हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 90 – कुछ दोहे  … हमारे लिए ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ वरिष्ठ साहित्यकार एवं अग्रज श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी स्वास्थ्य की जटिल समस्याओं से  सफलतापूर्वक उबर रहे हैं। इस बीच आपकी अमूल्य रचनाएँ सकारात्मक शीतलता का आभास देती हैं। इस कड़ी में प्रस्तुत है आपके कुछ दोहे  ... हमारे लिए। ) ☆  तन्मय साहित्य  # 90  ☆  ☆ कुछ दोहे  ... हमारे लिए ☆  इधर-उधर सुख ढूँढते, क्यों भरमाये जीव। बच्चों के सँग बैठ ले, जो है सुख की नींव।।   लीलाएं शिशु की अजब, गजब हास्य मुस्कान। बिरले लोगों को मिले, शैशव सुख वरदान।।   शिशु से निश्छल प्रेम ही, है ईश्वर से प्रीत। आनंदित तन मन रहे, सुखद मधुर संगीत।।   रुदन हास्य करुणा मिले, रस वात्सल्य अपार। नवरस का आनंद है, शैशव नव त्योहार।।   स्नेह थपकियाँ मातु की, कुपित प्रेम फटकार। शिशु अबोध भी जानता, ठंडे गर्म प्रहार।।   फैलाए घर आँगने, खेल खिलौने रोज। नाम धाम औ' काम की, नई-नई हो खोज।।   जातिभेद छोटे-बड़े, पंथ धर्म से दूर। कच्ची पक्की कुट्टियाँ, बाल सुलभ अमचूर।।   बच्चों की तकरार में, जब हो वाद विवाद। सहज मिलेंगे सूत्र नव, अनुपम से संवाद।।   बच्चों में हमको मिले, सकल जगत का प्यार। बालरूप ईश्वर सदृश, दिव्य...
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हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ धारावाहिक लघुकथाएं – औरत # – [1] अजेय [2] औरत ☆ डॉ. कुंवर प्रेमिल

डॉ कुंवर प्रेमिल (संस्कारधानी जबलपुर के वरिष्ठतम साहित्यकार डॉ कुंवर प्रेमिल जी को  विगत 50 वर्षों  से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में सतत लेखन का अनुभव हैं। अब तक 350 से अधिक लघुकथाएं रचित एवं ग्यारह  पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन।  आपकी लघुकथा ‘पूर्वाभ्यास’ को उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगांव के द्वितीय वर्ष स्नातक पाठ्यक्रम सत्र 2019-20 में शामिल किया गया है। वरिष्ठतम  साहित्यकारों  की पीढ़ी ने  उम्र के इस पड़ाव पर आने तक जीवन की कई  सामाजिक समस्याओं से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है,जो कदाचित उनकी रचनाओं में झलकता है। हम लोग इस पीढ़ी का आशीर्वाद पाकर कृतज्ञ हैं।  आपने लघु कथा को लेकर एक प्रयोग किया है।  एक विषय पर अनेक लघुकथाएं  लिखकर। इस श्रृंखला में  औरत विषय पर हम प्रतिदिन आपकी दो लघुकथाएं धारावाहिक स्वरुप में प्रस्तुत  करने का प्रयास करेंगे । आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला की  लघुकथाएं [1] अजेय  [2] औरत।  हमें पूर्ण विश्वास है कि आपका स्नेह एवं प्रतिसाद प्राप्त होगा। ) ☆ धारावाहिक लघुकथाएं – औरत #2 – [1] अजेय  [2] औरत ☆ [1] अजेय 'हर...
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हिन्दी साहित्य – रंगमंच ☆ दो अंकी नाटक – एक भिखारिन की मौत -9 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ रहे थे। हम संजय दृष्टिश्रृंखला को कुछ समय के लिए विराम दे रहे हैं । प्रस्तुत है  रंगमंच स्तम्भ के अंतर्गत महाराष्ट्र राज्य नाटक प्रमाणन बोर्ड द्वारा मंचन के लिए प्रमाणपत्र प्राप्त धारावाहिक स्वरुप में श्री संजय भारद्वाज जी का सुप्रसिद्ध नाटक “एक भिखारिन की मौत”। ) रंगमंच ☆ दो अंकी नाटक – एक भिखारिन की मौत – 9 ☆  संजय भारद्वाज *प्रवेश तीन* (अनुराधा चुपचाप बैठी है। विचारमग्न है। रमेश का प्रवेश।) रमेश- क्या हुआ अनुराधा? अनुराधा- कुछ नहीं।  यों...
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हिन्दी साहित्य – यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #75 – 11 – जिम कार्बेट राष्ट्रीय वन अभ्यारण्य ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक (श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है। इस सन्दर्भ में श्री अरुण डनायक जी हमारे  प्रबुद्ध पाठकों से अपनी कुमायूं यात्रा के संस्मरण साझा कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है  “कुमायूं  - 11 – जिम कार्बेट राष्ट्रीय वन अभ्यारण्य ”) ☆ यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #76 - 11 – जिम कार्बेट राष्ट्रीय वन अभ्यारण्य ☆   नैनीताल में एक...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 41 ☆ तू क्या बला है ए जिंदगी ☆ श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

श्री प्रहलाद नारायण माथुर ( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता ‘तू क्या बला है ए जिंदगी’। )    Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>>  मृग  तृष्णा     ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 41 ☆ ☆ तू क्या बला है ए जिंदगी ☆   कितने राज छुपा रखे है तूने ए जिंदगी, आज मुझे किस मोड़ पर पहुंचा दिया तूने ए जिंदगी || दो घड़ी खुशी से गुजारने की तमन्ना थी, खुशी से पहले ग़मों को पहुंचा दिया तूने ए जिंदगी || दो पल का सब्र तो कर लेती, क्या पहले कम थे जो और ग़म दे दिए तूने ए जिंदगी || सुना था हर रात के बाद एक नई सुबह होती है, नई सुबह को भी अंधेरी...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ नववर्ष विशेष – आओ अपना नववर्ष मनाएं ☆ श्री आर के रस्तोगी

श्री आर के रस्तोगी ☆ नववर्ष विशेष – आओ अपना नववर्ष मनाएं ☆ श्री आर के रस्तोगी☆  आओ हम सब मिलकर अपना नववर्ष मनाएं। घर घर हम सब मिलकर नई बंदनवार लगाए।   करे संचारित नई उमंग घर घर सब हम, फहराए धर्म पताका अपने घर घर हम। करे बहिष्कार पाश्चातय सभ्यता का हम, अपनी सभ्यता को आज से अपनाए हम। आओ सब मिलकर नववर्ष का दीप जलाए आओ हम सब मिलकर अपना नववर्ष मनाए, घर घर हम सब मिलकर नई बंदनवार लगाए।।   क्या कारण है हम अपना नववर्ष नहीं मनाते है, केवल पाश्चातय सभ्यता का हम नववर्ष मनाते है। रंग जाते है नई सभ्यता मे भूल गए अपने को। रहे गुलाम अंग्रेजो के भूल गए अपने सपनों को। आओ सब मिलकर इस सभ्यता की होली जलाए, करे बहिष्कार इन सबका अपना नववर्ष मनाए। आओ घर घर नववर्ष का हम सब दीप जलाएं।।   © श्री आर के रस्तोगी गुरुग्राम ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈ ...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “मेघदूतम्” श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद # मेघदूत…. उत्तर मेघः ॥२.४२॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

महाकवि कालीदास कृत मेघदूतम का श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆ “मेघदूतम्” श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद # मेघदूत …. उत्तरमेघः ॥२.४२॥ ☆   शब्दाख्येयं यदपि किल ते यः सखीनां पुरस्तात कर्णे लोलः कथयितुम अभूद आननस्पर्शलोभात सो ऽतिक्रान्तः श्रवणविषयं लोचनाभ्याम अदृष्टस त्वाम उत्कण्ठाविरचितपदं मन्मुखेनेदम आह॥२.४२॥   कथन योग्य अपनी सरल बात भी जो कि मुख स्पर्ष हित कान मे था बताता अब श्रवण और दृष्टि से दूर तव प्राण मम मुख व्यथा तुम्हें अपनी सुनाता   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈ ...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ असा बॅरिस्टर झाला ☆ श्री गौतम कांबळे

(14 एप्रिल 1891 – 6 डिसेंबर 1956) ☆  कवितेचा उत्सव ☆ असा बॅरिस्टर झाला ☆ श्री गौतम कांबळे ☆ परंपरेच्या जोखडाखाली समाज दबून गेला जेंव्हा  समाज दबून गेला आधार देण्या दीनास भीम वकील होऊन आला असा बॅरिस्टर हो झाला   पिता रामजी माता भिमाई आली फळाला तयांची पुण्याई गुलामगिरीचा कर्दनकाळ लढाया सिद्ध हो झाला   बुद्ध कबीर फुले हे गुरु शाहु सयाजी बनले तारु बुद्धीमत्तेने विश्वात साऱ्या चमकला तेजाचा गोळा   अन्यायाचा प्रतिकार करावा हक्कासाठी संघर्ष करावा शिक्षणाने होतो विकास खरा भीम आम्हाला सांगूनी गेला   शैक्षणिक सामाजिक तो न्याय राजसत्तेविना मिळणार नाय देऊनी संदेश मुडद्यांच्या अंगी स्फुल्लींग पेरून गेला   बुद्ध धम्माचा करुन स्विकार शिकविला तो शुद्ध आचार संविधानातूनी देशाला या समता विचार दिला   ©  श्री गौतम कांबळे सांगली ९४२१२२२८३४ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 93 ☆ आठवण – ७ एप्रिल २०२१ ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे (आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा सोनवणे जी  के उत्कृष्ट साहित्य को  साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 93☆ ☆ आठवण - ७ एप्रिल २०२१ ☆  आज अभिनेता जितेंद्र चा जन्मदिवस! मी शाळेत असताना जितेंद्र चे खुप सिनेमे पाहिले. शिरूर मध्ये असताना जितेंद्र चं वेड लागलं ! मला आठवतंय, बूँद जो बन गयी मोती, गीत गाया पत्थरों ने, गुनाहों का देवता, अनमोल मोती, औलाद, फर्ज, विश्वास, जिगरी दोस्त.....हे सगळे शिरूर ला तंबूत पाहिलेले सिनेमा. एकदा मी आणि माझी मैत्रीण ज्योती धनक सतरा कमानी पुलापर्यंत फिरायला गेलो होतो. मी फूल है बहारों का, बाग है नजारों का और चाँद होता है सितारों का.... मेरा तू.. . तू ही तू....  हे गाणं गुणगुणत होते. ज्योती नी विचारलं "जितेंद्र आवडतो का तुला?" मी म्हटलं, हो..." जितेंद्र आणि शशी कपूर.... "त्यावर ज्योती म्हणाली, "शशी कपूर चं लग्न झालंय, जितेंद्र करेल तुझ्याशी लग्न." जितेंद्र माझ्याशी लग्न करेल असं मला मुळीच वाटलं नव्हतं, कारण गुड्डी मधल्या जया भादुरी इतकी अतिभावनिक मी कधीच नव्हते. पण ज्योती...
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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ फरिश्ता….भाग 3 ☆ सौ. सुनिता गद्रे

सौ. सुनिता गद्रे  ☆ जीवनरंग ☆ फरिश्ता….भाग 3 ☆ सौ. सुनिता गद्रे ☆  मध्येच मी डोळे उघडले. गप्पा थोड्या थांबल्यागत वाटल्या. म्हणून पाहिलं तर अंकलने त्यांचा मोठा ट्रक वजा बॉक्स,-जसा सामान्यपणे सर्व सैनिकांकडे असतो तसा-उघडला होता व एक फोटो अल्बम त्यातून बाहेर काढला होता. मी पुन्हा दुर्लक्ष करून डोळे मिटले. वेगवेगळ्या फोटोबद्दल ते माहिती सांगत होते. "ये हमारा खेत, ये अम्मा-बाऊजी, अच्छा... ये ना, ये बडे बडे भाई साब । "और अंकल ये कौन है?" "ये मेरा बेटा सचिन और ये उसकी मम्मी।" "ओह, हाऊ फनी! जवान अंकल, सचिन की मम्मी ने मतलब इस आंटी ने मुँह क्यों ढक रखा है ?...ओ होs हो! आगे की सारी फोटो में भी ऐसा ही है। ....अंकल आपने ऑंटी की मुँहवाली फोटो क्यों नही खिंची ?"....हीsहीsही हसणं आणि मनसोक्त खिदळणं. हे जरा अतीच होतं. "सानवी" मी जरा जोरात हाक मारली. तिला खूणेनं आपल्या जवळ बोलावून घेऊन तिला दटावत म्हटलं, "अंकलना त्रास देऊ नको ग." "जी नही मॅडम, वह क्या मुझे परेशान करेगी? बल्कि बहूत  अच्छा लग रहा है उससे बाते करके"...
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