित्स – नरगिस – की झाड़िओं में ब्रवचे फुदक रही है। सोकोल उसे ढूँढ़ न सका …..

“अन्नु – तूली -!”लिपिका ने सलवार और स्वेटर के ऊपर अपने ओवरकोट में दस्ताना समेत हाथ डालते हुए बच्चों को बुलाया, ‘‘नाश्ता कर लो। ”

“आज मुझे यहाँ का ब्रेड नहीं खाना है। कैसी मटमैली होती है। मुझे घर के आटे का पराठा बना दो न माँ। ”

उधर स्टडी टेबुल के पास बैठे उस पर लिखते लिखते उल्लास हँसने लगा, ‘‘अरे बेटा अन्ना, इतनी बात जानना – हम लोगों को भारत से केवल 1100 किलो सामान ही लाने की इजाजत थी। उसमें भी बर्तन और कपड़े सभी थे। तो चावल, दाल और आटे होंगे ही कितने? दो साल पूरे बिताने है। ”

“ठीक है मुझे दादीवाली अमावट ही जरा दे दो। बाद में तुम लोगों के साथ नाश्ता करूँगा। ”

“तेरे मामा इसे आम पापड़ कहते हैं। ”उल्लास ने मजाक किया।

“चलो जी। सिर्फ भैया ही क्यों? अमृतसर में सभी अमावट को आम पापड़ ही कहते हैं। स्वर्ण मंदिर के पास इसकी एक सौ साल से भी पुरानी दुकान है। इस बार तो गुरु ग्रंथसाहिब के प्रकाशोत्सव के चार सौवीं वर्षगाँठ मनायी जा रही है। अमृतसर कितना सजा होगा….!”

उल्लास हाल ही में यहाँ सोफिआ विश्वविद्यालय में दो साल के लिए विजिटिंग प्रोफेसर बन कर आया है। साथ ही भारतीय दूतावास में सांस्कृतिक संपर्क अधिकारी का काम भी सँभालता है। दिन भर की व्यस्तता की लहरों पर समुद्री परिंदों की तरह कभी कभी आ धमकती हैं – देश की, घर की यादें…। यहाँ का जीवन बिल्कुल भिन्न। सब अपने अपने में व्यस्त। बेगानी जमीं की बर्फ में खो जाती है अपनी माटी की खुशबू…..

सोफिआ में नये नये आकर सभी कुछ उदास हो गये थे। बीच बीच में अनु के दादा दादी, नाना नानी के फोन आ जाते। उल्लास को तो खास फुर्सत मिलती नहीं, पर लिपिका के लिए एक एक पल सीसा जैसा भारी होने लगा। घर का काम, किताबों के पन्ने पलटना, माँ को, सास को एकाध खत लिखना, बस। आज आई. एस. डी. के जमाने में वो भी कहाँ तक हो पाता है? फिर अनुराग और तूलिका का स्कूल। नया परिवेश, नयी दुनिया।

तूलिका ने खिड़की से मुँह फेर लिया, ‘‘भैया, वो देखो, वह बिल्ली घात लगाये उधर जा रही है। ”

“अरे यह कोत्का क्या ब्रेवचे को झपट लेगी? ”

बड़ी सी बिल्ली। गदबदे ऊन का गोला। रोओं पर बर्फ जमी हुई है। दबे पाँव आगे बढ़ रही है। भाई बहन दौ़ड़े बाहर….

“अरे कहाँ जा रहा है? ”लिपिका कहती रह गयी।

बिल्ली भागी….दोनों पीछे….। मोड़ पर वह ग्रासरी स्टोर्स में घुस गयी।

“अरे रे रे !”दोनों भाई बहन एक बुढ़िया से टकराते टकराते बचे, ‘‘आलो! कदे हौदी? हैलो! कहाँ जा रहे हो? ”

अनुराग ने पहचान लिया – यही तो है दुकान की मालकिन। पिच स्ट्रीट की इस दुकान में पापा और मम्मी के साथ वह आ चुका है, ‘‘साॅरी बोबो !”

“दादी -!”बल्गारिआई में बोबो। इस शब्द ने मानो कई बर्फीले दिनों के बाद एक उजली सुबह की सफेद धूप की तरह इसिनबायेवा को छू लिया। उन्होंने उन्हे अपनी ओर खींच लिया, ‘‘क्या बात है? ”

“वो वो – कोत्का न – उस ब्रेवचे को -”तूलिका तुतलाने लगी। बुल्गारिआई में नहीं कह पा रही थी। अंग्रेजी में कहे? परंतु यहाँ तो अंग्रेजी बिल्कुल पसंद की नहीं जाती। ।

“क्या? ”

“वो पकड़ने जा रही थी। ” टूटी फूटी बल्गारिआई में दोनों ने अपनी बातें सुनायीं। साथ में हिन्दी अंग्रेजी की छौंक…..

“तुम शायद अपने पापा मम्मी के साथ एकबार यहाँ आ चुके हो। कहाँ के हो? तुम्हारा देश? ”

“हम इंडिया से आये हैं। मेरे पिताजी हिन्दी के विजिटिंग प्रोफेसर हैं। ”

“ओ! बच्चों, तुम लोगों ने मुझे बोबो कहा। तो स्कूल की छुट्टी के बाद इस दादी से मिलने आया करोगे न? ”

तूलिका ने भी एक श र्त रक्खी, ‘‘मेरी दादी की तरह आप भी हमें कहानियाँ सुनाया करेंगी न? ”

“कहानी? ” इसिनबायेवा के चेहरे की झुर्रियाँ और भी गहरा गयीं। सब कुछ छूट जाता है, पर यादों का दामन नहीं छूटता। दोनों बच्चे हाथ हिलाते हुए चल दिये। इसिनबायेवा को याद आया – इसी तरह उसका बेटा इल्को जब कभी यहाँ आता है – जाते समय हाथ हिलाते हुए अपने घर चला जाता है। अपना घर ! हाय जेश स ! यह उनका घर नहीं है? वह और उसकी दोस्त मेरिल्ली इस शहर में रहते हुए भी पराये हैं।

तभी तो इन दोनों के जाने के बाद जब उनके पति स्कोल्तानोव ने उनसे पूछा, ‘‘ये कौन हैं? क्या इतनी बातें कर रही थी? ”

तो उन्होंने सब कुछ कह सुनाया, ‘‘ये बच्चे इंडिया से आये हैं। हैं न कितने प्यारे? ”

परंतु पत्नी की बातें सुनते सुनते स्कोल्तानोव का चेहरा बिल्कुल कठोर होने लगा, ‘‘बस बस बहुत हो चुका। फिर से धोखा खाने की गलती न करना। जब सगे ही अपने नहीं हुए, तो पराये से क्या उम्मीद करें? अब क्या दूसरों के लिए भी बैठ कर रोना चाहती हो? ”

इसिनबायेवा को सब मालूम है। संतान से बिछुड़ने पर माँ का हृदय क्या कम रोता है? इल्को सब कुछ छोड़कर मैसिडोनिया जाने की बात करता है। वहाँ कमाई का अवसर है। इसीलिए बुल्गारिआ से काफी लोग इटली, ग्रीस और हंगरी चले जाते हैं। उन्होंने कितनी बार मेरिल्ली से उसकी शादी की बात छेड़ी। उसका घर बसाना चाहा। मगर इन बातों में उसे तनिक भी दिलचस्पी नहीं।

“ति काकसी – आप कैसी हैं? ”

“दुबरे आसम – मैं ठीक हॅूँ। ”

बातचीत की गाड़ी चलती रही। इधर हिन्दी, उधर बुल्गारियाई की पटरिओं पर….

उन दोनों को भी मानो परदेश में एक और दादा दादी मिल गये। स्कूल की छुट्टी के बाद घूमते टहलते दोनों ग्रासरी स्टोर्स पहुँच जाते, ‘‘दोबर बेचर! शुभ संध्या !”

स्कोल्तानोव खास एतराज भी नहीं करता। ग्राहकों को सामान देते हुए, अखबार का पन्ना पलटते हुए, अपनी बुढ़िया के साथ परदेसी पोते पोती की बातों का आनंद उठाता। काश ! ये इल्को के बच्चे होते ! हमारे अपने ! उसके सीने से सिर्फ एक साँस निकलती है – आह !

क्रिसमस की छुट्टियों के पहले ही बर्फबारी शुरु हो गयी। बुल्गेरियाई किसान इसी बर्फबारी के लिए आँखें बिछायें रहते हैं। यही तो खेतों की सिंचाई का मुख्य साधन है। उनका आसरा। बड़े दिन के पर्व पर स्कोल्तानोव की दुकान भी खूब सजी हुई थी। बाहर अंदर – चिरागवाले – सितारे लटक रहे थे। स्टोर के अंदर एक क्रिसमस ट्री सजाकर धरा गया था। उसकी हर एक शाखा पर बच्चों के लिए छोटे छोटे उपहार लटक रहे थे। गुब्बारा, तो टेडीबीअर या चाकोलेट…!

“हैप्पी क्रिसमस, बोबो – द्यौदी !”कहते हुए दोनों बच्चे अंदर दाखिल हुए, ‘‘पापा मम्मी भी आ रहे हैं। ”

उल्लास और लिपिका भी काँच का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हुए, ‘‘हैलो ज्.द्रास्ति। नमस्कार! क्रिसमस आनंदमय हो !”

“मेरि क्रिसमस!”कहते हुए इसिनबायेवा ने दोनों बच्चों को सीने से लगा लिया। आज के दिन स्कोल्तानोव ने भी हँस कर उनसे हाथ मिलाया।

“अनुराग, तूलिका इधर आओ। क्रिसमस ट्री पर से अपना अपना उपहार छाँट लो। ”इसिनबायेवा की खुशी को मानो पर लग गये थे। उन्होंने अपने हाथ से बनाये चाकोलेट केक उन्हें खिलाये। जाते समय लिपिका के हाथ में एक फूलगोभी जितना बड़ा गुलाब देते हुए बोली, ‘‘आप क्रिसमस के दिन हमारे यहाँ पधारे हैं। हमारी ओर से एक नाचीज भेंट!”

अनु उछलने लगा, ‘‘अम्मां, यह देखो – यह तो करफिआँल जितना बड़ा रोजा है!”

“ब्लागोदारिया!”लिपिका ने शुक्रिया अदा किया, ‘‘म्नोगो खूबवू! बहुत सुंदर!”

जाते जाते तूलिका ने एक समाचार सुनाया, ‘‘बोबो, भैया न – परसों पोलैंड जा रहा है। अकेले। ”

“पोलैंड! वहाँ क्यों? ”

लिपिका मुस्कुरा कर बोली, ‘‘स्कूल टीम के साथ वालीबाल खेलने। मैं तो डर रही हॅूँ। अपने देश में तो हम बच्चों को स्कूल बस में स्कूल भेज कर भी निश्चिन्त नहीं रह सकते। रास्ते में कुछ हो न जाए। और यहाँ तो विदेश का सफर। अकेले। वो भी हवाई जहाज से। ”

उल्लास हँसने लगा, ‘‘इसी तरह तो हमारे बेटे में आत्मविश्वास पैदा होगा। क्यों? आप ही कहिए। ”

इसिनबायेवा मुस्कुराई, ‘‘फिर भी माँ का दिल है। खैर, अनुराग, तुम्हारा स्कूल जीत कर आये – यही मेरी प्रार्थना है ! मदर मरियम तुम्हारा साथ दें, मेरे लाल !”

एक दिन बाद….

माँ से लिपट कर ‘‘जीत आऊँगा न माँ? ” कहकर हँसते हॅँसते अनुराग एरोड्रोम जाने के लिए स्कूल बस में बैठ गया, पर लिपिका उदास हो गई। तूलिका पेवमेंट पर खड़ी हाथ हिलाती रही – जब तक बस आँखों से ओझल हो नहीं गयी….

उल्लास लिपिका को समझा रहा था, ‘‘याद है? एकबार छात्रों का कौन सा विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया – वे बसों पर पत्थर और ढेले फेंकने लगे। अनु बस से उतर कर पैदल घर चला आ रहा था, और मैं स्कूटर लेकर मारा मारा फिर रहा था कि बच्चा गया कहाँ? कहीं उसे कुछ हो न जाए ! आज वही सरहद पार जा रहा है – अकेले! कस्टमस से गुजरना, एरोप्लेन में बैठना, सारी औपचारिकतायें पूरी करना, पोलैंड में किसी अन्जाने परिवार के साथ रहना – सब कुछ अकेले ! भारत में भी तो बच्चे मेट्रो या लोकल से रोज स्कूल जाते हैं। अकेले। तो? ”

लेकिन माँ का हृदय थोड़े ही मानता है। उसे बार बार अनु के स्कूल जाने का पहला दिन याद आ रहा था। ‘‘माँ, स्कूल में मैं अकेले जाऊँगा? तुम साथ नहीं चलोगी? तो मैं भी नहीं जाता। जाओ -!”

दो दिन बाद कहीं जाकर उसके होठों पर हॅँसी आयी – जब पोलैंड से श्रीमती बोरलीना का फोन आया। अनु को इन्हीं के घर ठहराया गया था। मिलनसार अनु से मिल कर वे इतनी खुश थीं कि फोन पर कहने लगीं, ‘‘आप दुनिया की सबसे खुश नसीब माँ हैं !”

शाम को सूरज यहाँ जल्दी अस्त नहीं होता। रात के नौ के बाद ही वह अल्विदा कहता है। कभी कभी तो आधी रात तक उजाले में तारे तैरते रहते हैं। भैया घर में नहीं है। तूलिका उदास बैठी थी। फिर निकल पड़ी। जरा बोबो से बतिया कर आयें। बदन पर केवल एक ही स्वेटर था। लिपिका ने भी ध्यान नहीं दिया। रास्ते में रिमझिम बारिश के साथ सर्द हवा की साँय साँय….

इसिनबायेवा तो उसे देखते ही दौड़ कर आयीं, ‘‘यह क्या? न रेनकोट, न कुछ ! कपड़े भी गीले हो गये हैं। अरे पगली, तुझे ठंड लग जायेगी। ”जल्दी से उसके कपड़े बदल कर अलाव की बगल में कुर्सी पर बैठा दिया। एक कप गरम दूध में चाकोलेट मिलाकर पिलाने लगी….

कुछ आराम जरूर हुआ, पर स्कोल्तानोव उन्हे सुनाकर भुनभुनाने लगे, ‘‘नन्ही सी जान। कुछ हो जाये तो? जबर्दस्ती ओखली में सर देना !”

बर्फबारी धीमी हुई तो तूलिका को गरम जैकेट में लिपट कर स्कोल्तानोव उनके अपार्टमेन्ट में पहुँचा आया। बेवजह परेशानी झेलना उसे पसन्द नहीं। उसने कुछ बेरूखी से लिपिका को सुना भी दिया, ‘‘बेटी जब घर से निकल रही थी, तो आपको देखना चाहिए था कि उसने पर्याप्त गरम कपड़े पहन रक्खे है कि नहीं। ”

लेकिन भोर होते होते बात बिगड़ने लगी। तूलिका को बुखार आ गया। साथ में तेज खाँसी और सीने में दर्द। उल्लास को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? जयपुरवाले पारिवारिक डाक्टर की याद आ गयी। उसने दूतावास के एक दूसरे सहयोगी को फोन किया। दोस्त ने कहा, ‘‘तुरंत अस्पताल ले जाओ। यहाँ निमोनिआ का खतरा हमेशा बना रहता है। ”

उल्लास परेशान हो उठा। बर्फ पर से कार चला कर वह सहयोगी भी यहाँ तक आ नहीं सकता। वह बुलाये तो किसे? किसकी मदद ले? एम्बुलेन्स मिल जायेगा? इसी उधेड़बुन में घबड़ाकर वह दौड़ा…

स्कोल्तानोव दंपति के घर के बेल बजाते ही उसने देखा सामनेवाली खिड़किओं के शीशे रोशन हो गये। वे जाग गये हैं। दरवाजा खुलते ही उसने सब कुछ कह सुनाया। स्कोल्तानोव पल भर सोचता रहा, ‘‘चलिए, मैं खुद उसे अस्पताल ले चलता हूँ। ”

उल्लास ‘ब्लागोदारिया’ भी न कह सका।

इसिनबायेवा बेडरुम में थीं। पूछने लगीं, ‘‘क्या बात है? इतनी रात गये कौन आया है? ”

“अरे तुम्हारी उस इंडियन बच्ची की तबिअत बहुत खराब है। भींग जो गई थी। अस्पताल ले जाना पड़ेगा। ”

