हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२४ ☆ शब्द-शब्द साधना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख शब्द-शब्द साधना। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मोहे ले चल मांझी उस पार / स्वर- रुखसार खान, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२४ ☆

☆ शब्द-शब्द साधना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘शब्द शब्द में ब्रह्म है/ शब्द शब्द में सार। शब्द सदा ऐसे कहो/ जिन से उपजे प्यार।’ वास्तव में शब्द ही ब्रह्म है और शब्द में ही निहित है जीवन का संदेश…इसलिए सदा ऐसे शब्दों का प्रयोग कीजिए, जिससे प्रेम भाव प्रकट हो। कबीरदास जी का यह दोहा ‘ऐसी बानी बोलिए/ मनवा शीतल होय। औरहुं को शीतल करे/ ख़ुद भी शीतल होय’ …उपरोक्त भाव की पुष्टि करता है। हमारे कटु वचन दिलों की दूरियों को इतना बढ़ा देते हैं; जिसे पाटना कठिन हो जाता है। इसलिए सदैव मधुर शब्दों का प्रयोग कीजिए, क्योंकि ‘शब्द से खुशी/ शब्द से ग़म। शब्द से पीड़ा/ शब्द ही मरहम’ शब्द में निहित हैं ख़ुशी व ग़म के भाव– परंतु उनका चुनाव आपकी सोच पर निर्भर करता है।

वास्तव में शब्दों में इतना सामर्थ्य है कि जहाँ वे मानव को असीम आनंद व अलौकिक प्रसन्नता प्रदान कर सकते हैं; वहीं ग़मों के सागर में डुबो भी सकते हैं। दूसरे शब्दों में शब्द पीड़ा है और शब्द ही मरहम है। शब्द मानव के रिसते ज़ख्मों पर कारग़र दवा का काम भी करते हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस मन:स्थिति में किन शब्दों का प्रयोग किस अंदाज़ से करते हैं।

‘हीरा परखै जौहरी/ शब्द ही परखै साध। कबीर परखै साध को/ ताको मतो अगाध’ हर व्यक्ति अपनी आवश्यकता व उपयोगिता के अनुसार इनका प्रयोग करता है। जौहरी हीरे को परख कर संतोष पाता है, तो साधु शब्दों व सत्य वचनों अर्थात् सत्संग को ही महत्व प्रदान करता है और आनंद प्राप्त करता है। वह उनके संदेशों को जीवन में धारण कर सुख व संतोष प्राप्त करता है; स्वयं को भाग्यशाली समझता है। परंतु कबीरदास जी उस साधु को परखते हैं कि उसके भावों व विचारों में कितनी गहनता व सार्थकता है; उसकी सोच कैसी है और वह जिस राह पर लोगों को चलने का संदेश देता है; वह उचित है या नहीं? वास्तव में संत वह है; जिसकी इच्छाओं का अंत हो गया है और उसकी श्रद्धा को आप विभक्त नहीं कर सकते; उसे सत्मार्ग पर चलने से नहीं रोक सकते–वही श्रद्धेय है, पूजनीय है। वास्तव में साधना करने व ब्रह्मचर्य को पालन करने वाला ही साधु है, जो सीधे व सपाट मार्ग का अनुसरण करता है। इसके लिए आवश्यकता है कि जब हम अकेले हों, तो अपनी भावनाओं पर अंकुश लगाएं अर्थात् कुत्सित भावनाओं व विचारों को अपने मनोमस्तिष्क में दस्तक न देने दें। अहं व क्रोध पर नियंत्रण रखें, क्योंकि ये दोनों मानव के अजात शत्रु हैं, जिसके लिए अपनी कामनाओं-तृष्णाओं को नियंत्रित करना आवश्यक है।

अहं अर्थात् सर्वश्रेष्ठता का भाव मानव को सबसे दूर कर देता है, तो क्रोध सामने वाले को तो हानि पहुंचाता ही है; वहीं अपने लिए भी अनिष्टकारी सिद्ध होता है। अहंनिष्ठ व क्रोधी व्यक्ति आवेश में न जाने क्या-क्या कह जाता है; जिसके लिए उसे बाद में प्रायश्चित करना पड़ता है। परंतु ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत’ अर्थात् समय गुज़र जाने के पश्चात् हाथ मलने अर्थात् पछताने का कोई औचित्य अथवा सार्थकता नहीं रहती। प्रायश्चित करना हमें सुख व संतोष प्रदान करने की सामर्थ्य तो रखता है, ‘परंतु गया वक्त कभी लौटकर नहीं आता।’ शारीरिक घाव तो समय के साथ भर जाते हैं, परंतु शब्दों के ज़ख्म कभी नहीं भरते; वे तो नासूर बन आजीवन रिसते रहते हैं। परंतु कटु वचन जहाँ मानव को पीड़ा प्रदान करते हैं; वहीं सहानुभूति व क्षमा-याचना के दो शब्द बोलकर आप उन पर मरहम भी लगा सकते हैं। शायद! इसीलिए कहा गया है गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपनी मधुर वाणी द्वारा दूसरे के दु:खों को दूर करने का सामर्थ्य रखता है। आपका दु:खी व आपदाग्रस्त व्यक्ति को ‘मैं हूं ना’ कह देना ही उसमें आत्मविश्वास जाग्रत करता है और वह स्वयं को अकेला व असहाय अनुभव नहीं करता। उसे ऐसा लगता है कि आप सदैव उसकी ढाल बनकर उसके साथ खड़े हैं।

एकांत में व्यक्ति के लिए अपने दूषित मनोभावों पर नियंत्रण करना आवश्यक है तथा सबके बीच अर्थात् समाज में रहते हुए शब्दों की साधना करना भी अनिवार्य है… सोच- समझकर बोलने की सार्थकता से आप मुख नहीं मोड़ सकते। इसलिए कहा जा सकता है कि यदि आपको दूसरे व्यक्ति को उसकी ग़लती का एहसास दिलाना है, तो उससे एकांत में बात करो, क्योंकि सबके बीच में कही गई बात बवाल खड़ा कर देती है। अक्सर उस स्थिति में दोनों के अहं का टकराव होता है। अहं से संघर्ष का जन्म होता है और उस स्थिति में वह दूसरे के प्राण लेने पर उतारु हो जाता है। गुस्सा चाण्डाल होता है… बड़े-बड़े ऋषि मुनियों के उदाहरण आपके समक्ष हैं। परशुराम का क्रोध में अपनी माता का वध करना व ऋषि गौतम का अहिल्या का श्राप देना आदि हमें संदेश देता है कि व्यक्ति को बोलने से पहले सोचना अर्थात् तोलना चाहिए। उस विषम परिस्थिति में कटु व अनर्गल शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए और दूसरों से वैसा व्यवहार करना चाहिए; जिसे सहन करने की क्षमता आप में है। सो! आवश्यकता है, हृदय की शुद्धता व मन की स्पष्टता की अर्थात् आप अपने मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, दुर्भावना व दुष्भावनाएं मत रखिए, बल्कि बोलने से पहले उसके औचित्य-अनौचित्य का चिन्तन-मनन कीजिए। दूसरे शब्दों में किसी के कहने पर उसके प्रति अपनी धारणा मत बनाइए अर्थात् कानों-सुनी बात पर विश्वास मत कीजिए, क्योंकि विवाह के सारे गीत सत्य नहीं होते। कानों-सुनी बात पर विश्वास करने वाले लोग सदैव धोखा खाते हैं और उनका पतन अवश्यंभावी होता है। कोई भी उनके साथ रहना पसंद नहीं करता। बिना सोच-विचार के किए गए कर्म केवल आपको ही हानि नहीं पहुंचाते; परिवार, समाज व देश के लिए भी विध्वंसकारी होते हैं।

सो! दोस्त, रास्ता, किताब व सोच यदि ग़लत हों, तो गुमराह कर देते हैं; यदि ठीक हों, तो जीवन सफल हो जाता है। उपरोक्त उक्ति हमें आग़ाह करती है कि सदैव अच्छे लोगों की संगति करें, क्योंकि सच्चा मित्र आपका सहायक, निदेशक व गुरु होता है; जो आपको कभी पथ-विचलित नहीं होने देता। वह आपको ग़लत मार्ग व ग़लत दिशा की ओर जाने पर सचेत करता है तथा आपकी उन्नति को देख कर प्रसन्न होता है; आप को उत्साहित करता है। पुस्तकें मानव की सबसे अच्छी मित्र होती हैं। इसलिए कहा गया है कि ‘बुरी संगति से इंसान अकेला भला’और एकांत में अच्छे मित्र के साथ न होने की स्थिति में सद्ग्रथों व अच्छी पुस्तकों का सान्निध्य हमारा यथोचित मार्गदर्शन करता है।

हाँ! सबसे बड़ी है मानव की सोच अर्थात् जो मानव सोचता है, वही उसके चेहरे के भावों से परिलक्षित होता है और व्यवहार उसके कार्यों में झलकता है। इसलिए अपने हृदय में दैवीय गुणों स्नेह, सौहार्द, त्याग, करुणा, सहानुभूति आदि  को पल्लवित होने दीजिए… ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर की भावना को दूर से सलाम कीजिए, क्योंकि सत्य की राह का अनुसरण करने वाले की राह में अनगिनत बाधाएं आती हैं। परंतु यदि वह उन असामान्य परिस्थितियों में अपना धैर्य नहीं खोता; दु:खी नहीं होता, बल्कि उससे सीख लेता है तो वह अपनी मंज़िल को प्राप्त कर अपने भविष्य को सुखमय बनाता है। वह सदैव शांत भाव में रहता है, क्योंकि ‘सुख- दु:ख तो अतिथि हैं’…’जो आया है, अवश्य जाएगा’ को अपना मूल-मंत्र स्वीकार संतोष से अपना जीवन बसर करता है। सो! आने वाले की खुशी व जाने वाले का ग़म क्यों? इंसान को हर स्थिति में सम रहना चाहिए, ताकि दु:ख आपको विचलित न करें और सुख आपके सत्मार्ग पर चलने में बाधा उपस्थित न करें अर्थात् आपको ग़लत राह का अनुसरण न करने दें। वास्तव में पैसा व पद-प्रतिष्ठा मानव को अहंवादी बना देते हैं और उससे उपजा सर्वश्रेष्ठता का भाव अमानुष। वह निपट स्वार्थी हो जाता है और केवल अपनी सुख-सुविधाओं के बारे में सोचता है। इसलिए ऐसा स्थान यश व लक्ष्मी को रास नहीं आता और वे वहां से रुख़्सत हो जाते हैं।

सो! जहां सत्य है; वहां धर्म है, यश है और वहीं लक्ष्मी निवास करती है। जहां शांति है; सौहार्द व सद्भाव है; मधुर व्यवहार व समर्पण भाव है और वहां कलह, अशांति, ईर्ष्या-द्वेष आदि प्रवेश पाने का साहस नहीं जुटा सकते। इसलिए मानव को कभी भी झूठ का आश्रय नहीं लेना चाहिए, क्योंकि वह सब बुराइयों की जड़ है। मधुर व्यवहार द्वारा आप करोड़ों दिलों पर राज्य कर सकते हैं…सबके प्रिय बन सकते हैं। लोग आपके साथ रहने व आपका अनुसरण करने में स्वयं को गौरवशाली व भाग्यशाली समझते हैं। सो! शब्द ब्रह्म है; उसकी सार्थकता को स्वीकार कर जीवन में धारण करें और सबके प्रिय बनें, क्योंकि हमारी सोच, हमारे बोल व हमारे कर्म ही हमारे भाग्य-निर्माता हैं और हमारी ज़िंदगी के प्रणेता हैं।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९६ – नवगीत – प्रभु श्री राम जी की महिमा… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतप्रभु श्री राम जी की महिमा

? रचना संसार # ९६ – गीत – प्रभु श्री राम जी की महिमा…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

राम तुम्हारी महिमा सारे,

जग ने देखो गाई है।

राम कथा लिखकर तुलसी ने,

जन -जन में पहुँचाई है।।

*

अवतारे हैं राम अवध में,

देव पुष्प बरसाते हैं।

ढोल नगाड़े घर -घर बजते ,

ऋषि मुनि भी हर्षाते हैं।।

ऋषि वशिष्ठ से शिक्षा पाकर,

प्रेमिल -गंग बहाई है।

*

उनकी पत्नी भी जगजननी ,

जनक दुलारी सीता थीं।

तीन लोक में यश था उनका

देवी परम पुनीता थीं।

राज-तिलक की शुभ बेला पर

दुख की बदरी छाई है।

*

कुटिल मंथरा की चालों से,

राम बने वनवासी थे।

लखन जानकी संग चले वन,

क्षुब्ध सभीपुरवासी थे।।

चौदह साल रहे प्रभु वन में,

कैसी विपदा आई है।

*

सीता हरण किया रावण ने,

वह तो अत्याचारी था।

गर्व राम ने उसका तोड़ा,

जग सारा आभारी था।

वापस लेकर सीता आये,

बजी अवध शहनाई है।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१३) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१३) ? ?

तुम चुप रहो

तो मैं कुछ कहूँ..,

इसके बाद

वह निरंतर

बोलता रहा

मेरी चुप्पी पर..,

अपनी चुप्पी की

सदाहरी कोख पर

आश्चर्यचकित हूँ!

?

© संजय भारद्वाज  

(2.9.2018, प्रातः 8:23 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Weekly Column ☆ Witful Warmth # 75 – All Lines on This Route Are Busy… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, known for his wit and wisdom, is a prolific writer, renowned satirist, children’s literature author, and poet. He has undertaken the monumental task of writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Telangana government at the primary school, college, and university levels. His editorial endeavors also include online editions of works by Acharya Ramchandra Shukla.

As a celebrated satirist, Dr. Suresh Kumar Mishra has carved a niche for himself, with over eight million viewers, readers, and listeners tuning in to his literary musings on the demise of a teacher on the Sahitya AajTak channel. His contributions have earned him prestigious accolades such as the Telangana Hindi Academy’s Shreshtha Navyuva Rachnakaar Samman in 2021, presented by the honorable Chief Minister of Telangana, Mr. Chandrashekhar Rao. He has also been honored with the Vyangya Yatra Ravindranath Tyagi Stairway Award and the Sahitya Srijan Samman, alongside recognition from Prime Minister Narendra Modi and various other esteemed institutions.

Dr. Suresh Kumar Mishra’s journey is not merely one of literary accomplishments but also a testament to his unwavering dedication, creativity, and profound impact on society. His story inspires us to strive for excellence, to use our talents for the betterment of others, and to leave an indelible mark on the world.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his SatireAll Lines on This Route Are Busy 

☆ Witful Warmth# 75

☆ Satire ☆ All Lines on This Route Are Busy… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆ 

Talking before marriage and tea leaves have one thing in common. In the beginning, both show a lot of color. The fragrance is so strong that the whole neighborhood knows something is boiling. But slowly, time passes, and those same tea leaves look like dry grass left in the corner of a utensil. The same thing happened between us.

The man who promised to stay with me for seven lifetimes during our wedding rounds locked himself inside a screen in just seven months. Now, when he comes home, he just lies on the sofa and keeps moving his thumb. That 15-second world of Instagram reels has become more valuable than my entire life. His fingers slide on the screen like a magician flipping playing cards. I sit next to him holding a cup of tea and keep looking at him, but his eyes never wander from the phone. It feels like I am just a piece of old furniture in that house, covered in dust, which no one even wants to bother moving.

One day I said, “Listen, I need to talk to you.” Without looking up, he said, “I am busy right now, we will see later.” This “later” never comes. When a man pretends to be busy, he is actually running away from his responsibilities. To break the silence of this loneliness, I found a new way. I would call my own number from my own mobile phone. When the voice from the other side said, “The number you have dialed is currently busy,” a strange peace would fill my heart. At least someone was saying that I was busy. Someone was noticing my presence, even if it was just a computer’s recorded voice. This was the biggest sadness of my life—that I had to use my own number to convince myself that I existed in this world.

Just then, a new young man came to live in front of our house. He was two years younger than me, and perhaps that is why he was far away from the clever tricks of the world. He understood my loneliness just by looking at the sadness on my face. While the master of the house was busy scrolling reels on the sofa, that boy was reading my silence. When my husband was not home, he would visit my house on the excuse of asking for salt or tea leaves. There was a strange kindness in his eyes, which felt like a cool shower of rain in my desert-like life. One day, during a conversation, he told me very simply that he was not married yet. I felt that God had sent him to the house opposite mine just to end my loneliness.

As we started meeting more often, the dried-up river inside me began to flood with life again. Every time I planned to run away with him from this suffocating life, he would smile and say, “Don’t rush. Let’s make a plan tomorrow.” I thought he was saying this for our safety. A man’s “tomorrow” sometimes becomes a woman’s lifelong wait. He would make an excuse every time, and I would come back to sit at the edge of the same sofa next to the reels. When love is received in small bits, its value increases even more. I was passing my days with the help of his false hope, telling myself that one day this darkness would go away.

One day, he suddenly came to me on his own and said, “Tomorrow we will go far away forever. Pack your bags and be ready.” That day, I felt like my years of prayer had finally answered. I quietly took out my favorite sarees from the cupboard and started packing them in a suitcase. In the next room, my husband was laughing loudly while watching a prank video on his mobile. His laughter stabbed my ears like a sharp nail. I felt pity for that man, who did not even know that the ground was slipping from under his feet. I packed the bitterest truth of my life into a bag and began waiting for the morning that was going to witness my departure.

When I reached his house with all my bags packed, he had already left. A lock was hanging on the door of the house opposite mine, and only dust was flying around. My breath got stuck in my throat, and the suitcase fell from my hand to the ground. When I didn’t see anyone around, I asked a shopkeeper nearby about him. The truth told by the shopkeeper completely shook me. The shopkeeper spat his tobacco and said very casually, “Oh, he was married. His wife lives in Bengaluru, and she came early this morning to pick him up. Both left by the first bus.”

Hearing this, everything inside me shattered. The boy whom I thought to be the savior of my loneliness was nothing but a cheat. He was just using the tea leaves and salt of my house to pass his free time. What could be a more horrible form of heartbreak than this? The person I thought was my way to freedom had pushed me into a deeper well. I sat on the doorstep of that empty house and started laughing because I ran out of tears to cry. The whole game was just about passing time—whether it was watching reels or asking for salt in the neighborhood.

With shaking hands, I picked up my suitcase and walked back toward my old house, where silence was waiting for me. The main door was open, and the sounds of the same reels were still coming from the sofa. My husband didn’t even look at me. While looking at the screen, he said, “Oh, you are back? Just check if we are out of salt.” Without saying anything, I looked toward the kitchen where the salt container was already half-full. I understood that in this world, everyone is busy with their own screens and their own stories, and other people’s emotions are just a source of entertainment.

I took out my phone and dialed my own number again. The same familiar voice came from the other side, saying that the number you have dialed is busy. I kept the phone pressed against my ear and started feeling the comfort of that busy tone. Now I was completely sure that in this selfish and fake world, only my own number was there which would never betray my loneliness, even if it always pretended to be busy. This final goodbye to love had made me completely self-reliant.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२४ ☆ भावना के गीत – प्रेम ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के गीत – प्रेम)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२४ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के गीत – प्रेम ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

प्रेम हवा का मंद झोंका

छूकर मन को जाता है

 जीवन में सुरभित पत्तों सा

हरियाली भर जाती है।

 *

मन में प्रेम के भाव लिए

 प्रेम भाव जगाता है

दुख की तपती राहों में,

शीतल छाँव पाता है।

 *

मीरा बनता प्रेम कभी

कभी राधा का गीत।

प्रेम छुपा माँ ममता में,

कभी सखी का गीत।

 *

प्रेम केवल प्रेम नहीं,

प्रेम मन का  पावन गान।

प्रेम है उपवन में छाया

मधुर मधुरिम बाहर।।

 *

जहाँ प्रेम के दीप जले,

मिटे वहाँ अंधियार।

प्रेम कटुता दूर करे,

महके हर परिवार।।

 

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०६ ☆ कविता – शिव संरचना… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – शिव संरचना आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०६ ☆

कविता – शिव संरचना☆ श्री संतोष नेमा ☆

रास्ते में चूने की

लाइन खींचते देख

हमने पूछा भैया क्या

कोई नेता आ रहे हैं….?

बोला नहीं मंदिर

के रास्ते चूने की

लाइन डाल रहे हैं …!

लोगों को भगवान की

राह दिखा रहे हैं …!

हमने कहा लोगों को

क्या मदिर की राह

का ज्ञान नहीं…?

बोला मंदिर क्या

भगवान का ही भान नहीं…!

 

अब तो वह भी भक्तों

को तरसते हैं…?

भक्त है कि भगवान पर ही 

फ़िल्मी स्टाइल में बरसते हैं …!

बोलते हैं आज खुश तो

बहुत होगा तू…जैसा

अहसान सा करते हैं…!

 

फिर भी भोले शंकर

सब के दुःख हरते हैं …!

कुछ तो शिवरात्रि की आड़ में

खुलकर नशा करते हैं…!

पीकर गांजा-भंग

खूब मज़ा करते हैं…!

अब त्यौहार भगवान

के किये कम अपने लिए

ज्यादा हो गए हैं …!

भक्त स्वादानुसार

खान-पान पर

आमादा हो गए हैं …!

“संतोष” भोले को

भोला समझने की भूल

न करना …!

हर अति के अंत की

है शिव संरचना …!

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १२ ☆ जीवन ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  जीवन।)

☆ मंजिरी साहित्य # १२ ☆

? कविता – जीवन ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

शांति दूत नहीं दुनिया में,

बने हुए सब दानव आज l

पीड़ा बहती नयनों से अब,

इंसानियत का खत्म है काज ll

*

आशाओं के सर्व सपने अब,

नित चिताओं पर सोते l

देखें प्रतिपल लोचन जिनको,

सतत दिन रात रोते रोते ll

*

 नहीं सुनाई देता कलरव,

मन रूपी खग अब मौन हुआ l

हरियाली गुमसुम हो गई,

जीवन अब तो बना जुआ ll

*

हिंसक चील कौए अरु गिद्ध,

 खुले आकाश हैं मंडरातें l

वहीं शांतिदूत कबूतर,

छुपते होते डर जाते ll

*

सदा उदासी लिये पूर्ण मन,

दुःख का ओज भरा डेरा l

रात हो रही दैनिक लंबी,

कब होगा मन शांत सवेरा ll

*

आज बना ली हृद ने दूरी,

कैसे हम इसको पाटें l

आओ मिलकर बात करें सब,

इस जहर को मिल काटें ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०१० ⇒ शुद्ध घी और चित्त शुद्धि ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शुद्ध घी और चित्त शुद्धि…।)

?अभी अभी # १०१० ⇒ आलेख – शुद्ध घी और चित्त शुद्धि ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या शुद्ध घी और शुद्ध चित्त का आपस में कोई संबंध है,शुद्ध घी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है,इसमें दो मत नहीं,अधिकांश लोग बाजार का अमूल घी अथवा केबीसी ब्रांड गोवर्धन घी पर भरोसा करते हैं । कुछ भाग्यशाली गुजरात की गिर देसी गाय पालते हैं,और उसके शुद्ध सात्विक,ऑर्गेनिक देशी घी का सेवन करते हैं ।

कुछ लोग होते हैं, जो अपने ही घर पर उपलब्ध दूध का घी बनाकर उसका सेवन करते हैं । घर पर बनाए जाने वाला शुद्ध घी

का तरीका हमारे चित्त शुद्धि के तरीके से बहुत मेल खाता है । गुरु को रंगरेज तो कहा गया है,लेकिन किसी हलवाई को सदगुरु नहीं कहा गया । गुरु रंगरेज की तरह हमारे चित्त को अगर रंग सकता है तो घी बनाने का तरीका हमारे चित्त को शुद्ध करने के तरीके से पूरी तरह मेल खाता है ।।

काश जितनी चिंता हम शुद्ध घी की करते हैं,उतनी ही चिंता हमें अपने चित्त की शुद्धि की भी होती । घी बनाने से चित्त शुद्ध करने का नुस्खा हमने ईजाद किया है,लेकिन इस पर हमारा कोई कॉपीराइट नहीं, मैं जब घर पर घी बनाता हूं तो मुझे ऐसा लगता है, मैं अपना चित्त शुद्ध कर रहा हूं । एक पंथ दो काज ।।

सबसे पहले हम दूध को गर्म करते हैं,दूध की चाय बनती है,बच्चे दूध पीते हैं और हम उसकी मलाई निकाल लेते हैं । बिना मलाई के घी नहीं बनता । अपने आपको तपाए बिना चित्त कभी शुद्ध नहीं हो सकता ।जप,तप,साधन,सेवा,सत्संग सभी चित्त शुद्धि के साधन माने गए हैं ।

लो जी दूध को तपाया और मलाई निकाल ली । जितना दूध है,उतने की ही मलाई निकलेगी,इसलिए रोज दूध गर्म होगा,तपेगा,और उसकी मलाई निकलेगी,जिसे एक बर्तन में एकत्रित कर लिया जाएगा । मलाई निकालने अथवा खाने से चित्त शुद्ध नहीं होता । थोड़ा धैर्य धारण करना पड़ता है । इस मलाई में चाहें तो थोड़ा दही मिलाते जाएं,और मलाई फ्रीजर में रखते जाएं । पहले तप और उसके बाद धीरज, मन ललचाता है,मलाई के लिए । मन पर कंट्रोल भी जरूरी है चित्त शुद्धि के लिए ।।

चलिए कुछ दिन यही चलता रहा । अच्छी मलाई जमा हो गई । अब इसे एक बड़े बर्तन अथवा मटकी में रवई से ,खूब सारा पानी डालकर मथ लिया । थोड़ा परिश्रम और ऊपर मक्खन तैरने लग गया । कृष्ण की सभी बाल लीलाएं,मटकी,माखन और गोपियों के आसपास ही घटित होती रहती हैं । माखन चोर की तरह किसी का दिल चुराएं,मक्खन नहीं ।

लो जी यहां तो मक्खन देखते ही मुंह में पानी आ गया,और साथ में मलाई वाली छाछ भी । हम तो तर गए । लेकिन महाराज,अभी कहां चित्त शुद्धि हुई,घी तो अभी निकला ही नहीं । कंट्रोल कंट्रोल, नो चित्त शुद्धि विदाउट कंट्रोल ।।

जी हां अब मक्खन छाछ से अलग होगा,जैसे विकार चित्त से अलग होते हैं,चित्त शुद्धि के समय । लेकिन अभी तो मक्खन की भी परीक्षा होगी,उसको भी संयम और विवेक की अग्नि में तपना होगा । बिना भाड़ में गए कभी चना सिका है,बिना भट्टी के कभी रसोई पकी है।

तेज आंच में मक्खन की तरह चित्त की परीक्षा हो रही है,कड़ी परीक्षा,तेज आंच,धैर्य की परीक्षा,और आखिर वह घड़ी आ ही जाती है,जब शुद्ध विकार युक्त घी चित्त शुद्ध की तरह कढ़ाई में तैरने लगता है ।

साथ में कुछ विकार जलकर खाक नहीं होते,मावा बन जाते हैं । नर,सत्संग से क्या से क्या हो जाए । संसार में असार कुछ भी नहीं,फिर ज्ञानियों द्वारा सार सार ही ग्रहण किया जाता है,और थोथा उड़ा दिया जाता है ।।

हमने घी बनाने का तरीका नहीं सीखा,चित्त शुद्धि का तरीका सीखा । सतगुरु की सीख ऐसी ही होती है,इसीलिए उसे रंगरेज कहते हैं । आप अपने गुरु स्वयं बनें,घर पर ही घी बनाएं,अपना चित्त शुद्ध करें । मैंने अपनी मां से सीखा,तेरा तुझको अर्पण,क्या लागा मेरा ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २५ – कविता – नव निर्मिती… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता नव निर्मिती।)

☆ शशि साहित्य # २५ ☆

? कविता – नव निर्मिती…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

परिवर्तन का यह दौर चला है,

हेतु नव-निर्माण को…

 

भाग्य विधाता देता मौका,

किस्मत अपनी लिखने को…

 

धर्म, मेहनत, लगन अटूट,

चल दो इसी राह को…

 

है दुश्वार..मगर कठिन नहीं,

भेदना किसी चक्रव्यूह को,

 

हिम्मत करो निकल चलो,

संग ले उपलब्धि को…

 

प्रथम युद्ध है खुद से, खुद का,

पूर्ण समर्पित, निभाओ अपने किरदार को,

 

खुद का दिल भी सह सके,

व्यवहार वही दो अन्य को…

 

जब हो लेखा-जोखा  कर्मों का,

सहर्ष “स्वागतम्”  कह सको,

 

फहरा सको जीत का झंडा,

तैयार करो उस धरती को…

 

भाग्य अगर लिखना हो खुद का,

निर्मित करो उस स्याही को…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २९६ – देवपुजा…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २९६ – विजय साहित्य ?

☆ देवपुजा…! कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

पुजार्चन करताना

करू सोळा उपचार

आवाहन देवतांना 

घडे दर्शन त्रिवार….! १

देऊ आसन मंत्राने

लाभण्याला सुखासन

पाद्यपुजा करूनीया

यशप्राप्ती संकलन…! २

 *

अर्घ्य सुगंधी जलाने

लाभे मना  समाधान

आचमन गंगाजल

होई आनंद विधान…! ३

 *

स्नान घालता देवास

मिळे जिवनात सुख

पंचामृत देता देवा

स्नेह माधुर्य सन्मुख…! ४

 *

अभिषेक देवतांना

स्थैर्य‌ शांततेचा लाभ

वस्त्र अर्पिता प्रेमाने

लाज राखी पद्मनाभ…! ५

 *

यज्ञोपविताचा मान

मोक्षप्राप्ती लाभतसे

गंध लावता देवाला

ज्ञानप्राप्ती गेही वसे…! ६

 *

फुले अर्पिताच मिळे

सर्व सुख समाधान

कुंकू हळद पिंजर

लाभे सौभाग्याचे दान..! ७

 *

अलंकार देता‌ देवा

मनी श्रीमंतीचा वास

धूप प्रक्षालन करी

कीर्ती ऐश्वर्य प्रवास…! ८

 *

दीपदान सौख्य मोठे

ज्ञान वैराग्य लाभते

प्रासादिक नैवेद्याने

अन्नपुर्णा सुखावते…! ९

 *

आरतीच्या गजरात

प्रसन्नता नांदे धामी

प्रदक्षिणा घालताना

लाभ स्वामित्वाचा नामी…! १०

 *

श्रीफलाने पुजार्चना

दावी सौख्याचे शिखर

दुर्वा तुलसी बेलाने

कृपा हस्त शिरावर…! ११

 *

मंत्र पुष्पांजली देई

सुख समृद्धीचे देणे 

अक्षतांनी परिपुर्ण

सोळा उपचार लेणे…! १२

 *

नमस्कार स्विकारावा

विनयाने विनवणी

सह कुटुंब प्रार्थना 

नको दुर्भाग्य मन्मनी…! १३

 *

यथाशक्ती यथामती

करू पुजा मनोभावे

नाना लाभ फलदायी

अशा देव पुजनाने….! १४

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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