हिन्दी साहित्य – कविता – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – स्वप्न ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज    (श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। )    We present an English Version of this poem with the title ✍ Dreams ✍  published today. We extend our heartiest thanks to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for this beautiful translation.)   ✍ संजय दृष्टि  – स्वप्न  ✍   कभी डराया, कभी धमकाया,  कभी कुचला,  कभी दबाया,   कभी तोड़ा, कभी फोड़ा,    कभी  रेता, कभी मरोड़ा...   सब कुछ करके हार गईं,  हाँफने लगीं परिस्थितियाँ।....   जाने क्या है जो मेरे    सपने कभी मरते ही नहीं..!   ©  संजय भारद्वाज, पुणे ☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम...
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English Literature – Poetry – ☆ Dreams ☆ – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM (We are extremely thankful to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for sharing his literary and artworks with e-abhivyakti.  An alumnus of IIM Ahmedabad, Capt. Pravin has served the country at national as well international level in various fronts. Presently, working as Senior Advisor, C-DAC in Artificial Intelligence and HPC Group; and involved in various national-level projects. We present an English Version of Shri Sanjay Bhardwaj’s Hindi poem ” स्वप्न ” published in today’s ✍ संजय दृष्टि  – स्वप्न ✍.  We extend our heartiest thanks to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for this beautiful translation. )   ✍ Dreams ✍   Sometimes frightened me, Sometimes tried threatening   Sometimes crushed me, Sometimes tried pressing...   Sometimes battered me, Sometimes tried breaking   Sometimes abrased me, Sometimes tried twisting   Circumstances tried everything possible But in vain...   Grouchingly exhausted They started panting...   Knoweth not what my dreams are made of They never seem to die..!   © Captain Pravin Raghuvanshi, NM ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 9 – सीता की गीता ☆ – श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार   (युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “अद्भुत पराक्रम”।) Amazon Link – Purn Vinashak ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 9 ☆   ☆ सीता की गीता ☆   देवी सीता ने कहा, "मेरी प्यारी बेटी, पत्नी को केवल अपने पति की नियति का पालन करना चाहिए । एक स्त्री  के लिए उसके पिता, उसका बेटा, उसकी माँ, उसकी सखियों, बहन, भाई, एवं स्वयं से बढ़कर भी उसका पति ही है, जो इस संसार में और उसकी आने वाली आगामी जिंदगियों में मोक्ष का उसका एकमात्र साधन है । एक स्त्री के लिए सबसे बड़ी सजावट बाह्य आभूषण नहीं बल्कि उसके पति की खुशी है । अपनी बेटी को...
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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 6 ☆ माझे स्वप्न ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे   (वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है. श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होतं आहे रे ”  की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  उनकी  परिकल्पित कविता  माझे स्वप्न.  श्रीमती उर्मिला जी  की  वृक्ष होने की कल्पना अद्भुत है  और सांकेतिक पर्यावरण का सन्देश भी देती है.  श्रीमती उर्मिला जी  को ऐसी सुन्दर कविता के लिए हार्दिक बधाई. )   ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 6 ☆   ☆ माझे स्वप्न ☆   मला वाटते एक सुंदर झाड मी व्हावे ! कुणीतरी मातीत मला रुजवावें ! त्यावर झारीने पाणी फवारावे ! मग मी मस्त तरारावें ! मी एक सुंदर झाड मी व्हावे !!१!!   फुटावित कोवळी पाने ! कसा हिरवागार जोमाने ! दिसामाजी मी वाढतच जावें ! मी एक सुंदर झाड व्हावें !!२!!   यावीत सुंदर सुगंधी फुले ! तोडाया येतील मुलीमुलें ! होतील आनंदी मुलें...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 7 ☆ फिरूनी जन्म घ्यावा…. ☆ – सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे (सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य  विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं ।  वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी की  एक भावप्रवण मराठी कविता  ‘फिरूनी जन्म घ्यावा....’।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 7 ☆ ☆ फिरूनी जन्म घ्यावा....☆   फिरूनी जन्म घ्यावा, की जन्मभर फिरावे रे मानवा ! तुची रे ठरवावे.. भरावे मनाचे गगन चांदण्याने, की व्देषाच्या आगीत स्वतः जळावे, रे मानवा ! तुची रे ठरवावे.. रहावे थांबून डोळ्यांच्या किनारी, की वहावे पूरात स्वतः बुडवावे, रे मानवा ! तुची रे ठरवावे.. जगावा प्रत्येक श्वास हृदयाचा, की मोजक्याच श्वासात स्वतः संपवावे, रे मानवा ! तुची रे ठरवावे.. छेडूनी अंतरी तार संगीताची, की बेसुरी संगतीत स्वतः भिजवावे, रे मानवा ! तुची रे ठरवावे.. कवटळून घ्यावे अथांग क्षितिजास, की कोंडी करावी स्वतःच्या मनाची, रे मानवा ! तुची रे ठरवावे.. जगाच्या पसा-सात, पसरूनी हरवावे, की स्वतःच्या मनी जग निर्माण करावे, रे मानवा ! तुची रे ठरवावे..   © सौ. सुजाता काळे...
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मराठी साहित्य – मराठी कविता – ☆ सत्तायदान (विडंबन) ☆ – श्री विक्रम मालन आप्पासो शिंदे

श्री विक्रम मालन आप्पासो शिंदे   (आज प्रस्तुत है श्री विक्रम मालन आप्पासो शिंदे जी की  एक भावप्रवण कविता “सत्तायदान (विडंबन)”।)   ☆ सत्तायदान (विडंबन) ☆    आता निवडणुका व्हावें  ! तिकीट मला आज्ञावें  ! निवडूनी मज द्यावें  ! मतदान हें   !!   उदंड पैशाची रास पडो  ! तया भ्रष्ट कर्मी गती वाढो  ! काळे भांडे उघड ना पडो  ! मैत्र लबाडांचे   !!   विरोधकांचे तिमिर जावो  ! एकटा स्वधर्म सत्ता पाहो  ! जो नडेल तो तो उखडावों  ! जीवजात  !!   बरसत सकळ चंगळी  ! पक्ष अनीष्ठांची मांदियाळी  ! न डरता नेता मंडळी  ! भेटती सदा  !!   चला जाती धर्मांचे आरव  ! चेतवा बंड फुकाचे गावं  ! बोलते जे उलट  ! पेटवायाचे  !!   हिंसाचाराचे जे लांछन  ! अखंड जे घडवून  ! ते सर्वाही सदा दुर्जन  ! आतंक होतू  !!   किंबहूना सर्व पापी  ! पूर्ण करोनी मानव लोकीं  ! दानव वृत्ती ठेवूनी भूकी  ! अखंडित   !!   आणि प्रतिष्ठापजीवियें  ! सर्व विशेष लोकी इयें  ! भ्रष्टा - भ्रष्ट विजयें  ! होवावे जी   !!   येथ म्हणे श्री - नेता अपराधो  ! हा होईल भय पसावो  ! येणे वरे दुःख देवो  ! दुःखिया झाला  !!   ( ज्ञानेश्वर माऊली  (महाराष्ट्र में  संत ज्ञानेश्वर महाराज जी के ग्रंथ ज्ञानेश्वरी को 'माउली' या माता भी कहा जाता है।) कृपया मला माफ करा...तुमच्या पसायदानाचं...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – षष्ठम अध्याय (11) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ षष्ठम अध्याय ( विस्तार से ध्यान योग का विषय )   शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्‌।।11।।   उचित उच्च आसन लगा, देख शुद्ध स्थान विध्न दर्भ मृगचर्म से वेदी कर निर्माण।।11।।   भावार्थ :  शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके।।11।।   In a clean spot, having established a firm seat of his own, neither too high nor too low,  made of cloth, a skin and kusha grass, one over the इतर ।।11।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – चिंतन तो बनता है ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज    (श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। )  ☆ संजय दृष्टि – चिंतन तो बनता है ☆   सोमवार 16 सितम्बर 2019 को हिंदी पखवाड़ा के संदर्भ में केंद्रीय जल और विद्युत अनुसंधान संस्थान, खडकवासला, पुणे में आमंत्रित था। कार्यक्रम के बाद सैकड़ों एकड़ में फैले इस संस्थान के कुछ मॉडेल देखे। केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों के लिए अनेक बाँधों की देखरेख और छोटे-छोटे चेकडैम बनवाने में  संस्थान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह संस्थान चूँकि जल अनुसंधान पर काम करता है, भारत की नदियों पर बने पुल और पुल बनने के बाद जल के प्रवाह...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 16 ☆ हैरान हूँ ! ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है  डॉ मुक्ता जी  का  कविता हैरान हूँ !  डॉ . मुक्ता जी ने इस कविता के माध्यम से आज के हालात  पर अपनी बेबाक राय रखी है.  जयंती, विशेष दिवस हों या कोई त्यौहार या फिर कोई सम्मान - पुरस्कार ,  कवि सम्मलेन या समारोह एक उत्सव हो गए हैं और  ये सब हो गए हैं मौकापरस्ती के अवसर.  अब आप स्वयं पढ़ कर  आत्म मंथन करें इससे बेहतर क्या हो सकता है? आदरणीया डॉ मुक्त जी का आभार एवं उनकी कलम को इस पहल के लिए नमन।)    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – # 16 ☆   ☆ हैरान हूं! ☆   हैरान हूं! आजकल कवि-सम्मेलनों की बाढ़ देख कर डर है कहीं सैलाब आ न जाये   जयंती हो या हो पुण्यतिथि होली मिलन...
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हिन्दी साहित्य – ☆ व्यंग्य – हिन्साप ☆ – श्री हेमन्त बावनकर

श्री हेमन्त बावनकर   (श्री हेमन्त बावनकर जी  द्वारा अस्सी नब्बे के दशक में  लिखा गया  राजभाषा  पखवाड़े पर  एक विशेष  व्यंग्य .)   ☆ हिन्साप☆   “हिन्साप”! कैसा विचित्र शब्द है; है न? मेरा दावा है की आपको यह शब्द हिन्दी के किसी भी शब्दकोश में नहीं मिलेगा। आखिर मिले भी कैसे? ऐसा कोई शब्द हो तब न। खैर छोड़िए, अब आपको अधिक सस्पेंस में नहीं रखना चाहिये। वैसे भी अपने-आपको परत-दर-परत उघाड़ना जितना अद्भुत होता है उतना ही शर्मनाक भी होता है। आप पूछेंगे कि- “हिन्साप की चर्चा के बीच में अपने-आपको उघाड़ने का क्या तुक है? मैं कहता हूँ तुक है भाई साहब, “हिन्साप” जैसे शब्द के साथ तुक होना सर्वथा अनिवार्य है। आखिर हो भी क्यों न; “हिन्साप”  की नींव जो “हमने” रखी है? आप सोचेंगे कि “हिन्साप” की नींव हमने क्यों रखी? चलिये आपको सविस्तार बता ही दें। हमारे विभाग में राजभाषा के प्रचार-प्रसार के लिये विभागीय स्तर पर प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया था। साहित्य में रुचि के कारण मैंने भी...
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