जब तक बूढ़े ने अपना वैन निकाला, बुढ़िया भी तैयार हो गईं। अच्छा ही हुआ। क्योंकि लिपिका के आँसू तो थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। तूलिका की छाती धौंकनी की तरह ऊपर नीचे हो रही थी। सफेद बर्फ को चरमराता हुआ वैन आगे निकला। रास्ते के लैंपपोस्ट, पेड़ों की पत्तियाँ, बिल्डिंगों की चहरदीवारी, और दुकानों के ग्लोबोर्ड – सभी जगह सांताक्लाज की सफेद दाढ़ी जैसी बर्फ जमी हुई थी।

जब तूलिका के मुँह पर आक्सीजन का मास्क लगा कर, इंजेक्शन दिलवा कर, वार्ड से बाहर जाते जाते डाक्टर ने कहा, ‘‘बस, अब हमें इंतजार करना है!”तो, उस समय अस्पताल की खिड़किओं पर से अंधकार के पर्दे कुछ उठने लगे थे। …

बूढ़ा स्कोल्तानोव अपनी दुकान देखता। इन्हें पहुँचाने जाता। मगर किसी से खास कोई बातचीत नहीं करता। इसिनबायेवा तूलिका की सगी दादी की तरह उसकी देखभाल करती रहीं। दोपहर में वह रहतीं, तो लिपिका घर जाकर कुछ आराम कर लेती। फिर शाम तक लिपिका आ जाती। पहली रात तो उसने जाग कर ही बितायी थी।

इस बीच अनुराग भी वापस आ गया। वापस आने पर जैसे किसी को कोई हर्ष ही न हुआ। मैच का क्या हुआ किसी ने न पूछा। व्याकुल उल्लास को भी कुछ ध्यान न रहा। पर स्कोल्तानोव को जब मालूम हुआ कि उसका स्कूल कप जीत कर लौटा है, तो वह हँस कर उसकी पीठ थपथपाने लगा, ‘‘जीओ मेरे नन्हे भालू! मैं भी अपने क्लब का सेंटर फारवर्ड था। फुटबॉल लेकर दौड़ता तो किसी की हिम्मत नहीं होती कि मेरे पैरों से उसे छीन ले -!”

और दो दिन बाद तूलिका घर आ गयी। लेकिन हर समय उसके पास किसी का रहना जरूरी था। इसिनबायेवा ने खुद ही कहा, ‘‘क्यों घबड़ाती हो, बेटी? हम हैं न। ”

इस बार स्कोल्तानोव की भौंहें तनी नहीं। वह अपनी दुकान देखता, फिर यहाँ आकर भोजन करता। पहली रात इसिनबायेवा इनके फ्लैट में ही रह गयीं। दूसरे दिन से वो भी थोड़ी देर के लिए दुकान हो आतीं।

भारत से उल्लास के पिताजी ने जब फोन पर पूछा, ‘‘तूली अब कैसी है? ” अनु खिलखिला कर हँसने लगा, ‘‘अब तो हमारे साथ दादा दादी हैं। ”

“दादा दादी? ”उसके दादाजी चकित रह गये।

“हाँ, सोफियावाले दादा दादी !”

इन दो तीन दिनों में स्कोल्तानोव भी मानो भूल गया था – ये दोनों बच्चे उनके सगे नहीं हैं। साथ साथ खाना। तूलिका को समय से दवा देना। सुबह जब इनके फ्लैट में पहुँचते तो लिपिका या उल्लास हॅँस कर स्वागत करता, ‘‘दोब्रो उतरो! गुड मार्निंग!”फिर वे जब दुकान के लिए निकलते, अनुराग दरवाजे तक छोड़ने आता। हाथ हिलाता, ‘‘गुड बाई, द्यौदी! जल्दी लौटियेगा। ”

फिर एकसाथ रात का भोजन। एक रात इसिनबायेवा ने अपने गाँववाली मसालेदार पनीर की रोटी बनायी। सबको खूब पसंद आयी। फिर रात में सोते सोते कहानी सुनना। दो दिन में उस बूढ़े और बुढ़िआ ने भी मानो दो युग जी लिये….

मगर वे और कितने दिन ठहरते? दुकान के कामों में भी परेशानी हो रही थी। जिस दिन शाम को वे जाने लगे, इसिनबायेवा ने अनु और तूलिका के गालों को दबाते हुए कहा, ‘‘तो अब हमारे स्टोर्स में भेंट होगी। “

दोनों उदास थे। तूलिका बोली, ‘‘बोबो, यहीं रह जाओ न। ”

उल्लास और लिपिका भी वहीं खड़े थे। इस बूढ़े दंपति के प्रति वे सिर्फ कृतज्ञ ही नहीं थे, बल्कि मन में एक लगाव भी हो गया था।

तभी अनु अचानक इनसे मुँह फेड़कर खिड़की के पास जा खड़ा हो गया।

“क्या बात है? अनु, इधर आ। ”लिपिका बोली, ‘‘अपने द्यौदी और बोबो को गुडबाई नहीं कहेगा? ”

इधर देखे बिना अनुराग ने झल्लाकर कहा, ‘‘इससे तो अच्छा था जब तूली बीमार थी। ”

“यह तू क्या बक रहा है? ”लिपिका की भौंहे तन गईं।

“तब तो बोबो और द्यौदी हमें छोड़ कर जा नहीं पाते। ”

उसने हिन्दी में ही यह बात कही थी। स्कोल्तानोव और इसिनबायेवा इतना तो समझ ही रहे थे कि वहाँ तूफान उठ खड़ा हुआ है। -‘‘वह क्या कह रहा है? ”

उल्लास ने उनको बल्गारियाई में सबकुछ समझाया।

स्तब्ध खड़े रह गये वे बूढ़े दम्पति। इसिनबायेवा की आँखों में दुनाव (दान्युब) नदी लहराने लगी।

स्कोल्तानोव को लगा – ये गैर नहीं। उनके इल्को के ही बच्चे हैं। उन्होंने आगे बढ़ कर उन दोनों को सीने से लगा लिया, ‘‘तेरे ये द्यौदी और बोबो तेरे ही रहेंगे, बेटे। वहाँ जाकर भी हम तुमसे जुदा हो सकते हैं क्या?”

——

आभारः डा0 श्रीप्रसाद तथा डा0 आनन्द वर्धन – ब्रजभूमि

♦♦♦♦

© डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी

पताः फ्लैट नं. 301, चौथी मंजिल, टावर नं 1, मंगलम आनन्दा ग्रैंड रामपुरा रोड, सांगानेर, जयपुर, 302029

मो. 9455168359, 9140214489. ईमेल: asrc.vns@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लिखा-पढ़ी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लिखा-पढ़ी ? ?

मेरा लिखना,

तुम्हारा पढ़ना,

बहुत हुआ

यूँ जी का बहलना,

चलो लिखा-पढ़ी छोड़ें,

साथ बैठें, जी भर बतियाएँ,

बाकी बची का उत्सव मनाएँ,

शेष को अशेष बनाएँ..!

?

© संजय भारद्वाज   

प्रातः 10:29 बजे, 29 अगस्त 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  शुक्रवार दि. 4 सितंबर (जन्माष्टमी) से गुरुवार 10 सितंबर  तक गोविंद साधना संपन्न होगी। 🕉️

💥 ‘गोविंद साधना’ का जाप मंत्र होगा-  ॐ कृष्णाय नमः.।। इसके साथ ही मधुराष्टकम् का पाठ करेंगे।💥

💥आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे। 💥

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

English Literature – Satire ☆ Witful Warmth # 111 – The Silent Wi-Fi Master… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.

His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.

His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.

Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.

Key Accolades and Works

  • Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
  • Satire Collections: ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’, ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’, ‘Gapodi Adda’
  • Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
  • Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
  • Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his satire The Silent Wi-Fi Master 

☆ Witful Warmth# 111 ☆

☆ Satire ☆ The Silent Wi-Fi Master… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

In the quiet suburb of Green Meadows, Mr. Kapoor was considered a neighborhood legend, not for his past career as an accountant, but for possessing the most powerful, unhackable Wi-Fi connection in the entire locality. His router signal was so strong that people three houses away could stream movies without a single second of buffering.

The catch? Mr. Kapoor refused to share the password with anyone. He guarded it like a state secret, believing that providing free internet to neighbors would corrupt their moral discipline and make them lazy.

This created a covert operation among the local teenagers, led by young Aryan. For months, Aryan tried every trick in the book: guessing basic combinations like ‘Kapoor123’, dropping fake delivery boxes with phishing notes, and even offering to clean Mr. Kapoor’s garden for free while trying to peek at the back of the router. Nothing worked. The network remained locked behind an impenetrable fortress of military-grade encryption.

 

Then came the night of the big final match of the World Cup. Just ten minutes before kickoff, a massive storm hit the neighborhood, knocking out the local cable TV network. Chaos erupted. Desperate neighbors gathered near Mr. Kapoor’s front gate, peering through the window. Mr. Kapoor’s house was lit up, and his smart TV was seamlessly streaming the pre-match analysis in glorious high definition.

 

Aryan decided to execute his final, desperate gambit. He walked up to the front door, knocked politely, and handed Mr. Kapoor a freshly baked hot box of homemade garlic bread made by his mother.

 

“Mr. Kapoor,” Aryan said with pure, innocent reverence. “We know you won’t give us the password, and we respect your principles. But could you at least do us the honor of letting my elderly grandfather sit on your porch? He has watched every World Cup final since 1975, and his heart will break if he misses this one.”

 

Mr. Kapoor’s stern face softened. He looked at the frail old man waiting by the gate, sighed deeply, and opened the door wide. “Bring him in. In fact, all of you can stand near the doorway. But no phones! Watch the TV!”

 

The entire neighborhood crowd squeezed into the living room, cheering quietly as the match unfolded. It was a nail-biting finish. In the final minute, as the winning goal was scored, the entire room erupted into wild cheers. People hugged each other, laughing and celebrating.

 

During the excitement, Aryan’s grandfather leaned closer to Mr. Kapoor, tapped him on the shoulder, and whispered with a warm smile, “Thank you, Kapoor. By the way, your password ‘GarlicBread1975’ is very creative.”

 

Mr. Kapoor froze. He looked at Aryan, who was quietly holding his phone under his jacket, displaying a full-bar Wi-Fi icon.

 

Aryan smiled sheepishly and said, “Sir, you only softened when I mentioned garlic bread and the year 1975. It was a logical deduction.”

 

Mr. Kapoor looked at the boy, then at the happy crowd still celebrating in his living room. He cracked a rare, genuine smile, raised his tea cup, and said, “Well played, Aryan. But tomorrow, it changes to ‘ColdSamosa2026’.”

 

The entire room burst into loud cheers and applause, honoring the neighbourhood’s ultimate tech showdown.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२८ ☆ व्यंग्य – ऊँट के मुँह में जीरा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२८ ☆

?  व्यंग्य – ऊँट के मुँह में जीरा ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ऊँट के मुँह में जीरा डालने से न ऊँट का पेट भरता है, न जीरे की ही प्रतिष्ठा बढ़ती है। पर हमारे देश में यह व्यवस्था का स्थायी चरित्र बन चुका है। जहाँ देखिए, वहीं जीरे बाँटे जा रहे हैं और ऊँट मुस्कुराते हुए भूखे रहने का अभ्यास कर रहे हैं।

सरकार हर 6 माह में मंहगाई राहत  की घोषणा करती है, । कर्मचारी पूछता है, कितना? जवाब आता है, इतना कि समाचार की हेडलाइन बन जाए, मगर जेब की सिलवट भी न बदले। यानी ऊँट के मुँह में जीरा।

 लेखक को वर्षों की तपस्या , प्रकाशक की मिन्नत , जोड़ तोड़ के बाद पुरस्कार घोषित होता है। पुरस्कार राशि देखकर लेखक भावुक हो गया। इसलिए नहीं कि रकम अधिक थी, बल्कि इसलिए कि यात्रा भत्ता उससे महँगा था । सम्मान का शॉल इतना बड़ा कि उसमें पूरा लेखक लिपट जाए, लेकिन लिफाफा इतना हल्का कि हवा भी उसे उड़ा ले जाए। साहित्य ने फिर कहा, “सम्मान अमूल्य होता है।” लेखक मन ही मन बोला, “हाँ, इसलिए उसका मूल्य कोई नहीं देता।”

आजकल संस्थाएँ भी जीरा वितरण अभियान चला रही हैं। पाँच सौ रुपये का मानदेय देकर लिखती हैं, “आपका अमूल्य सहयोग मिला।” अमूल्य सहयोग का मूल्य पाँच सौ! लगता है शब्दकोश भी अब महँगाई से डर गया है।

ज्यादा साहित्य प्रेमी आयोजक अपनी इज्जत बचाने के लिए स्वयं ही मानदेय को पत्रम पुष्पम लिख देते हैं, या सुदामा के चावल कहकर उसे थोड़ा ललित टच दे कर अपनी झेंप पता नहीं किससे मिटा लेते हैं।

डिजिटल दुनिया ने तो जीरे को और आधुनिक बना दिया है। घंटों का वेबिनार, दर्जनों स्लाइड, अंत में धन्यवाद और एक ई-प्रमाणपत्र।

प्रमाणपत्र डाउनलोड करते-करते बिजली का बिल ज़्यादा आ जाए तो आयोजक की आत्मा प्रसन्न हो जाती है कि ज्ञान का प्रसार सफल रहा।

शिक्षा में भी यही हाल है। बच्चों से कहा जाता है, बड़े सपने देखो। फिर स्कूल की लाइब्रेरी में तीन किताबें और उन पर चार ताले। खेलो, आगे बढ़ो, मगर मैदान पार्किंग बन चुका है। सपनों का ऊँट दौड़ना चाहता है, व्यवस्था उसे जीरा चबाने का प्रशिक्षण दे रही है।

महँगाई सबसे बड़ी जीरा विशेषज्ञ है। वेतन बढ़ा दो प्रतिशत, खर्च बढ़ा बीस प्रतिशत। फिर अर्थशास्त्री बताते हैं कि आपकी आय में वृद्धि हुई है। सचमुच हुई है, कैलकुलेटर पर, जेब में तो वही पुराना ऊँट बैठा जुगाली कर रहा है।

सोशल मीडिया ने इस मुहावरे को लोकतांत्रिक बना दिया है। किसी ने एक पौधा लगाया, सौ सेल्फियाँ खिंच गईं। किसी ने दो किताबें दान कीं, पचास पोस्ट लिख दीं। काम जीरा, प्रचार ऊँट। एक दर्जन केले मरीजो में बांटकर पुण्यात्मा बन कर ऊंट की तरह अस्पताल से निकलते नेता जी की फोटो अखबार में देखी ही होंगी ।

हम सब भी कहीं न कहीं इस खेल के हिस्सेदार हैं। रिश्तों में समय नहीं, लेकिन इमोजी भरपूर। पड़ोसी की खबर नहीं, मगर “टेक केयर” का संदेश तुरंत पहुँच जाता है। संवेदनाएँ भी अब इंस्टेंट जीरे की पुड़िया बन गई हैं। व्हाट्सएप पर ज्ञान त्वरित फॉरवर्ड कर देते हैं, किंतु अमल में नहीं लाते ।

दरअसल समस्या जीरे की नहीं, ऊँट की भूख को समझने की है। भूख बड़ी हो और समाधान प्रतीकात्मक, तो व्यंग्य अपने आप जन्म लेता है। समाज को रोटी चाहिए, हम उसे रिबन काटकर आशाई भरोसा परोस देते हैं। लेखक को सम्मान के साथ श्रम का मूल्य चाहिए, हम उसे स्मृति-चिह्न थमा देते हैं। नागरिक को सुविधा चाहिए, हम उसे घोषणा दे देते हैं।

अंत में लगता है कि इस मुहावरे का संशोधित संस्करण लिख देना चाहिए, “ऊँट अब जीरा नहीं माँगता, उसे इतना अनुभव हो गया है कि वह पहले लिफाफे का वजन तौलता है।”

और हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जीरा बाँटने वाले स्वयं को अन्नदाता समझते हैं।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०८ ☆ राकेश चक्र के स्वास्थ्य सम्बन्धी दोहे… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०८ ☆ 

☆ राकेश चक्र के स्वास्थ्य सम्बन्धी दोहे  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

