हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४१ – पीतल की कैंची – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – पीतल की कैंची।)  

☆  चुभते तीर # १४१ – व्यंग्य  – पीतल की कैंची ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे के पुराने महिला कल्याण केंद्र के मुख्य बरामदे की दीवार पर लकड़ी के एक चौकोर खांचे में पीतल की एक भारी और पुरानी कैंची पिछले बीस सालों से टँगी हुई थी जिसकी धार पर वक्त की गर्द जम चुकी थी। उस दीवार के ठीक नीचे सीमेंट की एक पुरानी और टूटी हुई बेंच पर हर सुबह आठ बजते ही पार्वती अम्मा अपनी पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाती थीं। सफेद सूती साड़ी पहने और अपने कांपते हाथों में मखमल का एक पुराना खाली टुकड़ा थामे पार्वती अम्मा दिन भर उस पीतल की कैंची को एकटक निहारती रहती थीं। केंद्र में सुबह से ही आधुनिक महिला संगठनों की गाड़ियाँ आ रही थीं, शहर की पढ़ी-लिखी और रसूखदार महिला नेत्री मंच पर बराबरी और अधिकारों के पर्चे बाँट रही थीं और कैमरों की रोशनी चमक रही थी। उन नए समाजसेवियों और स्वागत गीत गाती छात्राओं को उस कोने में टँगी धूल भरी पुरानी कैंची से कोई सरोकार नहीं था। केंद्र का पुराना चपरासी मंगरू जब भी चाय की केतली लेकर उधर से निकलता तो अम्मा की उस निश्चल मूरत को देखकर सहम जाता था। अम्मा बहुत ही धीमे और कांपते स्वर में उससे पूछती थीं “क्यों रे मंगरू आज इस महिला समानता दिवस पर इस पुरानी कैंची से कोई नया फीता काटने का हुक्म हुआ क्या या आज भी सिर्फ मंच से बराबरी के खोखले वादे ही बाँटे जा रहे हैं?” मंगरू बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

कल्याण केंद्र में हाल ही में शहर के बड़े मंत्रालय से स्थानांतरित होकर आईं नई जिला महिला कल्याण अधिकारी अनुराधा शर्मा बहुत ही कड़क, आधुनिक सोच की धनी और प्रशासनिक अनुशासन की पक्की अफसर मानी जाती थीं। अनुराधा मैडम जब भी अपनी फाइलों के साथ समारोह स्थल का मुआयना करने निकलतीं तो उनकी नजर सबसे पहले उसी बेंच पर बैठी पार्वती अम्मा पर जाकर टिक जाती थी जिनकी नजरें हमेशा उस दीवार पर टँगी पीतल की कैंची पर जमी रहती थीं। अनुराधा मैडम को महिला समानता दिवस के इतने बड़े सरकारी आयोजन के बीच किसी वृद्ध महिला का इस तरह रोज आकर एक जंग लगी कैंची के आगे हाथ जोड़ना अंधविश्वास और केंद्र के माहौल को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय उद्घाटन सत्र का मुख्य भाषण समाप्त हुआ और मुख्य अतिथि वीआईपी कक्ष में जलपान के लिए चली गईं तो अनुराधा मैडम अपने सहायकों को छोड़कर सीधे पार्वती अम्मा के पास पहुँच गईं। अनुराधा मैडम ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “अम्मा आप इस उम्र में यहाँ बाहर बैठकर केंद्र का रास्ता क्यों रोक रही हैं, अगर आपको कोई विधवा पेंशन या सिलाई मशीन की सरकारी मदद चाहिए तो भीतर जाकर फॉर्म भरिए, इस तरह बाहर बैठकर दीवार पर टँगी एक पुरानी बेकार कैंची को घूरने से आपको कोई अधिकार नहीं मिलने वाला है।” पार्वती अम्मा ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोलीं “मैडम जी मैं किसी सरकारी खैरात या पेंशन के लिए यहाँ नहीं बैठी हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रही हूँ जब इस कैंची की धार उस बंधन को काटेगी जो किसी जमाने में इसी केंद्र की चौखट पर मुझ पर लादा गया था।”

अनुराधा मैडम को अम्मा का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “अम्मा आप किस बंधन की बात कर रही हैं, सरकार तो हर साल इस दिवस पर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लाखों का बजट और प्रशस्ति पत्र बाँटती है, फिर आपकी इस पुरानी कैंची का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध क्लर्क पंडित कृपाशंकर जी जो पिछले तीस सालों से उस केंद्र के हर उतार-चढ़ाव और इतिहास के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “मैडम जी अम्मा की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस कस्बे में पहली बार इस महिला स्वावलंबन केंद्र की स्थापना हुई थी तब अम्मा की इकलौती बेटी कल्याणी ने पूरे जिले में एक बहुत बड़ा कीर्तिमान रचा था।” अनुराधा मैडम ने उत्सुक होकर पूछा “कल्याणी ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस पीतल की कैंची से जुड़ा हुआ है?” पंडित कृपाशंकर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “मैडम कल्याणी उस समय पूरे जिले की सबसे होनहार और बहादुर लड़की थी, उसने कस्बे की सैकड़ों शोषित और बेबस महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए इस सिलाई केंद्र की नींव रखी थी, उसने अपने अभियान के प्रतीक के रूप में यह पीतल की कैंची इस दीवार पर टांगी थी और कसम खाई थी कि जब तक इस कस्बे की हर बेटी को पुरुषों के बराबर हक और सम्मान नहीं मिल जाएगा तब तक वह इस कैंची को यहाँ से नहीं हटाएगी।”

पार्वती अम्मा ने कृपाशंकर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस कैंची के हत्थे को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोलीं “हाँ मैडम मेरी कल्याणी ने उस दिन मंच पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि माँ यह कैंची केवल कपड़ा काटने का औजार नहीं बल्कि इस पूरे समाज में नारी की बराबरी का वह परचम है जिसे मुझे अपने हाथों से बुलंद करना है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह राजधानी से महिला आयोग का सबसे बड़ा समानता पुरस्कार जीतकर लौटेगी उस दिन वह खुद अपने हाथों से इस कैंची से एक नया सुनहरा फीता काटकर इस केंद्र को पूरे देश का सबसे बड़ा महिला आश्रम बनाएगी।” अनुराधा मैडम ने बहुत ही भावुक होकर पूछा “तो क्या बीस सालों में कल्याणी वह पुरस्कार लेकर वापस नहीं लौटी, क्या वह शहर जाकर किसी बड़े पद के अहंकार में अपनी इस बूढ़ी माँ और इस छोटे से कस्बे के केंद्र को हमेशा के लिए भूल गई?” अम्मा की आँखों में आँसू छलक आए और उन्होंने कहा “नहीं मैडम मेरी कल्याणी बहुत सच्ची लड़की थी, उसने मुझे पत्र में लिखा था कि माँ तुम इस कैंची पर नजर रखना, जिस दिन देश में महिला समानता दिवस की असली सार्थकता साबित होगी उस दिन मैं अपनी सबसे बड़ी जीत लेकर तुम्हारे चरणों में आऊँगी।” अनुराधा मैडम के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने ठान लिया कि वे खुद रिकॉर्ड रूम में जाकर उस बीस साल पुरानी पहली फाइल और कल्याणी की असलियत का पता लगाएंगी।

अनुराधा मैडम तुरंत केंद्र के गोपनीय अभिलेखागार में पहुँचीं और उन्होंने चपरासी को उस बीस साल पुराने महिला मंडल रजिस्टर और कल्याणी के प्रोजेक्ट की फाइल खोजने का हुक्म दिया। लगभग दो घंटे की कड़ी मशक्कत और धूल भरे बस्तों को खंगालने के बाद आखिरकार वह लाल कपड़े में बंधी पुरानी फाइल मिल गई। जैसे ही अनुराधा मैडम ने उस फाइल के आखिरी पन्नों को खोला और उसमें लगे सरकारी दस्तावेजों, बजट आवंटन रसीदों और अंतिम जांच रिपोर्टों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई और उनके हाथ बुरी तरह थरथराने लगे। उस फाइल में एक बहुत ही चौंकाने वाला कानूनी दस्तावेज लगा था जिसमें लिखा था कि बीस साल पहले जब कल्याणी ने उस आंदोलन की शुरुआत की थी तो तत्कालीन बड़े अफसरों और नेताओं ने महिला उत्थान के नाम पर आए करोड़ों के सरकारी फंड को अपनी निजी संस्थाओं में डकार लिया था। कल्याणी ने जब इस भारी भ्रष्टाचार का विरोध किया तो उसे डराने के लिए उसके परिवार को तबाह करने की धमकियाँ दी गईं और अंत में उसे राजधानी में एक बहुत बड़े महिला आयोग का निदेशक पद और आलीशान कोठी देकर चुप करा दिया गया। कल्याणी ने अपनी सारी कसमें ताक पर रखकर उस समझौते को स्वीकार कर लिया और उसी पैसे और रसूख के दम पर शहर की सबसे बड़ी अमीर समाजसेवी बन गई। अनुराधा मैडम ने जब उस फाइल के सबसे अंतिम पन्ने पर आज के इस राष्ट्रीय महिला समानता दिवस समारोह की मुख्य अतिथि और राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष का नाम और तस्वीर देखी तो उनका पूरा शरीर पसीने से भीग गया क्योंकि वह तस्वीर किसी और की नहीं बल्कि उसी कल्याणी की थी जो आज मंच पर मुख्य वक्ता बनकर भाषण दे रही थी।

