(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
(श्री अरुण कुमार डनायक जी महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – छोटी-छोटी खुशियों का उत्सव।)
☆ कथा-कहानी – लघुकथा – छोटी-छोटी खुशियों का उत्सव… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆
नौकरी और विवाह—दोनों सपने पूरे हो चुके थे। अब अमेरिका में नए जीवन की शुरुआत थी। सबसे पहले शिक्षा ऋण चुकाया गया। फिर तय हुआ कि एक-तिहाई वेतन भविष्य के घर के लिए, एक-तिहाई कभी पूरे अमेरिका घूमने के सपने के लिए और बाकी रोज़मर्रा के जीवन के लिए रहेगा। हिसाब-किताब ने फिलहाल उन्हें स्टूडियो अपार्टमेंट में ही रहने को विवश किया।
समय अपनी रफ़्तार से बीतता रहा। एक दिन अचानक थोड़े बड़े घर की तलाश शुरू हुई। अब तक नवदंपती भी जीवन के व्यावहारिक गणित में कुछ अनुभवी हो चुके थे। उन्होंने दो शयनकक्ष वाला एक अपार्टमेंट पसंद किया। घर इतना बड़ा था कि स्टूडियो अपार्टमेंट का सारा फर्नीचर उसके एक कोने में ही सिमट गया।
अब तक अमेरिकी उपभोक्तावादी संस्कृति की हवा उन्हें भी कुछ-कुछ लग चुकी थी। एक टीवी पहले से था, फिर भी दूसरा टीवी उन्हें पसंद आ गया।
अमेरिका में कोई चीज़ पसंद आ जाए, तो उसके घर पहुँचने में देर नहीं लगती। टीवी महाशय घर पधार गए। युवक टूल बॉक्स लेकर जुट गया। युवती कभी दीवार नापती, कभी पीछे हटकर देखती कि टीवी किस जगह सबसे अच्छा लगेगा। दो घंटे की मशक्कत के बाद नया टीवी दीवार पर अपनी जगह पा चुका था।
युवक के मुँह से अनायास निकला, “यार, सेलिब्रेशन तो बनता है!”
दोनों हँस पड़े। फिर अचानक चुप हो गए।
उस शहर में अधिकांश पड़ोसी एक-दूसरे के नाम तक नहीं जानते थे। भारतीय मित्र शहर के दूसरे छोर पर रहते थे और रिश्तेदार दूसरे राज्यों में।
“चलो, हलवा बनाते हैं,” युवती ने कहा।
थोड़ी ही देर में घी और सूजी की महक पूरे घर में फैल गई। छोटा-सा अपार्टमेंट जैसे पल भर में भारतीय रसोई में बदल गया।
हलवा तैयार हुआ। दोनों ने कपड़े बदले। तभी युवती की आँखों में चमक उभरी।
युवक ने कहा “रेडी… वन… टू… थ्री…”
युवती ने बड़े जतन से नए टीवी का पारदर्शी प्लास्टिक आवरण हटाया। दीवार पर टँगी चमचमाती स्क्रीन के साथ दोनों के चेहरे भी खिल उठे।
कुछ क्षण तक मुस्कान बनी रही। फिर अचानक मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन से माँ की आवाज़ आई—
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – पथ… श्री संजय भारद्वाज
न दुर्गम था, न सुगम। न जटिल था, न सरल। पथ वैसा ही था, जैसा होना चाहिए। कहीं प्रशस्त, कहीं संकीर्ण। कहीं समतल, कहीं उबड़खाबड़। कहीं पुष्पित, कहीं कंटकाकीर्ण। सभी चलते रहे।
एक सहयात्री ने कहा, “वाह! पुष्प ही पुष्प भरे हैं पथ पर..” और उसने ढेर सारे पुष्प आँचल में भर लिए। एक को पूरे मार्ग में टेढ़े-मेढ़े से लेकर सुघड़-सुंदर छोटे-छोटे पत्थर दृष्टिगोचर हुए। उसने पत्थर बटोर लिए। एक वनस्पतिशास्त्री को भाँति-भाँति की वनस्पतियाँ दिखीं, उसने उनके पत्ते चुन लिए। हरेक की अपनी आँख थी और थी अपनी दृष्टि। उसे चप्पे-चप्पे पर कविता और कहानियाँ मिलीं, उसने सहेज लीं।
” इन्होंने अनगिन कविताएँ और कहानियाँ रची हैं..”, किसीने उनका परिचय देते हुए कहा।
वह सोच में पड़ गया कि चलना और रचना समानार्थी कैसे हुए?
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रीगणेश साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.
His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.
His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.
Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.
Key Accolades and Works
Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.
Some precious moments of life
Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.
Today we present his satire The Tricycle of Noble Hypocrisy.
☆ Witful Warmth# 124 ☆
☆ Satire ☆ The Tricycle of Noble Hypocrisy… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆
Leaning against the damp, flaking wall of the town’s state-run Rehabilitation Center for the Disabled stood a battered, rusted tricycle—a relic from two decades ago, proudly sporting perished rubber tires and a crust of corrosion thick enough to double as armor. Once, its handlebar had absorbed the anxious, trembling sweat of children grappling with cerebral palsy; now, it served as a five-star motel for spiders and accumulated municipal dust.
Right below, perched on a crumbling brick plinth like an unwanted fixture of the architecture, sat old Somdatt every morning at seven sharp, anchored by his seasoned wooden cane. Draped in a torn khadi kurta and a weathered towel, the old man spent his days locked in an unblinking staring contest with the tricycle’s oxidized pedals.
Meanwhile, just beyond the veranda, the premises buzzed with the real festival: fleets of polished luxury sedans disgorging top-dollar neurologists, slick bureaucrats, and brand reps eager to showcase robotic wheelchairs, neuro-stimulation rigs, and therapies priced roughly per deep breath. Loudspeakers blasted thunderous sermonettes about “giving wings to the dreams of afflicted children.” Naturally, neither the suited dignitaries nor the modern clinicians spared a glance for the scrap heap rusting in the corridor.
Whenever Mangru, the peon, scurried past clutching his battered tea kettle, Somdatt would ask in a raspy, feeble voice: “Tell me, Mangru, on this glorious World Cerebral Palsy Day, has an official decree arrived to seat a stumbling child on these three wheels? Or are we strictly rationing out plastic rhetoric and hollow speeches from the podium again?” Mangru would merely lower his eyes, let out a well-rehearsed sigh, and vanish into the administrative haze.
Enter Dr. Animesh Bhardwaj—the newly anointed Project Director dispatched straight from the capital’s elite Directorate of Social Welfare. Armed with an obsession for neuro-rehab orthodoxy and bureaucratic spit-and-polish, Dr. Bhardwaj considered anything not bearing a barcode or an imported brand tag an eyesore. Watching a tattered patriarch fold his hands daily before a heap of junk struck him as an assault on state decorum.
Once the inaugural session wrapped up and the VIPs retreated to the air-conditioned lounge to devour salted cashews and cashew-funded pleasantries, Dr. Bhardwaj marched over.
“Look here, old man,” the Director barked, puffing out his chest. “Why block the corridor every single day? If you want an old-age pension or a complimentary crutch, go file Form 47-B with the clerk inside. Staring at an obsolete contraption won’t magically realign the legs of this nation’s spastic youth.”
Somdatt folded his hands with infuriating serenity. “Director Sahib, I am not begging for free sticks or welfare crumbs. I am merely keeping vigil for the return of that lost support which was snatched from this very threshold years ago.”
Bhardwaj sneered at the riddle. “What lost support? The Ministry bleeds crores every year distributing state-of-the-art contraptions. What grand mystery does this junkyard relic hold?”
Pandit Kripashankar, the center’s pensioned-off physiotherapist who had witnessed forty years of suffering and state press releases, stepped forward. “Do not dismiss him as a lunatic, Director. Twenty years ago, when families shoved cerebral palsy patients into dark closets out of shame, this old man’s only son, Manas, stood in this exact corridor to wage war for their dignity.”
Bhardwaj raised an eyebrow. “And what miraculous feat did this Manas pull off?”
