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English Literature – Poetry ☆ Endured Anguish… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM (Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. An alumnus of IIM Ahmedabad was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.) We present his awesome poem Endured Anguish… We extend our heartiest thanks to the learned author  Captain Pravin Raghuvanshi Ji, who is very well conversant with Hindi, Sanskrit,  English and Urdu languages for sharing this classic poem.   ☆ Endured Anguish… ☆ Smelted constantly in the blazing inferno, Amalgamated ceaselessly in the virulent acid...   Endured anguish of the gory...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # 39 – मनोज के दोहे ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है “मनोज के दोहे”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। मनोज साहित्य # 39 – मनोज के दोहे ☆ ताल हुए बेताल अब, नीर गया है सूख। सूरज की गर्मी विकट, उजड़ रहे हैं रूख।।   नदी हुई अब बावली, पकड़ी सकरी राह। सूना तट यह देखता, जीवन की फिर चाह।।   पोखर दिखते घाव से, तड़प रहे हैं जीव। उपचारों के नाम से, खड़ी कर रहे नीव।।   झील हुई ओझल अभी, नाव सो रही रेत। तरबूजे सब्जी उगीं, झील हो गई  खेत।।   हरियाली गुम हो रही, सूरज करता दाह। प्यासे झरने हैं खड़े, दर्शक भूले राह।।   ©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)-  482002 मो  94258 62550 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका – भाग – 18 ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका - भाग - 18 संस्कृति अंतर्चेतना है, सभ्यता वाह्य व्यवहार। वस्त्र, खानपान, नृत्य, गीत, सब अलग पर भीतर से जुड़ा हुआ है। लोकसभ्यता, संस्कृति से अनुप्रेरित होती है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि सभ्य आदमी चम्मच से भोजन तो करने लग गया पर स्वाद से वंचित हो गया। संस्कृति को...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 168 ☆ लघुकथा – इच्छा मृत्यु… ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा – इच्छा मृत्यु … ।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 168 ☆ लघुकथा – इच्छा मृत्यु …  राजा शांतनु सत्यवती से विवाह करना चाहते थे. किंतु सत्यवती के पिता ने शर्त रख दी कि राज्य का उत्तराधिकारी सत्यवती का पुत्र ही हो. अपने पिता की सत्यवती से विवाह की प्रबल इच्छा को पूरा करने के लिए गंगा पुत्र भीष्म ने अखंड ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ले ली. पिता के प्रति प्रेम के इस अद्भुत त्याग से प्रसन्न हो, उन्होने भीष्म को इच्छा...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 128 – लघुकथा – चुनावी कशमकश… ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाती सशक्त लघुकथा  “चुनावी कशमकश …”। )  ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 128 ☆ ☆ लघुकथा – चुनावी कशमकश ☆ गाँव में चुनाव का माहौल बना हुआ था। घर- घर जाकर प्रत्याशी अपनी-अपनी योजना और लाभ का विवरण दे रहे थे। चुनाव कार्यालय से लगा हुआ छोटा सा मकान जिसमें अपने माता-पिता के साथ रूपा रहती थी। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। चाह कर भी रूपा पढ़ाई नहीं कर सकी। लेकिन सिलाई का कोर्स पूरा कर पूरे घर का खर्च चलाती थी। माँ बेचारी दिहाड़ी मजदूरी का काम करती थी और पिताजी पैर से लाचार होने के कारण ज्यादा कुछ नहीं कर पाते परंतु अपना स्वयं का खर्च किसी तरह काम करके निकाल लेते थे। चुनाव के झंडे, बैनर सिलने के लिए रूपा को दिया गया।...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ राजा और रजवाड़े ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार (श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख – “राजा और रजवाड़े”।) ☆ आलेख ☆ राजा और रजवाड़े ☆ श्री राकेश कुमार ☆ हमारे देश के राजवाड़े तो आज़ादी के बाद से ही समाप्त हो गए थे। उनको मिलने वाला गुजारा भत्ता( प्रिवीपर्स) भी बंद हुए कई दशक हो गए।            आज़ादी से पूर्व हमारे मालिक इंग्लैंड जिनके राज्य में सूर्यास्त भी नहीं हुआ करता था, अब थोड़े से में सिमट कर रह गए हैं। पुरानी बात है "राज चला गया पर शान नहीं गई"। वहां अभी भी प्रतीक के रूप में राज तंत्र विद्यमान हैं।      वहां की महारानी एलिजाबेथ की वर्ष 1952 में ताज पोशी हुई थी। उसकी सत्तरवी...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ ॥ मानस के मोती॥ -॥ मानस में भ्रातृ-प्रेम – भाग – 3 ॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ मानस के मोती॥ ☆ ॥ मानस में भ्रातृ-प्रेम - भाग - 3 ॥ - प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’☆ राम के साथ लक्ष्मण वन को गये। चौदह वर्षों तक उनके साथ रह सब कष्ट सहे और बड़े भाई और भाभी की सेवा व रक्षा की। लंका में युद्ध के समय जब लक्ष्मण को मेघनाद ने शक्ति से घायल किया। वे अचेत हो गये तो राम ने उनकी प्राण रक्षा के लिये यत्नकर वैद्यराज सुषेण के कथनानुसार हनुमान जी की योग्यता से हिमालय से संजीवनी बूटी मंगवाई और उन्हें स्वस्थ करने को सबकुछ किया। दुखी राम के इस कथन से उनके हृदय में भाई लक्ष्मण के प्रति गहन प्रेम की झलक स्पष्ट दिखाई देती है जब रुदन करते हुये वे कहते हैं- सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ, बंधु सदा तुम मृदुल सुभाऊ। मम हित लागि तजेहु पितु माता, सहेहु विपिन हिम आतप वाता॥ सो अनुराग कहां अब भाई, उठहु न सुनि मम बच बिकलाई। जो जनतेऊँ वन बंधु बिछोहूं, पिता वचन मनतेहू नहिं ओहू॥ सुत बित...
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ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ २८ जून – संपादकीय – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ई -अभिव्यक्ती -संवाद ☆ २८ जून – संपादकीय – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे – ई – अभिव्यक्ती (मराठी)  लोकप्रिय कवी व गीतकार श्री. भालचंद्र गजानन खांडेकर यांचा आज जन्मदिनही आणि स्मृतिदिनही .  ( २८/६/१९२२ – २८/६/१९९० )  पेशाने प्राध्यापक असणाऱ्या श्री खांडेकर यांची प्रेमातल्या विविध भावछटांचे उत्कट प्रकटीकरण करणारी कविता रसिकप्रिय झाली होती हे तर खरेच. पण त्याचवेळी, समाजातील दांभिकता आणि अन्याय, याविरुद्ध बंड पुकारण्याची त्यांची प्रामाणिक प्रवृत्तीही त्यांच्या काव्यामधून अनेकदा दिसून येत असे .  “ श्लोक केकावली “ , “ संजीवनी : ही काव्ये , तसेच “सं. एकच प्याला “ , “ सं. शारदा “ अशी नाटके यांच्या संहितेच्या संपादनाचे मोलाचे काम श्री. खांडेकर यांनी केले होते. “ चंद्रप्रकाश “, आणि “ गंधसमीर “ हे त्यांचे कवितासंग्रह प्रसिद्ध झाले होते.  श्री. भालचंद्र खांडेकर यांना विनम्र अभिवादन.  ☆☆☆☆☆ सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे  ई-अभिव्यक्ती संपादक मंडळ मराठी विभाग संदर्भ : विकिपीडिया. ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ मी निरांजनातील वात… ☆ कै भालचंद्र गजानन खांडेकर ☆

 कवितेचा उत्सव  ☆ मी निरांजनातील वात… ☆ कै भालचंद्र गजानन खांडेकर ☆  मी निरांजनातील वात माझ्या देवापाशी जळते हासत देवघरात   माझ्या प्रभूस माझी पारख माझ्या देवाचे मज कौतुक प्रभा प्रभूच्या सहवासाची फुलली या हृदयात   प्रशांत नीरव या एकान्ती शुचिर्भूतता सारी भवती पवित्र दर्शन सदा लोचना लाभतसे दिनरात   कणाकणातून प्रभा उधळिता पटे जिण्याची मज सार्थकता उषा फुलविता भयाण रात्री भासे रवितेजात   तुमची करण्यासाठी सेवा प्राणाहुती ही माझी देवा प्रकाशपूजन माझे घ्या हे जे प्राणाप्राणांत   मी निरांजनातील वात.    - कै भालचंद्र गजानन खांडेकर ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈  ...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पन्हाळगड… ☆ सुश्री दीप्ती कुलकर्णी ☆

सुश्री दीप्ती कुलकर्णी  कवितेचा उत्सव   ☆ पन्हाळगड… ☆ सुश्री दीप्ती कुलकर्णी☆ सुंदर-सुंदर, रुप मनोहर डोंगर-दर्या नि व्रुक्ष कलंदर रस्ता हा सर्पिल वळणे बिलंदर कडे-कपारी या भासती दुर्धर     पन्हाळा असा हा चित्तास वेधक   सांगू तरी किती स्थळाचं कौतुक  नरवीर बाजी नि जिवाचं बलिदान   मोरोपंतांच्या या आर्यांच गुणगान.     पाहावे तरुवर,वेली नि उद्यान   धान्याचं कोठार दरवाजा तीन   शिवराय स्पर्शानं, भूमी ही पावन   ताराराणींचा हा वाडा ही शान.     तटबंदी भक्कम,बुरुजांचा मान   गडाचं टोक ते भयावह. दारुण   गनिमी वाटा या यशासी कारण   आबालव्रुद्धांना खास आकर्षण.     थंड ही झुळुक, वात हा शीतल   शहारे तनमन,बनते ओढाळ   फुलांचा सुगंध,दरवळे परिमळ   धुके हे दाटते,वेढत स्थळ.     गडात गड हा पन्हाळा छान  शिवराय स्मृतींचे सोनेरी पान  मराठी मनाला सार्थ अभिमान  नतमस्तक होऊन राखावा मान.   © सुश्री दीप्ति कुलकर्णी कोल्हापूर ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈...
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