जीवनचर्या साध ले, रहना है यदि स्वस्थ।

मनमानी की बावरे, रोग बढ़ें मद मस्त।।

अलमुनियम के पात्र में, जो भी भोज पकायं।

रोग बढ़ें तन बावरे, मूरख समझ न पायं।।

 *

सूर्योदय की धूप में, ले तू मित्र नहाय।

दही, पनीर, सब तेल से, अस्थि सबल हो जाय।।

 *

नर्व टॉनिक बी ट्वेल्व है, भोग अंकुरित अन्न।

पालक, सेव , अनार में, मिलें विटामिन टन्न।।

 *

चीनी, नमक, रिफाइंड से, रह ले प्यारे दूर।

यदि ना चेता बाबरे, आएँ रोग हुजूर।।

 *

रक्त चाप उनका बढ़े, करें कपट, मद, क्रोध।

वाणी मधु रख बावरे, जीवन बने सुबोध।।

 *

योग, ध्यान नियमित करो, तन-मन निर्मल होय।

सोए पैर पसार के, नहीं चैन भी खोय।।

 *

आपाधापी जो करें, रक्त चाप बढ़ जाय।

हार्ट फेल हो बावरे, जीवन कब बच पाय।।

 *

सोच समझ कर भोज कर, अल्ल-मल्ल मत खाय।

भूख लगे पर खाए नित, जीवन भर मुस्काय।।

 *

अति करता जो बावरे, ‘चक्रसदा पछताय।

जिह्वा, मन को साध ले, जीवन भर सुख पाय।।

 *

घूँट-घूँट कर नीर पी, घूँट-घूँट कर दूध।

चबा-चबा कर भोज कर, बढ़े पेट ना गूद।।

 *

समय सोय से जाग ले, रहना है यदि स्वस्थ।

योग, सैर कर बावरे, यही मंत्र है मस्त।।

 *

मोबाईल, टीवी का, जो करते दुरुपयोग।

जो भी देखें लेट के, भोगें फिर दुर्योग।।

 *

रात रतजगा जो करें, रहते हैं अस्वस्थ।

मोबाइल में डूबकर, करें स्वयं को त्रस्त।।

 *

सब कुछ अति का हो रहा, गर्मी हो या शीत।

मोबाइल में डूबकर, खत्म हो रही प्रीति।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८५ ⇒ बातों के भूत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बातों के भूत।)

?अभी अभी # १०८५  ⇒ आलेख – बातों के भूत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पहली बात तो भूत होते ही नहीं, और अगर होते भी हैं, तो उनसे डरने की कोई जरूरत नहीं, बस भृगु बनने की है। भूत बातों से नहीं मानते। घोड़ा हवा से बात करता है, और भूत से लातों से ही बात की जाती है। सुना है, भूत के पांव उल्टे होते हैं, जब कुछ लोग उल्टे पांव लौट आते हैं, तो शंका होती है, कहीं ये वो तो नहीं।

भूत के पाँव तो खैर इसलिए उल्टे होते हैं, कि जब उसे लात पड़े, तो भागने में सहूलियत हो। बेचारे भूत की इतनी फजीहत, कि पहले तो उससे लातों से बात करना, और जब वह उल्टे पांव भागने लगे तो उसकी लंगोटी पर भी नज़र रखना। भागते भूत की लंगोटी भली ! वाह रे इंसानियत।।

वैसे भूत अधिकतर किस्से कहानियों और फिल्मों में ही होते हैं, लेकिन क्या पता, कब, किस पर, किस बात का भूत सवार हो जाए। जब हम पर किसी बात का भूत सवार होता है तो फिर हमें भूत से डर नहीं लगता, लोग हमसे डरने लगते हैं। जब हम पर क्रिकेट का भूत सवार होता था तो मोहल्ले के मकानों की खिड़कियों के शीशे तड़ातड़ टूटने लगते थे। शीशे तो जुड़ गए, लेकिन क्रिकेट का भूत आज भी नहीं उतरा।

अंध विश्वास की भी हद होती है। लोगों को हवा में भूत नजर आता है। सुनसान हवेली की ओर जाने से मना किया था, लेकिन आज की पीढ़ी कभी किसी की सुनती है, अब आठ रोज से बुखार में पड़े हैं, कुछ भी बड़बड़ा रहे हैं, अजीबोगरीब हरकतें कर रहे हैं। ओझा को बुलाया है, अब तो वही भूत उतारेगा। भूत उतरे, ना उतरे, अच्छी लू उतरने वाली है, जब झाड़ुओं से पूजा होगी। भूत भागता नजर आएगा।।

मैं किसी भी तरह की हिंसा के खिलाफ़ हूं। इंसान हो या भूत ! पहले लातों से नहीं, बातों से ही मामला सुलझाना चाहिए। लेकिन इसमें एक समस्या और आ खड़ी होती है। किसी पर अगर बातों का ही भूत सवार हो, तो क्या करना चाहिए। आप समझ रहे हैं न बात को।

कुछ लोगों पर बातों का भूत सवार होता है। बातें ही बातें। जैसे बरसात में किसी छाते की दुकान में छाते ही छाते ! इतनी बातें, इतनी बातें, कि बस बातें ही बातें। पहले बातों के लिए मुलाकातें जरूरी होती थी। लोग किसी बातूनी इंसान को देखते ही, पतली गली से निकल लेते थे, अभी मिलेगा तो चाट जाएगा। इंसान भूत से नहीं, ऐसे बातूनी इंसान से अधिक डरता था।।

आज भी डर लगता है, क्या भरोसा कब, किस पर, बातों का भूत सवार हो जाए। मैने लोगों को आधे आधे घंटे वॉक एंड टॉक शो में मशगूल देखा है। अनलिमिटेड डाटा और अनलिमिटेड बांतां। बस कान में स्पीकर लगे हैं और अपना स्पीकर, यानी मुंह भी चालू है। ऐसे चलते फिरते बातूनी भूत मॉर्निंग वॉक और इवनिंग वॉक में बहुतायत से देखे जा सकते हैं।

कौन अधिक बात करता है और कौन कम, यह नहीं जानते हम, लेकिन हर व्यक्ति के जीवन में ऐसा समय जरूर आता है, जब उस पर बातों का भूत सवार होता है। कहीं कहीं तो भोजन की तरह बातें भी हजम नहीं होती। बातें ही उनका हाजमोला होती हैं। पेट में गुड़गुड़ होने लगती है। ठीक से किसी से बात हो जाए, तो सब ठीक हो जाता है।।

जिस तरह लातों के भूत बातों से नहीं मानते, बातों के भूत का इलाज भी लातों से संभव है, यह हम नहीं मानते। यह छोटी सी बात नहीं, गंभीर बात है। कुछ लोग बड़ी प्यारी बातें करते हैं, लगता है, जैसे मुंह से फूल झर रहे हों। बच्चों की बातें कितनी प्यारी लगती हैं।

बातों का एक दर्दनाक पहलू भी है ! किसमें कितना दर्द भरा है, कौन जाने। दो घड़ी अगर बात करने से हल्कापन महसूस होता है तो क्या बुरा है। आधी मानसिक बीमारियां मन ही मन घुटते रहने से होती है;

मेरी बात रही मेरे मन में

कुछ कह ना सकी उलझन में;

से तो अच्छा है;

आपके पहलू में आकर रो दिए।

दास्ताने गम सुना कर रो दिए।।

बातों बातों में कभी कभी ऐसा भी हो जाता है;

जो हमने दास्तां अपनी सुनाई

आप क्यूं रोए !

किसी के दुख दर्द को कम करना, अथवा दूर करना ही तो वास्तव में भूत उतारना है ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

सूचना/Information ☆ संपादकीय निवेदन ☆ प्रकाशन संबंधी महत्वपूर्ण सूचना 📖 ☆ सम्पादक मंडल ई-अभिव्यक्ति ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

📖 प्रकाशन संबंधी महत्वपूर्ण सूचना !! 📖

कुछ अपरिहार्य कारणों से शुक्रवार दि. ४/९/२६ से  दि. ७/९/२६ (४ दिवस) तक ई-अभिव्यक्ति का प्रकाशन बंद रहेगा। 

आप सभी का इसी प्रकार स्नेह, प्रतिसाद और सहयोग अपेक्षित है।

 

– संपादक मंडल 

ई-अभिव्यक्ति 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

सूचना/Information ☆ संपादकीय निवेदन ☆ दि. ४/९/२६ ते दि. ७/९/२६ — अंक बंद असल्याबद्दल महत्वाची सूचना!!!! 📖 ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

💐 संपादकीय निवेदन 💐

📖 दि. ४/९/२६ ते दि. ७/९/२६ — अंक बंद असल्याबद्दल महत्वाची सूचना!! 📖

कृपया सर्वांनी नोंद घ्यावी – – 

काही अपरिहार्य कारणामुळे शुक्रवार दि. ४/९/२६ ते सोमवार दि. ७/९/२६ असे ४ दिवस दैनिक अंक प्रकाशित केला जाणार नाही. मंगळवार दि. ८/९/२६ पासून अंक नेहेमीप्रमाणे प्रकाशित केला जाईल. 

सर्वांचे सहकार्य अपेक्षित आहे. 

ई-अभिव्यक्ती, मराठी विभाग.– संपादक मंडळ

ई – अभिव्यक्ती, मराठी विभाग

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ कनकभरली फुले… ☆ रेणुका धनंजय मार्डीकर ☆

रेणुका धनंजय मार्डीकर

? कवितेचा उत्सव ? 

☆ कनकभरली फुले… ☆ सौ.रेणुका धनंजय मार्डीकर ☆

(वर्णसंख्या 16 यती 8 व्या अक्षरावर)

उंच उंच डोंगरात झाडेवेली घनदाट

किती साजरी साजरी धुकं भरली पहाट ||ध्रु||

रिमझिम रिमझिम श्रावणाच्या येती सरी

घाटाघाटातली झाडी वेली त्यात रंग भरी

कनकभरली फुले सोनमोहोराचा थाट

किती साजरी साजरी धुकं भरली पहाट ||1||

 *

हिरव्यात डोकावती पहा देखणी पिवळी

पर्ण पाचूवर आली कळी कोवळी कोवळी

मधू प्राशनास धावे फुलपाखरु सुसाट

किती सारी साजरी धुकं भरली पहाट ||2||

 *

वाटा वळणे वळणे झरे पाण्याचे खेळणे

ताम्रफुले पहुडली त्यांचे मातीशी लोळणे

पायघड्या देखण्याश्या वारा घालतो मोकाट

किती साजरी साजरी धुकं भरली पहाट ||3||

 *

माकडांचे लोट आले इकडे तिकडे पळे

ताम्रशेंगा पितवृष्टी खळखळून ओघळे

माझ्या कवन शेल्याला पितंबरी ताम्र काठ

किती साजरी साजरी धुकं भरली पहाट ||4||

 *

कुठे बेफाटला वारा कुठे पाऊस सरारा

ताम्रवृक्ष उंच उंच फुले घागरा गरारा

ओंजळीत सोनफुले शब्दांची वाहती लाट

किती साजरी साजरी धुकं भरली पहाट ||5||

 

© सौ.रेणुका धनंजय मार्डीकर

औसा.

मोबा. नं.  ८८५५९१७९१८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

Please share your Post !

Shares