हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #153 ☆ शेष या अवशेष ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  वैश्विक महामारी और मानवीय जीवन पर आधारित एक अत्यंत विचारणीय आलेख शेष या अवशेष। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 153 ☆ ☆ शेष या अवशेष ☆ जो शेष बची है, उसे विशेष बनाइए, अन्यथा अवशेष तो होना ही है',' ओशो की यह उक्ति अत्यंत सार्थक है, जिसमें जीवन-दर्शन निहित है और वह चिंतन करने को विवश करती है कि मानव को अपने शेष जीवन को विशेष बनाना चाहिए; व सार्थक एवं परार्थ काम करने चाहिएं। सार्थक कर्म से तात्पर्य यह...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 71 ☆ बच्चों के विकास में बाल कविताओं की भूमिका ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’ (डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं।आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक अत्यंत विचारणीय  एवं सार्थक आलेख “बच्चों के विकास में बाल कविताओं की भूमिका”।) ☆ किसलय की कलम से # 71 ☆ ☆ बच्चों के विकास में बाल कविताओं की भूमिका ☆  बच्चों के बौद्धिक स्तर, उनकी आयु व अभिरुचि का ध्यान रखते हुए उनके सर्वांगीण विकास में देश, समाज एवं परिवार के प्रत्येक सदस्य का उत्तरदायित्व होता है। हमारे समवेत प्रयास ही बच्चों के यथोचित विकास में चार चाँद लगा...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – नकार☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) ☆ आपदां अपहर्तारं ☆ 🕉️ नवरात्र  साधना सम्पन्न हुई 🌻 आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #153 ☆ भावना के दोहे… आँखें ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल (डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है  “भावना के दोहे…आँखें”।)  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 153 – साहित्य निकुंज ☆ ☆ भावना के दोहे… आँखें ☆ ☆ तिनका लगता आँख में, होती है जब पीर। आँखों के इस दर्द से, बहता है जब नीर।। ☆ आँखों के इस दर्द का, न है कोई इलाज। नीर-नीर बहता रहे, दर्द है लाइलाज । ☆ आँखें तेरी देखकर, है सुख का आभास। बहे कभी भी नीर तो, रहूँ सदा मैं पास ।। ☆ आँखों-आँखों  ने कहा, तू है मेरा कौन। अनुरागी संकेत से, आँखें होती मौन।। ☆ आँखों ने अब पढ़ लिया, तू है मेरा मीत। कैसे तुझसे कब मिलूँ, झरता है संगीत।। ☆ © डॉ भावना शुक्ल सहसंपादक… प्राची प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307 मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी)...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #140 ☆ संतोष के दोहे – भ्रष्टाचार ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष” (आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  “संतोष के दोहे – भ्रष्टाचार”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।) ☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 140 ☆  ☆ संतोष के दोहे – भ्रष्टाचार ☆ श्री संतोष नेमा ☆ नैतिकता जब सुप्त हो, जागे भ्रष्टाचार बेईमानी भरी तो, बदल गए आचार   हरड़ लगे न फिटकरी, खूब करें वे मौज अब के बाबू भ्रष्ट हैं, इनकी लम्बी फ़ौज   कौन रोकता अब किसे, शासक, नेता भ्रष्ट अंधा अब कानून है, जनता को बस कष्ट   हुआ समाहित हर जगह, किसको दें हम दोष बन कर पारितोषिक वह, दिला रहा...
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हिन्दी साहित्य – यात्रा संस्मरण ☆ न्यू जर्सी से डायरी… 11 – डाक व्यवस्था ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है आपकी विदेश यात्रा के संस्मरणों पर आधारित एक विचारणीय आलेख – ”न्यू जर्सी से डायरी…”।) यात्रा संस्मरण ☆ न्यू जर्सी से डायरी… 11 -  डाक व्यवस्था ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  डाक व्यवस्था  मेघदूत की डाक व्यवस्था महाकवि कालिदास ने भारतीय वांग्मय में की थी, आज तक इस अमर साहित्य का रसास्वादन, पाठ प्रतिपाठ हम करते हैं और हर बार नए आनंद सागर में गोते लगाते हैं। सात समंदर पार मेरे सामान्य पाठको को जानने में रुचि हो सकती है कि भारत की...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ मी राजा, तू राणी माझी… ☆ श्री रवींद्र सोनावणी ☆

श्री रवींद्र सोनावणी  कवितेचा उत्सव  ☆ मी राजा, तू राणी माझी… ☆ श्री रवींद्र सोनावणी ☆  (एक वास्तव) आठवते का? काय आपुले ठरले होते! लग्नानंतर पहिल्या रात्री ? स्पर्श बावरा वारा होता, साक्षीला अन्, खिडकीच्या कानात सुगंधी फाया होता रातराणीचा लाज हरवली होती गगनी ताऱ्यांनीही, मिठी अनामिक पडली होती, श्वासांनाही... आठवते का?   त्या भेटीतच रचले होते, उंच मनोरे, स्वप्न फुलांचे ! म्हणालीस तू, या काळाच्या वटवृक्षावर, बांधू आपण घरटे सुंदर, असेल ज्याला नक्षत्रांची सुंदर झालर, इंद्रधनुची कमान त्यावर, गारवेल अन्, कौलारांवर, वेलींच्या वेलांट्या असतील, आणि मनोहर, दोन पाडसे गोजिरवाणी, बागडतील मग साऱ्या घरभर, मीही म्हणालो, "हो गं!" होईल सारे मनासारखे, आणि सहेतुक, एक जांभई दिली खुणेची, हसलीस तू, मग मिटले डोळे... आठवते का?   हळू लागलो कानी नंतर, सलज्ज वदली तूही मग ते - चावट कुठले - मी नाही गं अधीरता ती, आणि हरवली कुशीत माझ्या, रात्र लाजरी... आठवते का?   अशाच रात्री आल्या गेल्या, कुठे हरवल्या? कुणांस ठाऊक? उरल्या केवळ आठवणी त्या - गंध हरवल्या निर्माल्यागत - उभारले घरकुल आपुले - पण उघड्यावर, नक्षत्रांची होती झालर, अधांतरावर, आणि पाडसे गोजिरवाणी - हमरस्त्यांवर, नित्य उद्याचे स्वप्न पाहिले, ज्या नयनांनी, त्या नयनांच्या पाणवठ्यावर, व्यथा मनाच्या भरती पाणी, घट भरतो अन् भविष्यात भटकते,...
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मराठी साहित्य – कविता ☆ विजय साहित्य #145 ☆ शब्द ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते कवितेचा उत्सव # 145 – विजय साहित्य ☆ शब्द ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆ शब्द  असा शब्द तसा सांगू तुला शब्द कसा? माणुसकीच्या ऐक्यासाठी पसरलेला एक पसा. .. . !   शब्द  अक्षरलेणे देऊन जातो देणे ह्रदयापासून ह्रदयापर्यंत करीत रहातो जाणे येणे. . . . !   शब्द  आलंकृत शब्द सालंकृत. मनाचा आरसा जाणिवांनी सर्वश्रृत.. . . . !   कधी येतो साहित्यातून तर कधी काळजातून.. . !   शस्त्र होतो कधी कधी श्रावण सर शब्द म्हणजे कवितेचे हळवे ओले माहेरघर.. . . .! © कविराज विजय यशवंत सातपुते सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009. मोबाईल  8530234892/ 9371319798. ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈ ...
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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ भूकंप – भाग 4 ☆ सौ अंजली दिलीप गोखले ☆

सौ अंजली दिलीप गोखले  जीवनरंग  ☆ भूकंप – भाग 4 ☆ सौ अंजली दिलीप गोखले ☆ अखेर मोठ्या मेहनतीने मी एमबीबीएस झाले . आई बाबांची सीमा डॉक्टर झाली .यावेळी मात्र मी दादाकडे जायचं ठरवलं. त्या एका घटनेनं आमचं सगळ्यांचं आयुष्य उध्वस्त झालं होतं. तो निघून गेला होता. पण आयुष्यात भली मोठी पोकळी निर्माण करून गेला होता . दादाकडे आल्यावर मला माहेरी आल्यासारखं वाटलं, पण क्षणभरच! सासरी कुठे गेले होते मी? कधी जाणार पण नव्हते. त्यामुळे तो विचारच झटकून टाकला. दादा चे घर, आई-बाबांनी नेटकेपणाने मांडले होते. आईचे स्वयंपाक घर म्हणजे चकाचक. पण यावेळी मात्र आई सगळे काम नाईलाजाने करते असं मला जाणवलं. सगळी कामं करणं तिला झोपत नव्हतं. खरंच तिला मदतीची गरज आहे हे मला जाणवलं . खरं तर एव्हानाना दादाचं लग्न व्हायला हवं होतं. आम्ही आमच्या दुःखात इतके बुडालो होतो, की त्याचा विचारच केला नाही. त्याची काय चूक आहे या सगळ्यात? त्यानं का शिक्षा भोगायची ? या विषयावर त्याच्याशी बोलायचं मी ठरवलं, आणि क्षणात मला माझ्या त्या मैत्रिणीची अर्थात त्याच्या बहिणीची, माझ्या न झालेल्या...
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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “सस्पेन्शन” ☆ प्रस्तुती – श्री विनय माधव गोखले ☆

श्री विनय माधव गोखले  इंद्रधनुष्य   ☆ “सस्पेन्शन” ☆ प्रस्तुती – श्री विनय माधव गोखले ☆ नॉर्वे हा युरोपमधील एक देश आहे. तिथे कुठेही जाता हे दृश्य सहसा सापडेल...  एक रेस्टॉरंट, एक महिला त्याच्या कॅश काउंटरवर येते आणि म्हणते —  " ५ कॉफी, १ सस्पेंशन "... मग ती पाच कॉफीचे पैसे देते आणि चार कप कॉफी घेऊन जाते. थोड्या वेळाने दुसरा माणूस येतो, म्हणतो — " ४ लंच, 2 सस्पेंशन "!!!  तो चार लंचसाठी पैसे देतो आणि दोन लंच पॅकेट घेऊन जातो. मग तिसरा येतो आणि ऑर्डर देतो —  " १० कॉफी, ६ सस्पेंशन" !!!  तो दहासाठी पैसे देतो, चार कॉफी घेतो.  थोड्या वेळाने जर्जर कपडे घातलेला एक म्हातारा काउंटरवर येऊन विचारतो — " एनी सस्पेंडेड कॉफी ??"  उपस्थित काउंटर-गर्ल म्हणते -" येस !!"--आणि त्याला एक कप गरम कॉफी देते. काही वेळाने दुसरा दाढीवाला माणूस आत येतो आणि विचारतो - " एनी सस्पेंडेड लंच ??" –काउंटरवरील व्यक्ती गरम अन्नाचे पार्सल देते आणि त्याला पाण्याची बाटली देते.  आणि हा क्रम सुरू… एका गटाने जास्त पैसे मोजावेत, आणि दुसऱ्या गटाने पैसे न देता खाण्यापिण्याचे पदार्थ घ्यावेत,असा दिवस जातो. म्हणजेच, अज्ञात गरीब, गरजू लोकांना स्वतःची "ओळख" न...
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