अनुराधा मैडम कांपते कदमों से दौड़ते हुए बाहर बरामदे में आईं जहाँ पार्वती अम्मा अपनी लाठी के सहारे उस पीतल की कैंची से अपना माथा टिकाए खड़ी थीं। अनुराधा मैडम ने बहुत ही रुँधे गले से अम्मा के कांपते हाथों को पकड़ा और बिलखते हुए बोलीं “अम्मा आप जिस कल्याणी के लौटने और नारी को बराबरी दिलाने की राह देख रही हैं, वह तो बीस साल पहले ही अपने आदर्शों को बेचकर बहुत बड़ी हुक्मरान बन चुकी है और आज वही मंच पर बैठकर महिला समानता पर भाषण दे रही है, फिर आप बीस सालों से इस जंग लगी कैंची के आगे बैठकर किसका मातम मना रही हैं?” अम्मा ने अपनी धुंधली आँखों से अफसर मैडम को देखा और उनके चेहरे पर एक ऐसी दिल दहला देने वाली कड़वी मुस्कान तैर गई जिसने पूरे महिला कल्याण तंत्र और समाज के झूठे दावों की धज्जियाँ उड़ा दीं। अम्मा ने अपनी जेब से एक पुराना मुड़ा हुआ सरकारी पत्र निकाला और रोते हुए बोलीं “मैडम मुझे सब पता था कि वह सौदा हो चुका है और मेरी बेटी बहुत बड़ी साहिबा बन चुकी है।” अनुराधा मैडम ने स्तब्ध होकर पूछा “तो फिर अम्मा आप रोज यहाँ क्यों आती हैं?” अम्मा ने बिलखते हुए भरे गले से कहा “बेटी मैं बीस सालों से यहाँ किसी अफसर बेटी का इंतजार नहीं कर रही बल्कि रोज यहाँ आकर यह देखने आती हूँ कि जो औरतें बाहर दुनिया में नारी समानता और त्याग के बड़े-बड़े उपदेश देती हैं, जब वे अपने ही घर में अपनी अनपढ़ और बूढ़ी माँ को एक फटी साड़ी में बेसहारा छोड़ देती हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई बराबरी के पीछे छुपे इस खोखलेपन का अहसास होता है या नहीं।” अनुराधा मैडम सुन्न होकर उस पीतल की कैंची को ताकती रह गईं और पूरा महिला केंद्र उस बेबस माँ के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४० – महिला कल्याण विभाग – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – महिला कल्याण विभाग।)  

☆  चुभते तीर # १४० – व्यंग्य  – महिला कल्याण विभाग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

विकास भवन के महिला सशक्तीकरण प्रकोष्ठ के बाहर पीपल के पुराने चबूतरे पर बहत्तर साल की कौशल्या देवी हर बुधवार सुबह ठीक दस बजे आकर बैठ जाती थीं। उनकी कांपती गोद में लोहे की एक पुरानी सिलाई मशीन का जंग लगा गोल पहिया और बिना धागे की एक मुड़ी हुई सुई हमेशा रखी रहती थी। दफ़्तर का नया चपरासी जब भी उन्हें धूप में बैठा देखता तो चाय का कुल्हड़ मेज़ पर रखते हुए ठहाका लगाकर कहता कि “अम्मा जब आज छब्बीस अगस्त को महिला समानता दिवस के मौके पर बड़े साहब खुद नई सिलाई मशीनें और चेक बांटने आ रहे हैं तो इस लोहे के कबाड़ वाले पहिये को रोज़ अपनी छाती से लगाकर यहाँ अफ़सरों के आगे क्या तमाशा खड़ा करती हो।” कौशल्या देवी अपनी पुरानी धुंधली ऐनक को धोती के छोर से साफ करतीं और बहुत धीमी आवाज में मुस्कुराकर कहतीं कि “बेटा यह लोहे का गोल पहिया केवल कबाड़ नहीं है बल्कि इस पूरे महिला कल्याण विभाग की वो टूटी हुई धुरी है जिसने मेरी बेटी के स्वाभिमान को कागज़ों की स्याही में हमेशा के लिए दफ़न कर दिया है।” आसपास खड़े तमाम मुंशी और क्लर्क उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि “लगता है इस बुढ़ापे में अम्मा की मति मारी गई है जो समानता दिवस के पावन उत्सव को अपनी हठ की भेंट चढ़ाने चली आई हैं।” कौशल्या देवी किसी की बात का तनिक भी मलाल किए बिना उस लोहे के पहिये को अपनी कांपती उंगलियों से सहलातीं और चुपचाप गाड़ियों के काफिले का इंतज़ार करती रहती थीं।

महिला कल्याण विभाग के तमाम बाबू और अधिकारी कौशल्या देवी की इस साप्ताहिक मूक उपस्थिति से पूरी तरह वाकिफ थे और उन्हें एक सनकी वृद्धा मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे। दफ़्तर का बड़ा बाबू जब भी फाइलों का पुलिंदा लेकर निदेशक के केबिन की तरफ बढ़ता तो कौशल्या देवी बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़ी हो जातीं और हाथ जोड़कर कहतीं कि “बाबू जी क्या आज उस स्वरोज़गार अनुदान और सुरक्षा वाले कागज़ पर साहब के दस्तखत हो गए।” बाबू गुस्से में फाइलें पटकते हुए डांटकर कहता कि “अरे अम्मा जब तक डिजिटल पोर्टल पर आधार का ऑनलाइन सत्यापन पूरा नहीं होगा और तहसील से जांच रिपोर्ट नहीं आएगी तब तक कागज़ आगे नहीं बढ़ेगा और तुम इस जंग लगे पहिये को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटती रहोगी।” कौशल्या देवी बिना किसी प्रतिवाद के वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जातीं और उस लोहे के पहिये को अपनी हथेली पर घुमाने का निरर्थक प्रयास करने लगतीं जो हर बार लड़खड़ाकर उनकी गोदी में गिर जाता था। कस्बे के लोग आपस में तरह-तरह की बातें करते कि शायद अम्मा अपने किसी पुराने भत्ते के लिए यह सब कर रही हैं लेकिन किसी को भी उस पहिये और महिला समानता के इस भव्य जलसे के बीच छुपे भयानक रहस्य की ज़रा सी भी भनक नहीं थी।

दोपहर में अचानक महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के प्रमुख सचिव महोदय महिला समानता दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित भव्य राज्य स्तरीय सम्मेलन का उद्घाटन करने उसी विकास भवन पहुँचे। साहब की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरे परिसर में खलबली मच गई और आनन-फानन में स्वागत के लिए नए बैनर टांगे जाने लगे ताकि कोई कमी न दिखाई दे। मंच पर दीप प्रज्वलन और नारी सशक्तिकरण पर लंबा भाषण देने के बाद जब सचिव महोदय पत्रकारों की भीड़ के साथ बाहर निकले तो उनकी नज़र चबूतरे पर शांत बैठी कौशल्या देवी पर पड़ी जिनकी गोद में वही जंग लगा पहिया रखा था। अपनी संवेदनशील और जनहितैषी छवि का प्रदर्शन करने के लिए सचिव महोदय तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर कौशल्या देवी के पास पहुँचे और बड़े आदर से बोले कि “अम्मा आज महिला समानता दिवस पर हम मातृशक्ति को नमन करते हैं बताइए आपकी क्या पीड़ा है क्या आपको स्वरोज़गार योजना का लाभ नहीं मिल रहा है जिसे मैं तुरंत स्वीकृत करवाऊँ।” कौशल्या देवी ने अपनी पथराई आँखों से सचिव महोदय को देखा और अपने कांपते हाथों से वह जंग लगा पहिया आगे बढ़ाते हुए बोलीं कि “साहब जी अगर वाकई न्याय करना चाहते हैं तो ज़रा इस पहिये पर खुदी हुई सरकारी योजना की संख्या और यह मुड़ी सुई पहचान लीजिए।”

सचिव महोदय ने जब उस लोहे के पहिये को हाथ में लेकर गौर से देखा तो उस पर महिला स्वावलंबन योजना की मुहर के साथ उनकी खुद की पुरानी तारीख दर्ज थी। कौशल्या देवी की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस ठंडे पहिये पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोलीं कि “साहब पाँच साल पहले मेरी पढ़ी-लिखी बेटी ने अपने पैरों पर खड़े होने के लिए आपके इसी दफ़्तर से सिलाई केंद्र का लोन मांगा था। लेकिन आपके भ्रष्ट अफ़सरों ने उसे सिलाई मशीन देने के बहाने महीनों दफ़्तर के चक्कर कटवाए और बंद कमरों में उसका मानसिक और शारीरिक शोषण करने की कोशिश की। मेरी बेटी उस अपमान और बेबसी के बोझ को बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसने समाज के डर से अपनी जुबान बंद कर ली और आज वह घर के एक कोने में मानसिक रूप से अपंग होकर जिंदा लाश की तरह पड़ी है। मैं रोज़ यह सिलाई मशीन का पहिया यहाँ इसलिए लाती हूँ ताकि आपके इस मंच को बता सकूँ कि साल में सिर्फ एक दिन भाषण देकर नारी को देवी कह देने से समानता नहीं आती जब तक कि तुम्हारे दफ़्तर की कुर्सी पर बैठे दरिंदे एक बेबस औरत के स्वाभिमान को सरेआम नोंचना बंद न कर दें।” यह सुनते ही सचिव महोदय का चेहरा शर्म से झुक गया और पूरा विकास भवन गहरे सन्नाटे में डूब गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३९ – वरिष्ठ नागरिक – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – वरिष्ठ नागरिक।)  

☆  चुभते तीर # १३९ – व्यंग्य – वरिष्ठ नागरिक ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

सभागार के वातानुकूलित कमरे के मुख्य द्वार पर अठहत्तर साल के विश्वंभर दयाल अपनी लाठी टेकते हुए सुबह ठीक दस बजे आकर बैठ जाते थे। उनके कांपते हाथों में जरी के गोटे वाला एक पुराना पीला शॉल और मखमली डिब्बे में रखा एक सूखा हुआ मुरझाया गुलाब का फूल रहता था जिसे वे अपनी हथेली पर रखकर लगातार सहलाते रहते थे। सभागार का नया सुरक्षाकर्मी जब भी उन्हें गेट के पास बैठा देखता तो चाय का कुल्हड़ मेज़ पर पटकते हुए ठहाका लगाकर कहता कि “बाबा जब आज इक्कीस अगस्त को वरिष्ठ नागरिक दिवस के मौके पर बड़े साहब खुद नए शॉल और सम्मान बांटने आ रहे हैं तो इस फटे पुराने शॉल को रोज़ अपनी छाती से लगाकर यहाँ अधिकारियों के आगे नुमाइश क्यों लगाते हो।” विश्वंभर दयाल अपनी पुरानी ऐनक के धुंधले शीशे को धोती से पोंछते और बहुत धीमी आवाज़ में मुस्कुराकर कहते कि “बेटा यह जरीदार कपड़ा केवल रेशम का टुकड़ा नहीं है बल्कि इस पूरे समाज की उस अंधी संवेदनहीनता का वो ढोंग है जिस पर साल में सिर्फ एक दिन भाषणों की माला पहनाई जाती है।” सभागार में आने वाले तमाम मुंशी और युवा कार्यकर्ता उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि “लगता है इस बुढ़ापे में बाबा की मति मारी गई है जो सम्मान के इस पावन उत्सव को अपनी हठ की भेंट चढ़ाने चले हैं।” विश्वंभर दयाल किसी की कड़वी बात का तनिक भी बुरा माने बिना उस सूखे गुलाब की पंखुड़ियों को अपनी कांपती उंगलियों से संभालते और चुपचाप गाड़ियों के काफिले का इंतज़ार करते रहते थे।

सभागार के तमाम कर्मचारी विश्वंभर दयाल की इस मूक उपस्थिति से पूरी तरह परिचित हो चुके थे और उन्हें एक सनकी बुजुर्ग मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे। आयोजन समिति का बड़ा सचिव जब भी गुलदस्तों और मोमेंटो का ढेर लेकर मुख्य मंच की तरफ बढ़ता तो विश्वंभर दयाल बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़े हो जाते और हाथ जोड़कर कहते कि “बाबू जी क्या आज उस बुजुर्ग पेंशन और भरण-पोषण वाले कागज़ पर साहब की मुहर लग गई।” सचिव गुस्से में अपने चश्मे को ठीक करते हुए डांटकर कहता कि “अरे बाबा जब तक डिजिटल पोर्टल पर सत्यापन पूरा नहीं होगा और तहसील से नई रिपोर्ट नहीं आएगी तब तक कागज़ आगे नहीं बढ़ेगा और तुम इस पुराने शॉल को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटते रहोगे।” विश्वंभर दयाल बिना किसी प्रतिवाद के वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जाते और उस मखमली डिब्बे के ढक्कन को बार-बार खोलने और बंद करने का निरर्थक प्रयास करने लगते थे। शहर के लोग आपस में खुसर-पुसर करते कि शायद बाबा अपने बेटे से संपत्ति का कोई पुराना विवाद सुलझाने के लिए यह स्वांग रच रहे हैं लेकिन किसी को भी उस सूखे गुलाब और वरिष्ठ नागरिक दिवस के इस भव्य तमाशे के बीच छुपे भयानक रहस्य की ज़रा सी भी थाह नहीं लग पा रही थी।

दोपहर में अचानक जिले के नए जिलाधिकारी महोदय और समाज कल्याण अधिकारी वरिष्ठ नागरिक दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित भव्य समारोह का उद्घाटन करने सभागार पहुँच गए। साहब की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरे परिसर में खलबली मच गई और आनन-फानन में स्वागत के लिए रेड कारपेट बिछाया जाने लगा ताकि कोई कमी न दिखाई दे। मंच पर दीप प्रज्वलन और बुजुर्गों के सम्मान में कसीदे पढ़ने के बाद जब जिलाधिकारी महोदय पत्रकारों की भीड़ के साथ बाहर निकले तो उनकी नज़र मुख्य द्वार के कोने में शांत बैठे विश्वंभर दयाल पर पड़ी जिनकी गोद में वही पीला शॉल और सूखा गुलाब रखा था। अपनी जनप्रिय और संवेदनशील छवि का प्रदर्शन करने के लिए साहब तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर विश्वंभर दयाल के पास पहुँचे और बड़े आदर से बोले कि “बाबा आज वरिष्ठ नागरिक दिवस पर हम आप जैसे पूज्य बुजुर्गों को नमन करते हैं बताइए आपकी क्या पीड़ा है जिसे मैं तुरंत हल करवाऊँ क्या आपको वृद्धावस्था सम्मान का लाभ नहीं मिल रहा है।” विश्वंभर दयाल ने अपनी सूजी हुई आँखों से साहब को देखा और अपने कांपते हाथों से वह पीला शॉल और सूखा गुलाब साहब की हथेली पर रखते हुए बोले कि “साहब जी अगर वाकई न्याय करना चाहते हैं तो ज़रा इस शॉल के कोने पर छपा हुआ नाम और यह सूखा हुआ फूल पहचान लीजिए।”

साहब ने जब उस शॉल के कोने पर सुनहरे धागों से लिखी इबारत को पढ़ा तो उनके चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ गया और हाथ कांपने लगे क्योंकि उस पर पिछले साल का तारीखवार सरकारी सम्मान और खुद उनके अपने दस्तखत दर्ज थे। विश्वंभर दयाल की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस सूखे गुलाब पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोले कि “साहब ठीक पिछले साल इसी इक्कीस अगस्त को आपने इसी मंच पर मुझे जिले का सबसे सम्मानित वरिष्ठ नागरिक घोषित करके यह शॉल और फूल पहनाया था। लेकिन अगले ही दिन जब मेरे अफ़सर बेटे ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया तो मैं आपके दफ्तर में भरण-पोषण कानून की अर्जी लेकर साल भर भटकता रहा और आपके बाबू मुझसे फाइल आगे बढ़ाने के लिए रिश्वत मांगते रहे। मैं भूखा प्यासा फुटपाथ पर सोता रहा और कोई भी अफ़सर मेरी सुध लेने नहीं आया। मैं आज यह सरकारी शॉल और सूखा फूल आपको वापस लौटाने आया हूँ ताकि आपकी इस व्यवस्था को बता सकूँ कि साल में तीन सौ चौसठ दिन लावारिस छोड़ दिए जाने वाले बूढ़े बाप को साल के सिर्फ एक दिन मंच पर शॉल ओढ़ाकर देवता बना देना ही इस सभ्य समाज का सबसे घिनौना मज़ाक है।” यह सुनते ही जिलाधिकारी का सिर शर्म से पूरी तरह झुक गया और पूरे सभागार में ऐसा सन्नाटा छा गया जिसने वहाँ खड़े हर इंसान के ज़मीर को झकझोर कर रख दिया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४८ ☆ व्यंग्य – बेमिसाल यूनिवर्सिटी के छात्र-हितकारी पाठ्यक्रम ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘बेमिसाल यूनिवर्सिटी के छात्र-हितकारी पाठ्यक्रम‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४८ ☆

☆ व्यंग्य ☆ बेमिसाल यूनिवर्सिटी के छात्र-हितकारी पाठ्यक्रम ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

देश के मशहूरो-मारूफ़ शिक्षा संस्थान बेमिसाल यूनिवर्सिटी ने 20 जून को एक विज्ञप्ति निकाली जिसमें घोषणा की गयी कि यूनिवर्सिटी छात्रों के लिए दो नये रोज़गारोन्मुख पाठ्यक्रम आरंभ करने जा रही है जिनका उद्घाटन राज्य के माननीय राज्यपाल के कर कमलों द्वारा शीघ्र होगा।

विज्ञप्ति में कहा गया कि पिछले साल यूनिवर्सिटी छात्रों के लिए पन्द्रह दिन का अति उपयोगी ‘उपला मेकिंग‘ कोर्स चला चुकी है जो बहुत लोकप्रिय हुआ और जिसमें छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। विशेषकर छात्राओं का मत था कि यह कोर्स साधारण पढ़ाई की तुलना में बहुत दिलचस्प और उपयोगी साबित हुआ।

यूनिवर्सिटी ने अब निम्नलिखित दो उपयोगी पाठ्यक्रमों के आरंभ होने की घोषणा की है जिनकी अवधि एक वर्ष होगी और जिनमें सफल छात्रों को डिप्लोमा प्रदान किया जाएगा। विज्ञप्ति में यह विश्वास दिलाया गया कि ये पाठ्यक्रम छात्रों को नौकरी या व्यवसाय करने में बहुत सहायक सिद्ध होंगे।

  1. एडवांस्ड कोर्स इन सायकोफ़ैंसी :-

इस पाठ्यक्रम को हिन्दी में ‘चाटुकारी का उन्नत पाठ्यक्रम‘ कहा जाएगा। यूनिवर्सिटी में बहुत समय से यह शिद्दत से महसूस किया जा रहा था कि- कोरी शिक्षा और डिग्री से जीवन में सफलता और तरक्की हासिल करना मुश्किल है। पढ़-लिख कर आदमी नौकरी तो पा सकता है, लेकिन प्रोमोशन के लिए कुछ और गुण आवश्यक महसूस होते हैं, वर्ना काबिल लोग पांव पीटते रह जाते हैं और चतुर गधे बुलन्दी पर पहुंच जाते हैं। इसी तरह बिज़नेस में ऊंचाई हासिल करने के लिए सत्ता के रसूखदारों को साधना ज़रूरी होता है, जिसके लिए चाटुकारी अत्यावश्यक होती है। इसलिए शैक्षणिक योग्यता में ठकुरसुहाती या ब्याजस्तुति की गोटा-किनारी लगाना ज़रूरी है। राजाओं के ज़माने में यह काम भाटों और चारणों के द्वारा किया जाता था।

इस पाठ्यक्रम के सफल संचालन के लिए यूनिवर्सिटी देश के शीर्षास्थ चाटुकारों को ‘विज़िटिंग प्रोफेसर’ के रूप में आमंत्रित करेगी। सौभाग्य की बात है कि देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है। अनेक जन-प्रतिनिधि इस कला में सिद्ध हैं। नेता के मुख से कोई प्रस्ताव निकलते ही तुरंत समर्थन में हाथ उठाते हैं। सोचने-समझने की ज़रूरत नहीं।  इन्हें देखकर एक फिल्मी गीत याद आता है— ‘जो तुमको हो पसन्द वही बात कहेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे।’ हमारे बॉलीवुड में इस कला में सिद्ध अनेक कलाकार बैठे हैं। एक बुज़ुर्ग कलाकार सार्वजनिक रूप से गर्व के साथ अपने को एक बड़े नेता का ‘चमचा’ घोषित कर चुके हैं। समझदार फिल्म निर्माता ऐसी फिल्में बना रहे हैं जिनसे सरकार खुश हो और टैक्स में छूट मिले, भले ही समाज में ज़हर फैले। इस गुण से संपन्न अनेक मीडिया चैनल भी हैं जिन्हें  ‘गोदी मीडिया’ नाम से विभूषित किया गया है।

कुछ लोगों में चाटुकारी की नैसर्गिक प्रतिभा होती है। वे हवा का रुख देखते ही अपने व्यवहार में पलटी मारते हैं। बनारस विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर साहब ने गोबर के उपले बनाने का प्रशिक्षण दिया, और  इस तरह छात्रों के दिमाग़ में भरपूर गोबर भरा। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज की प्रिंसिपल महोदया ने अंतरात्मा की पुकार पर छात्रों के क्लासरूम की दीवारों को गोबर से पुतवा दिया। परिणामत: छात्रों ने वही सलूक प्रिंसिपल महोदया के ऑफिस के साथ किया।

एक महंत जी हैं जो प्रभु के निर्देश पर एक राजनीतिक पार्टी में प्रवेश कर गये। फिर प्रभु के निर्देश पर दूसरी पार्टी में चले गये। फिलहाल वे अपनी नयी पार्टी के नेता में बुद्ध, महावीर और गांधी की छवि देख रहे हैं।

विज्ञप्ति में कहा गया कि भगवान भी अपनी प्रशंसा सुनना पसंद करते हैं। अजामिल की कथा इसका प्रमाण है। इसीलिए चतुर लोग मन में भक्ति न होते हुए भी मुंह से नारायण का जाप करते रहते हैं ताकि उन्हें भी धोखे से स्वर्ग में ‘एंट्री’ मिल जाए।

‌यूनिवर्सिटी की विज्ञप्ति में निष्कर्ष स्वरूप कहा गया कि संसार की बड़ी बाधाओं को चाटुकारी के अमोघ अस्त्र से जीता जा सकता है, और अन्त में रामायण की चौपाई उद्धृत की— ‘सकल पदारथ हैं जग माहीं, करमहीन नर पावत नाहीं।’  मतलब यह कि जो जन चाटुकारी नहीं कर पाते, उन्हें संसार में कुछ नहीं मिलता। वे मुट्ठी बांधे आते हैं और हाथ पसारे संसार से विदा हो जाते हैं।

  1. एडवांस्ड कोर्स इन डिस्सिम्युलेशन :-

इस कोर्स को ‘वाक्छल का उन्नत पाठ्यक्रम‘ कहा जा सकता है। यह भी बहुत उपयोगी और ज़रूरी पाठ्यक्रम है, ख़ासकर राजनीतिज्ञों और अफसरों के लिए। राजनीति में जनता को छलने और उनका वोट लेने के लिए बड़े-बड़े वादे करने पड़ते हैं। फिर वादे पूरे न होने पर जब जनता जवाब मांगती है तो वाक्छल की कला जान छुड़ाने के लिए बहुत काम आती है। जब जनता देश की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल पूछने लगती है तो मंत्री जी फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था की बात करने लगते हैं। एक जन- प्रतिनिधि को देखा जो अपने चुनाव-क्षेत्र गये थे। जब जनता उनके सामने अपनी शिकायतें रखने लगी तो नेताजी मुट्ठी उठाकर ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम’ के नारे लगाने लगे। इसके बाद वे कार में बैठकर वहां से फुर्र हो गये।

जनसेवा के जज़्बे से भरे नेताओं को कई बार दुखी मन से दल बदलना पड़ता है। तब जनता का सामना होने पर वाक्छल की कला बहुत काम आती है।

वाक्छल का उत्तम नमूना महाभारत में युधिष्ठिर का वक्तव्य था जिसमें वे गुरु द्रोण को अश्वत्थामा की मृत्यु का झूठा समाचार देते समय ‘अश्वत्थामा हत:‘ के पीछे ‘नरो वा कुंजरो वा’ जोड़ देते हैं।

अफसरों को भी जनता की शिकायतों का सामना करते समय अपना और अपने आकाओं का बचाव करना पड़ता है। इसके लिए जनता को नाना प्रकार से बहलाना और बहकाना पड़ता है। जब जनता के तर्कों का जवाब नहीं सूझता तो अफसर अंग्रेजी और कथा वाचक संस्कृत बोलने लगते हैं। पंडितों के मंत्रों के बारे में एक लेख में परसाई जी लिखते हैं— ‘जिन मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, वे अगर संस्कृत से हिन्दी में कर दिये जाएं तो प्राइमरी स्कूल की किताब के लायक हैं।’

यूनिवर्सिटी की विज्ञप्ति में कहा गया है कि हमारे देश में वाक्छल में माहिर लोग बड़ी संख्या में हैं। देश में ज़्यादातर लोगों के अल्पशिक्षित होने के कारण इस कला में माहिर लोगों की जनता को बहलाने में सफलता निश्चित रहती है। यूनिवर्सिटी ने लिखा कि वह इस  कला में उच्च योग्यता प्राप्त विद्वज्जन को आमंत्रित कर छात्रों को इस कला में दीक्षित करेगी।

विज्ञप्ति के अन्त में लिखा गया कि यूनिवर्सिटी आगे भी इसी प्रकार छात्रोपयोगी पाठ्यक्रमों का अन्वेषण कर छात्रों का हित करने के उपक्रम में सन्नद्ध रहेगी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
3

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३८ – पंडित जी की भविष्यवाणी – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – पंडित जी की भविष्यवाणी।)  

☆  चुभते तीर # १३८ – व्यंग्य  – पंडित जी की भविष्यवाणी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शर्मा जी भाग्य और हस्तरेखा पर इतना अटूट विश्वास रखते थे कि सुबह का पहला कदम भी पंचांग देखकर ही घर की चौखट से बाहर निकालते थे। उनके मोहल्ले में नए आए पंडित विद्याधर शास्त्री का दावा था कि वे इंसान के पैर का अंगूठा देखकर बता सकते हैं कि उसका आने वाला समय कैसा बीतेगा।

शर्मा जी रविवार की सुबह अपनी दाहिनी हथेली और पैर का अंगूठा लिए पंडित जी के आश्रम पहुँच गए। आश्रम में पहले से ही दफ़्तर के दो-तीन लोग अपनी किस्मत का ताला खुलवाने के इंतज़ार में बैठे थे।

पंडित जी ने अपनी बड़ी सी ऐनक नाक पर टिकाई, शर्मा जी के पैर के अंगूठे को दो मिनट तक गौर से देखा, फिर गहरी सांस छोड़कर अपना सिर हिलाया।

“शर्मा जी, मामला बहुत गंभीर है,” पंडित जी ने गंभीर आवाज़ में कहा, “आपके ग्रह बता रहे हैं कि अगले चौबीस घंटे के भीतर आपके साथ एक बहुत बड़ा धोखा होने वाला है। कोई अपना ही व्यक्ति आपके धन पर हाथ साफ़ करने वाला है।”

शर्मा जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनके दिमाग में तुरंत अपने साले, दफ़्तर के जूनियर और दूध वाले का चेहरा घूमने लगा। उन्होंने तुरंत पूछा, “पंडित जी, कोई उपाय? कोई ताबीज?”

पंडित जी ने मुस्कुराकर एक लाल धागा निकाला और बोले, “यह सिद्ध धागा अपनी दाहिनी कलाई पर बांधिए और अगले चौबीस घंटे तक अपने सारे पैसे, बटुआ और क्रेडिट कार्ड किसी गुप्त स्थान पर छुपाकर रख दीजिए। किसी पर विश्वास मत कीजिए।”

शर्मा जी ने ₹1100 दक्षिणा दी, धागा बंधवाया और भागे-भागे घर आए। घर पहुँचते ही उन्होंने अलमारी से अपना सारा नकद और पर्स निकाला और उसे अपने पुराने जूतों के डिब्बे में डालकर पलंग के सबसे गहरे कोने में छुपा दिया। यहाँ तक कि पत्नी को भी भनक नहीं लगने दी, क्योंकि पंडित जी ने कहा था—’कोई अपना ही धोखा देगा!’

पूरा दिन शर्मा जी जासूसों की तरह घर के हर कोने पर नज़र रखे रहे। जब भी पत्नी पास आती, वे अपना हाथ जेब पर रख लेते। रात भर वे सो नहीं पाए। हर आहट पर उन्हें लगता कि कोई चोर उनका जूतों का डिब्बा चुराने आ रहा है।

अगली सुबह आठ बज गए। पूरे चौबीस घंटे बीत चुके थे। शर्मा जी ने राहत की लंबी सांस ली। पंडित जी की भविष्यवाणी झूठी साबित हुई थी! उनका खजाना सुरक्षित था।

वे मुस्कुराते हुए पलंग के नीचे झुके और जूतों का डिब्बा बाहर निकाला। डिब्बा खोला तो शर्मा जी के होश उड़ गए! डिब्बा बिल्कुल खाली था। अंदर न पर्स था, न एक भी रुपया!

शर्मा जी चीखते हुए बाहर भागे, “चोरी हो गई! धोखा हो गया!”

तभी उनकी पत्नी हाथ में झाड़ू लिए आई और शांत भाव से बोलीं, “चिल्लाना बंद कीजिए। कल जब आप पंडित जी के यहाँ गए थे, तो कबाड़ी आया था। मैंने आपके पलंग के नीचे पड़े पुराने गल चुके जूतों के डिब्बे कबाड़ में ₹50 में बेच दिए। पर हाँ, डिब्बे के अंदर आपका पर्स मिला था, तो मैंने उससे पंडित जी की ₹1100 दक्षिणा और महीने का राशन चुकता कर दिया।”

शर्मा जी का मुंह खुला का खुला रह गया। पंडित जी की भविष्यवाणी सौ फ़ीसदी सच साबित हुई थी—धोखा चौबीस घंटे के अंदर ही हुआ था, और करने वाला कोई ‘अपना’ ही था!

शर्मा जी सिर पकड़कर वहीं बैठ गए। पूरा मोहल्ला एकत्र हो गया और पंडित जी की इस ‘सटीक भविष्यवाणी’ की महिमा पर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाने लगा।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३७ – गुप्ता जी का ऑनलाइन ऑफर – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – गुप्ता जी का ऑनलाइन ऑफर।)  

☆  चुभते तीर # १३७ – व्यंग्य  – गुप्ता जी का ऑनलाइन ऑफर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

गुप्ता जी के जीवन का एक ही स्वर्णिम सिद्धांत था—’छूट चाहे एक रुपये की हो, उसे छोड़ना पाप है।’ उनके फ़ोन में दुनिया भर की शॉपिंग ऐप्स का ऐसा जाल बिछा था कि नोटिफिकेशन आते ही उनका अंगूठा अपने आप ‘बाय नॉव’ पर चला जाता था।

एक दिन अचानक उनके फोन पर लाल अक्षरों में चमचमाता हुआ मैसेज आया—’महा-बचत ऑफर! केवल अगले दस मिनट के लिए, ₹50,000 का प्रीमियम एयर प्योरिफायर पाएं मात्र ₹499 में!’

गुप्ता जी की बाछें खिल गईं। उन्होंने न बाएं देखा न दाएं, तुरंत क्रेडिट कार्ड का नंबर डाला और ऑर्डर कन्फर्म कर दिया। अगले ही पल उनके खाते से ₹499 कटने का मैसेज आ गया। गुप्ता जी ने ऐसे राहत की सांस ली जैसे किसी युद्ध में आख़िरी किला फतह कर लिया हो। वे पूरे मोहल्ले में घूम-घूमकर अपनी इस ‘ऐतिहासिक खरीददारी’ की शेखी बघारने लगे।

तीन दिन बाद कूरियर वाला एक बहुत बड़ा कार्डबोर्ड का बक्सा लेकर आया। बक्से का आकार इतना विशाल था कि उसे ड्राइंग रूम में रखने के लिए गुप्ता जी को अपने सोफ़े की जगह बदलनी पड़ी। पत्नी ने संदेह भरी नजरों से बक्से को देखा, “इस बक्से में सचमुच पंखा और फिल्टर है भी या केवल डिब्बा खरीद लाए हैं?”

गुप्ता जी ने मूंछों पर ताव दिया, “अरे तुम क्या जानो कॉर्पोरेट मार्केटिंग के दांव-पेच! कंपनियां कई बार प्रचार के लिए घाटे में सामान बेचती हैं।”

गुप्ता जी ने कैंची उठाई और बक्से को टेप काटकर खोला। अंदर एक और बक्सा था। उस बक्से को खोला तो उसके अंदर एक और छोटा बक्सा निकला। जैसे-जैसे बक्से खुलते गए, गुप्ता जी के माथे पर पसीने की बूंदें गहरी होती गईं। यह किसी जापानी खिलौने की तरह डिब्बे के अंदर डिब्बे का सिलसिला था।

आखिरकार जब छठा और सबसे छोटा बक्सा खुला, तो उसके अंदर से एक छोटा सा प्लास्टिक का पौधा और एक छोटी सी पर्ची निकली।

पर्ची पर लिखा था: “बधाई हो! यह मनी प्लांट का प्राकृतिक एयर प्योरिफायर है। यह हवा में ऑक्सीजन घोलता है और ज़हरीली गैसों को सोखता है। 100% प्राकृतिक और बिना बिजली का!”

पत्नी ने अपना माथा पीट लिया और ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगीं। गुप्ता जी का चेहरा ऐसा उतर गया जैसे किसी ने गरमा-गरम चाय में नींबू का रस निचोड़ दिया हो। ₹499 में उन्होंने दरअसल ₹10 का एक प्लास्टिक का गमला और उसकी पैकिंग का खर्च उठाया था।

तभी दरवाज़े पर पड़ोसी शर्मा जी आ पहुंचे। शर्मा जी ने उस बड़े बक्से और छोटे गमले को देखा और मुस्कुराते हुए बोले, “क्यों गुप्ता जी, हवा शुद्ध हुई या सिर्फ़ पॉकेट हल्की हुई?”

गुप्ता जी ने एक पल का विराम लिया, तुरंत अपना चश्मा ठीक किया और मुस्कुराकर बोले, “शर्मा जी, इसे कहते हैं असली दूरदर्शिता! बिजली का बिल शून्य, ज़ीरो मेंटेनेंस, और देखिए डिब्बों का कबाड़ बेचकर मुझे ₹500 वापस भी मिल गए! यानी प्योरिफायर बिल्कुल मुफ़्त!”

शर्मा जी का मुंह खुला का खुला रह गया और पूरा परिवार गुप्ता जी की इस बेमिसाल जुगाड़-बुद्धि पर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाने लगा।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६८ ☆ व्यंग्य – “ऑनलाइन अध्यक्ष के ऑफ़लाइन दुःख…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “ऑनलाइन अध्यक्ष के ऑफ़लाइन दुःख…” ।)

☆ शेष कुशल # ६८ ☆

☆ व्यंग्य – “ऑनलाइन अध्यक्ष के ऑफ़लाइन दुःख…” – शांतिलाल जैन ☆

पिछले अठ्ठाइस दिनों से कलफ़ लगे कुरते-पजामे अपने पहने जाने की हसरत लिए उनकी ओर तक रहे हैं. उन शॉलों की संख्या में भी इज़ाफा नहीं हो रहा जिनके बारे में उनके मन में एक अदम्य लेकिन भोला विश्वास है कि एक दिन वे कोलकाता के द रसेल एक्सचेंज में नीलाम की जाएँगी और हिंदी जगत का कोई धरोहर प्रेमी कोई उन्हें ऊँची बोली लगाकर खरीद लेगा. उनके शेल्फ में लकड़ी के चौकोर गत्ते पर टिके लगभग नौ इंच ऊँचे तीन जगह से टेढ़े हुए जा रिए स्मृति चिन्ह की वृद्धि दर स्थिर हो गई है. फूलमालाओं की एडिक्ट हो चुकी गर्दन के अपने तकाज़े हैं. रह रह कर एक तलब सी उठती है. कर कमल बुके ग्रहण करने को कुलबुलाने लगते हैं. दरअसल, वे भी चाहते हैं कुरते-पजामे पहने जाएँ मगर विवश हैं. ऑकेजन बन ही नहीं रहा. ऐसा नहीं है कि पिछले अठ्ठाइस दिनों में उन्होंने किसी गोष्ठी की अध्यक्षता न की हो. की है. तीन-चार की है, मगर ऑनलाइन, वर्चुअल. आग लगे ऐसी तकनालॉजी को जिसने अध्यक्षीय ठाठ ख़त्म कर दिए. अध्यक्षता गूगल मीट पर हो तो चाय भी घर की पीनी पड़ती है श्रीमान्. टू-जीबी डेटा ज़ेब का लग जाता है सो अलग. हैरान हैं वे – बारात में जाना और पान-सुपारी घर की खाना, ये कौनसी बात हुई!!

ऑफ़लाइन अध्यक्षयाई के दिन भी क्या स्वर्णिम दिन हुआ करते थे. सुदूर शिमला-मसूरी-नैनीताल तक से ऑफर आया करते थे. जलवा हुआ करे था अध्यक्षजी का. सेकंड एसी से यात्रा. एक्सक्लूसिव टैक्सी का इंतजाम. थ्री स्टार स्टे, मिसेज अध्यक्ष के साथ साईट सीइंग के आनंद का प्रबंध. क्लोज डोअर रसरंजन की सुविधा. मेमोरेबल गिफ्ट. आयोजक बिछे-बिछे जाते थे. डिजिटल क्रांति ने अध्यक्षीय रुतबे पर पानी फेर दिया है. वे बड़े लेखक हैं. चालीस साल पहले उन्होंने एक उपन्यास लिखकर चतुर्दिक ख्याति पाई है. उसके बाद वे चाहकर भी कभी कुछ नहीं लिख पाए, साहित्यिक जगत उन्हें अध्यक्षता से विराम जो लेने नहीं दे रहा. इन चार दशकों में उन्हें अध्यक्ष होने की लत लग गई है. कितना कारूणिक है यह सब कि उम्र और साहित्यिक यात्रा के इस मोड़ पर उन्हें ऑनलाइन के दुःख झेलने पड़ रहे हैं.

सुदूर डेस्टिनेशन तो छोड़िए, इन दिनों शहर के शहर में आयोजक ऑनलाइन कार्यक्रम करा लेते हैं. पर्देदारी यह कि दूसरे शहर से भी कुछ वक्ताओं को जोड़ना है सर. ऑनलाइन से पूर्व के कालखंड में जब अपने ही शहर में हुआ करता था ऑफ़लाइन व्याख्यान तब अध्यक्षजी का जलवा देख देख कर स्थानीय प्रतीक्षारत अध्यक्षीय उम्मीदवारों के कलेजों पर साँप लोट जाया करते थे. ‘हाय हमारा नंबर कब आएगा?’ दो वालिंटियर कार लेकर पंद्रह मिनट पहले घर के बाहर हाज़िर. साहित्य में फिजीकल योगदान देते कार्यकर्ता घंटी देने के बाद अध्यक्षजी के घर से बाहर आने की प्रतीक्षा करते. आपस में बतियाते. बीच बीच में मरियल सी देसी कुतिया को लतियाकर भगाते हुए समय काट रहे हैं. कुतिया भी अध्यक्षजी को लेने आई कार का रियर व्हील भिगोने के मिशन पर है. प्रतिबद्ध. उसे एक सिंपल सा फैक्ट नहीं पता है – एक प्रतिबद्ध प्राणी हर दौर में लतियाया ही जाता है. खैर, साहित्य सेवा में असल त्याग तो इन दोनों वालिंटियर्स का है, दोनों निस्पृह भाव से सड़क पर खड़े उनकी प्रतीक्षा जो कर रहे हैं.

चलिए, अध्यक्षजी तैयार हैं मगर बाहर नहीं आ रहे. टाईम से बाहर निकल आएँ तो अध्यक्ष होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता. एनवक़्त पर डियो मिल नहीं रहा.  बेडरूम से ड्राइंगरूम तक आने में समय लग रहा है. कोई बात नहीं – बड़े आदमी हैं. हाँ कर दी यही बहुत है. प्रस्ताव आया तब तो उन्होंने मना ही कर दी थी. मिनिमम तीन मनुहार से कम में हाँ करते ही कब हैं? कहा कि इस दिन मुझे देहरादून एक कार्यक्रम की अध्यक्षता करने जाना है. काफी मनुहार के बाद उन्होंने देहरादून का कार्यक्रम निरस्त करके इस स्थानीय कार्यक्रम की हाँ की है. घंटाभर प्रतीक्षा भी करना पड़े तो कोई बात नहीं. बड़े आदमी हैं. थैंक गॉड. आधे घंटे बाद ही बाहर आ गए हैं. कार में बैठते बैठते पूछा – अरे आप लोगों ने चाय ली? (पानी तक मयस्सर नहीं हुआ). मगर – नहीं नहीं सर, अभी नहीं. पहले चलते हैं. देर हो गई है. डियो की तेज़ महक से रास्तेभर वालिंटियर्स का जी मिचलाता रहा. मैंने ऊपर बताया ना आपको – साहित्य सेवा में असल त्याग तो इन दोनों कार्यकर्ताओं का है.   

बहरहाल, अध्यक्ष होने का जन्मसिद्ध अधिकार पाए साहित्यकार को ऑनलाइन के कारण हिंदी साहित्य में ऐसे बुरे देखने पड़ेंगे उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था. ऊँचा मंच, बीच में उनकी दो इंच ऊँची कुर्सी, बिसलेरी का पानी, संचालिका से बीच बीच में बतियाने का सुख काफ़ूर हो गया है. सामान्यतः मिनिमम ऑडियंस की भूमिका में उनकी अपनी एक निजी सेना होती है. लगभग हर स्थानीय कार्यक्रम में मौजूद. अपनी चेयर पर बैठे बैठे जड़ हो जाने तक जमी रहती. नई किताब की भूमिका लिखवाने की गरज से आखिर तक जमे रहते कुछ नए लेखक, अध्यक्षजी की आँखों की शर्म से रुक जाया करते जूनियर लेखक. कुछ मोबाइल पर बात करने की एक्शन करते करते  हॉल से एग्जिट कर जाते,  फिर भी कुछ तो अध्यक्षीय उद्बोधन के समाप्त होने तक रुकते ही. क्या तो सुख था! फोटोग्राफर के लेन्स की जद में आते ही अध्यक्षजी सीरियस हो जाते, गंभीर मुद्रा में सोचने लगते या कुछ नोट्स लेने की अदाएँ फोटो में कैद करा लेते. अब तो बस स्क्रीन शॉट है, इनसेट-वन-बी से मौसम की ली हुई तस्वीर से मिलता जुलता. और है एक मसोसा हुआ मन. अध्यक्षीय धज ख़त्म जो हो गई है.

ऑनलाइन कार्यक्रमों से आयोजकों के अलावा किसी को आराम मिला है तो वो माँ शारदे को मिला है. डेढ़ बाय दो की फ्रेम में कैद माँ को आभार प्रदर्शन की आख़िरी पंक्ति तक सुनना पड़ती थी. चार अगरबत्तियों की खुशबू में साढ़े तीन घंटे गुजारना कितना भारी पड़ता था उन्हें. इनके चक्कर में वीणा बजाने की रियाज़ छूट जाया करती सो अलग. प्रोग्राम के बाद अध्यक्षजी तो कार में निकल जाया करते, उन्हें किसी वालिंटियर की एक्टिवा के फुट-बोर्ड पर लौटना पड़ता. प्रसन्न हैं वे, ऑफ़लाइन में शिरकत करने की विवशताएँ ख़त्म जो हो गई हैं.

आशा पर आकाश टिका है श्रीमान्. ऑफ़लाइन का बीज अभी पूरी तरह डूबा नहीं है. रेगिस्तान में नखलिस्तान की तरह बीच बीच में कहीं कहीं ऑफ़लाइन बुलावे भी आ रहे हैं. अठ्ठाइस दिन पहले एक ऑफ़लाइन कार्यक्रम में बुलाए जाने से मिले रिजुविनेशन से चार हफ्ते कट गए.  अब फिर कलफ़ लगे कुरते-पजामे अपने पहने जाने की हसरत लिए उनकी ओर तक रहे हैं. पुराने दिन वैसे के वैसे लौटेंगे कि नहीं पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता. हम तो यही चाहेंगे आग लगे गूगल-मीट, झूम-मीटिंग, माइक्रोसॉफ्ट-टीम, मेटावर्स की तकनालॉजी में. अध्यक्षजी के अच्छे दिन लौट आएँ – हमारी शुभकामनाएँ.

फ़िल-वक़्त “Meeting Ended by Host”.

-x-x-x-

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३६ – शादी का गुलाब जामुन – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – शादी का गुलाब जामुन।)  

☆  चुभते तीर # १३६ – व्यंग्य  – शादी का गुलाब जामुन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

 अवधेश जी के जीवन का एक ही ध्येय था—शादी के मंडप में बने ‘वीआईपी’ खाने की गुणवत्ता का निरीक्षण करना। वे मोहल्ले के ऐसे पारखी थे जो बिना न्यौता कार्ड देखे भी बता सकते थे कि किस मैरिज हॉल में असली देसी घी का इस्तेमाल हो रहा है और कहाँ रिफाइंड का गोलमाल चल रहा है।

इस बार शादी उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी, पड़ोस के वर्मा जी के बेटे की थी। वर्मा जी ने तीन महीने पहले से ही शेखी बघारना शुरू कर दिया था कि उन्होंने लखनऊ के सबसे महंगे हलवाई को बुलाया है और जो गुलाब जामुन उनकी शादी में मिलेगा, वैसा पूरे प्रदेश में कहीं नहीं बना होगा।

अवधेश जी शादी में पहुंचे तो उनकी नज़र सीधे मीठे के स्टॉल पर टिकी। वहाँ एक विशाल पीतल के कड़ाहे में गरमा-गरम बड़े-बड़े गुलाब जामुन तैर रहे थे। खुशबू ऐसी थी कि दूर खड़े आदमी के मुंह में भी पानी आ जाए। अवधेश जी ने अपनी प्लेट उठाई और गुलाब जामुन के काउंटर की तरफ कदम बढ़ाए।

लेकिन जैसे ही वे पहुँचे, हलवाई ने एक बड़ा सा बोर्ड लगा दिया—’आरक्षित: केवल समधी जी और विशेष अतिथियों के लिए’।

अवधेश जी की अनाहत भावना तिलमिला उठी। एक तरफ वर्मा जी दूर खड़े होकर उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे, जैसे कह रहे हों—’आज तो तरसते ही रह जाओगे अवधेश जी!’

अवधेश जी ने ठान लिया कि चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए, वे वह गुलाब जामुन खाकर ही रहेंगे। उन्होंने अपनी रणनीति बदली। उन्होंने देखा कि समधी जी का परिवार एक अलग बने लाल शामियाने में बैठा हुआ था, जहाँ वेटर हाथ में ढकी हुई चांदी की थालियाँ लेकर जा रहे थे।

अवधेश जी ने झट से अपनी जैकेट उतारी, गले में एक लाल गमछा लपेटा और एक खाली थाल उठाकर सीधे वीआईपी शामियाने की तरफ बढ़ गए। वे ऐसे हाव-भाव से चलने लगे जैसे शादी के मुख्य प्रबंधक वही हों।

शामियाने के गेट पर खड़े सुरक्षाकर्मी ने उन्हें रोका, “सर, आप अंदर कहाँ जा रहे हैं?”

धेश जी ने आंखें तरेरीं और कड़क आवाज़ में बोले, “मूर्ख! दिखता नहीं कि समधी जी की स्पेशल प्लेट में एक गुलाब जामुन कम है? अगर उन्होंने बुरा मान लिया तो शादी रुक जाएगी, ज़िम्मेदारी तुम्हारी होगी?”

सुरक्षाकर्मी डर के मारे पीछे हट गया। अवधेश जी सीधे मुख्य मेज़ पर पहुंचे जहाँ दूल्हे के पिता यानी स्वयं समधी जी बैठे थे। अवधेश जी ने बहुत ही आदर से प्लेट उनके सामने रखी और एक बड़ा सा गुलाब जामुन अपनी प्लेट में उठाकर कोने में टेबल पर बैठ गए।

पहला चम्मच मुंह में डालते ही अवधेश जी की आंखें बंद हो गईं। सचमुच, ऐसा अद्भुत स्वाद उन्होंने पहले कभी नहीं चखा था। लेकिन तभी पीछे से वर्मा जी की कड़क आवाज़ गूंजी, “अवधेश जी! आप समधी जी के निजी शामियाने में क्या कर रहे हैं?”

पूरा शामियाना शांत हो गया। समधी जी ने अवधेश जी की तरफ देखा। अवधेश जी का राज़ खुल चुका था।

अवधेश जी आराम से खड़े हुए, मुंह का निवाला निगला और मुस्कुराकर बोले, “वर्मा जी, मैं तो बस यह जांचने आया था कि आपके समधी जी को सबसे बेहतरीन चीज़ मिल रही है या नहीं। और अब मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि समधी जी, आपने बिल्कुल सही घर में रिश्ता जोड़ा है, जहाँ मेहमानावजी दिल से होती है!”

समधी जी खुशी से गद्गद हो गए। उन्होंने उठकर अवधेश जी को गले लगा लिया और कहा, “वाह! ऐसे फ़िक्र करने वाले पड़ोसी किस्मत वालों को मिलते हैं।”

पूरा शामियाना तालियों से गूंज उठा। वर्मा जी का मुंह बन गया, लेकिन उन्हें भी मुस्कुराकर ताली बजानी पड़ी, जबकि अवधेश जी आराम से दूसरा गुलाब जामुन उठाने लगे।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३५ – बॉस की पुरानी डायरी – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – बॉस की पुरानी डायरी।)  

☆  चुभते तीर # १३५ – व्यंग्य  – बॉस की पुरानी डायरी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

गुप्ता जी के रिटायर्ड होते ही दफ़्तर की अलमारी की सफ़ाई का काम नए नवेले जूनियर क्लर्क रमन को सौंपा गया। अलमारी का निचला ड्रॉर पिछले बीस सालों से बंद पड़ा था। उसके ताले पर जंग की ऐसी मोटी परत चढ़ी थी जैसे किसी पुराने रिश्ते पर वक्त की धूल। जब रमन ने हथौड़ी से ताला तोड़ा, तो अंदर से कागज़ों के कबाड़ के बीच चमड़े के ज़िल्द वाली एक पुरानी काली डायरी निकली।

उस डायरी के पहले पन्ने पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—’दफ़्तर के गुप्त रहस्य और तरक्की का अचूक मंत्र’।

रमन की आंखों में चमक आ गई। कॉर्पोरेट दुनिया में सीधे रास्ते से चलने वाले अक्सर दफ़्तर के दरवाज़े पर ही खड़े रह जाते हैं, जबकि शॉर्टकट वाले लिफ़्ट से सीधे पाँचवें माले पर पहुँचते हैं। रमन ने डायरी को अपनी जैकेट में छुपाया और चाय के टपरे पर जाकर पन्ने पलटने लगा।

डायरी में कोई सरकारी हिसाब नहीं था, बल्कि दफ़्तर के हर साहब की कमज़ोरियों का पूरा आलेख था। लिखा था कि बड़े साहब को जब गुस्सा आए तो अदरक वाली चाय में आधा चम्मच शहद डालकर दो, उनका गुस्सा मक्खन की तरह पिघल जाएगा। दूसरे साहब को अगर मीटिंग में हराना हो, तो बातों-बातों में उनकी पुरानी गाड़ी की तारीफ़ कर दो, वे खुश होकर हर फाइल पर दस्तखत कर देंगे।

रमन ने डायरी के हर पन्ने को किसी धार्मिक ग्रंथ की तरह रट लिया। अगले दो महीनों में दफ़्तर में चमत्कार होने लगा। जो बड़े साहब बात-बात पर क्लर्कों पर गरजते थे, वे रमन को देखते ही मुस्कुराने लगते। जिसकी फाइलें तीन-तीन महीने लटकी रहती थीं, रमन का नाम लेते ही वो फाइलें हवा की रफ्तार से आगे बढ़ने लगतीं। पूरे दफ़्तर में फुसफुसाहट शुरू हो गई कि रमन पर ज़रूर किसी सिद्ध संत का हाथ है।

वार्षिक समीक्षा का दिन आया। इस बार ‘बेस्ट एम्पलाई’ के पुरस्कार के लिए रमन का नाम सबसे ऊपर था। पुराने सीनियर साहब, जो रमन की इस अचानक तरक्की से जलते थे, उन्होंने भरे हॉल में माइक संभाल लिया।

उन्होंने रमन पर निशाना साधते हुए कहा, “रमन ने काम क्या किया, यह तो कोई नहीं जानता, लेकिन इसके पास ज़रूर कोई ऐसी जादुई छड़ी है जिससे यह हर साहब को अपनी उंगलियों पर नचाता है। मैं मांग करता हूँ कि इसकी इस जादुई डायरी को सबके सामने पेश किया जाए!”

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। रमन का दिल दहल गया। अगर डायरी का सच बाहर आया, तो उसकी नौकरी का जनाज़ा निकल जाएगा। रमन ने कांपते हाथों से अपनी जेब से वह काली डायरी निकाली और मंच पर जाकर बड़े साहब के हाथ में थमा दी।

बड़े साहब ने चश्मा लगाया और डायरी का अंतिम पन्ना खोला, जो अब तक रमन ने भी नहीं पढ़ा था।

अंतिम पन्ने पर गुप्ता जी की लिखावट में लिखा था: “यदि आप यह डायरी पढ़ रहे हैं, तो समझ लीजिए कि यह कोई जादू नहीं है। दफ़्तर में काम कागज़ों से नहीं, इंसान के स्वभाव को समझने से होता है। जो इंसान अपनों का मूड समझ ले, वही असली अफ़सर है।”

बड़े साहब की आंखें भर आईं। उन्होंने डायरी बंद की और रमन को गले लगा लिया। पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। रमन ने राहत की सांस ली और मन ही मन माना कि सबसे बड़ा कूटनीतिज्ञ वही है जो बिना लड़े मैदान जीत ले।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३४ – मुख्य अतिथि का भाषण – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – मुख्य अतिथि का भाषण।)  

☆  चुभते तीर # १३४ – व्यंग्य  – मुख्य अतिथि का भाषण ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शास्त्री नगर की ‘साहित्य कला परिषद’ का वार्षिक उत्सव बिना किसी रोड़े के पूरा हो जाए, ऐसा होना सूरज के पश्चिम से निकलने जैसा असंभव था। इस बार का मुख्य आकर्षण थे प्रसिद्ध लेखक और विचारक डॉ. पी. एन. त्रिपाठी, जिन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। त्रिपाठी जी का एक ही असूल था—भाषण जितना लंबा और उबाऊ होगा, उनकी विद्वत्ता उतनी ही गहरी मानी जाएगी।

सभागार खचाखच भरा हुआ था। पहली पंक्ति में बैठे संस्था के अध्यक्ष गुप्ता जी बार-बार अपनी घड़ी देख रहे थे। शाम के सात बज चुके थे, और आयोजकों को डर था कि अगर भाषण आठ बजे से आगे खिंचा, तो पूरा हॉल खाली हो जाएगा क्योंकि पास के मैरिज हॉल में मुफ़्त का शाही भोजन तैयार हो रहा था।

त्रिपाठी जी मंच पर आए। उन्होंने अपने भारी-भरकम चश्मे को नाक पर टिकाया, कागजों का एक मोटा पुलिंदा मेज़ पर रखा और बोलना शुरू किया। विषय था: ‘आधुनिक समाज में नैतिक मूल्यों की गिरती हुई दीवारें और हमारी वैचारिक जिम्मेदारी’।

शुरुआती पंद्रह मिनट में ही ऑडिटोरियम में बैठे आधे लोगों की पलकें भारी होने लगीं। बीस मिनट बीतते-बीतते पीछे की पंक्ति के दो सदस्य गहरी नींद में खर्राटे लेने लगे। गुप्ता जी ने मंच के कोने में खड़े सचिव को इशारा किया कि किसी तरह भाषण समेटा जाए।

सचिव ने हिम्मत करके एक छोटी सी पर्ची पर लिखा—’सर, समय कम है, कृपया अंतिम निष्कर्ष पर आएं’—और उसे बड़ी चालाकी से पानी के गिलास के नीचे सरका दिया।

त्रिपाठी जी ने गिलास उठाया, पर्ची देखी, चश्मा ठीक किया और ज़ोर से बोले, “हमारे अध्यक्ष जी ने मुझे याद दिलाया है कि समय सीमा समाप्त हो रही है। लेकिन क्या विचार कभी समय के पाबंद हो सकते हैं? नहीं! इसलिए मैं अपने भाषण का दूसरा भाग प्रस्तुत करने जा रहा हूँ!”

यह सुनते ही दर्शकों के बीच एक ठंडी सी हरकत हुई। कई लोग उठकर भागने की ताक में दरवाज़े की तरफ देखने लगे। गुप्ता जी का पसीना छूटने लगा। अगर मेहमान भाग गए, तो अगले साल का चंदा डूब जाएगा।

तभी बिजली अचानक गोल हो गई। पूरा हॉल अंधेरे में डूब गया।

लोग राहत की सांस लेने ही वाले थे कि त्रिपाठी जी की गर्जती हुई आवाज़ गूंजी, “अंधेरा मेरे विचारों की रोशनी को नहीं रोक सकता! मैं बिना माइक के भी जारी रखूँगा!” और वे अंधेरे में ही अपने कागज़ पढ़ने लगे।

तभी पीछे के दरवाज़े से एक छोटे बच्चे की मासूम आवाज़ गूंजी, “पापा! बाहर शाही पनीर और गुलाब जामुन खत्म हो रहे हैं, कैटरिंग वाले कह रहे हैं कि सिर्फ़ दस प्लेट बची हैं!”

फिर क्या था! बिजली आने से पहले ही पूरे हॉल में ऐसी भगदड़ मची कि पंद्रह सेकंड के अंदर पूरी जनता ऑडिटोरियम से बाहर मैरिज हॉल की तरफ दौड़ पड़ी। जब तीन मिनट बाद जनरेटर चालू हुआ, तो मंच पर केवल त्रिपाठी जी खड़े थे और सामने पूरे हॉल में सिर्फ़ खाली कुर्सियाँ उनका इंतज़ार कर रही थीं।

त्रिपाठी जी ने खाली हॉल की तरफ देखा, मुस्कराए और पानी का घूंट पीकर बोले, “देखा गुप्ता जी? मेरे भाषण का प्रभाव इतना तीव्र था कि लोग सत्य की खोज में तुरंत क्रियाशील हो गए!”

पीछे छुपे गुप्ता जी ने बाहर आकर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाना शुरू कर दिया, यह सोचते हुए कि कम से कम गुलाब जामुन बचाने का विचार एकदम सटीक निकला।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares