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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 20 ☆ विसाल ☆ – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा   (सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर (सिस्टम्स) महामेट्रो, पुणे हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “विसाल”। )   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 20 ☆ ☆ विसाल ☆ ज़ाफ़रानी* शामों में मैं जब भी घूमा करती थी नीली नदी के किनारे, नज़र पड़ ही जाती थी उस बेक़रार से दरख़्त पर और उस कभी न मानने वाली बेल पर!   आज अचानक देखा कि पहुँचने लगी है वो बेल उस नीली नदी किनारे खड़े अमलतास के उम्मीद भरे पीले दरख़्त पर, एहसास की धारा बनकर|   शायद वो खामोश रहती होगी, पर अपनी चौकन्नी आँखों से देखती रहती होगी उस दरख़्त के ज़हन के उतार-चढ़ाव, महसूस किया करती होगी उस दरख़्त की बेताबी, समझती होगी उस दरख़्त...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – स्त्रीत्व ☆ श्री संजय भारद्वाज

  श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )    ☆ संजय दृष्टि  –  स्त्रीत्व ☆   उन आँखों में बसी है स्त्री देह, देह नहीं, सिर्फ कुछ अंग विशेष, अंग विशेष भी नहीं केवल मादा चिरायंध, सोचता हूँ काश, इन आँखों में कभी बस सके स्त्री देह.., केवल देह नहीं स्त्रीत्व का सौरभ, केवल सौरभ नहीं अपितु स्त्रीत्व अपनी समग्रता के साथ, फिर सोचता हूँ समग्रता बसाने के लिए उन आँखों का व्यास भी तो बड़ा होना चाहिए!   समाज की आँख का व्यास बढ़ाने की मुहिम का हिस्सा बनें। आपका दिन...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ पैबंद ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “ (सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी”  जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है। आज प्रस्तुत है श्रीमती  हेमलता मिश्रा जी  की एक शिक्षाप्रद एवं प्रेरक लघुकथा पैबंद।)   ☆ लघुकथा – पैबंद  ☆   बरात बिदा हुई। रोती रोती नई दुल्हन श्यामा कब नींद में खो  गई पता ही नहीं चला। एकाएक नींद खुली,  पता लगा बरात ससुराल  द्वारे पहुंच चुकी है। परछन के लिए सासु माँ दरवाजे पर आ खडी हुईं। ज्यों ही हाथ उठाया बहू को परछन कर  टीका लगाने के लिए---कि ब्लाउज की  बाँह के पास पैबंद दिखाई पड़ा नई बहू को। कठोर पुरातनपंथी दादी सास और  माँ के पुछल्ले लल्ला--अपने ससुर जी के बारे में बहुत सुन रखा था...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #27 – वासनांचे कोपरे ☆ – श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे (वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक  सामयिक कविता  “वासनांचे कोपरे”।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 27 ☆   ☆ वासनांचे कोपरे ☆   केवढे हे कौर्य घडते रोज येथे बाप रे मी मुलीचा बाप आहे येत नाही झोप रे   पावसाळा गाळ सारा घेउनी गेला जरी स्वच्छ नाही होत यांच्या वासनांचे कोपरे   जाळण्या कचऱ्यास बंदी जाळती नारीस हे वृत्तपत्रे छापतांना अक्षरांना कापरे   फलक हे निर्जीव त्यांच्या चेहऱ्यावर वेदना झुंडशाहीला कुठे या कायद्याचा चाप रे   घोषणा अन् मागण्यांचे हे निखारे चालले राजभवनाच्या पुढे हे घेत नाही झेप रे   येउद्या शिवराज्य येथे वा शरीयत कायदा शीर वा हे हात तोडा थांबवा हे पाप रे   या सुया देतात जखमा आणि फिरती मोकळ्या जन्मभर नाही मिळाला या कळ्यांना लेप रे   © अशोक श्रीपाद भांबुरे धनकवडी, पुणे ४११ ०४३. मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८...
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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 16 ☆ कर्मभूमि के लिए बलिदान ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  (हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”  शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  प्रो सी बी श्रीवास्तव जी की प्रसिद्ध पुस्तक “कर्म भूमि के लिये बलिदान” पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा.  यह किताब ८ रोचक बाल कथाओ का संग्रह है। श्री विवेक जी  का ह्रदय से आभार जो वे प्रति सप्ताह एक उत्कृष्ट एवं प्रसिद्ध पुस्तक की चर्चा  कर हमें पढ़ने हेतु प्रेरित करते हैं। ) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 16 ☆  ☆ पुस्तक चर्चा – कर्म भूमि के लिये बलिदान  ☆ पुस्तक – कर्म भूमि के लिये बलिदान लेखक – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध मूल्य –  30 रु प्रकाशक –  बी एल एण्टरप्राईज जयपुर ISBN 978-81-905446-1-0   ☆ कर्म भूमि के...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 27 – प्रेम ☆ – श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’   (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक भावप्रवण लघुकथा  “ प्रेम ”। )  ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 27 ☆ ☆ लघुकथा – प्रेम ☆   रेल की पटरियों के किनारे, स्टेशन के प्लेटफार्म से थोड़ी दूर, ट्रेन को आते जाते  देखना रोज ही, मधुबनी का काम था। रूप यौवन से भरपूर, जो भी देखता  उसे मंत्रमुग्ध हो जाता था। कभी बालों को लहराते, कभी गगरी उठाए पानी ले जाते। धीरे-धीरे वह भी समझने लगी कि उसे हजारों आंखें देखती है। परंतु सोचती ट्रेन में बैठे मुसाफिर का आना जाना तो रोज है। कोई ट्रेन मेरे लिए क्यों रुकेगी। एक मालगाड़ी अक्सर कोयला लेकर वहां से निकलती। कोयला उठाने के लिए सभी दौड़ लगाते थे। उसका ड्राइवर जानबूझकर गाड़ी वहां पर धीमी गति से करता या फिर मधुबनी को रोज देखते हुए निकलता था। मधुबनी को उसका देखना अच्छा लगता था। परंतु...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – अष्टम अध्याय (15) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अष्टम अध्याय (ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर ) ( भक्ति योग का विषय )   मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्‌। नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ।।15।।   मुझे प्राप्त कर जन्म फिर पाते नहीं महान पर मुक्ति पाते जगत तो है दुख की खान।।15।।   भावार्थ :  परम सिद्धि को प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखों के घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते।।15।।   Having attained Me these great souls do not again take birth (here), which is the place of pain and is non-eternal; they have reached the highest perfection (liberation).।।15।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in`...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सामाजिक चेतना – #26 ☆ मेरा गाँव  ☆ सुश्री निशा नंदिनी भारतीय

सुश्री निशा नंदिनी भारतीय    (सुदूर उत्तर -पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना की अगली कड़ी में   प्रस्तुत है  उनकी  एक  कविता  “मेरा गाँव ”। आप प्रत्येक सोमवार सुश्री  निशा नंदिनी  जी के साहित्य से रूबरू हो सकते हैं।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना – #26 ☆ ☆ कविता – मेरा गाँव  ☆   सूना दिल मेरा तब आबाद हो गया गाँव से मेरे जब कोई संदेश आ गया। करते थे बहुत याद जिनको हम यादों को उनकी कोई आज सहला गया।   कुछ अजीज़ थे मेरे नदिया पार के उनकी यादों में कोई नहला गया।   इश्क में यारों का रूठना मनाना आज यादों में उनकी कोई भिगो गया।   हाथ फेरना बूढ़ी काकी का सिर पर मेरे दिला कर याद कोई था जो अपनत्व दे गया।   दिन वो बचपन के बेहद खूबसूरत थे मेरे दिला कर अहसास कोई दर्द में डूबो गया।   "निशा" फिर चाँद निकला है छत पर मेरी आज फिर गाँव से मेरे कोई आ गया।   © निशा नंदिनी भारतीय  तिनसुकिया, असम 9435533394...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – देह ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी - एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों - वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )    ☆ संजय दृष्टि  –  देह  ☆ आत्मतत्व है तो देह प्राणवान है, बिना आत्मतत्व देह निष्प्राण है.., दो पहलुओं से सिक्का ढलता है परस्परावलंबिता से जगत चलता है, माना आत्मऊर्जा से देह प्रकाशवान है पर देह बिना आत्म भी मृतक विधान है..!   ©  संजय भारद्वाज, पुणे ☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ मोबाइल– 9890122603 writersanjay@gmail.com ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 24 – ज़िन्दगी ☆ – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय   (श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की  अगली कड़ी में  उनकी एक कविता  “ज़िन्दगी”। आप प्रत्येक सोमवार उनके  साहित्य की विभिन्न विधाओं की रचना पढ़ सकेंगे।) ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 24 ☆ ☆ कविता – ज़िन्दगी   ☆    किसी ने कहा जिंदगी है खेल कोई पास कोई फेल पर उन्होंने जिंदगी खपा दी शब्दों को चुनने में शब्दों को तराशने में।   उन्हें गर्व हुआ अपनी होशियारी पर तभी नासमझ समय अट्टहास करते बोला "मूर्ख! तुमने नष्ट की है जिंदगी अपने स्मारक के पत्थर जुटाने में।"   © जय प्रकाश पाण्डेय 416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765...
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