“He was the state’s brightest occupational therapist,” Kripashankar recalled with a heavy sigh. “While private nursing homes squeezed destitute families dry, Manas pooled his own meager pennies, hired a village blacksmith and a carpenter, and welded this very tricycle so paralyzed children could learn to pedal on their own dignity. He planted it here, swearing he would never bend the knee to predatory medical cartels until the last impoverished child was granted free mobility.”
Somdatt ran a trembling finger over the rusted pedal. “Yes, Sahib. My boy stood right here and declared: ‘Bapu, this isn’t just scrap metal; it’s a chariot for stumbling childhoods.’ He promised that the day he secured the National Board’s mega-grant for universal, free rehabilitation, he would return, paint this carriage afresh, and seat me as the guest of honor on the nation’s grandest philanthropic stage.”
Spurred by bureaucratic intrigue, Dr. Bhardwaj stormed into the archives to exhume the twenty-year-old project dossier. Flipping through yellowed confidential memoranda, the ground crumbled beneath his polished oxfords.
The file told an all-too-modern fable: decades ago, when Manas’s grassroots crusade began rattling the market, a multinational syndicate peddling robotic mobility rigs and predatory therapy packages stepped in. Rather than fight him, they simply wrote a check. They handed the young crusader the title of Managing Director, a covert twenty-five percent equity stake, and an invitation to join the cartel.
Manas hadn’t freed the afflicted; he had merely cashed in on them.
Tossing his vows into the paper shredder, the messiah reinvented himself into the country’s premier billionaire neuro-rehab baron. Today, he presided over glass-and-steel healthcare empires that unceremoniously evicted the destitute at the gate while billing the elite twenty thousand rupees an hour to let their children breathe sterile clinic air.
Pale and visibly nauseated, Dr. Bhardwaj trudged back to the porch. “Old man…” he stammered, his bureaucratic swagger completely liquidated, “your heroic son didn’t save the vulnerable. He became their most ruthless auctioneer.”
Tears trickled down Somdatt’s wrinkled cheeks, though his voice bore no shock.
“I always knew my boy was bought and paid for, Sahib,” the father whispered softly. “I only come here every day to check a simple thing: when our decorated dignitaries sit on stages weeping theatrical tears for paralyzed children—while hawking their own fathers’ ideals and profiting off every faltering breath—can this deaf society finally smell the stench of monetization, or are the cashews in the VIP lounge simply too fragrant?”
Dr. Bhardwaj froze, tongue-tied, staring blankly at the dust-cloaked tricycle. For once, the entire pompous rehabilitation pavilion fell dead silent, thoroughly humiliated by the crushing weight of a father’s quiet grief.
☆आलेख ☆ ~ ‘पथरीला सोना’ में पितरों और पूर्वजों के प्रति आस्था और सांस्कृतिक मूल्य ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
(भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का विशेष महत्व है – (पितृ पक्ष विशेष))
☆
(मॉरीशस साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर के ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना – खंड सात के एक छोटे से अंश पर आधारित लेख )
जब मैं पितृपक्ष के अवसर पर पितरों और पूर्वजों के प्रति अपनी आस्था और संस्कृति की बात करता हूँ तो मेरे मन में साहित्य से जुड़े हुए कुछ विशेष पक्षो पर लिखने की भी इच्छा होती है। हिंदी साहित्यकार रामदेव धुरंधर जी का ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना, के कुल सात खंड है। भारत से मॉरीशस पहुंचे, श्रमिकों की संपूर्ण व्यथा कथा को इन सात खंड के उपन्यास में बहुत बेहतरीन ढंग से बयां किया गया है। श्री रामदेव धुरंधर जी की लेखन शैली में, न सिर्फ जादू है बल्कि आपकी लेखन शैली, कदम कदम पर भारत और मॉरिशस की संस्कृति को भी जोड़ते हुये चलती है। आगे आलेख उपन्यास के एक अंश पर चर्चा करेंगे इसके पहले श्री रामदेव धुरंधर जी के लेखन शैली एवं का एक अनुपम उदाहरण देखते हैं।
“भारतीय तीन तलवार के साथ न जाकर, अपनी संस्कृति धरोहर के साथ जाते थे और वही रहते स्वयं साधु जीवन में ढल जाते थे। भारतीय धरती ने कैसे इस तरह के संस्कार स्वयं में पल्लवित – पुष्पित किए हों और लगे हाथ लोगों में इस तरह की प्रेरणा का संचार किया हो-
“मुट्ठी भर लेकर दूसरे देश जाओ, जहाँ इसे रोप दो कि उगे तो स्वयं वहाँ भारत उगे। ” (पथरीला सोना खंड-७ पृष्ठ ३३३)
श्री रामदेव धुरंधर
मॉरीशस साहित्यकार रामदेव धुरंधर जी के ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना का सातवाँ खंड मेरे हाथों में है।
मैं इस उपन्यास को लगातार ही पढ़ रहा था। आज पितृ पक्ष के प्रथम दिवस पर मैं श्री रामदेव धुरंधर जी के इस उपन्यास के अंतिम पैराग्राफ पर आधारित एक लेख लिखने का एक विचार आया। इस पैराग्राफ में एक प्रपौत्र जो भारत में रहता है का मॉरीशस में रहने वाले पितामह के प्रति प्रेम का चित्रण किया गया है। उपन्यास का यह पैराग्राफ भारत और मॉरीशस के रिश्तों के मध्य रची बसी भारतीय संस्कृति को प्रदर्शित करता हुआ प्रतीत होता है।
पितृ पक्ष के अवसर पर भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति व्यक्त किए जाने वाले श्रद्धा के संदर्भ में यह पैराग्राफ अत्यंत सामयिक है। आइये श्री धुरंधर जी के इस उपन्यास के अंतिम पैराग्राफ को पढ़ते हैं और देखते हैं कि उपरोक्त विषय पर इस श्रेष्ठ उपन्यासकार का साहित्यिक चिंतन कहाँ तक जाता है –
परदादा स्वदेश से मिलने के लिए उसके परपोते अनूप और मंजुला दोनों मॉरीशस आने का जतन करते हैं।
“ड्राइवर ने आदमी से कहा कि उसके साथ भारतीय पति पत्नी है जो स्वदेश से मिलने आ रहे हैं।” (पथरीला सोना खंड-७ पृष्ठ ३३९)
लेकिन जब वह पहुँचते हैं तो –
“आदमी ने इशारे से ड्राइवर को बताया स्वदेश का घर कहाँ है। ड्राइवर को उस आदमी से स्वदेश के घर का तो मालूम हुआ, लेकिन उस परिचय में एक दुखद समाचार शामिल था। कल शाम को स्वदेश की मृत्यु हो गई थी” ( पथरीला सोना खंड-७ पृष्ठ ३३९)
उपन्यास का अंतिम पैराग्राफ :-
“अनूप और स्वदेशी के बीच परदादा और परपोते का जो धागा जुड़ गया था इसके अनुरूप हुआ यह कि परपोता अपने परदादा को मुखाग्नि दे। अनूप ने इस जिम्मेदारी को सिर झुकाकर स्वीकार किया। मन्त्रोंचार के साथ अरथी पूरी विशालता से उठी। श्मशान में शव दाह हो जाने के बाद लोग वापस लौटे। यहाँ जो कर्मकांड होना था अनूप उसके केंद्र में था। कल अस्थि विसर्जन होना था इसलिए अनूप रात को यहीं रहता। मंजुला के साथ यह बात तय हो जाने से वह टैक्सी से होटल लौट गई। अनूप के सेवा सत्कार में यहाँ के लोगों ने कोई कमी नहीं छोड़ते। शाम को पड़ोसी के घर से खाना आया। अनूप ने अपने पैसे से कुछ करना चाहा तो लोगों ने उसे मना किया। यह आत्मीयता का बड़ा ही सुंदर भावभीना पक्ष था। अनूप रात को स्वदेश के घर में रहा। पड़ोस के अमरनाथ सिम्हाद्री और दो-चार लोगों ने साथ दिया।
अगली सुबह अनूप लोगों के साथ श्मशान घाट गया। उसने अस्थि विसर्जन के लिए गंगा का चयन किया था। लोगों ने उसे सुनने हाथ जोड़कर उसकी बात का सम्मान किया। मॉरीशस का स्वदेश भारत की गंगा में जा मिले, उसका परम सौभाग्य….!
– (पथरीला सोना खंड-७ पृष्ठ ३४१)
उपन्यास की अंतिम पैराग्राफ में आलेख के संदर्भित विषय से संबंधित प्रत्येक सामग्री शब्दसह पिरोई गयीं है। इसमें ऐसे दो देश है, जो दूर होते हुए भी अपनी संस्कृति के साथ एक है। इसमें संस्कार है जिसमें परपोते को अपने परदादा को मुखाग्नि देना है। उपन्यास का यह अंश भारतीय संस्कृति में मंत्र और मंत्रोचार, अस्थि विसर्जन आदि के महत्व को जहाँ बिम्बित करता है, वही अतिथि देवो भव : की भावना को दर्शाती हुईं उपन्यास की निम्न पंक्ति पाठक मन पर गहरी छाप छोड़ती है
“अनूप के सेवा सत्कार में यहाँ के लोगों ने कोई कमी नहीं छोड़ते”
भारतीय संस्कृति का इससे सुन्दर उदाहरण क्या ही हो सकता है। उपन्यास के इस अंश की अंतिम पंक्ति में तब और अधिक धन्य हो जाती है, जब श्रेष्ठ उपन्यासकार ने उपन्यास के इस अंश में लिखा कि –
“उसने (अनूप ने) अस्थि विसर्जन के लिए गंगा का चयन किया था। लोगों ने उसे सुनने हाथ जोड़कर उसकी बात का सम्मान किया। मॉरीशस का स्वदेश भारत की गंगा में जा मिले, उसका परम सौभाग्य…!
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पाताल कोट – भाग- ५० ☆ श्री सुरेश पटवा
गढ़चिरोली की वापसी यात्रा गोंदिया, बालाघाट, सिवनी और छिन्दवाड़ा के रास्ते से सम्पन्न की। यह इलाक़ा सतपुड़ा की दक्षिणी तलहटी और ऊपरी पठार पर आबाद गोंड देवगढ़ साम्राज्य द्वारा शासित रहा है जिसके प्रमाण स्वरुप गढ़ी प्राचीरों के खंडहर अकसर दिखते हैं। पातालकोट पिपरिया से पंचमढ़ी जाते हुए मटकुली से छिन्दवाड़ा जाने वाले मार्ग पर जिला मुख्यालय छिंदवाड़ा से 78 किमी पहले सतपुड़ा की पहाडि़यों के बीच समुद्र तल से जमीन के 1700 फीट नीचे बसा है। यह सतपुड़ा की पहाडि़यों के बीच समुद्र तल से 2750-3250 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान 79 वर्ग किमी में फैला हुआ है। पातालकोट आदिवासियों की एक अलग दुनिया वाले 12 गांवों का समूह।
अपनी संस्कृति, इतिहास और भौगोलिक स्थिति से इसकी वैश्विक नक्शे में अलग पहचान है तो वहीं दिन में भी रात का एहसास कराने वाला यह क्षेत्र जग प्रसिद्ध है। पिपरिया और परासिया के बीच स्थित तामिया से पतालकोट जाया जाता है। तामिया तुलतुला पर्वत श्रेणियों के बीच आकर्षक प्राकृतिक छटा के साथ स्थित है। इसके चारों तरफ ऊंची पर्वत श्रेणियां तथा घने जंगल अद्भुत शान्ति का आभास कराते हैं। यहां डाक बंगले पर पहुंच कर चारों तरफ विहंगम दृश्य नज़र आता है, तो इसका आकार एक घोड़े की नाल जैसा नजर आता है। ऐसी जनश्रुति है कि यह पाताल लोक जाने का दरवाजा है। एक समय यहां के आदिवासी बाहरी दुनिया से दूर थे, लेकिन अब सरकारी प्रयासों से वे समाज की मुख्य धारा में शामिल हो गए हैं।
प्राकृतिक दृश्यावली के कारण यह बहुत मनमोहक है। पाताल से अर्थ इसका एक गहराई में बसा होना है। इसके मुहाने पर ब्रिटिश युग का बना हुआ सर्किट हाउस है, उससे जुड़ी अनेकों भूत-प्रेत कहानियाँ क्षेत्र में प्रचलित हैं। कहा जाता है कि इस जनजाति के लोग इस स्थान पर पिछले 5000 वर्षों से निवास कर रहे है। यह स्थान प्राकृतिक रूप से एक गहरी गर्त का किला-सा बन गया है। इसकी तलहटी से आसपास की पर्वत श्रेणियां करीब 1200 फीट ऊंची हैं। इसके पाास से ही दूधी नदी नर्मदा में मिलने निकलती है। वर्तमान में नीचे जाने के मार्ग बना दिए गए हैं। इसके पूर्व यहां लोग लताओं, बेलाओं तथा पेड़ पौधों को पकड़ कर नीचे और ऊपर आया जाया करते थे। यह स्थान अपनी अमूल्य जड़ी-बूटियों के लिए विख्यात है। यहां रहने वाले आदिवासी इन्ही जड़ी बूटियों से अपने कष्टों का निवारण करते हैं। वर्तमान में शासन द्वारा भी इन्हे चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। पातालकोट की सबसे खास बात यह है कि जमीन से नीचे होने और सतपुड़ा की पहाडि़यों से घिरा होने से इसके काफी हिस्से में सूरज की रोशनी देर से पहुंचती है, वह भी इतनी कम कि दिन में भी रात नजर आती है। बारिश के समय बादल इस घाटी में ऐसे दिखाई देते हैं जैसे तैर रहे हो। यदि कोई व्यक्ति यहां पहुंच जाए तो उसे लगेगा कि वह धरती के भीतर बसी अलग दुनिया में आ गया है।
पातालकोट की आदिवासी जीवन शैली से पुरातन युग का एहसास होता है। भारिया और गोंड परिवार रहन-सहन, खान-पान, दवा-दारू के लिए काफी हद तक जंगल के प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। समाज की मुख्य धारा में शामिल होने के बावजूद उनका भोजन मक्का, बाजरा, कोदो-कुटकी है। जड़ी-बूटियां होने से ये तुरंत अपनी बीमारी का इलाज कर लेते हैं। अब इन जड़ी-बूटियों को देश-विदेश में भी पहचान मिलने लगी है। पहनावा भी पहले की अपेक्षा आधुनिक युग जैसा हो गया है। पातालकोट के गांव कुछ दशक पहले तक रहस्य समेटे हुए थे। वर्ष 2007 में यहां पहला आंगनबाड़ी केंद्र खोला गया। प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित पातालकोट विकास प्राधिकरण के माध्यम से यहां स्कूली शिक्षा, आईसीडीएस, प्राथमिक स्वास्थ्य जैसी सेवाएं उपलब्ध कराई गई है। पातालकोट के ऊपरी गांव रातेड़ में वर्ष 2009 में तत्कालीन कलेक्टर निकुंज श्रीवास्तव ने रोमांचकारी आदिवासी खेल उत्सव की शुरुआत की थी और पर्यटकों को यहां पर्यटन के लिए आकर्षित किया था। तब से ये उत्सव हर साल नवम्बर से जनवरी के बीच हो रहे हैं। इससे पर्यटन नक्शे में पातालकोट को महत्व मिलने लगा है।
पौराणिक मान्यता हैं कि इस स्थान से रावण का पुत्र मेघनाथ, भगवान शिव की आराधना करने पाताललोक गया था। यह इलाका जड़ी-बूटियों के लिए भी जाना जाता है। पातालकोट के 12 गांव गैलडुब्बा, कारेआम, रातेड़, घटलिंगा-गुढ़ीछत्री, घाना कोडिय़ा, चिमटीपुर, जड़-मांदल, घर्राकछार, खमारपुर, शेरपंचगेल, सुखाभंड-हरमुहुभंजलाम और मालती-डोमिनी है, जहां एक समय जाना मुश्किल था। अब इसे पक्की सड़क से जोड़ दिया गया है। यहां की आबादी भारिया और गौंड आदिवासी समुदाय की हैं, जो अभी भी काफी हद तक प्राकृतिक व्यवस्थाओं पर आश्रित हैं। दृष्टि डालने से प्राकृतिक सौन्दर्य आपको अभिभूत कर देता है। इसके उत्तर दिशा में कुछ दूरी पर एक संकरे मार्ग से नीचे उतरने पर पर्वतीय गुफा में एक शिवलिंग स्थित है। इसके पास झरने के रूप में नीचे गिरने वाला पानी एक जल प्रपात सा प्रतीत होता है।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “मन की बात…“.)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हानि-लाभ…“।)
अभी अभी # १११३ ⇒ आलेख – हानि-लाभ श्री प्रदीप शर्मा
पुराने साहूकारी बही-खातों में अंदर कितनी भी लाभ-हानि हो, बही-खातों के ऊपर लाभ-शुभ ही लिखा जाता था। शुभ-लाभ में शुभ ही शुभ होता है, क्योंकि जब लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं, तो लाभ ही लाभ होता है! लेकिन जीवन में हर इंसान को हानि और लाभ दोनों का अनुभव होता है।
आम आदमी के लिए सुख-दुःख, हानि-लाभ ईश्वर के अधीन होंगे, लेकिन राजनीति हमेशा केवल सत्ता के अधीन होती है। ईश्वर की सत्ता से परे होती है सत्ता की राजनीति।।
जिस तरह एक व्यापारी की नैतिकता हानि-लाभ से जुड़ी होती है, घोड़ा घास से यारी नहीं कर सकता, उसी तरह राजनीति में सत्ता की खातिर कभी लोक-लुभावन निर्णय लिये जाते हैं, तो कभी लोक-विरोधी। कभी शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को सरकार पलट देती है तो कभी sc/st के निर्णय को ताक में रखना पड़ता है। और सरकार इसी ताक में रहती है, कि कब मौका आए, और वह ताक में रखा निर्णय पुनः बहाल करे।
जब धंदा मंदा होता है, व्यापारी अधिक जमाखोरी करता है। बाज़ार के उठते ही वह उठ जाता है, और उसका गोदामों में पड़ा सामान मुँह-माँगी कीमत पर हाथों-हाथ उठ जाता है। कभी कभी जब मंदी ज़ोर पकड़ लेती है, तो मज़बूरी में घाटा उठाकर भी सामान उठा देता है, सर पकड़कर बैठ जाता है, और आसमान की ओर मुँह उठाकर कहता है –
जन्म-मरण, जस-अपजस,
हानि-लाभ, सब ईश्वर के हाथ।।
एक व्यापारी की तरह कभी कभी सत्ता का भी दीवाला निकल जाता है। 60 साल से चली आ रही पेढ़ी जनता का विश्वास खो बैठती है और विपक्ष में जा बैठती है। राजनीति पुरुषार्थ का खेल है! इसमें रणछोड़ नहीं चलते। जंगबहादुर ही जंग जीतते हैं, लालबहादुर तो एक रेल दुर्घटना से ही व्यथित हो, मंत्री-पद से त्याग-पत्र दे देते हैं।
त्याग नहीं भोग की नीति का नाम है राजनीति! एक राजनेता के लिए सत्ता का डंडी-चूम उपभोग और कुर्सी की देखभाल से बड़ा कोई कर्तव्य अथवा आदर्श नहीं हो सकता। त्याग के लिए जनता बैठी है न।।
जनता नहीं समझती! उसके भले के लिए सरकार को कितने कड़वे और कठोर निर्णय लेने पड़ते है। सब्सिडी और आरक्षण जैसे कल्याणकारी क़दम अगर एक बार आगे बढ़ जाएं, तो महज भावुकता अथवा छोटे-मोटे आंदोलनों की परवाह नहीं की जाती। एक बार बढ़े हुए कदम पीछे नहीं लिए जाते। और खासकर चुनाव के वक्त तो कभी नहीं।
हम लाए हैं तूफान से कुर्सी निकाल के! इस कुर्सी को रखना, मेरे नेता संभाल के।।
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता पर्यावरण दिवस!!)