हिन्दी साहित्य – कविता ☆ डायरी के बहाने ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ कविता  ☆ डायरी के बहाने ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

मेरी डायरी पर बहुत से

पते हो गये हैं

जब कभी पन्ने पलट कर देखता हूं

अनेक चेहरे

सामने आने लगते हैं

कब मिला, कहां मिला, कैसे मिला

सब याद दिलाने लगते हैं ।

जब कभी हम

कहीं दूर जाते हैं

नये लोगों से मिलते हैं

हम उनको वादा करते हैं

मिलते रहने का या

याद करते रहने का ।

पर बहुत दिनों तक नहीं चल पाता

यह सिलसिला

पते लिखे रह जाते हैं

चेहरे धुंधले होने लगते हैं ।

अचानक फिर किसी मोड़ पर

होती है मुलाकात

सामने वाला पूछता है-पहचाना?

कुछ याद नहीं आता ।

शर्मिंदगी का अहसास होने लगता है ।

फिर से लिखता हूं नाम और पता ।

डायरियां बदलती रहती हैं

नाम और पते

अपनी जरुरत के चलते

कटते और छूटते रहते हैं ।

सबकी अपनी अपनी जरुरत

अपने अपने शौक

कौन कब तक अच्छा लगे

जो याद रखा जाये ?

डायरी में नाम

कटते और छूटते रहते हैं ।

कभी ऐसा भी होता है

पता चलता है कि

लिखे नाम और पता वाला आदमी

इस दुनिया से विदा हो गया।

तब डायरी पर देर तक

देखता रह जाता हूं

सब याद आने लगता है ।

कब मिले , कहां मिले

कितने हंसे, कितने रोये

आंखें नम होने लगती हैं

बेशक नहीं जा पाता

उनकी अंतिम बेला में

पर लगता है

जीवन का कुछ छूट गया

भीतर ही भीतर कुछ टूट गया ।

कोई अपना चला गया

डायरी से नाम काटते वक्त

बड़ा अजीब लगता है

यह सोच कर कि इस पते पर

भेजी चिट्ठी का

कोई जवाब नहीं आएगा।

सच, मेरी चिट्ठी कभी पहुंच भी गयी

तो कौन देगा जवाब?

बेबसी में डायरी बंद कर देता हूं ।

क्या आपके साथ भी ऐसा नहीं होता,,,,?

 

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४७ – कविता – मन की बात… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “मन की बात…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४७ ?

? कविता – मन की बात… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

जन गण के लिए मन की बात  इक सौगात है

जन-जन की हुकूमत से होती सीधी बात है

=2=

नायक सभी चौकन्ने हैं,जन-हित के वास्ते

प्रतिनिधि लोक-सेवक,जनता के साथ है

=3=

खुशबू से महक उठा लोकतंत्र का चमन

विकास के आँगन में खिला पारिजात है

=4=

सरकारी योजनाओं से हर  रास्ते रोशन

कौन कह रहा है अब अंधेरी रात है

=5=

सड़कों का जाल बिछ चुका,अब गाँव-गाँव में

देहात ने मिलाया शहरों से हाथ है

=6=

भेदभाव के समस्त क्लेश मिट गये

इंसान हैं सभी,कहाँ अब जात-पाँत है ?

=7=

रहता डरा-डरा अब,ना-पाक पड़ोसी

हिन्द की सेना बनी,अब वज्रपात है

=8=

दुरुस्त-चुस्त शासन,मुस्तैद प्रशासन

विकसित भारत से तय,मुलाक़ात है

=9=

अच्छे दिनों का दौर अब,आया है दोस्तो

विकास की यही तो नई शुरुआत है

=10=

‘राजेश’ विश्व गुरु है,ये देश हमारा

बलाओं-संकटों से सबको,अब निज़ात है

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २२१ ☆ गीत – ।। जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २२१ ☆

☆ गीत ।। जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा।

सोच बदलते ही किस्मत का सितारा ही बदल जाएगा।।

**

जैसी होती है हमारी दृष्टि वैसा ही हम देख भी पाते हैं।

जो रंग आंखों में समाया वही ही हर जगह हम पाते हैं।।

बदला दृष्टिकोण जीवन नैया का किनारा बदल जाएगा।

जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा।।

**

यदि विचार और सोच उलटी तो देखते भी गलत हैं।

अहंकार राग-द्वेष से तो आदमी का तन-मन जलत है।।

लेकिन सहयोग सरोकार से हर सहारा बदल जाएगा।

जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा।।

**

बिना स्नेह-प्रेम के हमारे हर रिश्ते की हार हो जाती है।

बिन मधुरता के हर एक  बोली भी बेकार हो जाती है।।

बिन धन -दौलत के भी आपका गुजारा बदल जाएगा।

जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १९ – पर्यावरण दिवस!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता पर्यावरण दिवस!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १९ ☆

☆ पर्यावरण दिवस!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

☆

वृक्ष काटते जाते मानव, होगा क्या परिणाम रे ।

शीतलता कह कहाँ मिलेगी,जब आएगी घाम रे ।।

खो जाएंँगे मौसम सारे, नहीं मिलेगी बूंँद रे ।

जागो अब कब तक बैठोगे, ऐसे आंँखें मूंँद रे ।।

*

निशिदिन जंँगल खाली होते, धरती करती शोक रे ।

धानी चुनर फटती जाती, मानव इसको रोक रे ।।

रौद्र रूप जब धारे माता,  होगा क्या परिणाम रे ।

हरित क्रांति से वसुंधरा का, दृश्य बना अभिराम रे ।।

 *

पर्यावरण दिवस जब आए, आती सबको याद रे।

वृक्ष नीर हम लोग बचाएंँ, भूले इसके बाद रे।।

दिव्य संपदा का अति दोहन, होगा ये अभिशाप रे।

भारत माँ आवाज लगाती, बंद करो ये पाप रे।।

☆

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३४० ☆ भावना के दोहे – श्राद्ध पक्ष ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – श्राद्ध पक्ष।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३४०– साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – श्राद्ध पक्ष ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

मिले बुजुर्गों का हमें, छतरी रूपी हाथ।

हरदम ऐसी कामना, रहें हमेशा साथ।।

* 

श्राद्ध पक्ष में हम करें, करें  पिंड का दान।

पितरों का तर्पण करें, करते वो कल्याण।।

 *

करकशता है काग की, बनी यही पहचान।

फिर भी मिलता है उसे, श्राद्धपक्ष सम्मान।।

 *

गौ का  ग्रास निकालते, काग श्वान का भाग।

आस लगाए बैठते, गौ माता अरु काग।।

 *

श्रद्धा प्रादुर्भाव से, श्राद्ध पक्ष में आज।

पुरखों के आशीष से, बनते बिगड़े काज।।।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३२१ ☆ संतोष के दोहे – पितृ पक्ष… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  – संतोष के दोहे – पितृ पक्ष…। आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३२१ ☆

☆ संतोष के दोहे – पितृ पक्ष… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

पितरों को सादर नमन, वंदन शत शत बार

सदा आप ही हमारे, जीवन का आधार

*

तुम बिन सूना सा लगे, यह अपना घर द्वार

कोई देता है कहाँ, तुम सा लाड़ प्यार

तर्पण पितरों का करें, सदा प्रेम से आप

श्रद्धा से ही श्राद्ध है, हरती भव के ताप

जिनके पुण्य प्रताप से, जीवन में उल्लास

उनके ही आशीष से, रिद्धि सिद्धि का वास

पुण्य कर्म से सुधरता, अपना ही परलोक

करनी ऐसी कर चलो, घर में हो आलोक

आना जाना है लगा,यह जीवन का सार

अपने कर्मों से मिले,जीवन में सत्कार

पितृ भक्ति से सदा ही,जीवन सफल महान

पित्र चरण की धूल को,पूजे सकल जहान

ईश्वर के अस्तित्व का,हो जिनसे अहसास

धन्य धन्य वो लोग हैं, रहें पिता के पास

पितरों के आशीष से,जीवन में “संतोष”

सांची सेवा से बढ़े, सुखद शांति का कोष

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ११३ – गीत – टेढ़ी चाल… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – टेढ़ी चाल…।

? रचना संसार # ११३ ?

☆ गीत – टेढ़ी चाल…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ☆

☆

जब पसीना श्रम बहा है,

लक्ष्य रक्षित कर दिया।

काल की हर ठोकरों ने,

खूब शिक्षित कर दिया।।

**

विधि लिखा माथे हमारे,

सूद साहूकार का।

थी लगोटीं तन अकेली,

मोह बस सरकार का।।

*

टीस सावन दे गया था,

तन असिंचित कर दिया।

**

भ्रष्ट नेता चाल टेढ़ी,

नित्य कर लगते नए।

आग लगती है घरों में,

सब कुएँ भी ढह गए।।

*

आँख पर पट्टी बँधीं है,

रक्त रंजित कर दिया।।

**

देख आशाएँ भटकती,

मात्र गक्कड़ हाथ है।

प्याज के लाले पड़े हैं,

बस गरीबी साथ है।।

*

खाट टूटी भाग्य फूटे,

गात खंडित कर दिया।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ४१ – कविता – प्रत्याशा… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘प्रत्याशा…‘।)

☆ शशि साहित्य # ४१ ☆

? कविता – प्रत्याशा… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

चाहे हों बोझिल नींद से पलकें,

सपनों को तुम ना सोने देना…

*

लंबी दूरी तय करना है,

कदमों को ना थकने देना…

*

श्रम को अपना हथियार बना लो,

सफलता… सन्मुख शीश नवाने देना…

*

कल उसको पुनः उदय होना है,

तो सूरज को ढल जाने देना…

*

नयी है आभा, नई बहारें,

राह के कांटे, बिसरा देना…

*

चाहे तूफानों से हो जाए सामना,

 डोर आशा की थामें रहना…

*

विपरीत हो जाए सब राहें,

दीपक लगन का, जलाए रखना…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सिक्का… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सिक्का… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

मृत्यु क्या है?

फोटो का

फ्रेम में टँक जाना,

जीवन क्या है?

फ्रेम बनवाना,

फोटो खिंचवाना,

एक सिक्के के

दो पहलू हैं,

कभी इस ओर आना,

कभी उस पार जाना।

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️

💥 💥

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “पंख और परवाज़” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – पंख और परवाज़… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

किस किस के पंख होते हैं..

परिंदों के अलावा।

मन की भावनाओं के,

कल्पनाओं की उड़ानों के,

अभिलाषाओं और महत्वकांक्षाओं के

सपने सलौनों के

सजीली स्मृतियों के

रुपहले, सुनहरे और धुंधले, मटमैले अतीत के

परवाज़ के लिये आस्मां बहुत विशाल है

जैसे सीमाविहीन होता हो..?

कोई सरहद नहीं, कोई बंधन नहीं

जितना ऊंचा, जितनी दूर उड़ जाओ

भारी होने लगें जब तुम्हारे पंख

डैने जवाब देने लगें

उतर आना धीरे से धरातल पर

कुछ साकार होने को उत्साहित आशाएं

यहीं प्रतीक्षा करती मिल जाएंगी

धैर्य तो रखना होगा..

नतीजे आने में वक़्त तो लगता है, मेरे दोस्त…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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