(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “यह कैसा स्वागत ?”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
अस्पताल में एक उच्च पद पर कार्यरत महिला ने बच्ची को जन्म दिया । अस्पताल की सबसे सीनियर महिला डाॅक्टर आई और उस।अधिकारी को बुरा सा मुंह बना कर कहने लगी-हमने सोचा था कि आप पढ़ी लिखीं हैं और आपने अल्ट्रासाउंड करवा रखा होगा । पर हमें क्या मालूम था कि आपने भगवान् भरोसे सब कुछ छोड़ रखा है ।
महिला अधिकारी चौंकी । फिर पूछा -यदि मैंने पहले से सब कुछ करवा रखा होता तो फिर क्या फर्क पड़ता?
– कम से कम हमारे स्टाफ को तो इनाम मिल जाता । महिला डाॅक्टर ने बड़ी बेशर्मी से कहा ।
– बस । इसी कारण आपने मेरी नवजात बच्ची का स्वागत् नहीं किया ?
– हां । हमारे स्टाफ को कुछ ऐसी ही उम्मीद थी आपसे ।
– कोई बात नहीं । आप स्टाफ को बुलाइए ।
सारा स्टाफ आ गया और महिला अधिकारी ने सबको इनाम दिया लेकिन उसके बाद अपने पति को बुलाकर अपना सारा सामान समेट लिया । पति ने पूछा -ऐसा क्यों कर रही हो ?
महिला अधिकारी ने पति के गले लगकर रोते कहा -इस अस्पताल में मैं एक पल और नहीं रहूंगी क्योंकि इन लोगों ने मेरी बच्ची का स्वागत् नहीं किया ।
☆ लघुकथा ☆ ~ पिता की चिंता ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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ट्रेन में बड़ी भीड़ थी, लेकिन देवीदयाल को अपनी बिटिया के घर जाना जरुरी था। बेटी की ससुराल की तरफ से आयी एक खबर ने देवी दयाल को डरा दिया था । उन्हें हर हाल में आज ही अपनी बेटी की ससुराल जाना था । ट्रेन में बहुत भीड़ थी, लेकिन उन्हें हर हाल में ट्रेन पर चढ़ना ही था।
आइए बाबूजी, आप ऊपर आ आइए,यह कहते हुए उस युवक ने देवीदयाल की बांह को पकड़कर ट्रेन के अंदर खींच लियाl बाबूजी आपने अपने इन्हीं हाथों से सुधा का हाथ मेरे हाथ में दिया थाl आप सुधा की चिंता मत कीजिए, उसे कोई भी इस घर से निकाल नहीं सकताl अब वह मेरे पास ही रहेगीl देवीदयाल ने युवक के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,बेटा..मेरी यात्रा का उद्देश्य पूरा हो गया, अब अगले स्टेशन पर उतर जाऊँगाl
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३३८ ☆ पर्यावरण दिवस…
– दो वर्ष पहले पर्यावरण महोत्सव में आपके एकल काव्य पाठ ने श्रोताओं का मन जीत लिया था। जैसे आपसे पहले बात हुई थी, इस वर्ष भी 5 जून को उसी स्थान पर आपका काव्य पाठ आयोजित होगा। नई सजावट के साथ कार्यक्रम स्थल की कुछ तस्वीरें भी आपको भेजी थीं।
– हाँ मैंने देखीं पर यह आयोजन स्थल तो भिन्न लग रहा है। यह कोई हॉल जैसा है। लग्जरी कुर्सियाँ लगी हैं। मंच बना हुआ है। एसी भी दिख रहा है। 2 वर्ष पहले तो मैंने विशाल बरगद के नीचे माटी के चबूतरे पर खुले में कविता पाठ किया था।
– जी हाँ, यह वही स्थान है। क्या है न कि खुले में मच्छर काटते थे। अचानक बारिश-अँधड़ आने का डर लगा रहता, सो अलग। इसलिए बरगद कटवा कर छोटा-सा एसी हॉल बनवा दिया है। इससे कवि को रचना सुनाने का और श्रोताओं को कविता सुनने का अधिक आनंद आएगा। एकॉस्टिक सिस्टम के प्रभाव से प्रस्तुति भी अलग ही स्तर की होगी। सारी व्यवस्था देखकर आपको बहुत अच्छा लगेगा।
– क्षमा कीजिएगा मैं नहीं आ पाऊँगा।
– अरे ऐसा क्या हो गया? तैयारी में या आपकी सुविधा में कुछ कमी दिख रही है क्या?
– एक तो मैं केवल संवेदनशील लोगों के बीच कविता पढ़ता हूँ। दूसरे, कथनी से नहीं अपितु करनी से मनाता हूँ मैं पर्यावरण दिवस, कहकर उसने फोन रख दिया।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
१७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी। इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:।
इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ आलेख ☆ धरती की पुकार: क्या हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ बचा पाएँगे? ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“जब आख़िरी पेड़ कट जाएगा, आख़िरी नदी सूख जाएगी और आख़िरी मछली मर जाएगी, तब इंसान को समझ आएगा कि पैसा खाया नहीं जा सकता।”
कुछ दिन पहले एक बच्चे ने अपने दादा से पूछा-
“दादाजी, क्या आपके बचपन में भी इतनी गर्मी पड़ती थी?”
दादा कुछ पल चुप रहे।
उन्होंने आँगन में खड़े पुराने नीम के पेड़ की ओर देखा और धीमे से कहा-
“नहीं बेटा, तब गर्मी भी इंसानों जैसी होती थी। आज की तरह गुस्से में नहीं।”
बच्चा उनकी बात पूरी तरह समझ नहीं पाया, लेकिन दादा समझ रहे थे कि सवाल मौसम का नहीं, बदलती हुई धरती का है।
सच तो यह है कि आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जब प्रकृति हमें बार-बार चेतावनी दे रही है। कभी असमय बारिश, कभी भयंकर सूखा, कभी जंगलों में आग, कभी बाढ़ का कहर। ऐसा लगता है जैसे धरती हमें समझाना चाहती है कि उसके धैर्य की भी एक सीमा है।
हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। बहुत से लोगों के लिए यह केवल एक तारीख है, लेकिन वास्तव में यह हमारी धरती के स्वास्थ्य की रिपोर्ट कार्ड जैसा दिन है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हम प्रकृति के मालिक नहीं हैं। हम केवल उसके मेहमान हैं।
दुर्भाग्य से आधुनिकता की दौड़ में हमने यह बात लगभग भुला दी है। हमने विकास के नाम पर जंगल काटे। नदियों को नालों में बदल दिया। मिट्टी को रसायनों से भर दिया और फिर आश्चर्य करते हैं कि मौसम इतना अस्थिर क्यों हो गया है।
कभी गाँवों में सुबह पक्षियों की आवाज़ से होती थी। आज अलार्म घड़ी की आवाज़ से होती है। पहले बच्चे पेड़ों की छाँव में खेलते थे। आज एयर-कंडीशनर वाले कमरों में मोबाइल की स्क्रीन पर उँगलियाँ चलाते हैं। पहले बारिश आने से पहले मिट्टी की खुशबू पूरे गाँव को खुश कर देती थी। अब बारिश के साथ लोग ट्रैफिक जाम और जलभराव की चिंता करने लगते हैं।
बदलाव केवल पर्यावरण में नहीं आया है। बदलाव हमारे सोचने के तरीके में भी आया है। हमने प्रकृति को संसाधन समझ लिया, संबंध नहीं।
यही हमारी सबसे बड़ी भूल है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया अभूतपूर्व जलवायु संकट का सामना कर रही है। पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। लाखों जीव-जंतु अपने प्राकृतिक आवास खो रहे हैं।
लेकिन इन सबके बीच एक उम्मीद भी है।
प्रकृति आज भी हमें रास्ता दिखा रही है।
एक जंगल हजारों एयर प्यूरीफायर से ज्यादा प्रभावी होता है। एक स्वस्थ नदी लाखों लीटर शुद्ध पानी दे सकती है। एक पेड़ केवल छाया नहीं देता, बल्कि कार्बन को सोखकर धरती का तापमान कम करने में मदद करता है। यानी प्रकृति कोई समस्या नहीं है। प्रकृति ही समाधान है।
लेकिन समाधान केवल सरकारों से नहीं आएगा। यह बदलाव हमारे घरों से शुरू होगा। जब हम बिना जरूरत बिजली बंद करेंगे। जब हम प्लास्टिक की थैली की जगह कपड़े का थैला इस्तेमाल करेंगे। जब हम पानी की एक-एक बूंद की कीमत समझेंगे। जब हम अपने बच्चों को पेड़ लगाने के साथ-साथ पेड़ बचाना भी सिखाएँगे।
अक्सर लोग कहते हैं-“मेरे अकेले के बदलने से क्या होगा?”
लेकिन इतिहास गवाह है कि हर बड़ा परिवर्तन एक छोटे कदम से शुरू हुआ है।
एक बूंद से नदी बनती है।
एक बीज से जंगल बनता है।
और एक जागरूक इंसान से समाज बदलता है।
मुझे हमेशा लगता है कि पर्यावरण संरक्षण का असली अर्थ केवल पेड़ लगाना नहीं है।
असली पर्यावरण संरक्षण है-प्रकृति के प्रति सम्मान विकसित करना।
जिस दिन हम नदी को केवल पानी नहीं, जीवन समझने लगेंगे…
जिस दिन हम पेड़ को केवल लकड़ी नहीं, साँस समझने लगेंगे…
जिस दिन हम धरती को केवल जमीन नहीं, माँ समझने लगेंगे…
उस दिन किसी पर्यावरण दिवस की जरूरत नहीं पड़ेगी।
दुनिया की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम अपने बच्चों के लिए बैंक बैलेंस छोड़ने की चिंता करते हैं, लेकिन उनके लिए स्वच्छ हवा, साफ पानी और सुरक्षित धरती छोड़ने की चिंता कम करते हैं।
याद रखिए, आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह नहीं पूछेंगी कि हमारे पास कितनी संपत्ति थी। वे यह पूछेंगी कि हमने उनके लिए कैसी पृथ्वी छोड़ी।
फंडा यह है कि-
धरती हमारी विरासत नहीं है, यह हमारे बच्चों से लिया गया उधार है। यदि हम आज प्रकृति की रक्षा नहीं करेंगे तो कल प्रकृति हमारे अस्तित्व की रक्षा नहीं कर पाएगी। इसलिए पर्यावरण संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता पर्यावरण!)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ५ ☆
☆ पर्यावरण ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆
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वृक्ष काटते निशदिन मानव, होगा क्या परिणाम रे।
शीतलता कह कहाँ मिलेगी, जब आएगी घाम रे।।
०
खो जाएंँगे मौसम सारे, नहीं मिलेगी बूंँद रे।
जागो अब कब तक बैठोगे, ऐसे आंँखें मूंँद रे।।
निशिदिन जंँगल खाली होते, धरती करती शोक रे।
धानी चुनर फटती जाती, मानव इसको रोक रे।।
रौद्र रूप जब धारे माता, होगा क्या परिणाम रे।
शीतलता कह कहाँ मिलेगी, जब आएगी घाम रे।।
०
पर्यावरण दिवस जब आए, आती सबको याद रे।
वृक्ष नीर हम लोग बचाएंँ, भूले इसके बाद रे।।
दिव्य संपदा का अति दोहन, होगा ये अभिशाप रे।
भारत माँ आवाज लगाती, बंद करो ये पाप रे।।
हरित क्रांति से वसुंधरा का, दृश्य बनें अभिराम रे।।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – तेल कम, गैस फुल।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९५ – व्यंग्य – तेल कम, गैस फुल☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
अरे भाई, अपुन का भेजा एकदम कड़क चकरघिन्नी हो गया जब अपुन ने उस तेल की टपरी पे कदम रखा। लोग बोलते हैं दुनिया गोल है, अपुन बोलता है दुनिया ‘जीरो’ है! जैसे ही अपुन अपनी खटारा स्कूटी लेकर गया, वो सेल्समैन लड़का एकदम हीरो माफिक मुस्कराया और चबाते हुए गुटके को गाल में सेट करके बोला, “भाई, मीटर पे जीरो देख लो!” अपुन भी चौड़ में आकर कोहनी चमकाते हुए बोला, “देख लिया भिडू, एकदम सन्नाटा पसरा है मीटर में।” पर असली झोल तो उस जीरो के पीछे का ‘मशाल’ था बॉस। वो जीरो देखना ऐसा है जैसे शादी के बायोडाटा में लड़के का ‘संस्कारी’ होना देखना, अंदर से भाई साहब, साठ-सत्तर झोल की कोडिंग करके बैठे हैं। अपुन को लगा सिर्फ जेब ढीली होगी, पर यहाँ तो स्कूटी का इंजन ऐसे रो रहा था जैसे विदाई में दुल्हन की सहेलियाँ दहाड़ मारती हैं। तेल क्या डाला साला, लगा कि पेट्रोल में थम्स-अप और कफ सिरप मिलाकर पिला दिया गाड़ी को, पूरा सिस्टम ही हिल गया बॉस!
अब सुनो उस पंप वाले के तिकड़मों का ऐसा कच्चा चिट्ठा कि सुनकर तुम्हारा भेजा फ्राई हो जाए। उनका पहला झोल तो ‘हवा का रुख’ था, नोजल ऐसे पकड़ते हैं जैसे मोगैम्बो की बंदूक हो, आधा पेट्रोल तो भाप बनकर बादलों से वाट्सएप चैट करने निकल जाता है। वो जो मीटर का कांटा है ना, वो कसम से कतररी चूहे की तरह कुदकता है, सीधा अंक गायब कर देते हैं, जैसे क्लास से बैकबेंचर गायब होते हैं। अगला तिकड़म वो तेल की डेंसिटी का मीटर है, जो हमेशा एक ही जगह पे ऐसे चिपका रहता है जैसे सरकारी दफ्तर में बाबू की कुर्सी फेविकोल से चिपकी हो। नोजल को टंकी में डालने के बाद वो लड़का ऐसे खटका दबाता-छोड़ता है जैसे कोई डीजे डिस्को में रीमिक्स बजा रहा हो—कट, कट, कट! पेट्रोल की खुशबू भी ऐसी कि सूँघो तो चमड़े के पुराने जूते की पॉलिश जैसी बास आती है, मिलावट का ऐसा कड़क लेवल की केमिस्ट्री लैब का प्रोफेसर भी जहर खा ले। फिल्टर पेपर मांगने पे ऐसे मुंह बनाते हैं जैसे अपुन ने उनकी पुश्तैनी जायदाद मांग ली हो। कार्ड स्वाइप मशीन का नेटवर्क हमेशा उस वक्त कौवा उड़ हो जाता है जब आपकी जेब में छुट्टे पैसे नहीं होते। फिर वो राउंड फिगर का ऐसा खेल खेलते हैं कि अगर कुछ ऊपर का बिल हुआ, तो बोलेंगे “मैडम, सर, टॉफी ले लो ना, चिल्लर नहीं है,” जैसे बैंक के बदले चॉकलेट फैक्ट्री खोल रखी हो!
उनकी टंकी का ढक्कन खोलने की स्पीड इतनी बिजली जैसी होती है कि आपको लगे आप पेट्रोल पंप पे नहीं, पीसी सरकार के जादू के शो में बैठे हैं। नोजल से आखिरी बूंद टपकाने से पहले ही वो नली को ऐसे झटकते हैं जैसे धोबी घाट पे भीगा कपड़ा पछाड़ रहे हों, आधी बूंद वापस खींच के अपनी तिजोरी में डाल लेते हैं। प्रीमियम पेट्रोल का ऐसा झांसा देंगे कि “सर, इसमें एक्स्ट्रा माइलेज का कैप्सूल मिक्स है,” और साला वो एक्स्ट्रा माइलेज सिर्फ उनके बैंक बैलेंस को मिलता है, अपनी गाड़ी तो कछुए की चाल चलती है। डिजिटल मीटर की लाइट इतनी डिम रखते हैं कि रात को मोमबत्ती जलाकर सीआईडी के प्रद्युम्न की तरह दया को बुलाना पड़े। फ्री हवा भरने वाला कंप्रेसर हमेशा ‘कल ही खराब हुआ है भाई’ के बोर्ड के साथ खर्राटे मार रहा होता है। जब आप कंप्लेंट बुक मांगो, तो वो ऐसे देखते हैं जैसे आपने उनकी दोनों किडनियाँ दान में मांग ली हों। नोजल का पाइप इतना लंबा रखते हैं कि आधा लीटर तेल तो साला उसी नली की अंतड़ियों में सोया रह जाता है। वो बिलिंग मशीन का कागज ऐसा होता है, जिसका प्रिंट दो मिनट बाद धूप लगते ही ऐसे गायब हो जाता है जैसे गधे के सिर से सींग!
पेट्रोल का रंग कभी-कभी वो इतना सफेद रखते हैं कि लगता है भैंस का टोंड दूध डाल दिया हो, गाड़ी चलेगी नहीं बल्कि दही जमाएगी। वो मीटर चालू होने की टिक-टिक की आवाज आपके दिल की धड़कन से तेज भागती है, जैसे पीछे यमराज का भैंसा लगा हो। सेल्समैन का ध्यान भटकाने का स्टाइल तो एकदम कड़क है—”अरे भाई, पीछे देखो कौन जा रहा है!” और जैसे ही आपने मुंडी घुमाई, कुछ रुपयों का तेल हवा में गुल हो जाता है। वो पानी की मिलावट चेक करने वाला पेस्ट हमेशा ‘खत्म हो गया’ की श्रेणी में रहता है, जैसे दुनिया का सारा पेस्ट वही चाट गए हों। नोजल की रबर ग्रिप कटी होती है, जिससे फ्यूल लीक होकर वापस उनकी मशीन में गिरता है और अपनी जेब कटती है। बड़े नोट देने पे वो ऐसे गिनते हैं जैसे रिजर्व बैंक के गवर्नर खुद नकली नोट की चेकिंग कर रहे हों, टाइम वेस्ट करने का एकदम निंजा टेक्निक है बॉस। वो वीआईपी लेन जहाँ नॉर्मल पब्लिक को भेजकर एक्स्ट्रा चार्ज का झोल करते हैं, साला अमीर बनने का शॉर्टकट है। उनकी मशीन का कीपैड ऐसा, जहाँ कोई बटन दबाओ तो कुछ और दबता है और बिल का कबाड़ा हो जाता है। वो तेल की प्योरिटी वाली मशीन का कांच इतना धुंधला होता है कि उसमें खुद का चेहरा भी भूत जैसा दिखे।
एक और तिकड़म है, उनका नोजल होल्डर जो हमेशा ढीला रहता है ताकि प्रेशर कम आए और हवा ज्यादा घुसे। पेट्रोल में जो सॉल्वेंट मिलाते हैं, उसकी वजह से गाड़ी का कार्बोरेटर ऐसे खांसता है जैसे किसी बूढ़े दादाजी को दमा हो गया हो। वो सुबह-सुबह तेल डलवाने का मिथक है—जब डेंसिटी सही होती है, तब वो कहते हैं “साहब, अभी स्टॉक खाली है, टैंकर आ रहा है,” मतलब जब मौका सही हो, तब दुकान बंद! दोपहर की कड़क धूप में तेल बेचते हैं, जब लिक्विड फैल जाता है और आपको तेल कम, गैस ज्यादा मिलती है, मानो गाड़ी को एलपीजी पे चला रहे हों। उनकी मशीन के पीछे छुपा वो छोटा सा रिमोट, जो साला बटन दबाते ही मीटर की स्पीड को चीते की रफ़्तार दे देता है और अपनी खोपड़ी का फ्यूज उड़ जाता है। नोजल के मुंह पर लगी वो छोटी सी जाली तेल को झाग बना देती है; टंकी में झाग भर जाता है और मीटर बाबू बोलते हैं “फुल हो गया बॉस!” जब आप कहो ‘हजार का डालो’, तो वो बीच में ही रोक कर बोलते हैं, “अरे भाई, सुना नहीं, अभी और डाल देता हूँ,” और पुराना मीटर रीसेट किए बिना ही गेम बजा देते हैं!
उनकी वो मीठी जुबान तो सुनो, कसम से कान से खून आ जाए—”भाईसाहब, आपकी गाड़ी का इंजन ऑइल एकदम कड़कड़ा के काला हो गया है, बदल लो नहीं तो पिस्टन ब्लास्ट हो जाएगा।” ऐसी भविष्यवाणी करते हैं जैसे नास्त्रेदमस के सगे साले हों। वो नाइट्रोजन हवा के नाम पर नॉर्मल ऑक्सीजन को ही एक्स्ट्रा पैसे लेकर टायर में ठूस देते हैं, जैसे चिप्स के पैकेट में हवा बेची जा रही हो। वो कैशलेस पेमेंट का बहाना बनाते हैं—”क्यूआर कोड स्कैन नहीं हो रहा है, कैश ही दो ना भाई,” ताकि टैक्स के लूपहोल में अपनी फेरारी घुसा सकें। जब आप बोलो कि बोतल में तेल दो, तो कानून का ऐसा वास्ता देंगे कि ‘बोतल में बैन है जी’, क्योंकि बोतल में तो उनकी चोरी सरेआम नंगी हो जाएगी ना! उनके स्टाफ की वो आपस की कोडिंग होती है, जैसे बोलेंगे कि ‘जरा उस तरफ पोछा मारना’, जिसका मतलब होता है कि उस मशीन का प्रेशर धीमा करो और ग्राहक को चूना लगाओ। नोजल का नथुना हमेशा टेढ़ा रखते हैं ताकि तेल सीधा न गिरे। वो मीटर का रीसेट बटन दबाने पे कटकट करता है पर अंक पुरानी जगह से ही शुरू होते हैं, एकदम स्कैम!
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३५ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
भेड़ाघाट से बिजना घाट: 15 अक्टूबर 2018
एक दिन पहले, जैसे ही हम तिलवारा घाट के पुल पर जाकर खड़े हुए, वहाँ पान की दुकान वाले ने बताया कि नर्मदा के किनारे से रास्ता बहुत दलदली है। आप लोगों को घूँसोर होते हुए सिवनी गाँव से होकर लम्हेंटा पहुँचना होगा। हमने उससे आगे की जानकारी ली। जबलपुर और आसपास में दूधिया कत्था और मलाईदार चूना का जैसा ज़ायक़ेदार बीड़ा मिलता है वैसा कहीं नहीं मिलता सिवाय बनारस के अतः हमने एक मीठा पत्ता पान चटनी, चमन-बहार, लोंग, इलायची, पिपरमिंट का बनवा कर मुँह में दबाया और निकल पड़े। हम घूँसोर गाँव पहुँचे वहाँ पहले घर में पीने को पानी माँगा तो वे पानी देने में हिचकिचा रहे थे। हमने कहा हम छुआछूत नहीं मानते। आप साफ़-सफ़ाई से रहते हो बस यही हमारे लिए काफ़ी है। वे सतनामी समाज के थे। यह सतनामी समाज नर्मदा घाटी में कब, कैसे और कहाँ से आया। नर्मदा के उस पार दक्षिण के गाँवो में सतनामी समाज की सघन वसाहट है। जबलपुर जिले में नर्मदा के दक्षिण तट की तरफ़ बसे गाँवों में सतनामी बसे हैं।
जब भारत में ग्यारहवीं सदी से मुस्लिम तेग़ की ख़ूनी ख़ूँख़ार आँधी चली तब हिमालय की तराई, दक्षिण के पथरीले पहाड़ और सतपुड़ा-विंध्याचल में नर्मदा के दोनों तरफ़ दो सौ किलोमीटर चौड़ी और एक हज़ार किलोमीटर लम्बी घाटी हिंदुओं के लिए सुरक्षित अभयारण्य बन गई। जहाँ भी इस्लामी सुल्तान या बादशाह का अत्याचारी दबाव पड़ता था वहाँ के रघुवंशी, गूज़र, लोधी, कुर्सी, कलार, काछी, सतनामी और उनके साथ लगे-लगे ब्राह्मण, चमार, बँसोड, भंगी नर्मदा घाटी की गोद में आकर बस जाते थे। सघन जंगलों से पूरी तरह ढँकी रहने वाली घाटी आबाद होने लगी थी। अंग्रेज़ों द्वारा रेल लाइन बिछाने के पहले तक नर्मदा घाटी में पहुँच दुरूह हुआ करती थी।
1672 में वर्तमान हरियाणा के नारनौल नामक स्थान पर साध बीरभान और जोगीदास नामक दो भाइयों ने सतनामी साध मत का प्रचार किया था। सुप्रसिद्ध इतिहासकार चोपड़ा, पुरी और श्रीदास ने मैकमिलन कम्पनी द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘ए सोसल कल्चरल एंड इकोनामिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ के भाग तीन में लिखा है। “18वीं शताब्दी में अवध के बाबा जगजीवनदास ने एक अलग धार्मिक पंथ बनाया जो कि सत्य और ज्ञान पर विश्वास करने वाला सतनाम पंथ कहलाया।”
इस पंथ के लोग उत्तरी भारत में विस्तृत रूप से फैले थे। औरंगज़ेब के शासनकाल में कट्टर नीतियों के चलते सिक्ख, जाट, मराठों के साथ-साथ सतनामी लोगों ने भी विद्रोह का परचम लहराया था। इस सम्प्रदाय के गुरू घासीदास माने जाते हैं। जो मध्य युगीन सतनामी समाज में विश्वास और उपासना विधि को जीवित रखना चाहते थे तथा उनमें अभिनव चेतना लाने की आकांक्षा रखते थे। उन्होंने प्रचारित किया कि वास्तविक भगवान कर्मकांड में निहित नहीं है सतनाम ध्यान में प्रकट होते हैं। उन्होंने अक्षर ब्रह्म का शब्द देकर ध्यान लगाने और निर्गुण ईश्वर के भजन गाने की प्रणाली सतनामी समाज में विकसित की थी। ईश्वर की नजर में सभी समान हैं। इसलिये मानव समाज में कोई भेद नहीं होना चाहिये जैसा कि जाति प्रथा से भेदभाव परिलक्षित होता है। छतीसगढ में सतनाम आंदोलन पिछड़े, निम्न और अछूत समझे जाने वाले वर्गो में धार्मिक और सामाजिक चेतना लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। यह कबीर, नानक, दादू पंथ की कड़ी को मानने वाले हैं।
सतनामी मत के अनुयायी किसी भी मनुष्य के सामने नहीं झुकने के सिद्धांत का पालन करते हैं। एक सतनामी किसान ने तत्कालीन मुगल बादशाह औरंगजेब के कारिंदे को झुक कर सलाम नहीं किया तो उसने इसको अपना अपमान मानते हुए उस पर लाठी से प्रहार किया जिसके प्रत्युत्तर में उस सतनामी ने मुग़ल कारिन्दे को लाठी से पीट दिया। यह विवाद यहीं खत्म न होकर तूल पकड गया और एक बड़े संघर्ष में बदल गया। धीरे धीरे मुगल बादशाह औरंगजेब तक पहुँच गया कि सतनामियों ने बगावत कर दी है। यहीं से औरंगजेव और सतनामियों का ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। जिसका नेतृत्व सतनामी साध बीरभान और साध जोगीदास ने किया था। यूद्ध कई दिनों तक चला जिसमें सशक्त शाही फौज निहत्थे सतनामी समूह से मात खाती चली जा रही थी। शाही फौज में ये बात फैल गई कि सतनामी कोई जादू टोना करके शाही फौज को हरा रहे हैं। इसके लिये औरंगजेब ने अपने फौजियों को कुरान की आयतें लिखे तावीज भी बंधवाए थे लेकिन इसके बावजूद कोई फ़र्क़ नहीं पडा था। उन्हें ये पता नहीं था कि सतनामी साधों के पास आत्मदान करने वाले भक्तों की शक्ति के कारण यह स्थिति थी।
सतनामी संघर्ष को मुग़लों द्वारा बेरहमी से कुचलने की प्रक्रिया में बचे-खुचे सतनामी अपनी जान बचा कर अलग अलग दिशाओं में भाग निकले थे। जिनमें घासीदास के पूर्वजों का भी एक परिवार रहा जो कि महानदी के किनारे-किनारे वर्तमान छत्तीसगढ तक जा पहुचा था। जहाँ पर संत घासीदास जी का जन्म हुआ औऱ वहाँ पर उन्होंने सतनाम पंथ का प्रचार-प्रसार किया। वे गिरौदपुरी तहसील बलौदाबाजार जिला रायपुर में पिता महंगुदास जी एवं माता अमरौतिन के यहाँ पैदा हुये थे। गुरूजी को सतनाम पंथ सतनाम धर्म जिसे आम बोल चाल में सतनामी पंथ के प्रवर्तक कहा जाता है। उन्होंने अपने समय की सामाजिक आर्थिक विषमता, शोषण तथा जातिभेद को समाप्त करके मानव-मानव एक समान का संदेश दिया। गुरू घासीदास का जन्म 1756 में रायपुर जिले के गिरौदपुरी में एक गरीब और साधारण परिवार में हुआ था। उन्होंने हिन्दु धर्म की कुरीतियों पर कुठाराघात किया था। ब्राम्हणों और मन्दिर के पुजारियों द्वारा हिन्दुओं के धार्मिक शोषण का विरोध करने का यही मार्ग उनको सूझा था। जिसका असर आज तक दिखाई पड रहा है। उनकी जयंती हर साल पूरे छत्तीसगढ़ में 18 दिसम्बर को मनाई जाती है। बिलासपुर के विश्वविद्यालय का नाम गुरु घासीदास विश्वविद्यालय है। सतनामियों के घरों से चाय-पानी प्रसाद पाकर आगे बढ़ते जा रहे थे।
भेड़ाघाट से बिजना घाट की यात्रा सबसे लम्बी थकाऊ और उबाऊ थी। पहले हमने तय किया था कि रामघाट में रुककर रात गुज़ारेंगे। मंगल सिंघ परिहार जी वहाँ से चार किलोमीटर आगे रास्ता देख रहे थे। सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। खजूर, मूँगफली दाने और चने व पानी के दम पर सभी को खींचे जा रहे थे। चार घण्टे पैदल चल चुके थे। दोपहर में तेज़ धूप में चलने से शरीर का ग्लूकोस जल जाता है और हवा में ऑक्सिजन भी कम हो जाती है। मांसपेशियाँ जल्दी थकने लगतीं हैं और साँस फूलने लगती है। दो बजे के बाद सूर्य की किरणे सामने से परेशान करने लगती है। ऐसे माहौल में नदी किनारे रास्ता भी नहीं था। बर्मन लोगों ने नदी के कछार को हल चलाकर मिट्टी के बड़े-बड़े ढेले में बदल दिया था। खाने पीने का कोई ठिकाना नहीं था। साथियों को बाटी-भर्ता का लालच देकर खींचे जा रहे थे, जबकि भोजन का कहीं कोई ठिकाना नहीं था। उधर दनायक जी को परिहार जी मोबाइल से जल्दी पहुँचने को कह रहे थे। सब थक कर चूर थे। ऐसे में दल को खींच कर आगे ले जाना ज़रूरी था।
मंगल सिंग परिहार बहुत पुराने परिचित सहकर्मी रहे हैं। उन्होंने दिन के ग्यारह बसे से, जब हम भेड़ाघाट से चले ही थे, तब से बिजना गाँव से नर्मदा पार करके मुरकटिया घाट आकर मोबाईल से सम्पर्क साध कर हमारी स्थिति लेना शुरू कर दिया। वे हर आधा घंटे में दनायक जी को मोबाईल से सम्पर्क साध कर स्थिति पूछते जा रहे थे। कभी मोबाईल लगता था और कभी नहीं लगता था। हम लोग रामघाट से सड़क छोड़ नर्मदा किनारे आ गए, वहाँ से अत्यंत दुरुह यात्रा शुरू हुई। छोटी नदी, नाले, झरने, सघन हरियाली और ताज़े गोंड़े गए खेतों की मिट्टी के बड़े-बड़े ढेलों के बीच से घुटनों और ऐडियों की परीक्षा का समय था क्योंकि कहीं भी समतल ज़मीन नहीं थी। आगे छोटी पहाड़ियों का जमघट एक के बाद एक घाटियाँ का सिलसिला जिनको स्थानीय बोली में ड़ांगर कहते हैं। चम्बल में जैसे बीहड़ होते हैं जिनमे कँटीले पेड़-पौधे होते हैं वैसे नर्मदा के आजु-बाजु ड़ांगर का साम्राज्य है उनके बीच से पानी झिर कर जंगली नालों को आकार देते हैं। उनको पार करने के लिए ऊपर चढ़ाई चढ़ना फिर उतरना फिर चढ़ना। यात्रियों का दम निकलने लगता है। पसीने से तरबतर शरीर में पूरी साँस धौंकनी के साथ भरकर पहाड़ियों को पार करने के बीच में नर्मदा दर्शन से हिम्मत बनती टूटती रहती है। चार बजे हाल-बेहाल और निढ़ाल-पस्त हालत में बिजना घाट के सामने वाले मुरकटिया घाट पर मंगल सिंघ परमार बिस्कुट और केले फल के साथ स्वागत आतुर मिले। वहाँ उनकी सिकमी ज़मीन थी। उसी पर खड़े थे। बैठने को कोई छायादार जगह नहीं थी। यात्री बिस्कुट और केलों को क्षणभर में चट कर गए। नाव से नर्मदा पार करके दूसरी पार उतरे वहाँ एक बर्मन दादा पूड़ी और खीर का भंडारा करा रहे थे। यात्रियों ने भंडारा खाया। ख़ूब पानी पिया तो कुम्लाए चेहरों की रंगत और ढीले शरीरों में जान लौटने लगी।
15 अक्टूबर को मंगल सिंग परिहार के आश्रम नुमा फ़ार्म हाऊस में विश्राम का अवसर मिला। मंगल सिंघ परिहार ने प्राकृतिक छटाओं में बसा अपना आश्रम दिखाया। जिसमें पारिजात और रुद्राक्ष के वृक्ष लगे हैं। सूर्यास्त का दृश्य अत्यंत सुंदर नज़र आता है। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज नागौद रियासत के राजा रहे हैं। परमार, परिहार, बुंदेले और बघेल सब गहडवाल राजपूत हैं। परमारों ने महोबा, परिहारों ने नागौद, बुन्देलों ने छतरपुर और बघेलों ने रीवा रियासत स्थापित की थी। ये सब पहले अजमेर के पृथ्वीराज़ चौहान या कन्नौज के जयचंद राज्यों के सरदार थे। 1091-92 में मुहम्मद गोरी के हाथों अजमेर, दिल्ली और कन्नौज हारने के बाद इन्होंने इन राज्यों को स्थापित किया था। नागौद कभी स्वतंत्र राज्य और कभी रीवा के बघेलों का करद राज्य हुआ करता था। उसके उत्तर-पश्चिम में केन नदी का अत्यंत ऊपजाऊ कछारी भाग था लेकिन दक्षिण-पूर्व में पथरीली ज़मीन थी। अतः राजपूतों ने नर्मदा के कछारी मे बसने का निर्णय लिया था।
अंग्रेज़ों ने 1861 में जबलपुर को राजधानी बनाकर सेंट्रल प्रोविंस राज्य बनाया तो रीवा, ग्वालियर, इंदौर, भोपाल रियासत छोड़कर मध्य प्रांत के नागौद सहित बाक़ी सब इलाक़े उसमें रख दिए। तब ही नर्मदा घाटी का सर्वे करके जबलपुर की सीमा नर्मदा के दक्षिण में चरगवाँ-बरगी तक निर्धारित कर दी। परिहारों को ज़मींदारी में मगरमुहां का इलाक़ा दिया गया। कई परिहार सौ-सौ एकड़ के ज़मींदार बनकर आज के पाटन और शाहपुरा इलाक़े में आ बसे। उनमें मंगल सिंघ परिहार के पूर्वज भी थे। मंगल सिंघ के पिताजी मुल्लुसिंघ परमार निरक्षर थे परंतु उन्होंने अपने आठ बेटों को पोस्ट-ग्रेजुएट कराया।
मंगल सिंघ जी से देर रात तक बातें होतीं रहीं। वे हमें एक वेदान्ती साधु के दरबार में ले गए। हमसे कहा कि साधु जी वेदों के प्रकांड विद्वान हैं। आप उनसे गूढ़ प्रश्न कीजिए तब उनकी ज्ञान गंगा बहने लगेगी। हम लोग उनके दरबार मे पहुँचे पाँव-ज़ुहार होने के बाद बातचीत चली तो मौक़ा देखकर हमने एक सवाल का तीर चलाया कि हमारी जानने कि इच्छा है कि महाराज रुद्र और शिव का अंतर बताएँ, तो बड़ी कृपा होगी। स्वामी जी ने थोड़ा इधर-उधर घुमाया। फिर विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया कि प्रश्न गूढ़ है और उनका ज्ञान वेदों तक ही सीमित है उन्होंने पुराण नहीं पढ़े हैं। वे नेपाल से नर्मदा की गोद में आकर बस गए हैं। नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। वापस आकर परिहार जी ने शिमला मिर्च की साग-रोटी और दाल-चावल का बढ़िया भोजन कराया। उसके बाद बातों का सिलसिला चल पड़ा। परिहार जी की बातें सुनते रहे। उनकी बातों के क्रम को बीच में बोलकर तोड़ना उनके रुतबे को कम करने जैसा होता है यह बात हम जानते थे परंतु अन्य लोगों को नहीं पता था। एक सहयात्री ने टोकने की कोशिश कि तो हमने उसे चुपके से समझा दिया कि भैया:-
बंभना जाय खाय पीय से
क्षत्री जाय बतियाय
लाला जाय लेय-देय से
शूद्र जाय लतियाय।
इस बुंदेलखंड की कहावत को गाँठ बाँध लो और क्षत्री की बातें चुपचाप सुनो। सुबह दो-दो रोटियाँ तोड़कर आश्रम से फिर नर्मदा की गोद मे पहुँच गए। इस प्रकार 13, 14 और 15 अक्टूबर की यात्रा पूरी हुई। यहाँ से हमारे एक और साथी प्रयास जोशी ने हमसे विदा ली।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “कॉकरोच…“.)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “असंग्रह (अपरिग्रह)…“।)
अभी अभी # १०११ ⇒ आलेख – असंग्रह (अपरिग्रह) श्री प्रदीप शर्मा
नैतिक नियमों को आप यम नियम कह सकते हैं। आवश्यकता से अधिक संग्रह की वृत्ति हमारी भौतिकता की देन है। अगर जीवन ही सादा होगा तो जीवन कितना फीका फीका होगा, हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
जब हमारा आचरण हमारे सिद्धांतों और आदर्श से मेल नहीं खाता, तो जीवन में कृत्रिमता और
बनावटीपन आ जाता है, सहजता कहीं गायब हो जाती है। कौन नहीं चाहता, अच्छा खाना और अच्छा पहनना। लेकिन जाने अनजाने सुविधाओं की आड़ में हमारे पास कई अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह होता चला जाता है, और हम उनसे बेखबर रहते हैं।।
आवश्यकता आविष्कार की जननी है, हम आविष्कार किया करते हैं, और हमारी आवश्यकताओं को दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ाते रहते हैं। मूल भूत सुविधा भी आवश्यकता का ही अंग है, लेकिन संपन्नता के साथ सुविधा का ग्राफ भी बढ़ता ही रहता है। छोटे मकान से बड़ा मकान और छोटी गाड़ी से बड़ी गाड़ी समय की भी मांग है, और संपन्नता की निशानी भी। लेकिन जब हर अनावश्यक चीज भी आवश्यक लगने लगे, तब जीवन से यम नियम गायब हो जाता है।
आइना हम रोज देखते हैं, लेकिन हमें आइना दिखाने वाले लोग कम ही होते हैं। असंग्रह और अपरिग्रह की दुहाई देते हुए जब एक दिन अनायास मैने अपने कपड़ों की आलमारी खोली तो मुझे कई ऐसे पुराने कपड़े नजर आए, जो केवल अलमारी की शोभा बढ़ा रहे थे। पत्नी की अलमारी में तो मेरी नजर चली गई, कितनी अनावश्यक साड़ियां हैं, लेकिन अपनी अलमारी से मेरा साक्षात्कार मानो पहली बार हुआ हो। मुझे मेरा मुंह आईने में नजर आ गया, मुझे आज अपने गिरेबान में झांकना ही पड़ा, अपने हाथों से ही अपने कानों को उमेठना पड़ा।।
एक पंछी को रोज अपने दाना पानी की व्यवस्था करनी होती है। रोजाना अपने बाल बच्चों का भी पेट भरना होता है। आप उसे अपरिग्रह का पाठ नहीं पढ़ा सकते, क्योंकि वह कल के लिए कुछ संग्रह कर ही नहीं सकता। इंसान की बात अलग है, उसे दो जून की रोटी की भी व्यवस्था करनी पड़ती है। वह परिग्रह की श्रेणी में नहीं आता।
जो अपरिग्रह का पालन करते हैं, वे अनावश्यक वस्तुओं को नेकी के दरिए में बहा देते हैं। लेकिन संग्रह की प्रवृत्ति से छुटकारा पाना इतना आसान भी नहीं। अपने किताबों के संग्रह से कौन मुंह मोड़ सकता है, तिजोरी और लॉकर में रखे गहनों का भी खयाल रखना पड़ता है।।
कई घरों में आपको संग्रहालय नजर आ जाएंगे। किसी को जूतों का शौक तो किसी को टाइयों का। वॉर्डरोब होता ही काहे के लिए है। शान शौकत पर खर्च और धूमधाम से शादियां, हमारे समाज का ही प्रचलन है। कोई किसी का हाथ नहीं रोकता लेकिन फिर भी इसी समाज में कुछ लोग हैं जो फिजूलखर्ची को अपराध मानते हैं, और संयम और सादगी का जीवन व्यतीत करते हैं।
कल कॉलर ट्यून पर एक गीत बज रहा था, ये मोह मोह के धागे …. आगे के शब्द बेमानी हैं। समाज के नियम अपनी जगह हैं, हमारे जीवन के नियम हमें ही बनाने पड़ते हैं, खुद को अपनी ही कसौटी पर कसना पड़ता है, संयम, संतुलन के साथ तितिक्षा का भी अभ्यास करना पड़ता है। वैराग्य ना सही, विवेक का दामन तो थामना ही पड़ता है ;