हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६४ ☆ लघुकथा – गणेश चौथ ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा गणेश चौथ। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६४ ☆

☆ लघुकथा – गणेश चौथ ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

‘आज गणेश चौथ है आप भी व्रत होंगी?’ सासूजी खुद तो व्रत रखती ही थीं आस-पड़ोसवालों से भी पूछती रहतीं –‘ नहीं’ या ‘हाँ’ के उत्तर में सामने से एक प्रश्न दग जाता – ‘और आपकी बहू?’ ‘उसके लड़का नहीं है ना? हमारे यहाँ लड़के की माँ ही गणेशचौथ का व्रत रखती है। ‘

ना चाहते हुए भी मेरे कानों में आवाज पड़ ही जाती थी। तभी मैंने सुना आस्था दादी से उलझ रही है – ‘दादी। लड़के के लिए व्रत रखती हैं आप! लड़की के लिए कौन-सा व्रत होता है?’

‘ऐं — लड़कियों के लिए कोई व्रत रखता है क्या?’- दादी बोलीं

‘पर क्यों नहीं रखता’ – रुआँसी होती आस्था ने पूछा।

‘अरे, हमें का पता। जाकर अपनी मम्मी से पूछो, बहुत पढ़ी-लिखी हैं वही बताएंगी। ’

आस्था रोनी सूरत बनाकर मेरे सामने खड़ी थी। आस्था के गाल पर स्नेह भरी हल्की चपत मैं लगाकर बोली – ‘ये पूजा- पाठ संतान के लिए होती है। ’

‘संतान मतलब?’

‘हमारे बच्चे और क्या। ‘

आस्था के चेहरे पर भाव आँख – मिचौली खेल रहे थे। सासूजी पूजा करने बैठीं, तिल के लड्डूओं का भोग बना था। उन्होंने अपने बेटे रजत को टीका करने के लिए आरती का थाल उठाया ही था कि रजत ने अपनी बेटियों को आगे कर दिया – ‘पहले इन्हें माँ’। तिल की सौंधी महक घर भर में पसर गयी थी।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ करफिआँल (फूलगोभी) जैसा रोजा (गुलाब) ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆

डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी एक संवेदनशील एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार के अतिरिक्त वरिष्ठ चिकित्सक  के रूप में समाज को अपनी सेवाओं दे रहे हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें (दो  हिंदी  तथा एक अंग्रेजी और एक बांग्ला भाषा में ) प्रकाशित हो चुकी हैं।  आपकी रचनाओं का अंग्रेजी, उड़िया, मराठी और गुजराती  भाषाओं में अनुवाद हो  चुकाहै। आप कथाबिंब ‘ द्वारा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (2013, 2017 और 2019) से पुरस्कृत हैं एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा “हिंदी सेवी सम्मान “ से सम्मानित हैं।)

☆ कथा कहानी ☆ करफिआँल (फूलगोभी) जैसा रोजा (गुलाब) ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी 

ऽखिड़की के काँच से इस तरह सटी हैं कि दोनों आँखें फैल गयीं हैं। बाँसुरी सी नाक हो गयी है चप्टी। बाहर बर्फ गिर रही है। देखते देखते सामने के आड़ू के पेड़ सान्ताक्लाज की तरह सफेद हो गये। पापा बता रहे थे – दिसंबर जनवरी में तो बुल्गारिया में -30.सेल्सिअस तक तापमान चला जाता है। बाप रे! इस समय तो फिर भी गनीमत है।

वो – वो रही एक ब्रवचे – यानी गौरैया – आड़ू के पेड़ से उड़ कर नीचे आ गयी। पंख फड़फड़ा रही है। परों के बीच हवा भर कर कैसी गेंद सी हो गयी है। पापा कहते हैं, ‘‘अनु, कोई चीज देखो तो उसका बल्गारियाई शब्द याद करो। तभी न इस भाषा को जल्दी सीख पाओगे। ”तो, पेड़ नहीं दरवाँ। और पत्तियाँ नहीं लीत्स पर बरफ जमी है।

अनुराग मन ही मन मुस्कराने लगा। पापा को उसकी जैसी बुल्गारिआई आती नहीं। मम्मी को तो बिल्कुल नहीं। उनसे अच्छी तो छोटी बहन तूलिका है। यहाँ – राजधानी सोफिआ में आये हुये दिन ही कितने हुए हैं? बस में जाओ, तो अनु। बाजार में जाओ, तो अनु – सभी उसे ही बुलाते हैं।

अचानक एक सोकोल – यानी बाज आकाश में चक्कर लगाने लगा। क्या उसने ब्रवचे को देख लिया? जीव विज्ञान के शिक्षक दिमितिर कहते हैं – यही भोजन श्रृंखला है। एकमात्र इंसान ही सिर्फ शौक के लिए दूसरे प्राणिओं की हत्या करता है। लो, अब नारासित्स – नरगिस – की झाड़िओं में ब्रवचे फुदक रही है। सोकोल उसे ढूँढ़ न सका …..

“अन्नु – तूली -!”लिपिका ने सलवार और स्वेटर के ऊपर अपने ओवरकोट में दस्ताना समेत हाथ डालते हुए बच्चों को बुलाया, ‘‘नाश्ता कर लो। ”

“आज मुझे यहाँ का ब्रेड नहीं खाना है। कैसी मटमैली होती है। मुझे घर के आटे का पराठा बना दो न माँ। ”

उधर स्टडी टेबुल के पास बैठे उस पर लिखते लिखते उल्लास हँसने लगा, ‘‘अरे बेटा अन्ना, इतनी बात जानना – हम लोगों को भारत से केवल 1100 किलो सामान ही लाने की इजाजत थी। उसमें भी बर्तन और कपड़े सभी थे। तो चावल, दाल और आटे होंगे ही कितने? दो साल पूरे बिताने है। ”

“ठीक है मुझे दादीवाली अमावट ही जरा दे दो। बाद में तुम लोगों के साथ नाश्ता करूँगा। ”

“तेरे मामा इसे आम पापड़ कहते हैं। ”उल्लास ने मजाक किया।

“चलो जी। सिर्फ भैया ही क्यों? अमृतसर में सभी अमावट को आम पापड़ ही कहते हैं। स्वर्ण मंदिर के पास इसकी एक सौ साल से भी पुरानी दुकान है। इस बार तो गुरु ग्रंथसाहिब के प्रकाशोत्सव के चार सौवीं वर्षगाँठ मनायी जा रही है। अमृतसर कितना सजा होगा….!”

