हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९४ ☆ श्रावण मास की दस्तक – सुंदर रूप निखार : हरियाली ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना श्रावण मास की दस्तक – सुंदर रूप निखार : हरियाली । इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९४ ☆

श्रावण मास की दस्तक – सुंदर रूप निखार : हरियाली ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

वर्षा की बूंदे सुखद, जीवन का आधार ।

हरियाली फैली रहे,  सुंदर रूप निखार ।।

*

बागों में झूले पड़े,   बारिश हो घनघोर ।

चंचल मन पर न चले, कभी किसी का जोर।।

श्रावण की पहली आहट के साथ ही लगता है मानो प्रकृति ने धरा के माथे पर हरियाली का तिलक सजा दिया हो। वर्षा की बूँदें केवल धरती की प्यास ही नहीं बुझातीं, वे मनुष्य के भीतर सोई संवेदनाओं को भी सींच देती हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में श्रावण केवल एक मास नहीं, बल्कि प्रकृति और आत्मा के पुनर्मिलन का पर्व माना गया है।

हमारे ऋषियों ने ऋतुचक्र के साथ जीवनचक्र को इस प्रकार जोड़ा कि उपासना भी हो, अनुशासन भी और पर्यावरण का संरक्षण भी। देवशयनी एकादशी से लेकर गुरु पूर्णिमा और हरियाली अमावस्या तक प्रत्येक अवसर हमें यही स्मरण कराता है कि सृष्टि से हमारा संबंध उपभोग का नहीं, आत्मीयता का है। वृक्ष केवल छाया नहीं देते, नदियाँ केवल जल नहीं बहातीं और वर्षा केवल मौसम नहीं बदलती—ये सब जीवन के मौन गुरु हैं।

आज जब विकास की दौड़ में हरियाली सिमटती जा रही है, तब श्रावण हमें ठहरकर यह प्रश्न पूछने का अवसर देता है—क्या हम प्रकृति से उतना ही प्रेम करते हैं, जितना उसके उपहारों से?

यदि प्रत्येक व्यक्ति इस मास में केवल एक पौधे को अपना आत्मीय मान ले, जल और हरियाली के प्रति अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर ले, तो यह धरती फिर से मुस्करा उठेगी। श्रावण का सच्चा उत्सव मंदिरों की घंटियों से आगे बढ़कर तब पूर्ण होगा, जब हमारे मन, हमारे आँगन और हमारी धरती—तीनों फिर से हरे-भरे हो उठेंगे।

सपनों को मिलने लगा, एक नया आकार ।

हरियाली फैली रहे, सुंदर रूप निखार।।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३१) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३१) ? ?

तुम्हारा चुप

मेरे चुप से

अलग है,

अभेद में

भेद दिखा रहा है,

वह रक्त की लालिमा

और जल की प्रवहनीयता पर

प्रश्न उठा रहा है।

?

© संजय भारद्वाज   

2.9.2018, प्रात: 10:03 बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “चुभती स्मृतियों का रोमांच” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – चुभती स्मृतियों का रोमांच… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

किताब में “उसकी” तस्वीर

यक़ीनन कोई बुक मार्कर नहीं थी

महफूज़ थी गर्द ओ ग़ुबार से

यादों में पैवस्ता एक दस्तावेज की तरह

उसे देखने की लालसा में

वह किताब जिसमें तस्वीर रखी थी

कभी बुक शेल्फ के पुस्तक संग्रह में

नहीं सजती थी

अक्सर रीडिंग टेबल पर या

बिछौने के सिरहाने रखी रहती थी

जानबूझकर, न चाहते हुए भी

मैं उस किताब को पढ़ने का उपक्रम करता था

और अतीत के घावों को खुद कुरेद कर

हरे और ताज़े कर लेता था

कई बार मन में आया कि,फाड़कर फेंक दूं

लेकिन सचमुच लगा कि

यह आसां तो नहीं था और सहेजा था ऐसा कुछ

तो यह उतना व्यर्थ का प्रयोजन नहीं था

सुना था कि…

चुभती चीज़ें भी, जिस्म ओ जां को राहत देकर

ज़िंदगी में बहुत से मर्ज़ ठीक करने की विधा हैं

सो वह यादगार आज भी वैसी ही रखी है…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

English Literature – Stories ☆ Witful Warmth # 92 – Electoral Frogs… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, known for his wit and wisdom, is a prolific writer, renowned satirist, children’s literature author, and poet. He has undertaken the monumental task of writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Telangana government at the primary school, college, and university levels. His editorial endeavors also include online editions of works by Acharya Ramchandra Shukla.

As a celebrated satirist, Dr. Suresh Kumar Mishra has carved a niche for himself, with over eight million viewers, readers, and listeners tuning in to his literary musings on the demise of a teacher on the Sahitya AajTak channel. His contributions have earned him prestigious accolades such as the Telangana Hindi Academy’s Shreshtha Navyuva Rachnakaar Samman in 2021, presented by the honorable Chief Minister of Telangana, Mr. Chandrashekhar Rao. He has also been honored with the Vyangya Yatra Ravindranath Tyagi Stairway Award and the Sahitya Srijan Samman, alongside recognition from Prime Minister Narendra Modi and various other esteemed institutions.

Dr. Suresh Kumar Mishra’s journey is not merely one of literary accomplishments but also a testament to his unwavering dedication, creativity, and profound impact on society. His story inspires us to strive for excellence, to use our talents for the betterment of others, and to leave an indelible mark on the world.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his SatireElectoral Frogs 

☆ Witful Warmth# 92  ☆

Satire ☆ Electoral Frogs… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆ 

The first shower of the monsoon had not even touched the earth yet when a sudden stir gripped the filthy gutters of neighborhood politics, and the white-collared creatures, famously hailed as the ‘protectors of democracy,’ began crawling out of their burrows to croak. The self-proclaimed leader of our neighborhood—whose kurta-pyjama possessed a whiteness that could put even milk to shame—suddenly began prostrating himself from house to house as if the Almighty Himself resided upon every single doorstep. His smile bore that distinct artificiality found only on expired sweet boxes, and his words dripped with a honey of ‘development’ so enticing that the gullible public stood ready to lick it, completely forgetting their long-standing bitterness. The dust blanketing the alleys had now integrated into an electoral strategy, where every swirling particle bore witness to some grand promise. The troupe of sycophants, holding flags in their hands, appeared so disciplined as though they had just returned yesterday with Olympic gold medals, whereas in reality, their race was confined merely to free alcohol and packets of biryani.

In the second act of this spectacle, as the clamor of campaigning reached its crescendo, the broken roads of the neighborhood were overnight transformed on paper into velvet carpets, and claims were made that holy Ganges water would now flow from defunct taps. Netaji addressed a public gathering where, pounding his chest, he grandly proclaimed that if he won, every child in the neighborhood would directly tour outer space, and an ‘Immortality Scheme’ would be launched for the elderly. A few intellectuals seated among the audience, proving that their brains had turned to stone, clapped enthusiastically, while the neighborhood stray dog, who had been listening to identical speeches for the past five elections, sat quietly in a corner with his tail tucked between his legs, pondering the collapse of the system. The statistics recorded in the official files danced so wildly that even experts from the department of statistics would have beaten their heads in despair, but here, a trade of emotions was underway where logic held no place. The posters plastered across every wall depicted Netaji’s face with such innocence that even Yamraj, the God of Death, would have been deceived upon looking at him and changed his route.

On the eve of the election, Netaji organized a secret ritual to guarantee his victory, and the moment he offered the final sacrifice into the holy fire, the entire neighborhood was illuminated by a bizarre light. The next morning, when the voters arrived at the polling booth, they discovered that instead of an election official, Netaji himself was seated near the EVM machine in the form of a gargantuan frog, his eyes rotating constantly like CCTV cameras. The moment people pressed the button, instead of a standard ‘beep’, a loud ‘croak-croak’ echoed from the machine, and instead of indelible ink, a sticky green substance smeared onto the voters’ fingers—one that refused to wash away. Suddenly, that monstrous frog darted its long tongue out and, in a single flash, whipped away and swallowed all the hard-earned money from the voter’s pocket. The terror escalated further when the frog burst into a roaring laughter in a human voice and mocked, “The vote belongs to you, but the note and the belly belong to me!”—and within the blink of an eye, it swallowed the entire polling station building whole. In the end, nothing remained but a barren, empty field where tatters of Netaji’s white kurta fluttered in the wind, and the public stood frozen in sheer bewilderment, staring blankly at the unremovable green stain on their fingers.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२२ ☆ व्यंग्य – आम और खास के बीच वाली खस की चिक ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२२ ☆

? व्यंग्य – आम और खास के बीच वाली खस की चिक ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

शहर के चौराहे पर लगा नेताजी का स्टैचू आज भी वैसा ही है। उनका हाथ हवा में ऐसे ठहरा है, मानो किसी अदृश्य भीड़ को बरसों से समझा रहे हों, ” मैंने तुम्हें विकास का जो लॉलीपॉप दिया है, उसे चूसना क्यों छोड़ रहे हो?, लॉली पाप चूसते रहो, और मुंह बंद रखो”

उसी मूर्ति के चौराहे के कोने में मोची रामसहाय बैठा करता है । उसे बहुतों की टूटी चप्पलें मौके पर सिलनी होती हैं और इंटरव्यू देने जाते बेरोजगार लोगों के जूते चमकाने होते हैं।

आज उसके पास सिर उठाने की फुर्सत नहीं है। उसे उन ‘खास’ जूतों की पॉलिश करनी है, जो कल स्वतंत्रता दिवस की परेड में ‘आम’ सड़कों पर शान से धूल उड़ाते हुए चलेंगे।

राम सहाय को उसके बचपन की याद है। गर्मियों की दोपहरी में खास लोगों के बंगलो की  खिड़कियों और दरवाजों पर खस की खुशबूदार चिक लगाई जाती थी। वह खास लोगों को आम लोगों से अलग करने वाली एक अदृश्य, मगर ठंडी विभाजक रेखा थी । बाहर का ‘आम’ आदमी भरी दोपहरी में बाल्टी भर-भरकर पानी उस चिक पर छिड़कता था।भीतर ‘खास’ साहब मखमली कुर्सी पर पसरकर उस ठंडी बयार में कलमी आम को तक चूसकर आनंद लेते थे । बाहर सिंचाई करता ‘आम’ आदमी भी खस की महक को ही अपनी नियति मानकर तृप्त हो जाता था।

खस की महक की खुशी  ‘आम’ के पसीने और ‘खास’ के आराम के बीच का इकलौता साझा रिश्ता थी।

आज न खस की चिक बची, न वह सादगी। शीशे की वातानुकूलित दीवारों ने खस को रिप्लेस कर दिया है। इस कांच की दीवार ने संवेदनाओं को भी ‘फ्रीज’ कर दिया है। अब कोई किसी की खिड़की पर पानी नहीं छिड़कता, क्योंकि अब भीतर वालों को बाहर की गर्मी का एहसास ही नहीं होता।

पहले अंदर की खास लोगों की  बातें खस की चिक के उस पार आम व्यक्ति तक पहुंच जाती थी। अब कांच के पार आवाजें नहीं जाती ।

रामसहाय ने अब मेरी घिसी हुई टूटी चप्पल सिलना शुरू किया था ।

मैंने उस से पूछा, “रामू भाई, खस की चिक हट गई, अब क्या बचा?” उसने बिना नज़र उठाए जवाब दिया, “साहब, अब चिक नहीं, एल्गोरिदम की दीवार है। पहले हम पानी छिड़कते थे तो महक हमें भी नसीब होती थी। अब हम सिर्फ डेटा रिचार्ज करवाते हैं, ताकि ‘खास’ लोगों की डिजिटल चमक को लाइक कर सकें।”

कहने को सच है कि खास वह नहीं है जो बंगलों में बैठा है। खास तो वह है, जो यह तय करता है कि किस ‘आम’ को कितनी देर तक किस मुद्दे की हवा में भिगोकर खास बनाए रखना है। और रामसहाय इस तरह का ही खास आम है।वह निचोड़ा जाता है, बार बार नए तरीकों से नए लोगों द्वारा ।

चौराहे पर पकौड़े तलने वाले की कड़ाही में तेल तो एक ही खौल रहा है, पर ‘पकौड़े’ की गुणवत्ता पर राजनीति की मोहर लगी है। ‘खास’ काउंटर पर पकौड़े सजे-सजाए प्लेट में पहुंचते हैं। ‘आम’ काउंटर पर आदमी को अपनी थाली खुद ही ढोनी पड़ती है । यह ‘सेल्फ-सर्विस’ का दौर है।

‘आम’ आदमी का लाइन में खड़े होना लोकतंत्र की गरिमा है, और ‘खास’ का सीधे अंदर जाना वीआईपी शिष्टाचार है। अगर ‘आम’ आदमी  कुर्सी मांग ले, तो वह ‘अतिक्रमणकारी’ करार दिया जाता है, जबकि ‘खास’ का वहां बैठना ‘जन-संवाद’ की तस्वीर बन जाता है।

खस की चिक के साथ हमने वह सौंधी खुशबू खो दी है, जो वर्ग-भेद को कम से कम ‘महसूस’ तो करने देती थी। आज की एयर-कंडीशंड खामोशी में संवाद मर चुका है। ‘आम’ आदमी ‘खास’ बनने की ऐसी अंधी दौड़ में है कि वह यह भूल गया है कि वह खुद उस पेड़ का तना है, जिस पर ‘खास’ फल लटके हैं।

त्रासदी यह है कि ‘आम’ आदमी ने अब यह मान लिया है कि उसे कुल्हड़ ही नसीब होगा और ‘खास’ को चीनी मिट्टी का प्याला।

मिट्टी तो मिट्टी ही है, चाहे वह कप हो या कुल्हड़।

मेरी टूटी चप्पल सिल कर फिर एट माई सर्विस, ऑन रोड आ चुकी थी। मैं फटियाते हुए आगे निकला, सोच रहा था कि

जिस दिन ‘आम’ आदमी शीशे की दीवार हटाकर भीतर की बातों में हिस्सेदारी का साहस करेगा, उस दिन शायद सारी कृत्रिम व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।

तब तक, बस लॉली पाप चूसते हुए, मुंह बंद रख मुस्कुराते रहिए। हंसी अभी भी टैक्स-फ्री है। पर डर तो यह है कि कहीं अगली बजट मीटिंग में ‘हंसी कर’ न लग जाए। आखिर, ‘खास’ को अपनी लग्जरी गाड़ियों के लिए पेट्रोल और  खामोशी के लिए साउंड-प्रूफ दीवारों का खर्चा तो ‘आम’ के पसीने से ही निकालना है!

  

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४५ ⇒ सब्र का बांध ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सब्र का बांध।)

?अभी अभी # १०४५ ⇒ आलेख – सब्र का बांध ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जब सब्र का बांध टूटता है तो आंखों से आंसुओं की झड़ी लग जाती है। नैना सावन भादो हो जाते हैं, बिन बादल बरसात हो जाती है।

सभी जानते हैं, बांध नदियों पर बनाया जाता है। भाखड़ा नांगल, टिहरी, चंबल, गांधी सागर और सरदार सरोवर, सब बांध ही तो हैं। नदियों के पानी को रोककर बिजली बनाई जाती है। एक समय में पूरे मध्यप्रदेश को चंबल से बिजली मिलती थी और राजस्थान को पानी। बाद में नर्मदा के सरदार सरोवर से मध्यप्रदेश तो पानी पानी हो गया और बिजली गुजरात चली गई। साथ ही गंगा जमुनी संस्कृति की जगह नर्मदा – साबरमती संस्कृति ने जन्म ले लिया और पूरे गुजरात में नर्मदा के पानी से नहरों का जाल बिछ गया। यही अंतर है कल के नेहरू और आज की विकास की नहरों में।।

बांध की एक सीमा होती है। जब बरसात और पहाड़ों का पानी नदियों में सैलाब बन फूट पड़ता है तो बांध के गेट खोलने पड़ते हैं। खतरों के निशान पर नजर रखनी पड़ती है। थोड़ी भी लापरवाही हुई और चारों ओर जल प्रलय। बारिश में जब यशवंत सागर के सभी साइफन खुल जाते हैं, तो नजारा देखते ही बनता है।

बस कुछ ऐसी ही स्थिति होती है, सब्र के बांध की ! कभी गुस्सा फूट पड़ता है तो कभी दुख का पहाड़। गुस्सा तो खैर तबाही ही मचाता है, इसलिए गुस्से को तो कंट्रोल ही करना चाहिए लेकिन अगर गम के आंसू हैं, तो उन्हें रोको मत, बहने दो ;

या दिल की सुनो दुनिया वालों

या मुझको अभी चुप रहने दो।

मैं गम को खुशी कैसे कह दूं

जो कहते हैं, उनको कहने दो।।

ये आंसू मेरे दिल की ज़ुबान है ! अभी कल ही हमारे परिवार के बेहद करीबी, मित्र और शुभचिंतक का आकस्मिक स्वर्गवास हो गया। साठ साल का साथ, 60 घंटों में टूट गया। लॉक डाउन में जो जहां है, वहीं सब्र किए बैठा है। मर्द को तो दर्द नहीं होता। औरतों का दिल तो रोता है जी। मेरी दोनों बहनें जो आने से मजबूर थी, फोन पर ही फट पड़ी। आंखों से टप टप आंसू। अगर पास भी होती तो मैं क्या कर लेता। पहले हाथों को सनेटाइज करता, शायद फिर उसके आंसू पोंछता। शायद गले तो फिर भी नहीं लगा पाता। अच्छा हुआ, कोरोना ने दूरी बनाई रखी।।

मुझे याद नहीं, मैं कब फूट फूट कर रोया। महिलाओं में भगवान ने करुणा के साइफन लगा रखे हैं, उधर दुख का पहाड़ टूटा, इधर सब्र का बांध टूटा और आंसुओं के सैलाब में सब कुछ जलमग्न।

कितना कुछ बह जाता है इन आंसुओं के साथ। इन्हें बहने देना चाहिए, रोकना नहीं चाहिए। जब कभी सदमे से ये आंसू सूख जाते हैं, तो मानसिक आघात अधिक घातक हो जाता है। ऐसे में आंसू जबरदस्ती लाए जाते हैं। जो लिखा था, आंसुओं के संग बह गया। रोना ज़रूरी है।

ये कोरोना हमें किसी के आंसू नहीं पोंछने देगा। कैसी शवयात्रा और कैसी शोक बैठक ! बस किसी को रोने को मजबूर ना करें, और अगर खुद को मज़बूरी में रोना पड़े, तो दर्जन भर नैपकिन साथ रखें। अब कोई आपके आंसू भी नहीं पोंछ सकता। रोने से जी हल्का होता है। सब्र का बांध टूटने दें। मुझे अच्छी तरह से रोने दें। बहुत दिन हो गए आंसू बहाए।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गुरुवर का शुक्रिया ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ गुरुवर का शुक्रिया ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

तुमने दिया विवेक तो, हुआ सत्य  का भान।

करूँ शुक्रिया आपका, गुरुवर ऐ भगवान।।

खिलता है जीवन तभी, जब गुरुवर हैं संग। 

करूँ शुक्रिया ज़िन्दगी, गुरु से जो नवरंग।।

 *

 यदि गुरुवर हैं संग तो, मैं नित ही बलवान।

करूँ शुक्रिया तात हे!, है जीना आसान।।

 *

नहीं ज्ञान बिन चेतना, जीवन जाता हार।

प्रभुवर करता शुक्रिया, पाया मैं उजियार।।

 *

गुरु देते संस्कार नित, कर देते निर्माण।

सदा शुक्रिया ज्ञान का, जिससे रक्षित प्राण।।

 *

हर दुर्गुण को दूर कर, गुरुवर लाते शान।

करूँ शुक्रिया सूर्य का, मिलती जिससे आन।।

 *

गुरुवर का नित शुक्रिया, जिनका पावन काम।

जिनको समझो शिष्य तुम, पूरे चारों धाम।।

 *

गुरुजी की महिमा बहुत, करो शुक्रिया खूब।

जो देते हैं ज्ञान को, गहराई में डूब।।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ गंवार सी स्त्री ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखिका व कवयित्री श्रीमती अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ संस्मरण ☆ गंवार सी स्त्री ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

दादी एक शिक्षक की पत्नी थीं, पर उनका स्वभाव बिल्कुल माटी जैसा सरल था। बाबा जब भी उनके किस्से सुनाते, तो उनकी आँखें छलक उठतीं। वे अक्सर बताया करते थे कि कैसे दादी महुआ बिनने, सुखाने और पीसने से लेकर लकड़ी के चूल्हे पर रसोई बनाने तक का सारा काम अकेले हंसते-हंसते कर लेती थीं। उन दिनों पापा पटना में रहकर पढ़ाई भी करते थे और नौकरी भी; तब रात्रि पाठशालाएं (नाइट स्कूल) हुआ करती थीं। हमारा गाँव पटना से कोसों दूर था। उस दौर में आज जैसे सुख-साधन भले न रहे हों, पर मुश्किलों के समाधान ज़रूर थे और सबसे बढ़कर था — आपसी विश्वास की एक मजबूत नाव।

बाबा के परिवार की पृष्ठभूमि अम्मा के मायके से बिल्कुल उलट थी। जहाँ पापा एक साधारण शिक्षक और किसान के बेटे थे, वहीं अम्मा दरभंगा के एक संभ्रांत जमींदार परिवार की हंसमुख बेटी थीं। नियति ने दोनों का गठबंधन तो करा दिया, लेकिन बदले में अम्मा से उनका ऐश्वर्य और बहुत कुछ छीन लिया।

अम्मा अक्सर एक बात याद करती थीं कि एक बार नानी ने उनसे कहा था — “पति के चरण या ज़मीन के नीचे ही स्त्रियों का असली स्थान होता है।”

अम्मा ने अपनी माँ की इस सीख को गाँठ बांध लिया। वे अपनी सास (दादी) और बड़की माई के पदचिह्नों पर चुपचाप चल पड़ीं। वह ऐसा दौर था जब चावल बाज़ारों में पैकेटों में नहीं मिलते थे; धान को उबालना, सुखाना, कूटना और फटकना पड़ता था, तब कहीं जाकर थाली में भात सजता था। आटा और दाल की कहानी भी कुछ ऐसी ही मशक्कत भरी थी। घर कच्चे थे, जिन्हें संवारने के लिए मिट्टी और गोबर की ज़रूरत होती थी। द्वार पर बंधे मवेशियों से गोबर मिल जाता था। गृहस्थी के इन कामों को सहेजते-सहेजते जमींदार की वह बेटी न जाने कब सीधा पल्लू रखना भूल गई और सिर पर उल्टा पल्लू रखे कब इस गाँव की संस्कारी बहू बन गई, उसे खुद भी पता न चला।

मर्यादा ऐसी थी कि बड़े बाबूजी (जेठ जी) के सामने अम्मा कभी नहीं गईं और न ही बड़े बाबूजी कभी अम्मा के समक्ष आए। दादी की मृत्यु के बाद घर का नेतृत्व बड़की माई ने संभाला। उनके साए में पूरा परिवार हमेशा संयुक्तरहा। गाहे-बगाहे सब मिलते रहे।

तीज-त्योहार हो, शादी-ब्याह हो, या जीवन-मृत्यु का कोई अवसर—इन सब सामाजिक ताने-बाने को उन्हीं तथाकथित गंवारस्त्रियों ने मिलकर बखूबी चलाया। और तब तक चलाया, जब तक कि उस परिवार में पढ़े-लिखेलोगों का आगमन और हस्तक्षेप नहीं हुआ। जैसे ही आधुनिकता और शिक्षा का अहंकार घुसा, धीरे-धीरे गाँव का वह भरा-पूरा घर खाली होता चला गया। पुराने बुजुर्ग रहे नहीं और नई पीढ़ी आधुनिकता की चकाचौंध में रम गई।

अब आलम यह है कि आज के बच्चे अपने माता-पिता से पूछते हैं—

“पापा, क्या यह आटे का पेड़ है?”

तो पिता झेंपते हुए कहते हैं— “नहीं बेटा, यह गेहूँ का पौधा है।”

यह आधुनिक काल है या हमारी समझ का पतन, यह तो समझ से परे है। लेकिन इतना तो तय है कि आज के इन समझदारऔर पढ़े-लिखे लोगों से कहीं बेहतर वे गंवारलोग थे। वे चाहे जैसे भी थे, अपने भरे-पूरे कुनबे को एक डोर में बांधकर रखते तो थे! तीज-त्योहारों और गर्मियों की छुट्टियों में बेटियाँ और बुआ मायके की राह ताकती तो थीं!

परन्तु अब… अब अपनों के इंतज़ार की वह राह और वह गाँव का घर, दोनों ही बेनूर हो चुके हैं। अब कुछ नहीं बचा।

*— अभिलाषा श्रीवास्तव, गोरखपुर*

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०३ ☆ शिशु कविता – चूहे राजा चले बाजार… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०३ ☆ 

☆ शिशु कविता – चूहे राजा चले बाजार ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

चूहे राजा चले बाजार।

साइकिल पर वह हुए सवार।

थैला लिया साथ में अपना।

बाएँ ओर सड़क के चलना।

थैले में सामान को लाएँ।

पॉलीथिन को नहीं अपनाएँ।

कभी प्रदूषण नहीं बढ़ाएं।

 धरती माँ को स्वर्ग बनाएँ।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ माझी माय मराठी… + संपादकीय निवेदन – सौ. दीप्ती कुलकर्णी – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सौ. दीप्ती कुलकर्णी

💐 अ भि नं द न 💐

महाराष्ट्र साहित्य परिषद, इचलकरंजी आणि रोटरी क्लब ऑफ इचलकरंजी यांनी आयोजित केलेल्या काव्यस्पर्धेत आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका श्रीमती दीप्ती कुलकर्णी यांना त्यांच्या ‘माझी माय मराठी’ या कवितेला उत्तेजनार्थ पुरस्कार प्राप्त झाला आहे.

श्रीमती कुलकर्णी यांचे ई-अभिव्यक्ती परिवारातर्फे मन: पूर्वक हार्दिक अभिनंदन आणि शुभेच्छा 💐

 आज त्यांची पुरस्कार प्राप्त कविता प्रकाशित करत आहोत.

संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

पुरस्कार प्राप्त कविता

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “माझी माय मराठी” ☆ सौ.ज्योत्स्ना तानवडे ☆

(काव्यप्रकार:अष्टाक्षरी)

 माझी ही माय मराठी

अभिमाने येते ओठी||धृ||

हर्षे कविताही येते

गीते नि भारुड गाते

पोवाड्यात ही रमते

ओव्यातुनी ती सजते ||||

 *

विश्वी कथेच्या फुलते

शब्दा लेते नि खुलते

वास्तवास न्याय देते

आविष्कारे ती नटते ||||

 *

कधी कादंबरी बने

शब्दांसवे ती डोलते

वेधकता  दाखविते

सर्वां काबिज करते ||||

 *

लालित्येही ती मांडते

 संवादाने ती नटते

तेजोन्मेषे नि पांडित्ये

मोहिनीच ती घालिते ||||

 *

सारस्वता जी स्फुरते

नाट्यातुनी प्रगटते

नवरसा दाखविते

विश्वासह ती स्पर्शते ||||

© सौ. दीप्ती कुलकर्णी

भ्र. ९५५२४४८४६१

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares