हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३४१ ☆ ज़बर्दस्ती नहीं ज़बर्दस्त… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ज़बर्दस्ती नहीं ज़बर्दस्त। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मैं तो गुरुवर के गुण गाऊं / स्वर- वंदना शर्मा, सौजन्य – रुखसार चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३४१ ☆

☆ ज़बर्दस्ती नहीं ज़बर्दस्त… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

जीवन एक यात्रा है, इसे ज़बर्दस्ती नहीं ज़बर्दस्त तरीके से तय करें। जीवन अनमोल है, जो मानव को चौरासी लाख योनियों के पश्चात् प्राप्त होता है। यह प्रभु की नियामत है; इसका सम्मान करें तथा जो परमात्मा ने आपको दिया है, उसमें संतोष रखें व प्रसन्न रहें। संतोष जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है और आशाओं का दामन बहुत विस्तृत है; जिनका पेट कभी नहीं भरता है। सो! मानव को इनके हाथों का खिलौना नहीं बनना चाहिए। सो! सार्थक जीवन जीने के लिए हमें अपनी इच्छाओं पर अंकुश लगाना आवश्यक है। मन चंचल है। यह पल-भर में तीन लोकों की यात्रा कर लौट आता है और हमें आजीवन उलझाए रखता है। अक्सर इंसान अपने दु:ख से दु:खी नहीं होता; दूसरों के सुखों को देखकर हैरान-परेशान रहता है। इसलिए ऐसे इंसान का दु:ख असीम होता है, जो कभी समाप्त नहीं हो सकता। जब तक हमारे अंतर्मन में संतोष नहीं होगा; हमारी भटकन का अंत नहीं होगा और हम उस चक्रव्यूह से बाहर नहीं आ पाएंगे।

जीवन सुख-दु:ख का मेला है/ जिसमें हर इंसान अकेला है। सुख-दु:ख मेहमान हैं; आते-जाते रहते हैं। सुख में वे हमारे जीवन का हिस्सा होते हैं, परंतु वे मेहमान की भांति थोड़ा समय विश्राम कर अपनी डगर पर चल पड़ते हैं। सुख में फूलना व दु:ख में अपना आपा खो बैठना हमारी उन्नति में बाधक है। इसलिए हमें हर स्थिति में सम रहना चाहिए। संसार मिथ्या है और मानव जीवन नश्वर। यहां स्थायी कुछ भी नहीं। समय परिवर्तनशील है। मौसम बदलते रहते हैं और इनके अनुसार मन:स्थिति में भी परिवर्तन होता रहता है। सामाजिक प्राणी होने के नाते मानव के लिए एक जैसी स्थिति व एकांत में रहना सज़ा बन जाता है। इसलिए वह अनेक लोगों से संबंध स्थापित करता है। वैसे ईश्वर भी हमारे लिए माता-पिता, परिजन व दोस्तों के रूप में चंद लोगों को भेजता है; जिनसे चाहे-अनचाहे निबाह करना मानव की विवशता होती है। परंतु आजकल कोई भी रिश्ता विश्वास क़ाबिल नहीं रहा। सब संबंध स्वार्थ पर आधारित हैं और रिश्तों पर तो ग्रहण लग गया है, यहां तक कि खून के रिश्तों की गरिमा भी नहीं रही। अपने, अपने बनकर अपनों को छल रहे हैं। माता-पिता, गुरुजन व दोस्त आदि सब शतरंज की बिसात बिछाए बैठे रहते हैं। उनके लिए दो महीने की बालिका और नब्बे वर्ष की वृद्धा में कोई अंतर नहीं है। वे पल-भर की वासना-तृप्ति के लिए सब सीमाओं को लांघ जाते हैं और मासूमों की अस्मिता से खिलवाड़ करना सामान्य-सी बात हो गई है। आजकल तो दुष्कर्म करने के पश्चात् सबूत मिटाने का प्रचलन चल निकला है। ऐसी स्थिति में मानव मन मसोस कर रह जाता है, क्योंकि वह उन दुष्टों का सामना करने में स्वयं को असमर्थ पाता है।

जिस घाव से खून नहीं निकलता, समझ लेना कि वे किसी अपने के दिए गये ज़ख्म हैं; जो आजीवन रिसते हैं, लाइलाज होते हैं और इंसान उनके व्यूह से आजीवन मुक्त नहीं हो पाता। ‘पहाड़ियों की तरह ख़ामोश हैं/ आज के संबंध व रिश्ते/ जब तक हम न पुकारें/ आवाज़ ही नहीं आती।’ आजकल संबंध-सरोकारों की अहमियत रही नहीं। हर रिश्ता ख़ामोश व बेमानी है और मानव आत्मकेंद्रित होकर रह गया है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद हैं और चहुंओर विचित्र-सा सन्नाटा पसरा रहता है। वास्तव में अतिव्यस्तता के कारण पति-पत्नी एक-दूसरे को कोंचते व कचोटते रहते हैं। आरोप-प्रत्यारोपण उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाते हैं। धीरे-धीरे उनमें संवादहीनता की स्थिति पनप जाती है, जो सभी रोगों की जड़ है। अजनबीपन का एहसास उन्हें जीने नहीं देता और वे अलगाव की स्थिति में पहुंच जाते हैं। बच्चे व वृद्ध एकांत की त्रासदी झेलने को विवश होते हैं। अक्सर बच्चे नशे की गिरफ़्त में आ जाते हैं और जब तक मानव इस तथ्य से अवगत होता है; बहुत देर हो चुकी होती है और उनके पास प्रायश्चित करने के अतिरिक्त अन्य विकल्प नहीं शेष नहीं बचता।

अहंकार दिखाकर रिश्ते तोड़ने से अच्छा है; क्षमा मांगकर रिश्तों को बचा लेना। अहं रिश्तों में अविश्वास ही नहीं, खटास उत्पन्न करता है। उस स्थिति में अहंकार के कारण परिवार टूटने के कग़ार पर आ जाता है, यहां तक कि सल्तनतें भी बदल जाती हैं। वास्तव में जो अपनों के बिना बीती ‘उम्र’/ जो अपनों के संग बीती ‘ज़िंदगी’। सो! अपनों के अंग-संग रहिए, क्योंकि अपने ही अपनों को उन्नति करते देखकर प्रसन्न ही नहीं होते; उत्साह-वर्द्धन भी करते हैं। जो ऐसा नहीं करते; वे आजीवन दु:खों के भंवर से मुक्त नहीं हो सकते। जीवन में दो प्रकार के लोग ही असफल होते हैं–’जो सोचते हैं और करते नहीं और जो करते हैं सोचते नहीं।’ यह दोनों स्थितियां भयावह हैं। सो! केवल हवाई महल बना लेना कारग़र नहीं, क्योंकि मात्र योजनाएं बनाने वाले लोग बीच अधर लटके रहते हैं। दूसरे लोग उसे अंजाम देने से पहले परिणाम के बारे में सोचते नहीं।  इसलिए उनका जीवन कठिनाइयों से भरा रहता है। वे परिवार व समाज के दुश्मन कहलाते हैं। वे अपने साथ, अपने परिवारजनों को भी भंवर अथवा मुश्किल में फंसा देते हैं; जिससे उबर पाना उनके वश में नहीं होता।

जो लोग असफल होने के बाद भी उत्साह व साहस नहीं खोते; जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं। असफलता अथवा अनुभव हमारे पथ में बाधक नहीं; मील का पत्थर साबित होते हैं। एडिसन को बल्ब का आविष्कार करते समय अनेक बार असफलता का मुंह देखना पड़ा और उसके दोस्तों ने उसे वह कार्य छोड़ देने की सलाह भी दी। परंतु उसने उत्तर दिया कि अब मुझे उस दिशा विशेष में काम नहीं करना पड़ेगा। इसलिए यह असफलता मेरे लिए मार्गदर्शक है। सो! अंत में उन्हें सफलता प्राप्त हुई।

संदेह मुसीबत के पहाड़ों का निर्माण करता है और विश्वास पहाड़ों से भी रास्तों का निर्माण कर लेता है। जीवन में संदेह, शक़ व संशय को जीवन में कभी दस्तक ना देने दें, क्योंकि वह फ़ासलों को इतना बढ़ा देता है कि उन्हें पाटना असंभव हो जाता है। परंतु यदि आत्मविश्वास सुदृढ़ है, तो वह पर्वतों के बीच रास्तों का निर्माण कर सकता है। दाना मांझी का उदाहरण हम सबके समक्ष है, जिसने बारह किलोमीटर की यात्रा अपनी पत्नी के शव को कांधे पर लादकर की और तत्पश्चात् अकेले उस रास्ते पर सड़क का निर्माण किया, क्योंकि उसका निश्चय दृढ़ था। वह नहीं चाहता था कि सड़क के अभाव में किसी को अपनों के प्राण गंवाने पड़ें।

‘तलाश ना कर मुझे/ ज़मीन और आसमान की ग़र्दिशों में/ अगर तेरे दिल में नहीं/ तो कहीं भी नहीं’ अर्थात् परमात्मा मानव के मन में निवास करता है। उसे बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं। शुभकामनाएं तभी फलीभूत होती हैं, जब वे तह़ेदिल से निकलें। आपका स्वभाव ही आपका भविष्य है। ‘जाने वो कैसे मुक़द्दर की किताब लिख देता है/ सांसं गिनती की और ख़्वाहिशें बेहिसाब लिख देता है।’ इसलिए मानव को शब्दों को चखकर अथवा प्रेम से बोलना चाहिए, ताकि लोग आपसे बात करना पसंद करें। जिसने दूसरों की ख़ुशी में ख़ुद की ख़ुशी ढूंढने का हुनर सीख लिया है; वह इंसान कभी दु:खी नहीं हो सकता। रिश्ते बरक़रार रखने के लिए कमियां नहीं, अच्छाइयां देखें। अब्दुल कलाम के शब्दों में आप अपना भविष्य नहीं, आदतें बदल सकते हैं;  जिनके बदलने से आपका भविष्य बदल सकता है। कटु यथार्थ को बदलने में सकारात्मकता है और झूठी आशाओं के भ्रम में जीने में नकारात्मकता निहित है। इसलिए जीवन में कभी निराश ना हों। यह भी गुज़र जाएगा– आश्वस्त रहें, क्योंकि समय निरंतर परिवर्तनशील है; कभी ठहरता नहीं। इसलिए जीवन को ज़बर्दस्ती नहीं, ज़बर्दस्त तरीके से जीएं। निरंतर संघर्ष करें तथा निराशा का दामन कभी मत थामें। सफलता आपके कदम चूमेंगी। परेशानी व अनुभव से जो सीख मिलती है; वह किसी स्कूल में नहीं मिल सकती। जीवन में सबसे बड़ा थप्पड़ भरोसा मारता है। इसलिए भरोसा व उम्मीद ख़ुद से रखें। ख़ुद से जीतने की ज़िद्द करें; यही जीवन जीने की सर्वोत्तम कला व सर्वश्रेष्ठ अंदाज़ है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ११४ – गीत – सृष्टि का आधार नारी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम गीत – सृष्टि का आधार नारी…।

? रचना संसार # ११४ ?

☆ गीत – सृष्टि का आधार नारी…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ☆

☆

नारी की पूजा करिए सब,

वह परमेश्वर का वरदान।

तन -मन करती सदा समर्पित,

जननी प्रज्ञा  को दो मान।।

*

है आधार सृष्टि की नारी,

करो सदा उसका सत्कार।

दुर्गा काली है रणचंडी,

नारी देवी का  अवतार।।

रानी लक्ष्मीबाई साहस ,

पराक्रमी दुर्गा पहचान।

त्यागमूर्ति है वह करुणा की ,

बसती बच्चों में है जान।।

*

जगजननी माता है नारी,

पावन गंगा की है धार।

प्रेम त्याग की वह  है मूरत ,

जीवन का अनुपम शृंगार।।

नारी धरती का है गौरव,

देती सबको दुर्लभ ज्ञान।

शत- शत नमन करो नारी को,

नित करना उसका जयगान।।

*

लक्ष्मी देवी नारी घर की,

नहीं रही वह अबला आज।

पुरुषों से भी वह है बढ़कर ,

उससे उन्नत लोक समाज।।

जान देशरक्षा में देतीं ,

करती रहती हैं बलिदान।

राह दिखाती है विकास की,

सत्कर्मों की लौकिक खान।।

 *

चीर-हरण रोको नारी का,

करते क्यों हो अत्याचार।

नारी हिंसा उत्पीड़न का,

करो सजग मन से प्रतिकार।।

उठा शस्त्र दानव को मारो,

करना स्थापित नया विधान।

चक्र सुदर्शन कृष्ण चला अब,

करो सुरक्षा और निदान।।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – संभावना… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – संभावना… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

एक रोज़

आँखों को ढककर

कोहनियों से,

खुली आँखों से

मैं देखने लगा अंधेरा,

तब जाना-

अंधेरे में भी टिमटिमाते रहते हैं

जुगनू-से कुछ सितारे,

कहीं उठती दिखती है एक लौ,

लौ के आलोक में कालापन,

कभी फ़िरोज़ी, कभी हरा,

कभी नीला-सा हो जाता है, 

कभी सूर्योदय की रंगत,

कभी सूर्यास्त की संगत,

बदलते रंगों में

किसी न किसी रोशनदान से

भेदा जाता रहता है अंधेरा,

इतना स्याह नहीं होता समय

कि परिश्रम से मिला

निवाला हड़प पाए,

ध्यान रहे-

अंधेरा कभी इतना घुप्प नहीं होता

कि उजाले की संभावना को

निगल जाए..!

?

© संजय भारद्वाज   

1713 बजे, 3.10.2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ दि. 11 अक्टूबर 2026 से नवरात्रि साधना आरम्भ होगी। 🕉️

💥

इस साधना के लिए देवीमंत्र इस प्रकार होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

💥

💥 इसके साथ ही महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् का एक पाठ नियमित रूप से करने का प्रयास करें। तथापि जो लोग किन्हीं कारणों से महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् न कर पाएँ, वे कम से कम इसे सुनें अवश्य।

अपेक्षित है कि नवरात्रि साधना में साधक हर प्रकार के व्यसन से दूर रहे, शाकाहार एवं ब्रह्मचर्य का पालन करे।

सदा की भाँति आत्म-परिष्कार तथा मौन साधना तो साथ चलेंगी ही। 💥

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३४१ ☆ भजन – नवरात्रि ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भजन – नवरात्रि।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३४१ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भजन – नवरात्रि ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं,

खुशियों के दीप जले घर-घर, मैया के भक्त आए हैं।

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए है।

* 

ओढा दो माँ को तुम चुनरी, फूलों के हार चढ़ाए हैं,

बजे है ढोल-नगाड़े माँ, भक्तों ने भजन सुनाए हैं।

गूंजेगी जयजयकार तो, माँ के दर्शन पाए हैं,

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं।

 *

मैंने मनमंदिर में माँ को, लाखों दीप जलाए हैं,

जिसने भी माँ को है पुकारा, किरपा माँ की पाई है।

तेरे चरणों में माँ हमने, अपना शीश झुकाया है,

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं। 

 *

नहीं लौटे कोई खाली, भरी झोली बहुत सारी,

तुझे देखूं लगे प्यारी, चुनरी मैया की लगे न्यारी ।

तेरी ज्योत जगाने हम, दौड़े तेरे दर पर आए हैं,

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं।

 *

भरो झोली आशीषों की करूँ तुझसे  मै अरदास,

तेरे चरणों में जीना है, बस इतनी-सी है आस।

लगाते तेरा जयकारा, गूँजे है सारी  दिशाएँ हैं,

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३२२ ☆ नवरात्रि विशेष ☆ नवरात्रि पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी समसामयिक विषय पर एक कविता  – नवरात्रि पर दोहे… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३२२ ☆

☆ नवरात्रि विशेष ☆ नवरात्रि पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

शैलपुत्री माँ प्रथम दिन, पूजा करिए आप

गौ घृत खीर चढ़ाइए, मिटें शोक संताप

*

दिवस दूसरा पूजिये, ब्रम्हचारिणी मात

मिश्री चीनी भोग का, दें माँ को सौगात

*

चन्द्रघंटा माँ नमन है, पूजिये दिवस तृतीय

दूध-मलाई चढ़ा कर, बोलें जय रमणीय

*

चतुर्थ दिवस कुष्मांडा, जपिये माँ का नाम

मालपुये का भोग लगे, हरतीं रोग तमाम

*

आरती माँ स्कन्द की, हरे विषम आघात

केला भोग लगाइए, पंचम दिवस सुहात

*

छठवें दिन कात्यायनी, ममता का हैं रूप

करें ग्रहण माता शहद, धरें दीप अरु धूप

*

कालरात्रि माँ सप्तमी, करतीं मोक्ष प्रदान

गुड़ मेवे का भोग पा, करें सदा कल्यान

*

महागौरी माँ नमस्तु, चढ़े नारियल पान

भोजन कन्या अष्टमी, खूब कीजिये दान

*

सिद्धिदात्री नवम दिवस, चढता तिल अरु अन्न

दया करो माँ सभी पर, होवें सभी प्रसन्न

*

नवरात्रि के व्रत रखें, मिले सुखद संतोष

पहुँचे जो माँ की शरण, उसके हरतीं दोष

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

☆ नवरात्रि विशेष ☆ नवरात्रि पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४९ – लोहे का पुराना पिंजरा – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – लोहे का पुराना पिंजरा।)  

☆  चुभते तीर # १४९ – व्यंग्य  – लोहे का पुराना पिंजरा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे से सटे राष्ट्रीय वन्यजीव अभयारण्य के मुख्य वन जांच नाके की कंटीली बाड़ के सहारे लोहे की सींकों वाला एक पुराना और जंग लगा पिंजरा पिछले बीस सालों से एक भारी खूंटे पर टँगा हुआ था जिसका छोटा सा दरवाजा हमेशा खुला रहता था। उस पिंजरे की पपड़ीदार जर्जर सींकों पर कभी वन्यजीवों के बचाव का प्रतीक बना हुआ था जो अब धूल और बारिश की मार से स्याह हो चुका था। उस नाके के ठीक नीचे पत्थर के टूटे चबूतरे पर हर सुबह सात बजते ही धरमपाल काका अपनी शीशम की पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का फटा कुर्ता और कंधे पर मैला अंगोछा डाले धरमपाल काका दिन भर उस खुले हुए लोहे के पिंजरे को अपनी पथराई आँखों से एकटक निहारते रहते थे। अभयारण्य के प्रवेश द्वार पर सुबह से ही सफारी जिप्सियों, वातानुकूलित कारों और वन विभाग के बड़े-बड़े अधिकारियों की गाड़ियों का तांता लगा हुआ था। मंच से मूक वन्यजीवों के प्रति करुणा और वन रक्षा पर लंबे-चौड़े भाषण लाउडस्पीकरों पर गूँज रहे थे। उन नए वन्यजीव विशेषज्ञों और सूट-बूट पहने अफसरों को बाड़ के कोने में लटके उस पुराने कबाड़ पिंजरे से कोई सरोकार नहीं था। नाके का पुराना वन रक्षक मंगलू जब भी हाथ में चाय की केतली लिए उधर से निकलता तो काका की उस शांत और निश्चल मूरत को देखकर सिहर उठता था। काका बहुत ही कांपती और धीमी आवाज में उससे पूछते “क्यों रे मंगलू आज वन्यजीव सप्ताह के इस मेले में इस पिंजरे के खुले दरवाजे से किसी बेजुबान का दर्द समझने का कोई आदेश आया क्या या आज भी सिर्फ मंच पर भाषणों की घास ही चरवाई जा रही है?” मंगलू बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

अभयारण्य में हाल ही में राजधानी के केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से नए क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक बनकर आए साहब अनिमेष अग्निहोत्री बहुत ही कड़क, आधुनिक वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट के विशेषज्ञ और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए डिजिटल निगरानी केंद्र का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे धरमपाल काका पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस बाड़ पर लटके पुराने पिंजरे पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को वन्यजीव सप्ताह के इतने बड़े भव्य सरकारी जलसे और जीपीएस ट्रैकिंग के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक पुराने कबाड़ पिंजरे के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और नाके के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय मुख्य उद्घाटन सत्र समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में वातानुकूलित कमरे में काजू बादाम का नाश्ता करने चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे धरमपाल काका के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य नाके का रास्ता क्यों रोकते हैं, अगर आपको कोई वन आश्रित पेंशन या लकड़ी बीनने का परमिट चाहिए तो भीतर दफ्तर में जाकर क्लर्क से मिलिए, इस तरह बाहर बैठकर बाड़ पर टँगे एक पुराने बेकार पिंजरे को घूरने से इस जंगल के जानवरों की सुरक्षा नहीं होने वाली है।” धरमपाल काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “संरक्षक साहब मैं किसी पेंशन या मुफ़्त की लकड़ी की भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस पिंजरे में वह खोया हुआ विश्वास वापस लौटेगा जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीना गया था।”

अनिमेष साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोए हुए विश्वास की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस वन्यजीव सप्ताह पर करोड़ों का बजट जारी करके बेजुबानों के लिए नए प्राकृतिक गलियारे बना रही है, फिर आपकी इस पुरानी लोहे की जाली का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त वनपाल पंडित सोमेश्वर जी जो पिछले चालीस सालों से उस जंगल के हर पेड़ और हर शिकारी के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “संरक्षक साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस पूरे वन क्षेत्र में शिकारियों और तस्करों ने बेजुबान वन्यजीवों का संहार करना शुरू किया था तब काका के इकलौते बेटे समरेश ने इसी चौपाल पर खड़े होकर मूक जीवों के प्राणों की सबसे बड़ी मशाल जलाई थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “समरेश ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस पुराने पिंजरे से जुड़ा हुआ है?” पंडित सोमेश्वर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब समरेश उस समय पूरे प्रदेश का सबसे मेधावी और स्वाभिमानी युवा प्राणी विज्ञानी था, जब शहर के बड़े तस्कर तेंदुओं और हिरणों की खालें नोचते थे तब समरेश ने जंगलों में रात-रात भर भटक कर घायल जानवरों को इसी पिंजरे में रखकर उनका इलाज किया था, उसने इस पिंजरे का दरवाजा हमेशा खुला रखकर कसम खाई थी कि जब तक इस जंगल के अंतिम जानवर को स्वतंत्र सांस लेने की गारंटी नहीं मिल जाएगी तब तक वह किसी बड़ी विदेशी सफारी लॉबी के आगे घुटने नहीं टेकेगा।”

धरमपाल काका ने सोमेश्वर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस पिंजरे की जंग लगी सींक को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे समरेश ने उस दिन इस चबूतरे पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह पिंजरा केवल लोहे का ढांचा नहीं बल्कि कैद से आजादी की हिफाजत करने वाली चौखट है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड का सबसे बड़ा अभयारण्य सुरक्षा आदेश लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस पिंजरे को संग्रहालय में रखवाएगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े पर्यावरण मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी वन रक्षा प्रोजेक्ट फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब समरेश ने अंतरराष्ट्रीय तस्करों के सिंडिकेट की पोल खोली थी तो विदेशी निजी जू और लक्जरी सफारी रिसॉर्ट्स की लॉबी ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए समरेश को अपनी अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव पर्यटन कंपनी का मुख्य प्रबंध निदेशक और पच्चीस प्रतिशत की गुप्त हिस्सेदारी देकर खरीद लिया था। समरेश ने अपने सारे आदर्शों और उस पिंजरे का वास्ता ताक पर रखकर उन गोपनीय परमिटों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा अरबपति वाइल्डलाइफ रिजॉर्ट टाइकून बन गया जो आज उसी जंगल के जानवरों को विदेशी रईसों के मनोरंजन के लिए निजी बाड़ों में कैद करने का सबसे बड़ा सौदागर था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से काका से कहा कि समरेश तो खुद बेजुबानों का सबसे बड़ा व्यापारी बन चुका है, तो काका ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर वन्यजीव सप्ताह में बेजुबान जानवरों से प्यार का पाखंड करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही वनवासी बाप के खुले पिंजरे का सौदा करके जंगल के राजा को सर्कस का खिलौना बना देते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई संवेदना से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस खाली पिंजरे को ताकते रह गए और पूरा वन नाका उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १११८ ⇒ मीठे की हद-शहद ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मीठे की हद-शहद…“।)

?अभी अभी # १११८ ⇒ आलेख – मीठे की हद-शहद ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

निदा फ़ाज़ली इस दुनिया को जादू का खिलौना कहते हैं। कोई कहता है, दुनिया है सराय, रहने को हम आए तो उधर शैलेंद्र शिकायत करते हैं, दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई ! जगत कहें अथवा कुदरत, लेकिन इसे इंसान ने तो नहीं बनाया।

किसान खेत में गन्ना उगाता है, हम घर में बैठे बैठे शर्बत बनाते हैं। शर्बत में चीनी होती है, हम कम ज्यादा कर सकते हैं। किसान गन्ना उगा सकता है, शकर नहीं। वह खेत की मिट्टी में सिर्फ खाद पानी डालता है, कोई शर्बत नहीं, फिर भी गन्ना मीठा पैदा होता है। यह कुदरत का करिश्मा भी किसी जादू से कम नहीं। लेकिन इंसान कर्ता बन इसका भी श्रेय ले लेता है।।

कुदरत में केवल मिठास ही नहीं, सभी रंग भी व्याप्त हैं और खुशबू भी। सागर में मोती भी है और पृथ्वी के गर्भ में खनिज का भंडार भी। पांच तत्वों से बना यह शरीर भी कुदरत की ही देन है और अंत में इसे भी मिट्टी में ही मिल जाना है। किसी के लिए यह मनुष्य जीवन माया है, मिट्टी की काया है, तो किसी के लिए सोने से भी अधिक अनमोल, ईश्वर की दया माया है, उसी की छत्र छाया है ;

माटी के पुतले,

इतना न तू कर गुमान।

पल भर का तू मेहमान ;

यह बुद्धिमान मनुष्य प्रकृति का दोहन कर कभी यहां का राजा बन बैठता है तो कभी मालिक। ईश्वर की तरह उसकी भी सत्ता है, उसके भी नौकर चाकर दास और गुलाम हैं। उसका बस चले, तो स्वर्ग धरती पर ही उतार ले। वैसे भी जननी जन्मभूमि को स्वर्ग से भी अधिक महान ही माना गया है और देवता भी इस धरती पर जन्म लेने के लिए कतारबद्ध बैठे रहते हैं।

देव भी यहीं दानव भी यहीं, यहीं कोई मानव तो कोई महामानव।

मनुष्य के अलावा अन्य सभी प्राणी यहां अकर्त्ता बनकर कर्म करते हैं।

हमारी मां सिर्फ इंसान के बच्चे को दूध पिलाती है, लेकिन हम तो गाय, भैंस और बकरी का भी दूध पी जाते हैं। दूध, मलाई, मक्खन और मावा भी पका पकाया।

कपास के पौधे से रुई और जंगल की लकड़ी से हमने कपड़ा और मकान बना लिए और खेत में अनाज बो, अपनी रोटी का प्रबंध भी कर लिया। हमारे आलीशान महल और बंगले, सोना, चांदी और हीरे जवाहरात भी हमें इस पृथ्वी की गोद से ही मिले हैं, हम कोई दहेज में नहीं लाए। हां लेकिन इतना दिमाग पृथ्वी के अन्य प्राणियों के पास कहां।।

जीव: जीवस्य भोजनम् से ही प्रकृति का संतुलन है।

क्या आपको नहीं लगता ईश्वर ने मुर्गी का अंडा और जल बिन मछली सिर्फ इस इंसान के लिए ही बनाई है। जंगल में तो खैर जंगल राज है लेकिन हम तो जंगल भी बर्बाद करने पर तुले हैं। आज हर पहाड़ की चोटी और सभ्यता की चोटी पर भी यह मानव ही विराजमान है। चंद्रमा के बाद बस अब शीघ्र ही मंगल पर भी प्रवेश है।

नदियां न पीयें कभी अपना जल, वृक्ष ना खाए कभी अपना फल। एक मधुमक्खी बड़े जतन से फूलों से गंध और पराग चुराती है और अपने छत्तों में शहद बनाती है। चतुर मनुष्य मधुमक्खी को भी पाल लेता है, शहद शहद चाट लेता है। मीठे की हद है शहद। क्या आपने कभी शहद में शकर घोली है ?

रेशम का कीड़ा हमारे लिए रेशम तैयार करता है। कीड़े मकोड़े इतना काम करते हैं, फिर भी कहलाते हैं मक्खी और कीड़े मकोड़े ही। अजब तेरी कारीगरी रे करतार।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गीत – आओ! मातारानी के द्वार चलें ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ गीत ☆

☆ आओ! मातारानी के द्वार चलें ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

☆

न और उदास हों, न अब और स्वयं को खलें।

मिलेगा सुफल, आओ! मातारानी के द्वार चलें।।

*

अंधकार में और न भटकें, पावन पथ पर कदम बढ़ाएँ।

कंटक राहों के मत देखें, पुष्पों से  उपवन महकाएँ।

अब तो रीति-नीति के नग़मे, अपने अधर सजाएँ।

मानवता के काम करें हम, इस जग को महकाएँ।।

न व्यर्थ कुछ सोचें, न ही व्यर्थ निज हाथ मलें।

मिलेगा सुफल, आओ! मातारानी के द्वार चलें।।

*

सब विकार भीतर के मारें, कर लें रोशन राहें।

सच्चाई को आज साध लें, भरें न यूँ ही बाहें।।

जन्म जो पाया मानव का तो, कुछ मानव-सा हो।

पाना है कुछ तुझको तो तू, अच्छा ही अब बो।।

क्यों नहीं अब नवल चेतना के भाव हृदय पलें।

मिलेगा सुफल, आओ! मातारानी के द्वार चलें।।

*

आशाओं के सावन में अब, पावनता बरसाएँ।

मातारानी की करुणा से, जीवन-सुमन खिलाएँ।।

हम बदलेंगे जग बदलेगा, होगा कुछ चोखा।

धर्म-कर्म में रखें श्रेष्ठता, नहीं रचें धोखा।।

तज दें सब बैर, न ही किंचित डाह में और जलें।

मिलेगा सुफल, आओ! मातारानी के द्वार चलें।।

 ☆

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

आज़ाद वार्ड-चौक, मंडला, मप्र, मो. 9425484382 ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # २८ ☆ आलेख – परशुराम जी – ४ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘परशुराम जी – ३‘।)

☆ मंजिरी साहित्य # २८ ☆

? आलेख – परशुराम जी – ४ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

सनातन का अध्यात्म: सनातन का अध्यात्म हमें स्व से मिलाने की यात्रा हैl आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने की यात्रा हैl उस सत्य से, उस परब्रम्ह से मिलने की यात्रा हैl हमें हमारे वास्तविक स्वरूप से मिलने की यात्रा हैl सनातन हमें इस यात्रा में आगे बढ़ने हेतु हमारी मदद करता हैl सनातन सदा भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल इन तीनों में अपरिवर्तत होता हैl मनसा, वाचा और कर्मणा से किसी को भी हानि नहीं पहुंचानी चाहिए ये सीख देता हैl सनातन सदैव सत्य बोलने की प्रेरणा देता हैl सनातन, सनक, सनंदन और सनत कुमार नाम के ब्रम्हाजी के चार मानस पुत्र थेl इनमे से सनत और सनातन दोनों का अर्थ हमेशा रहने वाला, चिरकाल तक रहने वाला होता हैl

सनातन हमें आत्मज्ञान, कर्म और पुनर्जन्म, साधना के मार्ग, आंतरिक शांति, प्रकृति से जुड़ाव के साथ जीवन का सच्चा अर्थ क्या है ये समझाता हैl

1- सनातन का आत्मज्ञान : सनातन का आत्मज्ञान समझाता है कि मैं कौन हूँl यह शरीर नश्वर है परन्तु आत्मा अनश्वर हैl मैं यह शरीर नहीं हूँl मैं चैतन्य हूँ जो हमेशा प्रकाशवान चेतना है जो सदैव सुखी रहती हैl

यही कारण है कि हमारे उपनिषदों में बताया गया है कि मैं ही ब्रम्ह हूँl जो वो है मैं भी वही हूँl मैं ही परम सत्य हूँl मैं ही चेतना से परिपूर्ण हूँl मैं सदा ही निरलिप्त हूँl

2- कर्म और पुनर्जन्म : सनातन के अनुसार आत्मा अनश्वर है और यह शरीर नश्वरl हमारे कर्म चाहे वे अच्छे हों या बुरे उसका फल आत्मा अपने अंदर एकत्रित करती रहती है, जिसे हम भाग्य कहते हैंl आज हम जो भी कर्म करते हैं वह हमारे अगले जन्म का प्रारबद्ध तय करता हैl जब हमारी आत्मा इस शरीर को छोड़ नए शरीर में प्रवेश करती है तब आदमी का पुनर्जन्म होता हैl जब वह इस संसार की मोहमाया में लिप्त रहता है तब उसकी अधूरी इच्छाओं को पूरा करने उसे पुनः जन्म लेना होता हैl उसे कर्म करके उनके परिणामों को भुगतने पुनः पुनः जन्म लेना पड़ता हैl और यह चक्र चलता ही रहता हैl इस चक्र से बाहर निकलने सनातन हमें सिखाता है कि कर्म करते रहो और उसके परिणामों को ईश्वर पर छोड़ दो ताकि उसका फल आत्मा अपने अंदर एकत्रित ना कर सकेl इसके साथ सदा इस बात का एहसास दिलाना है कि मैं आत्मा हूँ मैं यह शरीर नहींl ये महसूस होते ही पुराने कर्म कटने लगते हैं और हम मोक्ष की तरफ बढ़ने लगते हैंl

3- साधना के मार्ग : इसे हम चतुर्विध योग भी कहते हैंl

क) – ज्ञान योग – ज्ञान योग में हमें समझाया जाता हैं कि सत्य क्या है और असत्य क्या है? ये हमें शास्त्रों को सुनकर, सुनी बातों पर मनन कर और निरंतन अभ्यास से हमारी प्रेक्टिस में आ जाता हैl

ख) – भक्ति योग – उस परम सत्ता को पूर्णतः स्वयं को समर्पित कर देनाl इसमें नव विधा भक्ति आती हैl

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

श्रवण, कीर्तन, नामस्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य एवं आत्मनिवेदनl

श्रवण : भगवान के गुणगान, उनकी कथाए एवं उनकी लीलाओं का श्रद्धा पूर्वक श्रवण करनाl श्रवण भक्ति हमारे मन को शांति प्रदान करती हैl हमारे विचार सकारात्मक हो जाते हैंl हमारे जीवन के बुरे दिनो में हमारी सहन शीलता बढ़ जाती हैl

कीर्तन : भगवान के गुणगान, उनकी कथाए एवं उनकी लीलाओं को श्रद्धा पूर्वक गायन करनाl कीर्तनकार जब कीर्तन करते हैं तब सुनने वाले वही नाम को दोहराना शुरू करते हैंl साथ में ढ़ोल, मंजीरे, मृदंग, झाँझ, हारमोनियम और तालियों की गूंज के साथ अगरबत्ती, धूप, फूलों की खुशबू वातावरण में सामूहिक ऊर्जा उत्पन्न करती है जो सम्पूर्ण माहौल को धार्मिक और भक्तिमय बना देता हैl

नामस्मरण : ये सबसे सरल भक्ति का प्रकार हैl भगवान के नाम का सतत स्मरण करनाl सोते -जागते, उठते -बैठते, खाते -पीते, सुख में – दुःख में भगवान के नाम को सतत जपते रहनाl नाम स्मरण मन की चंचलता को कम करता हैl मन को स्थिर रखता है और हमारे मन से डर दूर होता हैl

पाद सेवन : वास्तविकता में प्रभु हमारे पास नहीं कि हम उनके चरणों की सेवा कर सकेंl इसीलिए हम मंदिर में जाकर उस परिसर को साफ करते हैंl प्रभु मूर्ति में चरणों को दबाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैंl हम मानस पूजा के माध्यम से भी भगवान के श्री चरणों की सेवा करते हैंl

अर्चन भक्ति : सगुण प्रभु की प्रतिमा या फोटो की पूर्ण भाव भक्ति और पूर्ण पूजा सामग्री के साथ पूजा करते हैंl श्लोक या स्तोत्र गाते हुए पूजा करते हैंl या फिर मानस पूजा करते हैंl

वंदन भक्ति : अहंकार त्याग कर प्रभु के श्री चरणों में शीश नवाकर नमन करते हैंl ऐसा करने से हमारा घमंड चूर चूर हो जाता हैl और हम विनम्र होने लगते हैंl हमारा दूसरों को देखने का दृष्टिकोण ही बदल जाता हैl हम भक्ति के रंग में डूबने लगते हैंl हम सभी प्रभु के अंश हैं इस बात पर हमारा पक्का विश्वास बैठने लगता हैl

दास्य भक्ति : प्रभु हमारे स्वामी हैं और हम उनके दास हैंl हम उनकी सेवा हेतु तत्पर हैंl हम उनकी आज्ञा पालन हेतु तैयार हैंl ऐसा करने से हम बिना फल की चिंता किये हर कर्म को खुशी खुशी करने को राजी हो जाते हैंl

सख्य: अर्थात प्रभु को अपना मित्र मानिएl उससे अपने मन की सभी बातें कीजिएl जिससे मैं और वो एक ही हैं ये बात हमारे जीवन को सार्थक बना देती हैl

आत्मनिवेदन : आत्मिक रूप से प्रभु के सामने आत्मसमर्पण करनाl अर्थात अपने तन से मन से, वाचा से, कर्मो से अपने आपको भगवान को समर्पित करना होता हैl हमारे साथ जो हो रहा है फिर वो अच्छा हो या बुरा वो सब उस प्रभु की इच्छानुरूप हो रहा हैl जैसी प्रभु इच्छाl आत्म निवेदन करते करते भक्त उस महासत्ता में इतना तन्मय हो जाता है कि उसे अपना भान ही नहीं रहताl उसका अपना कोई वजूद ही नहीं बचताl

 – क्रमशः

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ४२ – कविता – भ्रम / सत्य… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘भ्रम / सत्य…‘।)

☆ शशि साहित्य # ४२ ☆

? कविता – भ्रम / सत्य…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

बहुत भरम में थी मैं,

खुशी को बाहर ढूंढ रही मैं…

*

अंतर मन में युद्ध चल रहा,

उसको शांत करूं कैसे मैं…

*

प्रीत लगाऊं प्रीतम से मैं,

मीरा बन सब त्यागूं मैं,

*

राधा से भी प्रीत करे वो,

यह कैसे स्वीकार करूं मैं…

*

नहीं चाहिए अब कोई मुझको,

नहीं ढूंढ सकी, कोई, मुझसा, मैं…

*

नहीं चाहिए कोई इंद्रधनुष,,

अब अपने रंग में खुश हूं मैं…

*

भीतर, बाहर रणक्षेत्र बना है,

क्यों ना बिगुल, युद्ध का फूंकूं मैं…

*

बहुत भरम में थी मैं,

खुद को बाहर ढूंढ रही मैं…

*

जब से तेरी शरण में आई !!!

देखो खुद से, खुद ही मिल गई मैं…

*

नहीं रचा तूने खुद सा कोई…

तुझ में ही अब रम गई मैं…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares