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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लेखनी सुमित्र की – दोहे ☆ डॉ राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ (संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम दोहे । )    लेखनी सुमित्र की – दोहे   आंसू सूखे आंख के, सूख रही है देह। इन यादों का क्या करूं, होती नहीं सदेह।।   याद तुम्हारी कुसुम -सी, खिली बिछी तत्काल । या समुद्र के गर्भ में, बिखरी मुक्ता माल।।   घन विद्युत सी याद है, देती कौंध उजास। कभी-कभी ऐसा लगे, करती है परिहास।   सूना सूना घर मगर, दिखे नहीं अवसाद। इसमें क्या अचरज भला, महक रही है याद।।   मास दिवस या वर्ष सब, होते गई व्यतीत। किंतु याद की कोख में, है जीवन अतीत।।   © डॉ राजकुमार “सुमित्र” 112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # 26 – आखिर में मेरा कुसूर भी… ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी

श्री राघवेंद्र तिवारी (प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज पस्तुत है आपका अभिनव गीत  “आखिर में मेरा कुसूर भी…”। ) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 26– ।। अभिनव गीत ।। ☆ ☆ आखिर में मेरा कुसूर भी... ☆ चिड़ियों को क्यों बाँट दिये पंख मछली को पाँव न दिये बँटवारे में, सुनो न  आप खींचते रहे हैं हाशिये   आँखों को दे दी बरसात साँसों को ग्रीष्म दे दिया चाँदनी को दे दी उजास धूपको दिया पीलिया   व्यथाकथा क्या कहें नदी की हम,...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ पाखण्ड ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) ☆ संजय दृष्टि  ☆ पाखंड ☆ मुखौटों की भीड़ से घिरा हूँ, किसी चेहरे तक पहुँचूँगा या नहीं प्रश्न बन खड़ा हूँ, मित्रता के मुखौटे में शत्रुता छिपाए, नेह के आवरण में विद्वेष से झल्लाए, शब्दों के अमृत में गरल की मात्रा दबाए, आत्मीयता के छद्म में ईर्ष्या से बौखलाए, मनुष्य मुखौटे क्यों जड़ता है, भीतर-बाहर अंतर क्यों रखता है? मुखौटे रचने-जड़ने में जितना समय बिताता है जीने के उतने ही पल आदमी व्यर्थ गंवाता है, श्वासोच्छवास में कलुष ने अस्तित्व को कसैला...
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हिन्दी साहित्य- लघुकथा ☆ तीन लघु कथाएं – घर ☆ डॉ. कुंवर प्रेमिल

डॉ कुंवर प्रेमिल (संस्कारधानी जबलपुर के वरिष्ठतम साहित्यकार डॉ कुंवर प्रेमिल जी को  विगत 50 वर्षों  से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में सतत लेखन का अनुभव हैं। अब तक 350 से अधिक लघुकथाएं रचित एवं ग्यारह  पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन।  आपकी लघुकथा ‘पूर्वाभ्यास’ को उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगांव के द्वितीय वर्ष स्नातक पाठ्यक्रम सत्र 2019-20 में शामिल किया गया है। वरिष्ठतम  साहित्यकारों  की पीढ़ी ने  उम्र के इस पड़ाव पर आने तक जीवन की कई  सामाजिक समस्याओं से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है,जो कदाचित उनकी रचनाओं में झलकता है। हम लोग इस पीढ़ी का आशीर्वाद पाकर कृतज्ञ हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी  "तीन लघुकथाएं  -घर "।) ☆ तीन लघु कथाएं – घर ☆ ☆ दिहाड़ी ☆ बेटा, पिता नहीं है पर यह घर है. इसे चाचा-ताऊ समझना. इन सबने इसे कितनी मुश्किल से बनाया था. इन सबके इंतकाल के बाद इसे मैं बड़ी मुश्किल से बचा पाई. मैने दिहाड़ी की पर घर नहीं बेचा. घर बेचना जमीर बेचना जैसा होता है मुन्ना. लड़के ने मान लिया...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शेष कुशल # 15 ☆ व्यंग्य ☆ अपना तो नहीं है, अपना मानने वालों की कमी भी नहीं है ☆ श्री शांतिलाल जैन

श्री शांतिलाल जैन (आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी  के  साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक  व्यंग्य  "अपना तो नहीं है, अपना मानने वालों की कमी भी नहीं है" । इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से हम आपसे उनके सर्वोत्कृष्ट व्यंग्य साझा करने का प्रयास करते रहते हैं । श्री शांतिलाल जैन जी के व्यंग्य में वर्णित सारी घटनाएं और सभी पात्र काल्पनिक होते हैं ।यदि किसी व्यक्ति से इसकी समानता होती है, तो उसे मात्र एक संयोग कहा जाएगा। हमारा विनम्र अनुरोध है कि  प्रत्येक व्यंग्य  को हिंदी साहित्य की व्यंग्य विधा की गंभीरता को समझते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। )  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल #...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 71 ☆ व्यंग्य – नमस्ते-नमस्ते ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय (श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर व्यंग्य - "नमस्ते-नमस्ते "। )  ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 71 ☆ ☆ व्यंग्य - नमस्ते-नमस्ते ☆ सुबह-सुबह टहलने निकलो तो बहुत से लोग परस्पर अभिवादन करते हैं। कोई नमस्ते, नमस्ते करता है, कोई गुड मॉर्निंग, कोई राधे राधे, कोई जय श्रीकृष्ण, तो कोई जय श्रीराम.... अपनी बचपन से आदत है कि सबको नमस्ते नमस्ते करते हैं। कुछ लोग इसमें भी बुरा मान जाते हैं, और कहते हैं तुम बड़े 'वो' हो, राधे राधे का जबाव राधे राधे से नहीं देते हो, तब...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी #19 ☆ यह कैसा छल है? ☆ श्री श्याम खापर्डे

श्री श्याम खापर्डे  (श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर, अर्थपूर्ण, विचारणीय  एवं भावप्रवण  कविता “यह कैसा छल है”। )  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 19 ☆  ☆ यह कैसा छल है ☆  यह कैसा छल है? रिश्ते भी क्या कमाल है सर्वत्र रिश्तों का मायाजाल है कुछ लोग रिश्ते जोड़ते हैं कुछ लोग रिश्ते तोड़ते हैं निभाता है कोई कोई आत्मा जिसकी नहीं है सोई यहाँ टूटते रिश्ते हर पल है यह कैसा छल है जिसने अपने सीने से भींचा जिसने अपने दूध से सींचा जिसने सर पर छांव बनाई जीवन की दौड़ सिखाई जिन्होंने चुभने दिया ना कांटा भूख, प्यास दोनों ने बांटा अन्तिम प्रहर में वो कितने निर्बल है यह कैसा छल है प्रेम तो है फूलों की गंध प्रेम भरता है जीवन में सुगंध प्रेम के लिए जीते हैं लोग प्रेम के लिए मरते हैं लोग प्रेम तों है नवजीवन की आशा प्रेम पर पहरे, घोर निराशा प्रेम पर प्रतिबंध, नहीं! यह तो दंगल है यह कैसा छल है आज...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 26 ☆ गर्व नसावा… ☆ कवी राज शास्त्री

कवी राज शास्त्री ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 26 ☆  ☆ गर्व नसावा… ☆ गर्व नसावा, मानहानी होईल गर्व नसावा, विनाकारण कलह होईल   गर्व नसावा, आपलेच घराचे वासे मोजतील गर्व नसावा, स्व:कीय ते परके होतील   गर्व नसावा, अधोगती होईल गर्व नसावा, जवळचे सर्व जाईल   गर्व नसावा, जगणे मुश्कील होईल गर्व नसावा, पाणी पाजण्या कोणीच नसेल   गर्व नसावा, गर्वाचे घर खाली पडेल गर्व नसावा, मृत्यू एक दिवस हमखास येईल   © कवी म. मुकुंदराज शास्त्री उपाख्य कवी राज शास्त्री श्री पंचकृष्ण आश्रम चिंचभुवन, वर्धा रोड नागपूर – 440005 मोबाईल ~9405403117, ~8390345500 ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ गझल – हौसच आहे ☆ सौ. गौरी सुभाष गाडेकर

सौ. गौरी सुभाष गाडेकर ☆ कवितेचा उत्सव ☆ गझल – हौसच आहे ☆ सौ. गौरी सुभाष गाडेकर ☆ अज्ञाताची अशी असोशी हौसच आहे सुखासीनता ठोकरण्याची हौसच आहे   नाकापुढती चालत जगणे सोपे तरीही अवघड आव्हाने घेण्याची हौसच आहे   मृदुमुलायम पायघड्यांची वाट  सोडुनी धोंड्यांमधुनी धडपडण्याची हौसच आहे   ऐषारामी नोकरीवरी लाथ मारुनी रित्या खिशाचा कवी होण्याची हौसच आहे   नोकरीतली दगदग सरली निवांत जगणे लष्करच्या रोट्या करण्याची हौसच आहे   शंभूधनुष्या बाण लावणे छंद असे हा सूर्याचा गोळा गिळण्याची हौसच आहे   © सौ. गौरी सुभाष गाडेकर संपर्क –  1/602, कैरव, जी. ई. लिंक्स, राम मंदिर रोड, गोरेगाव (पश्चिम), मुंबई 400104. फोन नं. 9820206306 ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈...
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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ अजि म्या भूत पाहिले (भाग पहिला) ☆ सौ. दीपा नारायण पुजारी

☆ जीवनरंग ☆ अजि म्या भूत पाहिले (भाग पहिला) ☆ सौ. दीपा नारायण पुजारी ☆  संध्याकाळचे सहा वाजले असावेत. नेहमीप्रमाणे मी गॅसवर चहाच भांडं ठेवलं. वासू येईलच इतक्यात. एक तासभर समोरच्या बागेत फिरून सहा वाजेपर्यंत येतोच तो.चहा घेत घेत अर्धा तास Zee Business बघतो. नंतर रात्रीच्या जेवणाची वेळ होईपर्यंत आबांच्या खोलीत पुस्तक वाचून दाखवयाला जातो. मी टेबलवर चहा बिस्किटं ठेवली आणी बागेला पाणी घालायला गेले. थोड्या वेळाने देवापाशी दिवा लावण्यापूर्वी रिकामा कप सिंक मध्ये ठेवला. तेव्हढ्यात . . "सुधा --s s  सुधा चहा  . . .s s s " काय हे? केव्हढा ओरडतोय हा! आणी चहा ? परत ? "वाजलेत किती बघ.आणी आज स्वारीला पुन्हा तल्लफ आलीय? आत्ताच तर घेतलास." "कुठे? तू दिलाच नाहीस? काय हो आबा? घेतला का मी चहा?" अरे, आत्ताच तर रिकामा कप धुतला मी. मग हा चहा प्यायला काय भूत आलं होतं कि काय!" "विसरतेस तू अलिकडे. दिलाच नाहीस तू चहा मला." मी थोड्या घुश्शातचं पुन्हा चहा ठेवला. रात्री नेहमीप्रमाणे झाकापाक केली. उरलेली पोळी भाजी use and throw च्या डब्यात ठेवली. किचनचे लाईटस् ऑफ केले....
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