डॉ. मुक्ता
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ज़बर्दस्ती नहीं ज़बर्दस्त। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मैं तो गुरुवर के गुण गाऊं / स्वर- वंदना शर्मा, सौजन्य – रुखसार चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३४१ ☆
☆ ज़बर्दस्ती नहीं ज़बर्दस्त… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
जीवन एक यात्रा है, इसे ज़बर्दस्ती नहीं ज़बर्दस्त तरीके से तय करें। जीवन अनमोल है, जो मानव को चौरासी लाख योनियों के पश्चात् प्राप्त होता है। यह प्रभु की नियामत है; इसका सम्मान करें तथा जो परमात्मा ने आपको दिया है, उसमें संतोष रखें व प्रसन्न रहें। संतोष जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है और आशाओं का दामन बहुत विस्तृत है; जिनका पेट कभी नहीं भरता है। सो! मानव को इनके हाथों का खिलौना नहीं बनना चाहिए। सो! सार्थक जीवन जीने के लिए हमें अपनी इच्छाओं पर अंकुश लगाना आवश्यक है। मन चंचल है। यह पल-भर में तीन लोकों की यात्रा कर लौट आता है और हमें आजीवन उलझाए रखता है। अक्सर इंसान अपने दु:ख से दु:खी नहीं होता; दूसरों के सुखों को देखकर हैरान-परेशान रहता है। इसलिए ऐसे इंसान का दु:ख असीम होता है, जो कभी समाप्त नहीं हो सकता। जब तक हमारे अंतर्मन में संतोष नहीं होगा; हमारी भटकन का अंत नहीं होगा और हम उस चक्रव्यूह से बाहर नहीं आ पाएंगे।
जीवन सुख-दु:ख का मेला है/ जिसमें हर इंसान अकेला है। सुख-दु:ख मेहमान हैं; आते-जाते रहते हैं। सुख में वे हमारे जीवन का हिस्सा होते हैं, परंतु वे मेहमान की भांति थोड़ा समय विश्राम कर अपनी डगर पर चल पड़ते हैं। सुख में फूलना व दु:ख में अपना आपा खो बैठना हमारी उन्नति में बाधक है। इसलिए हमें हर स्थिति में सम रहना चाहिए। संसार मिथ्या है और मानव जीवन नश्वर। यहां स्थायी कुछ भी नहीं। समय परिवर्तनशील है। मौसम बदलते रहते हैं और इनके अनुसार मन:स्थिति में भी परिवर्तन होता रहता है। सामाजिक प्राणी होने के नाते मानव के लिए एक जैसी स्थिति व एकांत में रहना सज़ा बन जाता है। इसलिए वह अनेक लोगों से संबंध स्थापित करता है। वैसे ईश्वर भी हमारे लिए माता-पिता, परिजन व दोस्तों के रूप में चंद लोगों को भेजता है; जिनसे चाहे-अनचाहे निबाह करना मानव की विवशता होती है। परंतु आजकल कोई भी रिश्ता विश्वास क़ाबिल नहीं रहा। सब संबंध स्वार्थ पर आधारित हैं और रिश्तों पर तो ग्रहण लग गया है, यहां तक कि खून के रिश्तों की गरिमा भी नहीं रही। अपने, अपने बनकर अपनों को छल रहे हैं। माता-पिता, गुरुजन व दोस्त आदि सब शतरंज की बिसात बिछाए बैठे रहते हैं। उनके लिए दो महीने की बालिका और नब्बे वर्ष की वृद्धा में कोई अंतर नहीं है। वे पल-भर की वासना-तृप्ति के लिए सब सीमाओं को लांघ जाते हैं और मासूमों की अस्मिता से खिलवाड़ करना सामान्य-सी बात हो गई है। आजकल तो दुष्कर्म करने के पश्चात् सबूत मिटाने का प्रचलन चल निकला है। ऐसी स्थिति में मानव मन मसोस कर रह जाता है, क्योंकि वह उन दुष्टों का सामना करने में स्वयं को असमर्थ पाता है।
जिस घाव से खून नहीं निकलता, समझ लेना कि वे किसी अपने के दिए गये ज़ख्म हैं; जो आजीवन रिसते हैं, लाइलाज होते हैं और इंसान उनके व्यूह से आजीवन मुक्त नहीं हो पाता। ‘पहाड़ियों की तरह ख़ामोश हैं/ आज के संबंध व रिश्ते/ जब तक हम न पुकारें/ आवाज़ ही नहीं आती।’ आजकल संबंध-सरोकारों की अहमियत रही नहीं। हर रिश्ता ख़ामोश व बेमानी है और मानव आत्मकेंद्रित होकर रह गया है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद हैं और चहुंओर विचित्र-सा सन्नाटा पसरा रहता है। वास्तव में अतिव्यस्तता के कारण पति-पत्नी एक-दूसरे को कोंचते व कचोटते रहते हैं। आरोप-प्रत्यारोपण उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाते हैं। धीरे-धीरे उनमें संवादहीनता की स्थिति पनप जाती है, जो सभी रोगों की जड़ है। अजनबीपन का एहसास उन्हें जीने नहीं देता और वे अलगाव की स्थिति में पहुंच जाते हैं। बच्चे व वृद्ध एकांत की त्रासदी झेलने को विवश होते हैं। अक्सर बच्चे नशे की गिरफ़्त में आ जाते हैं और जब तक मानव इस तथ्य से अवगत होता है; बहुत देर हो चुकी होती है और उनके पास प्रायश्चित करने के अतिरिक्त अन्य विकल्प नहीं शेष नहीं बचता।
अहंकार दिखाकर रिश्ते तोड़ने से अच्छा है; क्षमा मांगकर रिश्तों को बचा लेना। अहं रिश्तों में अविश्वास ही नहीं, खटास उत्पन्न करता है। उस स्थिति में अहंकार के कारण परिवार टूटने के कग़ार पर आ जाता है, यहां तक कि सल्तनतें भी बदल जाती हैं। वास्तव में जो अपनों के बिना बीती ‘उम्र’/ जो अपनों के संग बीती ‘ज़िंदगी’। सो! अपनों के अंग-संग रहिए, क्योंकि अपने ही अपनों को उन्नति करते देखकर प्रसन्न ही नहीं होते; उत्साह-वर्द्धन भी करते हैं। जो ऐसा नहीं करते; वे आजीवन दु:खों के भंवर से मुक्त नहीं हो सकते। जीवन में दो प्रकार के लोग ही असफल होते हैं–’जो सोचते हैं और करते नहीं और जो करते हैं सोचते नहीं।’ यह दोनों स्थितियां भयावह हैं। सो! केवल हवाई महल बना लेना कारग़र नहीं, क्योंकि मात्र योजनाएं बनाने वाले लोग बीच अधर लटके रहते हैं। दूसरे लोग उसे अंजाम देने से पहले परिणाम के बारे में सोचते नहीं। इसलिए उनका जीवन कठिनाइयों से भरा रहता है। वे परिवार व समाज के दुश्मन कहलाते हैं। वे अपने साथ, अपने परिवारजनों को भी भंवर अथवा मुश्किल में फंसा देते हैं; जिससे उबर पाना उनके वश में नहीं होता।
जो लोग असफल होने के बाद भी उत्साह व साहस नहीं खोते; जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं। असफलता अथवा अनुभव हमारे पथ में बाधक नहीं; मील का पत्थर साबित होते हैं। एडिसन को बल्ब का आविष्कार करते समय अनेक बार असफलता का मुंह देखना पड़ा और उसके दोस्तों ने उसे वह कार्य छोड़ देने की सलाह भी दी। परंतु उसने उत्तर दिया कि अब मुझे उस दिशा विशेष में काम नहीं करना पड़ेगा। इसलिए यह असफलता मेरे लिए मार्गदर्शक है। सो! अंत में उन्हें सफलता प्राप्त हुई।
संदेह मुसीबत के पहाड़ों का निर्माण करता है और विश्वास पहाड़ों से भी रास्तों का निर्माण कर लेता है। जीवन में संदेह, शक़ व संशय को जीवन में कभी दस्तक ना देने दें, क्योंकि वह फ़ासलों को इतना बढ़ा देता है कि उन्हें पाटना असंभव हो जाता है। परंतु यदि आत्मविश्वास सुदृढ़ है, तो वह पर्वतों के बीच रास्तों का निर्माण कर सकता है। दाना मांझी का उदाहरण हम सबके समक्ष है, जिसने बारह किलोमीटर की यात्रा अपनी पत्नी के शव को कांधे पर लादकर की और तत्पश्चात् अकेले उस रास्ते पर सड़क का निर्माण किया, क्योंकि उसका निश्चय दृढ़ था। वह नहीं चाहता था कि सड़क के अभाव में किसी को अपनों के प्राण गंवाने पड़ें।
‘तलाश ना कर मुझे/ ज़मीन और आसमान की ग़र्दिशों में/ अगर तेरे दिल में नहीं/ तो कहीं भी नहीं’ अर्थात् परमात्मा मानव के मन में निवास करता है। उसे बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं। शुभकामनाएं तभी फलीभूत होती हैं, जब वे तह़ेदिल से निकलें। आपका स्वभाव ही आपका भविष्य है। ‘जाने वो कैसे मुक़द्दर की किताब लिख देता है/ सांसं गिनती की और ख़्वाहिशें बेहिसाब लिख देता है।’ इसलिए मानव को शब्दों को चखकर अथवा प्रेम से बोलना चाहिए, ताकि लोग आपसे बात करना पसंद करें। जिसने दूसरों की ख़ुशी में ख़ुद की ख़ुशी ढूंढने का हुनर सीख लिया है; वह इंसान कभी दु:खी नहीं हो सकता। रिश्ते बरक़रार रखने के लिए कमियां नहीं, अच्छाइयां देखें। अब्दुल कलाम के शब्दों में आप अपना भविष्य नहीं, आदतें बदल सकते हैं; जिनके बदलने से आपका भविष्य बदल सकता है। कटु यथार्थ को बदलने में सकारात्मकता है और झूठी आशाओं के भ्रम में जीने में नकारात्मकता निहित है। इसलिए जीवन में कभी निराश ना हों। यह भी गुज़र जाएगा– आश्वस्त रहें, क्योंकि समय निरंतर परिवर्तनशील है; कभी ठहरता नहीं। इसलिए जीवन को ज़बर्दस्ती नहीं, ज़बर्दस्त तरीके से जीएं। निरंतर संघर्ष करें तथा निराशा का दामन कभी मत थामें। सफलता आपके कदम चूमेंगी। परेशानी व अनुभव से जो सीख मिलती है; वह किसी स्कूल में नहीं मिल सकती। जीवन में सबसे बड़ा थप्पड़ भरोसा मारता है। इसलिए भरोसा व उम्मीद ख़ुद से रखें। ख़ुद से जीतने की ज़िद्द करें; यही जीवन जीने की सर्वोत्तम कला व सर्वश्रेष्ठ अंदाज़ है।
●●●●
© डा. मुक्ता
माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी
संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈


