हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #109 ☆ व्यंग्य – ‘दर्दे-दिल और दर्दे-दाँत – (उर्फ़ मजनूँ के ख़त प्यारी लैला के नाम)’ ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार (वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘दर्दे-दिल और दर्दे-दाँत - (उर्फ़ मजनूँ के ख़त प्यारी लैला के नाम)’। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 109 ☆ ☆ व्यंग्य – दर्दे-दिल और दर्दे-दाँत - (उर्फ़ मजनूँ के ख़त प्यारी लैला के नाम) ☆ [1] जान से भी प्यारी लैला, आपके...
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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 62 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 62 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 62) ☆ Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’. Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 109 ☆ संभावना के बीज ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।” हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।) ☆ संजय उवाच # 108 ☆ संभावना के बीज ☆ सीताफल की पिछले कुछ दिनों से बाज़ार में भारी...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 62 ☆ हाइकु सलिला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ (आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी द्वारा रचित भावप्रवण  ‘हाइकु सलिला’। ) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 62 ☆  ☆ हाइकु सलिला ☆  * हाइकु करे शब्द-शब्द जीवंत छवि भी दिखे। * सलिल धार निर्मल निनादित हरे थकान। * मेघ गरजा टप टप मृदंग बजने लगा। * किया प्रयास शाबाशी इसरो को न हो हताश * जब भी लिखो हमेशा अपना हो अलग दिखो। * ©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य #92 ☆ # क्या रावण जल गया? # ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” (आज  “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है  श्री सूबेदार पाण्डेय जी की  एक भावप्रवण कविता  “#क्या रावण जल गया?#”। )  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य# #92 ☆ # क्या रावण जल गया? # ☆ हर साल जलाते हैं रावण को, फिर भी अब-तक जिंदा है। वो लंका छोड़ बसा हर मन में, मानवता शर्मिंदा हैं। हर साल जलाते रहे उसे, फिर भी वो ना जल पाया। जब हम लौटे अपने घर को, वो पीछे पीछे घर आया। शहर गांव ना छूटा उससे, सबके मन में समाया। मर्यादाओं की चीर हरे वो, मानवता चित्कार उठी। कहां गये श्री राम प्रभु, सीतायें  उन्हें पुकार उठी। अब हनुमत भी लाचार हुए, निशिचरों ने उनको  फिर बांधा। निशिचर  घूम रहे गलियों में, है कपट वेष अपना‌ साधा।, कामातुर जग में घूम रहे, आधुनिक बने ये  नर-नारी। फिर किसे दोष दे हम अब, है फैशन से सबकी यारी। आधुनिक बनी जग की नारी कुल की मर्यादा लांघेगी। फैशन परस्त बन घूमेगी, लज्जा खूंटी पर टांगेगी। जब लक्ष्मण रेखा लांघेगी, तब संकट से घिर जायेगी। फिर हर लेगा कोई रावण, कुल में दाग लगायेगी। कलयुग के  लड़के राम नहीं, निशिचर,बन सड़क पे ‌घूम रहे। अपनी मर्यादा ‌भूल गये, नित...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 5 (56-60)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #5 (56-60) ॥ ☆   चिरकाल से प्रतीक्षारत था जिसकी मैं उस आप से हुआ अब शापमोचित - तो यदि न उपकार मानू मैं प्रभु का, तो होगा मेरे लिये यह बड़ा अनुचित॥ 56॥   मेरा अस्त्र ‘सम्मोहन' नाम का यह इसे लें सखे यह दिलाता विजय श्री यह सिद्ध गाँधर्वमन्त्रित जिताता है होता नहीं शत्रु हिंसा का भय भी ॥ 57॥   मुझ पर दया पूर्ण प्रहार करके, जो कुछ किया उस पै करें न लज्जा मेरी प्रार्थना पर न बरतें रूखाई, ग्रहण कर इसे करें नव साज सज्जा ॥ 58॥   अज अस्त्र विद्या विशारद ने उससे - ‘ऐसी ही हों - कहके पी नर्मदाजल उत्तर दिशा ओर मुख कर प्रियवंद से धारण किया अस्त्र का मंत्र निश्चल॥ 59॥   इस भांति संयोग से असंभव संख्य को प्राप्तकर दोनों बढ़े लक्ष्य की ओर आगे एक प्रियवंद कुबेर उद्यान चित्ररथ ‘अज' विदर्भ की ओर झट मन बना के॥ 60॥   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ...
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ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ १७ ऑक्टोबर – संपादकीय – श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

📝 १७ ऑक्टोबर  – संपादकीय  – श्री सुहास रघुनाथ पंडित 📝 आज 17 ऑक्टोबर. मराठी साहित्यातील वेगवेगळ्या वाटेने जाणा-या तीन सारस्वतांचा आज स्मृतीदिन! पाणिनी हे संस्कृत भाषेचे व्याकरणकार. पण मराठी भाषेचे पाणिनी म्हणून ज्यांना संबोधले जाते त्या दादोबा पांडुरंग तर्खडकर यांचा आज स्मृतीदिन. ते व्याकरणकार तर होतेच.पण त्याशिवाय त्यानी विपुल लेखन केले आहे. मानवधर्मसभा, परमहंससभा आणि प्रार्थना समाज या संस्थांचे ते संस्थापक सदस्य होते. मराठी बरोबरच त्याना फार्शी व संस्कृत भाषेचे ज्ञानही होते. इंग्रज सरकारने त्यांना रावबहादूर ही पदवी दिली  होती. महाराष्ट्र भाषेचे व्याकरण हे व्याकरणाचे पहिले पुस्तक त्यांनी 1836 मध्ये प्रकाशित केले. त्याची सुधारित दुसरी आवृत्ती 1850 ला निघाली. 1865मध्ये मराठी लघुव्याकरण हे पुस्तक प्रसिद्ध झाले. या शिवाय त्यांनी आत्मचरित्र, वैचारिक, शैक्षणिक, नकाशा संग्रह असे विपुल लेखन केले आहे. कोकणातील उफळे या गावी जन्मलेले श्री रवींद्र पिंगे यांचे बालपण मुंबईत गेले. पुढे ते अर्थशास्त्राचे पदवीधर झाले.मराठी साहित्यात ललित गद्य लेखनात त्यांचा मोलाचा वाटा आहे. कथा, कादंबरी, प्रवासवर्णन,आत्मपरलेखन, ललित असे विविधांगी लेखन त्यांनी केले आहे. सुमारे 32 पुस्तके त्यांच्या नावावर आहेत.त्यात प्रामुख्याने ललित...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ शुभेच्छांचा महापूर ☆ श्री विजय गावडे

श्री विजय गावडे  कवितेचा उत्सव  ☆ शुभेच्छांचा महापूर ☆ श्री विजय गावडे ☆   गटांगळ्या मी खात आहे थोपवू कवण्या उपायी 'व्हाट्सअँप,' रुपी ये खतायें   फेस आला फेसबुकी पाहुनी अगणित फोटो का सहावा जुल्म मी हा अंगावरी येतात काटे   सुप्रभात ने होई सुरु दिन अन ओघ लागे दिनभरी नको तितक्या न नको तसल्या मेसेजीस भाराभरी   जन्मदिन अन श्रद्धांजली च्या येती मेसीजिस संगे कोणी फोटो टाकी ऐसा जन्मदिनी बापडा अंतरंगे   बरे नाही जीवास म्हणुनी करावा आराम जरी हा 'गेट वेल सून' संदेशे वैताग पुरता येई पहा हा   पस्तावतो होऊनी मेंबर कळपांचा अशा काही अर्धमेला होतसे वाचूनी अर्थहीन सल्ले सवाई   असो उरली न आशा यावरी कवणा उतारा बदलतील वारे माध्यमे अन बदलेल हा खेळ सारा.   © श्री विजय गावडे कांदिवली, मुंबई मो 9755096301  ≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ कवीमन ☆ श्रीशैल चौगुले

श्रीशैल चौगुले  कवितेचा उत्सव  ☆ कवीमन ☆ श्रीशैल चौगुले ☆ मना सावर आता वादळे स्मृतीत होशील घायाळ बेट आयुष्याचे सुख-दुःख दैव वेदनांचे  आयाळ.   किती प्रसंगे नाती नि गोती विरले क्षणात तुझिया झडतात फुले तसे ऋतू तुटले सारे पंखबळ.   हताश होऊ नको तरिही अजून,आशा या क्षितीजा प्रबळ काळीज भाव निष्ठा घरटे शब्दांचे सकळ.   नजर जिथवरती जाई लाटा डोळ्यात मेघ होतील घाव सोसता कविता होई वादळाची शमेल झळ.   प्रतिभेचा दास थोर कवी संघर्षाची होई ऐसी तैसी अलौकीक ज्ञान तुजपाशी गगनभेदी संपदा दळ.   सुर्य चंद्र तारका गातील गुणगान अमर तेजस्वी जीवन धन्य तुझिया जन्मा सरस्वती प्रसन्न प्रांजळ.   © श्रीशैल चौगुले ९६७३०१२०९० ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈...
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मराठी साहित्य – विविधा ☆ भाकरीयन … भाग पहिला ☆ सौ. सुचित्रा पवार

सौ. सुचित्रा पवार  विविधा  ☆ भाकरीयन ... भाग पहिला ☆ सौ. सुचित्रा पवार ☆ 'अरे संसार संसार जसा तवा चुल्हावर         आधी हाताला चटके तेव्हा मिळते भाकर.' भाकरीचे उदाहरण देऊन संसाराचा सार्थ अनुभव बहिणाबाईंनी सांगितलाय. भाकरी हवी असेल तर त्यासाठी तव्याचे चटके, चुलीची धग सहन करायलाच हवी. कोणतीही इच्छित गोष्ट सहज प्राप्त होत नाही असेच बहिणाबाईंना सुचवायचे आहे. सुख हवे असेल तर दुःख झेलावे लागते,हिरवळ हवी असेल तर उन्हातानातून चालावे लागते,परमेश्वरभेट हवी असेल तर कठोर तपश्चर्या करावी लागते, मोह मायेपासून अलिप्त रहावे लागते. थोडक्यात एखादी गोष्ट विनासायास मिळाली की तिचे महत्व रहात नाही मात्र तीच वस्तू प्रयत्नातून,परिश्रमातून मिळाली असेल तर तिचा आनंद अवर्णनीय तर असतोच पण चिरंतर देखील असतो. एखादी माऊली एकाग्र होऊन चटचट भाकरी थापते आणि प्रत्येक भाकरी टम्म फुगते.चुलीवरच्या त्या भाकरींचा ढीग आपण भान हरपून पहातो आणि तिच्या कौशल्याचे मनातून कौतुक करतो,किती छान वाटते आपल्याला!पण तिने हे कौशल्य आत्मसात करायला बराच वेळ घालवलेला असतो,निरीक्षण,प्रयोगातून आणि सरावातून हे कौशल्य तिला सहज प्राप्त होते. 'Practice makes man perfect' एखाद्या गोष्टीच्या सरावाने माणूस त्यात अव्वल होतो. तरीही...
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