उल्लास हाल ही में यहाँ सोफिआ विश्वविद्यालय में दो साल के लिए विजिटिंग प्रोफेसर बन कर आया है। साथ ही भारतीय दूतावास में सांस्कृतिक संपर्क अधिकारी का काम भी सँभालता है। दिन भर की व्यस्तता की लहरों पर समुद्री परिंदों की तरह कभी कभी आ धमकती हैं – देश की, घर की यादें…। यहाँ का जीवन बिल्कुल भिन्न। सब अपने अपने में व्यस्त। बेगानी जमीं की बर्फ में खो जाती है अपनी माटी की खुशबू…..

सोफिआ में नये नये आकर सभी कुछ उदास हो गये थे। बीच बीच में अनु के दादा दादी, नाना नानी के फोन आ जाते। उल्लास को तो खास फुर्सत मिलती नहीं, पर लिपिका के लिए एक एक पल सीसा जैसा भारी होने लगा। घर का काम, किताबों के पन्ने पलटना, माँ को, सास को एकाध खत लिखना, बस। आज आई. एस. डी. के जमाने में वो भी कहाँ तक हो पाता है? फिर अनुराग और तूलिका का स्कूल। नया परिवेश, नयी दुनिया।

तूलिका ने खिड़की से मुँह फेर लिया, ‘‘भैया, वो देखो, वह बिल्ली घात लगाये उधर जा रही है। ”

“अरे यह कोत्का क्या ब्रेवचे को झपट लेगी? ”

बड़ी सी बिल्ली। गदबदे ऊन का गोला। रोओं पर बर्फ जमी हुई है। दबे पाँव आगे बढ़ रही है। भाई बहन दौ़ड़े बाहर….

“अरे कहाँ जा रहा है? ”लिपिका कहती रह गयी।

बिल्ली भागी….दोनों पीछे….। मोड़ पर वह ग्रासरी स्टोर्स में घुस गयी।

“अरे रे रे !”दोनों भाई बहन एक बुढ़िया से टकराते टकराते बचे, ‘‘आलो! कदे हौदी? हैलो! कहाँ जा रहे हो? ”

अनुराग ने पहचान लिया – यही तो है दुकान की मालकिन। पिच स्ट्रीट की इस दुकान में पापा और मम्मी के साथ वह आ चुका है, ‘‘साॅरी बोबो !”

“दादी -!”बल्गारिआई में बोबो। इस शब्द ने मानो कई बर्फीले दिनों के बाद एक उजली सुबह की सफेद धूप की तरह इसिनबायेवा को छू लिया। उन्होंने उन्हे अपनी ओर खींच लिया, ‘‘क्या बात है? ”

“वो वो – कोत्का न – उस ब्रेवचे को -”तूलिका तुतलाने लगी। बुल्गारिआई में नहीं कह पा रही थी। अंग्रेजी में कहे? परंतु यहाँ तो अंग्रेजी बिल्कुल पसंद की नहीं जाती। ।

“क्या? ”

“वो पकड़ने जा रही थी। ” टूटी फूटी बल्गारिआई में दोनों ने अपनी बातें सुनायीं। साथ में हिन्दी अंग्रेजी की छौंक…..

“तुम शायद अपने पापा मम्मी के साथ एकबार यहाँ आ चुके हो। कहाँ के हो? तुम्हारा देश? ”

“हम इंडिया से आये हैं। मेरे पिताजी हिन्दी के विजिटिंग प्रोफेसर हैं। ”

“ओ! बच्चों, तुम लोगों ने मुझे बोबो कहा। तो स्कूल की छुट्टी के बाद इस दादी से मिलने आया करोगे न? ”

तूलिका ने भी एक श र्त रक्खी, ‘‘मेरी दादी की तरह आप भी हमें कहानियाँ सुनाया करेंगी न? ”

“कहानी? ” इसिनबायेवा के चेहरे की झुर्रियाँ और भी गहरा गयीं। सब कुछ छूट जाता है, पर यादों का दामन नहीं छूटता। दोनों बच्चे हाथ हिलाते हुए चल दिये। इसिनबायेवा को याद आया – इसी तरह उसका बेटा इल्को जब कभी यहाँ आता है – जाते समय हाथ हिलाते हुए अपने घर चला जाता है। अपना घर ! हाय जेश स ! यह उनका घर नहीं है? वह और उसकी दोस्त मेरिल्ली इस शहर में रहते हुए भी पराये हैं।

तभी तो इन दोनों के जाने के बाद जब उनके पति स्कोल्तानोव ने उनसे पूछा, ‘‘ये कौन हैं? क्या इतनी बातें कर रही थी? ”

तो उन्होंने सब कुछ कह सुनाया, ‘‘ये बच्चे इंडिया से आये हैं। हैं न कितने प्यारे? ”

परंतु पत्नी की बातें सुनते सुनते स्कोल्तानोव का चेहरा बिल्कुल कठोर होने लगा, ‘‘बस बस बहुत हो चुका। फिर से धोखा खाने की गलती न करना। जब सगे ही अपने नहीं हुए, तो पराये से क्या उम्मीद करें? अब क्या दूसरों के लिए भी बैठ कर रोना चाहती हो? ”

इसिनबायेवा को सब मालूम है। संतान से बिछुड़ने पर माँ का हृदय क्या कम रोता है? इल्को सब कुछ छोड़कर मैसिडोनिया जाने की बात करता है। वहाँ कमाई का अवसर है। इसीलिए बुल्गारिआ से काफी लोग इटली, ग्रीस और हंगरी चले जाते हैं। उन्होंने कितनी बार मेरिल्ली से उसकी शादी की बात छेड़ी। उसका घर बसाना चाहा। मगर इन बातों में उसे तनिक भी दिलचस्पी नहीं।

“ति काकसी – आप कैसी हैं? ”

“दुबरे आसम – मैं ठीक हॅूँ। ”

बातचीत की गाड़ी चलती रही। इधर हिन्दी, उधर बुल्गारियाई की पटरिओं पर….

उन दोनों को भी मानो परदेश में एक और दादा दादी मिल गये। स्कूल की छुट्टी के बाद घूमते टहलते दोनों ग्रासरी स्टोर्स पहुँच जाते, ‘‘दोबर बेचर! शुभ संध्या !”

स्कोल्तानोव खास एतराज भी नहीं करता। ग्राहकों को सामान देते हुए, अखबार का पन्ना पलटते हुए, अपनी बुढ़िया के साथ परदेसी पोते पोती की बातों का आनंद उठाता। काश ! ये इल्को के बच्चे होते ! हमारे अपने ! उसके सीने से सिर्फ एक साँस निकलती है – आह !

क्रिसमस की छुट्टियों के पहले ही बर्फबारी शुरु हो गयी। बुल्गेरियाई किसान इसी बर्फबारी के लिए आँखें बिछायें रहते हैं। यही तो खेतों की सिंचाई का मुख्य साधन है। उनका आसरा। बड़े दिन के पर्व पर स्कोल्तानोव की दुकान भी खूब सजी हुई थी। बाहर अंदर – चिरागवाले – सितारे लटक रहे थे। स्टोर के अंदर एक क्रिसमस ट्री सजाकर धरा गया था। उसकी हर एक शाखा पर बच्चों के लिए छोटे छोटे उपहार लटक रहे थे। गुब्बारा, तो टेडीबीअर या चाकोलेट…!

“हैप्पी क्रिसमस, बोबो – द्यौदी !”कहते हुए दोनों बच्चे अंदर दाखिल हुए, ‘‘पापा मम्मी भी आ रहे हैं। ”

उल्लास और लिपिका भी काँच का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हुए, ‘‘हैलो ज्.द्रास्ति। नमस्कार! क्रिसमस आनंदमय हो !”

“मेरि क्रिसमस!”कहते हुए इसिनबायेवा ने दोनों बच्चों को सीने से लगा लिया। आज के दिन स्कोल्तानोव ने भी हँस कर उनसे हाथ मिलाया।

“अनुराग, तूलिका इधर आओ। क्रिसमस ट्री पर से अपना अपना उपहार छाँट लो। ”इसिनबायेवा की खुशी को मानो पर लग गये थे। उन्होंने अपने हाथ से बनाये चाकोलेट केक उन्हें खिलाये। जाते समय लिपिका के हाथ में एक फूलगोभी जितना बड़ा गुलाब देते हुए बोली, ‘‘आप क्रिसमस के दिन हमारे यहाँ पधारे हैं। हमारी ओर से एक नाचीज भेंट!”

अनु उछलने लगा, ‘‘अम्मां, यह देखो – यह तो करफिआँल जितना बड़ा रोजा है!”

“ब्लागोदारिया!”लिपिका ने शुक्रिया अदा किया, ‘‘म्नोगो खूबवू! बहुत सुंदर!”

जाते जाते तूलिका ने एक समाचार सुनाया, ‘‘बोबो, भैया न – परसों पोलैंड जा रहा है। अकेले। ”

“पोलैंड! वहाँ क्यों? ”

लिपिका मुस्कुरा कर बोली, ‘‘स्कूल टीम के साथ वालीबाल खेलने। मैं तो डर रही हॅूँ। अपने देश में तो हम बच्चों को स्कूल बस में स्कूल भेज कर भी निश्चिन्त नहीं रह सकते। रास्ते में कुछ हो न जाए। और यहाँ तो विदेश का सफर। अकेले। वो भी हवाई जहाज से। ”

उल्लास हँसने लगा, ‘‘इसी तरह तो हमारे बेटे में आत्मविश्वास पैदा होगा। क्यों? आप ही कहिए। ”

इसिनबायेवा मुस्कुराई, ‘‘फिर भी माँ का दिल है। खैर, अनुराग, तुम्हारा स्कूल जीत कर आये – यही मेरी प्रार्थना है ! मदर मरियम तुम्हारा साथ दें, मेरे लाल !”

एक दिन बाद….

माँ से लिपट कर ‘‘जीत आऊँगा न माँ? ” कहकर हँसते हॅँसते अनुराग एरोड्रोम जाने के लिए स्कूल बस में बैठ गया, पर लिपिका उदास हो गई। तूलिका पेवमेंट पर खड़ी हाथ हिलाती रही – जब तक बस आँखों से ओझल हो नहीं गयी….

उल्लास लिपिका को समझा रहा था, ‘‘याद है? एकबार छात्रों का कौन सा विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया – वे बसों पर पत्थर और ढेले फेंकने लगे। अनु बस से उतर कर पैदल घर चला आ रहा था, और मैं स्कूटर लेकर मारा मारा फिर रहा था कि बच्चा गया कहाँ? कहीं उसे कुछ हो न जाए ! आज वही सरहद पार जा रहा है – अकेले! कस्टमस से गुजरना, एरोप्लेन में बैठना, सारी औपचारिकतायें पूरी करना, पोलैंड में किसी अन्जाने परिवार के साथ रहना – सब कुछ अकेले ! भारत में भी तो बच्चे मेट्रो या लोकल से रोज स्कूल जाते हैं। अकेले। तो? ”

लेकिन माँ का हृदय थोड़े ही मानता है। उसे बार बार अनु के स्कूल जाने का पहला दिन याद आ रहा था। ‘‘माँ, स्कूल में मैं अकेले जाऊँगा? तुम साथ नहीं चलोगी? तो मैं भी नहीं जाता। जाओ -!”

