हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 100 ☆ शांति और सहयोग ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ (ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक सार्थक एवं विचारणीय रचना  “शांति और सहयोग…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 100 ☆ ☆ शांति और सहयोग… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’  ☆ मैंने कुछ कहा और बुद्धिजीवियों ने उसे संशोधित किया बस यहीं से अहंकार जन्म लेता है कि आखिर मुझे टोका क्यों गया। सीखने की प्रक्रिया में लगातार उतार- चढ़ाव आते हैं। जब हम सुनना, गुनना और सीखना बंद कर देते हैं तो वहीं से हमारी बुद्धि तिरोहित होना शुरू कर देती है। क्या सही है...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मुक्तक – किसी के काम आना ही…☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस”☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस” (बहुमुखी प्रतिभा के धनी  श्री एस के कपूर “श्री हंस” जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवा निवृत्त अधिकारी हैं। आप कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। साहित्य एवं सामाजिक सेवाओं में आपका विशेष योगदान हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना किसी के काम आना ही…।) ☆ मुक्तक – ।। किसी के काम आना ही जीवन की परिभाषा है।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस”☆  [1] जाने क्यों आदमी इतना मगरूर रहता है। जाने कौन से नशे में वो चूर रहता है।। पानी के बुलबुले सी होती है जिंदगी। फिर भी अहम में भरपूर रहता है।। [2] हर काम स्वार्थ को नहीं सरोकार से करो। मत किसी का अपमान तुम अहंकार से करो।। उबलते पानी मेंअपना चेहरा भी दीखता नही है। जो भी करो बस तुम सही व्यवहार से करो।। [3] कुछ पाकर इतरांना ठीक होता नहीं है। अपनो से ही कतराना ठीक होता नहीं है।। जाने कौन किस मोड़ पर काम आ जाये। किसी को यूँ ठुकराना ठीक होता नहीं है।। [4] तुम्हारी वाणी ही तुम्हारे दिल की भाषा है। किसी के...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – तत्त्वमसि ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  संजय दृष्टि – तत्त्वमसि अनुभूति वयस्क तो हुई पर कहन से लजाती रही, आत्मसात तो किया किंतु बाँचे जाने से कागज़ मुकरता रहा, मुझसे छूटते गये पन्ने कोरे के कोरे, पढ़ने वालों की आँख का जादू , मेरे नाम से जाने क्या-क्या पढ़ता रहा...!   © संजय भारद्वाज प्रात: 9:19 बजे, 25.7.2018 अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ मोबाइल– 9890122603 संजयउवाच@डाटामेल.भारत writersanjay@gmail.com ≈ संपादक –...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 157 ☆ आलेख  – शिव लिंग का आध्यात्मिक महत्व… ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है। ) आज प्रस्तुत है  एक विचारणीय  आलेख  शिव लिंग का आध्यात्मिक महत्व…! इस आलेख में वर्णित विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं जिन्हें सकारात्मक दृष्टिकोण से लेना चाहिए।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 157 ☆ आलेख  – शिव लिंग का आध्यात्मिक महत्व.. सनातन संस्कृति में भगवान शिव को सर्वशक्तिमान माना जाता है।  भगवान शिव की पूजा  शिवलिंग के स्वरूप में भी की  जाती है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश, ये तीनों देवता सृष्टि की स्थापना , लालन पालन , तथा प्रलय के सर्वशक्तिमान देवता हैं। दरअसल, भगवान शिव का कोई...
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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ कथा संग्रह – ‘शॉप-वरदान’ – प्रभा पारीक ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं।आज प्रस्तुत है प्रभा पारीक जी के कथा संग्रह  “शॉप-वरदान” की पुस्तक समीक्षा।) ☆ पुस्तक चर्चा ☆ कथा संग्रह - ‘शॉप-वरदान’ – प्रभा पारीक ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆ पुस्तक:  शॉप-वरदान लेखिका:  प्रभा पारीक प्रकाशक: साहित्यागार,धामणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर- 302013 मोबाइल नंबर : 94689 43311 पृष्ठ : 346 मूल्य : ₹550 समीक्षक : ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश' ☆ शॉप-वरदान की अनूठी कहानियाँ - ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆ किसी साहित्य संस्कृति की समृद्धि उसके रचे हुए साहित्य के समानुपाती होती है। जिस रूप में उसका साहित्य और संस्कृति समृद्ध होती है उसी रूप में उसका लोक साहित्य और समाज सुसंस्कृत और समृद्ध होता है। लौकिक साहित्य में लोक की समृद्धि संस्कार, रीतिरिवाज और समाज के दर्शन होते हैं। इस मायने में भारतीय संस्कृति में पुराण, संस्कृति, लोक साहित्य, अलौकिक साहित्य आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। समृद्ध काव्य परंपरा, महाकाल, ग्रंथकाव्य, पुराण,  वेद, वेदांग उपाँग और अलौकिक-लौकिक महाकाव्य...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 110 ☆ बाल कविता – क्यों न मैं तुलसी बन जाऊँ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘ चक्र’ (हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक 120 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 7 दर्जन के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत। इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिया जाना सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ (धनराशि ढाई लाख सहित)।  आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें  संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 110 ☆ ☆ बाल कविता – क्यों न मैं तुलसी बन जाऊँ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆ क्यों न मैं तुलसी...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 17 (76-81)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #17 (76 - 81) ॥ ☆ रघुवंश सर्ग : -17   यदपि दिग्विजय कामना थी पर हित प्रतिकूल। तदपि अश्वमेघ चाह थी उचित धर्म-अनुकूल।।76।।   शास्त्रविहित पथ मानकर चल नियमों के साथ। इंद्र-देव के देव सम बना राज-अधिराज।।77।।   गुण समानता से हुआ वह पंचम दिक्पाल। महाभूत में षष्ठ औं अष्ट्म भू भृतपाल।।78।।   जैसे सुनते देव सब विनत इंद्र आदेश। तैसेहि सब राजाओं को थे उसके संदेश।।79।।   अश्वमेघ में याज्ञिकों को कर दक्षिणा प्रदान। ‘अतिथि’ धनद अभिधान से बना कुबेर समान।।80।।   इंद्र ने वर्षा की, यम ने रोगों का रोका बढ़ाव। वरूण ने जलमार्ग दे दिखाये मित्रभाव। कोष में रघु-राम के युग सी कुबेर ने वृद्धि की, लोकपालों ने अतिथि की, भय से सब समृद्धि की।।81।। सत्रहवां सर्ग समाप्त   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈ ...
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ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ १९ मे – संपादकीय – श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

श्री सुहास रघुनाथ पंडित ई -अभिव्यक्ती -संवाद ☆ १९ मे -संपादकीय – श्री सुहास रघुनाथ पंडित – ई – अभिव्यक्ती (मराठी)  विजय धोंडोपंत तेंडुलकर साहित्याच्या विविध प्रांतात आपल्या लेखणीने विजय संपादन करणारे विजय तेंडुलकर यांचा आज स्मृतीदिन!तेंडुलकर म्हटले की आठवते ते घाशीराम कोतवाल आणि सखाराम बाइंडर ही गाजलेली नाटके. पण त्यांची साहित्यिक कारकिर्द इतकी विस्तृत आहे की आजच्या दिवशी थोडीफार माहिती करून घेणे उचित ठरेल. विजय तेंडुलकर यांचा जन्म मुंबईतला, पण त्यांचे शिक्षण मुंबई, पुणे व कोल्हापूर येथे झाले. शिक्षणात व्यत्यय आला तरी घरातील वातावरण साहित्याला अनुकूल असे होते. कारण त्याचे वडील पुस्तक विक्रेते, प्रकाशक, हौशी नाट्य कलाकार व दिग्दर्शक होते. त्यामुळे मुद्रिते तपासणे, पुस्तके हाताळणे हे आपोआपच होऊ लागले. वाचनाची आवड व सवय लागली. वि. वा. बोकिल, दि. बा. मोकाशी  आणि शिवराम वाशीकर यांच्या लेखनाचा आणि संवाद लेखनाचा त्यांच्यावर प्रभाव पडला. पुणे आणि मुंबई येथे वास्तव्य झाले असले तरी ते दीर्घ काळ मुंबईतच होते. तेव्हा त्यांचा रंगायन, आविष्कार, अनिकेत, इत्यादी नाट्यक्षेत्राशी संबंधित संस्थांशी संबंध आला. त्यांचे सुरूवातीचे लेखन हे वृत्तपत्रिय व नियतकालिकांच्या संपादनाचे होते. पण...
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सूचना/Information ☆ सम्पादकीय निवेदन – श्रीमती उज्ज्वला केळकर आणि श्री अमोल केळकर – अ भि नं द न !☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information  (साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार) ☆ सम्पादकीय निवेदन ☆  श्रीमती उज्ज्वला केळकर श्री अमोल केळकर  अ भि नं द न श्री अमोल केळकर यांच्या "माझी टवाळखोरी" तसेच श्रीमती उज्ज्वला केळकर यांच्या "हिरव्या हास्याचा कोलाज" या पुस्तकांचे प्रकाशन श्री अरविंद मराठे यांच्या शुभहस्ते आणि श्री नितीन खाडिलकर यांच्या अध्यक्षतेखाली, शुक्रवार दिनांक २० मे रोजी सिटी हायस्कूल, सांगली येथे संध्याकाळी ४ वाजता होणार आहे. आपण सर्वांनी या सोहळ्यास उपस्थित राहून लेखकांना शुभेच्छा द्याव्यात व आनंद द्विगुणीत करावा ही विनंती 🙏 💐 ई-अभिव्यक्ती समुहातर्फे श्रीमती उज्ज्वला केळकर आणि श्री अमोल केळकर यांचे मनःपूर्वक अभिनंदन आणि शुभेच्छा 💐  संपादक मंडळ ई अभिव्यक्ती मराठी   ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ राधेला नाही कळला… ☆ श्री तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील  कवितेचा उत्सव  ☆ राधेला नाही कळला… ☆ श्री तुकाराम दादा पाटील ☆  राधेला नाही कळला हा मुरलीधर ही नटवा ती धरते त्याच्या वरती मनमानी लटका रुसवा   सांजेला अवखळ कान्हा येतोच तिला भेटाया ती आहे वेडी त्याची सखयानो तिजला सजवा   का राग धरावा कोणी कोणावर कळले नाही पण नकळत काही थोड्या घडतात चुका हे पटवा   प्रेमाने प्रेमालाही समजून जरासे सांगा आनंद पुन्हा मिळवाया गमतीने नुसते हसवा   घर आहे साधे पण ते सजवाच कला कुसरीने सांगावा धाडायाला वा-याला वार्ता कळवा   ठरलेल्या भेटी साठी आतूर मनाने थांबा त्याच्या ही वाटे वरती फुलबाग फुलांची फुलवा   जुळतात सुखाचे धागे मग भाव खुणांचे सारे स्पर्शाने येतो तेव्हा अंगावर काटा हळवा   भेटीत तुम्हाला कळते हा स्वर्ग सुखाचा असतो मग सिंहासन हृदयाचे सोन्याने पुरते मढवा   © श्री तुकाराम दादा पाटील मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३ दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६ ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈...
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