दो दिन बाद कहीं जाकर उसके होठों पर हॅँसी आयी – जब पोलैंड से श्रीमती बोरलीना का फोन आया। अनु को इन्हीं के घर ठहराया गया था। मिलनसार अनु से मिल कर वे इतनी खुश थीं कि फोन पर कहने लगीं, ‘‘आप दुनिया की सबसे खुश नसीब माँ हैं !”

शाम को सूरज यहाँ जल्दी अस्त नहीं होता। रात के नौ के बाद ही वह अल्विदा कहता है। कभी कभी तो आधी रात तक उजाले में तारे तैरते रहते हैं। भैया घर में नहीं है। तूलिका उदास बैठी थी। फिर निकल पड़ी। जरा बोबो से बतिया कर आयें। बदन पर केवल एक ही स्वेटर था। लिपिका ने भी ध्यान नहीं दिया। रास्ते में रिमझिम बारिश के साथ सर्द हवा की साँय साँय….

इसिनबायेवा तो उसे देखते ही दौड़ कर आयीं, ‘‘यह क्या? न रेनकोट, न कुछ ! कपड़े भी गीले हो गये हैं। अरे पगली, तुझे ठंड लग जायेगी। ”जल्दी से उसके कपड़े बदल कर अलाव की बगल में कुर्सी पर बैठा दिया। एक कप गरम दूध में चाकोलेट मिलाकर पिलाने लगी….

कुछ आराम जरूर हुआ, पर स्कोल्तानोव उन्हे सुनाकर भुनभुनाने लगे, ‘‘नन्ही सी जान। कुछ हो जाये तो? जबर्दस्ती ओखली में सर देना !”

बर्फबारी धीमी हुई तो तूलिका को गरम जैकेट में लिपट कर स्कोल्तानोव उनके अपार्टमेन्ट में पहुँचा आया। बेवजह परेशानी झेलना उसे पसन्द नहीं। उसने कुछ बेरूखी से लिपिका को सुना भी दिया, ‘‘बेटी जब घर से निकल रही थी, तो आपको देखना चाहिए था कि उसने पर्याप्त गरम कपड़े पहन रक्खे है कि नहीं। ”

लेकिन भोर होते होते बात बिगड़ने लगी। तूलिका को बुखार आ गया। साथ में तेज खाँसी और सीने में दर्द। उल्लास को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? जयपुरवाले पारिवारिक डाक्टर की याद आ गयी। उसने दूतावास के एक दूसरे सहयोगी को फोन किया। दोस्त ने कहा, ‘‘तुरंत अस्पताल ले जाओ। यहाँ निमोनिआ का खतरा हमेशा बना रहता है। ”

उल्लास परेशान हो उठा। बर्फ पर से कार चला कर वह सहयोगी भी यहाँ तक आ नहीं सकता। वह बुलाये तो किसे? किसकी मदद ले? एम्बुलेन्स मिल जायेगा? इसी उधेड़बुन में घबड़ाकर वह दौड़ा…

स्कोल्तानोव दंपति के घर के बेल बजाते ही उसने देखा सामनेवाली खिड़किओं के शीशे रोशन हो गये। वे जाग गये हैं। दरवाजा खुलते ही उसने सब कुछ कह सुनाया। स्कोल्तानोव पल भर सोचता रहा, ‘‘चलिए, मैं खुद उसे अस्पताल ले चलता हूँ। ”

उल्लास ‘ब्लागोदारिया’ भी न कह सका।

इसिनबायेवा बेडरुम में थीं। पूछने लगीं, ‘‘क्या बात है? इतनी रात गये कौन आया है? ”

“अरे तुम्हारी उस इंडियन बच्ची की तबिअत बहुत खराब है। भींग जो गई थी। अस्पताल ले जाना पड़ेगा। ”

जब तक बूढ़े ने अपना वैन निकाला, बुढ़िया भी तैयार हो गईं। अच्छा ही हुआ। क्योंकि लिपिका के आँसू तो थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। तूलिका की छाती धौंकनी की तरह ऊपर नीचे हो रही थी। सफेद बर्फ को चरमराता हुआ वैन आगे निकला। रास्ते के लैंपपोस्ट, पेड़ों की पत्तियाँ, बिल्डिंगों की चहरदीवारी, और दुकानों के ग्लोबोर्ड – सभी जगह सांताक्लाज की सफेद दाढ़ी जैसी बर्फ जमी हुई थी।

जब तूलिका के मुँह पर आक्सीजन का मास्क लगा कर, इंजेक्शन दिलवा कर, वार्ड से बाहर जाते जाते डाक्टर ने कहा, ‘‘बस, अब हमें इंतजार करना है!”तो, उस समय अस्पताल की खिड़किओं पर से अंधकार के पर्दे कुछ उठने लगे थे। …

बूढ़ा स्कोल्तानोव अपनी दुकान देखता। इन्हें पहुँचाने जाता। मगर किसी से खास कोई बातचीत नहीं करता। इसिनबायेवा तूलिका की सगी दादी की तरह उसकी देखभाल करती रहीं। दोपहर में वह रहतीं, तो लिपिका घर जाकर कुछ आराम कर लेती। फिर शाम तक लिपिका आ जाती। पहली रात तो उसने जाग कर ही बितायी थी।

इस बीच अनुराग भी वापस आ गया। वापस आने पर जैसे किसी को कोई हर्ष ही न हुआ। मैच का क्या हुआ किसी ने न पूछा। व्याकुल उल्लास को भी कुछ ध्यान न रहा। पर स्कोल्तानोव को जब मालूम हुआ कि उसका स्कूल कप जीत कर लौटा है, तो वह हँस कर उसकी पीठ थपथपाने लगा, ‘‘जीओ मेरे नन्हे भालू! मैं भी अपने क्लब का सेंटर फारवर्ड था। फुटबॉल लेकर दौड़ता तो किसी की हिम्मत नहीं होती कि मेरे पैरों से उसे छीन ले -!”

और दो दिन बाद तूलिका घर आ गयी। लेकिन हर समय उसके पास किसी का रहना जरूरी था। इसिनबायेवा ने खुद ही कहा, ‘‘क्यों घबड़ाती हो, बेटी? हम हैं न। ”

इस बार स्कोल्तानोव की भौंहें तनी नहीं। वह अपनी दुकान देखता, फिर यहाँ आकर भोजन करता। पहली रात इसिनबायेवा इनके फ्लैट में ही रह गयीं। दूसरे दिन से वो भी थोड़ी देर के लिए दुकान हो आतीं।

भारत से उल्लास के पिताजी ने जब फोन पर पूछा, ‘‘तूली अब कैसी है? ” अनु खिलखिला कर हँसने लगा, ‘‘अब तो हमारे साथ दादा दादी हैं। ”

“दादा दादी? ”उसके दादाजी चकित रह गये।

“हाँ, सोफियावाले दादा दादी !”

इन दो तीन दिनों में स्कोल्तानोव भी मानो भूल गया था – ये दोनों बच्चे उनके सगे नहीं हैं। साथ साथ खाना। तूलिका को समय से दवा देना। सुबह जब इनके फ्लैट में पहुँचते तो लिपिका या उल्लास हॅँस कर स्वागत करता, ‘‘दोब्रो उतरो! गुड मार्निंग!”फिर वे जब दुकान के लिए निकलते, अनुराग दरवाजे तक छोड़ने आता। हाथ हिलाता, ‘‘गुड बाई, द्यौदी! जल्दी लौटियेगा। ”

फिर एकसाथ रात का भोजन। एक रात इसिनबायेवा ने अपने गाँववाली मसालेदार पनीर की रोटी बनायी। सबको खूब पसंद आयी। फिर रात में सोते सोते कहानी सुनना। दो दिन में उस बूढ़े और बुढ़िआ ने भी मानो दो युग जी लिये….

मगर वे और कितने दिन ठहरते? दुकान के कामों में भी परेशानी हो रही थी। जिस दिन शाम को वे जाने लगे, इसिनबायेवा ने अनु और तूलिका के गालों को दबाते हुए कहा, ‘‘तो अब हमारे स्टोर्स में भेंट होगी। “

दोनों उदास थे। तूलिका बोली, ‘‘बोबो, यहीं रह जाओ न। ”

उल्लास और लिपिका भी वहीं खड़े थे। इस बूढ़े दंपति के प्रति वे सिर्फ कृतज्ञ ही नहीं थे, बल्कि मन में एक लगाव भी हो गया था।

तभी अनु अचानक इनसे मुँह फेड़कर खिड़की के पास जा खड़ा हो गया।

“क्या बात है? अनु, इधर आ। ”लिपिका बोली, ‘‘अपने द्यौदी और बोबो को गुडबाई नहीं कहेगा? ”

इधर देखे बिना अनुराग ने झल्लाकर कहा, ‘‘इससे तो अच्छा था जब तूली बीमार थी। ”

“यह तू क्या बक रहा है? ”लिपिका की भौंहे तन गईं।

“तब तो बोबो और द्यौदी हमें छोड़ कर जा नहीं पाते। ”

उसने हिन्दी में ही यह बात कही थी। स्कोल्तानोव और इसिनबायेवा इतना तो समझ ही रहे थे कि वहाँ तूफान उठ खड़ा हुआ है। -‘‘वह क्या कह रहा है? ”

उल्लास ने उनको बल्गारियाई में सबकुछ समझाया।

स्तब्ध खड़े रह गये वे बूढ़े दम्पति। इसिनबायेवा की आँखों में दुनाव (दान्युब) नदी लहराने लगी।

स्कोल्तानोव को लगा – ये गैर नहीं। उनके इल्को के ही बच्चे हैं। उन्होंने आगे बढ़ कर उन दोनों को सीने से लगा लिया, ‘‘तेरे ये द्यौदी और बोबो तेरे ही रहेंगे, बेटे। वहाँ जाकर भी हम तुमसे जुदा हो सकते हैं क्या?”

——

आभारः डा0 श्रीप्रसाद तथा डा0 आनन्द वर्धन – ब्रजभूमि

♦♦♦♦

© डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी

पताः फ्लैट नं. 301, चौथी मंजिल, टावर नं 1, मंगलम आनन्दा ग्रैंड रामपुरा रोड, सांगानेर, जयपुर, 302029

मो. 9455168359, 9140214489. ईमेल: asrc.vns@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७५ – अनाथ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा अनाथ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७५ ☆

☔ लघुकथा  ☔ अनाथ ☔

पारंपरिक रूप से त्योहार मनाना, उसे उत्साह उमंग उल्लास के साथ मिलबाँट कर सहेजना प्रेम, प्यार, सौहार्द की भावना को बढ़ते देखना सभी को अच्छा लगता है।

आज मानसी के ह्दय में उथल- पुथल मची थी कि रक्षाबंधन तो आया पर क्या? राखी का प्यार विश्वास भैया निभा पाया या वह स्वयं निभा सकी।

आसपास की बातें सुनने और घर में सिर्फ औपचारिकता से राखी बंधवाने का मतलब, अब उसे लगने लगा कि रक्षाबंधन अब एक मानसिक बंधन होने लगा है। भौहें-चढ़ाना, आँखे ततेरना, हर बात पर छींटाकशी और सिर्फ मै मेरा!! तू तेरा।

वह उठी पूजा की थाल लिए घर के मंदिर में दीपक जला, भारी मन से प्रार्थना करने लगी – – – प्रभु मुझे अगले जनम अनाथ बना देना। कम से कम सामाजिक दानदाताओं और चेरिटी वाले कृतज्ञता कातर दृष्टि से ही सही एक दिन का तो परिवार मिल जाता है।

पीछे से भाई की आवाज आई रहने दो—मै अभी जा रहा हूँ!! बाद में आऊंगा तो देखते है।

मानसी राखी की डोरी लिए माँ की तरफ देखने लगी। बंधन ही तो है – – – – तू कान्हा जी को बाँध ले! बिटिया माँ ने रुंधे गले से आवाज लगाई।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वह छूटा हुआ मौका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ वह छूटा हुआ मौका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“माँ, मेरा इंटरव्यू कैंसल हो गया!” निखिल ने फोन पर लगभग चीखते हुए कहा।

“अच्छा… क्यों?”

“कंपनी ने आखिरी समय पर मेल भेज दिया। तीन महीने से तैयारी कर रहा था। आज सुबह से मन ही मन पूरा इंटरव्यू दे चुका था। अब कह रहे हैं—‘नई तारीख बाद में बताएँगे।’”

माँ ने धीरे से पूछा, “तो क्या हुआ?”

“क्या हुआ?” निखिल हँसा, “आपको पता भी है यह नौकरी मेरे लिए कितनी जरूरी थी?”

“हाँ बेटा, पता है।”

“नहीं माँ, आपको नहीं पता। घर का किराया, लोन की किस्त… सब कुछ इसी नौकरी पर टिका था। मुझे लगा था आज सब बदल जाएगा।”

माँ कुछ क्षण चुप रहीं।

फिर बोलीं, “तुमने अपना काम तो पूरा किया था न?”

“हाँ।”

“फिर?”

“फिर क्या? अब इंतज़ार करूँ।”

“कर लो।”

“बस? इतनी आसानी से?”

माँ हल्के से हँसीं, “बेटा, कुछ चीज़ें हमारे हाथ में होती हैं और कुछ नहीं। जो हमारे हाथ में नहीं, उसे पकड़े रहने से हाथ ही दुखता है।”

निखिल कुछ नहीं बोला।

“माँ…”

“हाँ?”

“अगर यह नौकरी नहीं मिली तो?”

“तो तुम क्या करोगे?”

“पता नहीं।”

“और अगर मिल गई तो?”

“तब… सब ठीक हो जाएगा।”

माँ फिर चुप हो गईं।

“क्या हुआ माँ?”

“कुछ नहीं। बस सोच रही थी… इंसान अक्सर जिस दरवाज़े के सामने खड़ा होता है, उसे ही अपनी मंज़िल मान लेता है।”

“आप फिर पहेलियाँ बुझाने लगीं।”

“नहीं बेटा,” माँ ने मुस्कुराकर कहा, “मैं तो बस पूछ रही हूँ—अगर दरवाज़ा देर से खुले तो क्या हम मान लें कि घर में कोई और रास्ता है ही नहीं?”

निखिल ने कोई उत्तर नहीं दिया।

उसी समय उसके मोबाइल पर एक नया मेल आया।

उसने स्क्रीन देखी।

कुछ सेकंड तक चुप रहा।

“माँ…”

“हाँ बेटा?”

“कल एक जगह और इंटरव्यू है। मैंने वहाँ आवेदन तो किया था, लेकिन पहली नौकरी की उम्मीद में उसे लगभग भूल ही गया था।”

माँ मुस्कुराईं, “तो अब?”

निखिल ने खिड़की से बाहर देखा। चेहरे पर सुबह वाली बेचैनी नहीं थी।

“अब लगता है… कल जल्दी उठना पड़ेगा।”

माँ हँस पड़ीं।

“हाँ बेटा, कभी-कभी जिंदगी हमारी योजना बदल देती है… ताकि हम वह रास्ता देख सकें, जिस पर हमने ध्यान ही नहीं दिया था।”

निखिल ने फोन रखा और अगली सुबह की तैयारी में लग गया।

बाहर रात गहरी हो रही थी।

और उसके भीतर… जैसे कोई नया सवेरा धीरे-धीरे उतर रहा था।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ११७ – नागरिक… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– नागरिक…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ११७ — नागरिक — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

चार जवान मोटर में जा रहे थे कि सब्जी के एक खेत के पास रुके। खेतिहर बोरे पर बहुत सारी सब्जियाँ रख कर बेच रहा था। लड़कों ने खेतिहर को डरा कर उससे पैसा मांगा। खेतिहर की सोच हुई सुन्दर मोटर, चार जवान। देश कहाँ जा रहा है? खेतिहर हाथ में छुरी ले कर उनके सामने डट गया। वे डर से पीछे सरके और मोटर में भाग चले। खेतिहर की अब सोच हुई वह देश का एक ताकतवर नागरिक है।

 © श्री रामदेव धुरंधर

28 – 08 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ राखी का दीप ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ कथा कहानी ☆

☆ लघुकथा – राखी का दीप ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

भैया तुम  कितनी देर में आओगे?”

“आता हूँ जरा बिजी हूं।”

भैया बहुत देर हो गई, अब तो आ जाओ।”

ट्रिन ट्रिन——“

“——–“

ट्रिन ट्रिन——–“

“———-“

अरे तुम क्यों परेशान हो रही हो? तुम्हारा मिनिस्टर भाई विधवा आश्रम की महिलाओं से राखी बँधवाने में व्यस्त होगा न?” पति ने भाई को राखी बाँधने के लिए व्याकुल हो रही अपनी पत्नी से कहा, जो बार-बार भाई को फोन कर रही थी।

दरअसल बात यह है कि हम दोनों साल भर के अंतर वाले बहन-भाई हैं। साथ ही खेल-कूदकर बड़े हुए हैं। चूँकि भाई शुरू में छात्र राजनीति में रहा। कालेज का प्रेसीडेंट रहा, फिर छात्र संगठनों में शामिल होकर पार्टी पोलिटिक्स में चला गया।—और फिर विधायक बनकर मिनिस्टर बन गया, पर भैया ने मुझे वचन दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, कैसे भी हालात हों, वह मुझसे राखी बँधवाने मेरे पास पहुँच ही जाएँगे। इसीलिए मैं उनका इंतजार कर रही हूँ।”

हाँ तुम्हारा कहना ठीक है पर आज तुम्हारे मिनिस्टर भाई के नगर में अनेक कार्यक्रम हैं,पता नहीं उन्हें किन-किन से राखी बँधवानी है, तो ऐसे में उन्हें यह याद होगा ही नहीं कि उन्हें अपनी सगी छोटी बहन से भी राखी बँधवानी है। पति ने कहा।

नहीं ऐसा नहीं हो सकता, मेरा भाई जरुर आएगा।” बहन ने पूरे भरोसे के साथ कहा।

अच्छा,तुम राखी की थाली सजाकर तैयार कर लो। मैं पता करके और मंत्री जी को लेकर आता हूँ,आखिर शाम हो गई तुम कब तक भूखी रहकर भाई को राखी बाँधने का रास्ता देखोगी?”

तभी टीवी पर न्यूज आती है-हमारे नगर में पधारे समाज कल्याण मंत्री दिन भर विधवा आश्रम,अनाथ आश्रम व लाडली बहनों से राखी बँधवाने के बाद स्थानीय कार्यक्रमों से निवृत्त होने के बाद वापस राजधानी लौट गए हैं।”

 यह न्यूज सुनकर सजी हुई राखी की थाली विलाप करती नजर आई,और जलाया गया दीप एक बार फिर बुझ गया था।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ प्यार से आगे भी एक जिंदगी है ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ प्यार से आगे भी एक जिंदगी है ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“माँ, आपने मेरी शादी के लिए हाँ क्यों नहीं की?”

“क्योंकि मुझे तुम्हारी खुशी चाहिए, सिर्फ तुम्हारी जिद नहीं।”

“लेकिन मैं निखिल से प्यार करती हूँ।”

“जानती हूँ। पर क्या तुमने कभी यह सोचा है कि प्यार के बाद की जिंदगी कैसी होगी?”

“माँ, आप भी न! आजकल कौन इतनी बातें सोचता है? हम दोनों एक-दूसरे को समझते हैं।”

“मैं भी तुम्हारी उम्र में यही सोचती थी, अनन्या।”

“फिर?”

“तुम्हारे पिता और मैंने भी बहुत प्यार किया था। घंटों बातें होती थीं, एक-दूसरे के बिना रहने की कल्पना तक नहीं कर सकते थे। लेकिन शादी के बाद बातें कम और जिम्मेदारियाँ ज्यादा हो गईं।”

“तो क्या प्यार झूठा था?”

“नहीं। प्यार सच्चा था… शायद हमारी समझ अधूरी थी।”

“आप कहना क्या चाहती हैं?”

“बस इतना कि शादी से पहले यह मत देखना कि वह तुम्हें कितना चाहता है। यह भी देखना कि तुम्हारे ‘न’ कहने पर उसका व्यवहार कैसा होता है, तुम्हारी असहमति का वह कितना सम्मान करता है, तुम्हारे सपनों के लिए कितनी जगह रखता है।”

अनन्या कुछ देर चुप रही।

“माँ, अगर निखिल इन सब बातों में अच्छा निकला तो?”

माँ ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा-

“तब क्या तुम उससे सिर्फ इसलिए शादी करोगी कि वह तुम्हें प्यार करता है… या इसलिए भी कि उसके साथ तुम अपने आपको सुरक्षित, सम्मानित और स्वतंत्र महसूस करती हो?”

अनन्या ने कोई उत्तर नहीं दिया।

माँ भी चुप रहीं।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७६ ☆ लघुकथा – राहत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “राहत“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७६ ☆

✍ लघुकथा ☆ राहत☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

आजकल हाउसिंग सोसायटी हर जगह बनी हुई हैं। एक कालोनी या एक दो बड़ी बिल्डिंग में रहने वाले लोग सोसायटी बना लेते हैं ताकि बिजली पानी सफाई जैसे काम होते रहें और लोग अपना काम निश्चिंत होकर करते रहें। चिंता अगर रहती है तो अपने निजी काम की। सहकारिता की इस भावना की  लोकप्रियता व उपयोगिता को देखते हुए प्रशासन ने भी सोसायटी को मान्यता दी है उसके लिए वियम पर नियम बनाए हैं। उसका रजिस्ट्रेशन वगैरह सब कुछ होता है। सोसायटी अपने सदस्यों और स्थानीय प्रशासन के बीच की कड़ी बन गई है।

गली में कचरा है तो सोसायटी साफ कराएगी। नल में पानी नहीं आ रहा है तो सोसायटी व्यवस्था करेगी। कोई अपने मकान या फ्लैट में कुछ निर्माण करवा रहा है तो उसे सोसायटी देखेगी। पार्किंग व्यवस्था भी यानी जो भी सार्वजनिक काम हो सोसायटी देखेगी। किसी के फ्लैट का पानी दूसरे के फ्लैट में आ रहा है तो सोसायटी देखेगी। वे लोग आपस में बात करके हल नहीं निकाल सकते।

पता नहीं कैसे एक डंफर से एक बड़ा पत्थर सोसायटी के गेट के अंदर गिर गया। पत्थर भारी था। वॉचमैन अकेला उठा नहीं पा रहा था। जो भी आता सोसायटी को कोसता कि सोसायटी कर क्या रही है। कब से पत्थर पड़ा है और सोसायटी सोई हुई है। आते जाते चेयरमैन सेक्रेटरी को बोलते, भाई पत्थर हटवाओ सबको बहुत दिक्कत हो रही है।  सेक्रेटरी बोलता क्रेन नहीं मिल रही है, मिलते ही उठवा देंगे। सभी लोग पत्थर के इधर उधर से भुनभुनाते निकल जाते पर किसी ने उसे हटाने का प्रयास नहीं किया।

सोसायटी में चार पांच युवक थे । ड्यूटी से आने के बाद एक जगह बैठकर गप्पें मारा करते थे। एक ने कहा कि भाई यह पत्थर की दिन से एक ही जगह पड़ा हुआ है। चलो मिल कर उसे रास्ते के किनारे कर देते हैं। उनमें सहमति बनी और चारों पांचों उठे और मिल कर पत्थर को एक ओर खिसका दिया। अब किसी को परेशानी नहीं होगी।

दूसरे दिन लोगों ने पत्थर रास्ते में नहीं देखा तो सोसायटी के चेयरमैन सेक्रेटरी की तारीफ़ करने लगे कि ऐसे काम करना चाहिए और चेयरमैन सेक्रेटरी एक दूसरे का मुंह देखने लगे पर चुप रहे। तीन चार दिन बाद म्युनिसिपेलिटी की गाड़ी आई और पत्थर को उठा ले गई। सभी ने राहत की सांस ली।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति (मानद)

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२६ – दोष किसका? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – दोष किसका?)

☆ लघुकथा # १२६ – दोष किसका? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

लगातार हो रही मूसलाधार बारिश से शहर की सड़कें तालाब में बदल गई थीं। नालियाँ कूड़े से अटी पड़ी थीं और गंदा पानी घरों में घुसने लगा था। शर्मा जी छतरी लेकर दरवाजे पर खड़े बड़बड़ा रहे थे।

“बस करो बारिश! आखिर कितना सताओगी? पूरा शहर डुबोकर ही मानोगी क्या?”

सामने से गुजर रहे वर्मा जी ठिठक गए।

“शर्मा जी, बारिश को क्यों कोस रहे हैं?”

“क्यों न कोसूँ? देख नहीं रहे, सड़क पर कमर तक पानी है। घर में रखा सामान खराब हो रहा है। बच्चे बाहर नहीं निकल पा रहे। यह बारिश नहीं, आफत है आफत!”

वर्मा जी मुस्कराए, “बारिश आफत नहीं, प्रकृति का वरदान है।”

“वाह! आपके घर में पानी नहीं घुसा, इसलिए वरदान लग रही है।”

“मेरे घर में भी पानी घुसा है, लेकिन दोष बारिश का नहीं है।”

“तो किसका है? बादलों का?”

“नहीं, हमारी व्यवस्था का और हमारी लापरवाही का।”

शर्मा जी तुनककर बोले, “अब इसमें हमारी क्या गलती?”

वर्मा जी ने सड़क की ओर इशारा किया। नाली के मुहाने पर प्लास्टिक की थैलियाँ, बोतलें और कूड़े का ढेर जमा था।

“यह देखिए। नाली किसने बंद की?”

शर्मा जी चुप रहे।

“बारिश ने?”

शर्मा जी ने मुँह फेर लिया।

वर्मा जी फिर बोले, “नालियाँ समय पर साफ नहीं होंगी, कचरा नालियों में फेंका जाएगा, प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों पर अतिक्रमण होगा और फिर हम बारिश को दोष देंगे—यह कहाँ का न्याय है?”

शर्मा जी कुछ नरम पड़े।

“लेकिन नगर निगम की भी तो जिम्मेदारी है।”

“बिल्कुल है। जल निकासी की समुचित व्यवस्था करना, नालियों की नियमित सफाई करना और जलभराव वाले क्षेत्रों का स्थायी समाधान करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन शहर को साफ रखना नागरिकों का भी कर्तव्य है।”

अचानक नाली से निकला गंदा पानी सड़क पर फैलता हुआ शर्मा जी के दरवाजे तक आ पहुँचा।

वे घबराकर बोले, “अरे! मेरा सामान अंदर रखा है।”

वर्मा जी ने उनकी मदद करते हुए कहा, “यही पानी अगर सही रास्ते से निकल जाए तो मुसीबत नहीं, उपयोगी संसाधन है।”

शर्मा जी ने आश्चर्य से पूछा, “तो बारिश को दोष देना बंद कर दें?”

“बारिश को नहीं, अपनी सोच और व्यवस्था को सुधारिए।”

कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

शर्मा जी ने सामने जमा कूड़े को देखा। फिर बोले, “कल मोहल्ले की बैठक बुलाएँगे। नालियों की सफाई के लिए नगर निगम में शिकायत करेंगे और लोगों को भी समझाएँगे कि कचरा नालियों में न डालें।”

वर्मा जी मुस्कराए, “अब बात बनी।”

आसमान से बारिश अब भी बरस रही थी। शर्मा जी ने पहली बार उसे शिकायत भरी नजरों से नहीं, बल्कि समझदारी भरी नजरों से देखा।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७४ – नई दिशा ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा नई दिशा”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७४ ☆

🌻लघु कथा🌻 नई दिशा 👩‍🍼

मम्मी आपने बताया आप पापा के साथ शादी के पहले सोलह सोमवार का व्रत कई बार किया है। अंजली ने बड़े भोलेपन से मम्मी को प्रश्न किया मेरी सभी सहेलियों के यहाँ शिव अभिषेक बड़ी श्रद्धा से करते है। न आप करती है न मुझे व्रत करने देती। कहा जाता है – – – इसको करने से मनचाहे पति की प्राप्ति होती है।

मम्मी ने तुरंत बात काटते हुए कहा–बस इसलिये ही नही करने देती। मनचाहा नही वो चाहे ऐसे पति की कामना रखनी चाहिए।

हम नारियों को भगवान ने ममता से भरपूर बनाया है। हमें तो पत्थर से भी प्रेम हो जाता है। पर समय बदल गया है अंजली!!! अब पति की चाहत होना बहुत आवश्यक है।

सारी जिंदगी घूटन से अच्छा है वो चाहे ये मायने रखता है। मम्मी के इस निर्णय पर अंजली हैरान थी। परन्तु नई दिशा, नई सोच मिलने से उसका व्याकुल मन शांत हो चला।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares