हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०२ ☆ “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक…” – लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है प्रो. अरुण कुमार भगत जी द्वारा लिखित  “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तकपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०२ ☆

☆ “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक…” – लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक ..’संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक’

लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत (सदस्य , बिहार लोक सेवा आयोग, पटना)

प्रकाशक: वाणी प्रकाशन , नयी

दिल्ली

मूल्य : 325 रु, पृष्ठ 160

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ संपादन की जटिलताओं को समझकर उसे एक सार्थक सामाजिक सरोकार में बदलने की कला – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रो. अरुण कुमार भगत की यह पुस्तक पत्रकारिता के उस ‘नेपथ्य’ को सामने लाती है, जिसके बिना सूचना महज एक कच्चा माल है। आठ प्रमुख अध्यायों में विस्तृत विषय वस्तु को बिंदुवार व्याख्या कर लेखक ने संपादन को एक यांत्रिक कार्य के बजाय एक बौद्धिक और सृजनात्मक शिल्प के रूप में स्थापित किया है।

\संपादन की परिकल्पना और कला (पृष्ठ 11-40), के पहले अध्याय में लेखक ने पुस्तक की शुरुआत ‘संपादन की अवधारणा’ से की है। यहाँ संपादन को केवल त्रुटि-शोधन नहीं, बल्कि एक ‘दृष्टि’ के रूप में परिभाषित किया गया है। ‘संपादन के सोपान’ और ‘तकनीक’ वाले अध्याय यह स्पष्ट करते हैं कि एक संपादक को किन मानसिक चरणों से गुजरना पड़ता है। संपादन के महत्व को रेखांकित करते हुए पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए एक स्तरीय संदर्भ है ।

 संपादन के सिद्धांत (पृष्ठ 41-54) अध्याय पुस्तक का दार्शनिक आधार है। यहाँ ‘पाठ्य-सामग्री के चयन’, ‘गठन’ और ‘प्रस्तुति’ के सिद्धांतों पर लेखक ने अनुभूत विस्तृत चर्चा की है। लेखक ने कतिपय अनुभवी संपादकों के सिद्धांतों को जोड़कर इस खंड को ऐतिहासिक संदर्भ भी प्रदान किया है, जो शोधार्थियों के लिए मूल्यवान सामग्री है। संपादकीय विभाग का ढाँचागत स्वरूप (पृष्ठ 55-74) गहन अध्ययन योग्य है। एक उत्कृष्ट समाचार पत्र या पत्रिका के पीछे की संगठनात्मक शक्ति इस आलेख में स्पष्ट होती है ।संपादकीय कक्ष (Newsroom) की कार्य-प्रणाली और संरचना को बारीकी से समझाया गया है। यह व्यवहारिक ज्ञान उन नवागत पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण है जो मीडिया संस्थानों की आंतरिक कार्य-संस्कृति को समझ कर कुछ नवाचार करना चाहते हैं।

मेरा मानना है कि शीर्षक किसी भी किताब या लेख का वह प्रवेश द्वार होता है जो अपने लालित्य से पाठक को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। लेखन का शिल्प और सौंदर्य (पृष्ठ 75-97)

शीर्षक (Headline) में यही तथ्य बौद्धिक विवेचना के आधार पर बताया गया है। प्रो. भगत ने शीर्षक के प्रकार, उसकी विशेषताओं और ‘प्रभावी शीर्षक लेखन की तकनीक’ पर जो प्रकाश डाला है, वह लेखक के स्वयं के व्यापक अनुभव का प्रमाण है। यहाँ शिल्प और सौंदर्य का सामंजस्य संपादन को एक ललित कला की श्रेणी में खड़ा कर देता है।

संपादन का शिल्प-विधान और शैली-पुस्तिका (पृष्ठ 98-108) संपादन में ‘शैली’ (Style Book) का क्या महत्व है, इस पर लेखक ने विशेष बल दिया है। भाषा-शैली की एकरूपता और शुद्धता ही किसी प्रकाशन की पहचान बनाती है। यह खंड भाषाई अनुशासन के प्रति लेखक की आदर्श प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

संपादन-प्रक्रिया, विलोम पिरामिड से चित्र-संपादन तक (पृष्ठ 109-140)  अध्याय सबसे अधिक तथ्यात्मक और क्रियात्मक है। इसमें ‘आमुख (Lead) की बनावट’, ‘विलोम पिरामिड शैली’ (Inverted Pyramid) और ‘समाचार का पुनर्गठन’ जैसे गंभीर विषयों पर नवाचारी चर्चा की गई है। साथ ही, ‘चित्र-संपादन’ का समावेश यह बताता है कि विजुअल मीडिया के दौर में एक संपादक की आँखें कितनी पैनी होनी चाहिए।

मुझे स्मरण है कि मेरा एक व्यंग्य ‘कबीर से एक आत्म साक्षात्कार ‘ एक राष्ट्रीय पत्र में छपा था, लेख में, जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है, कुछ भी ऐसा नहीं है जो किसी की कोई भावना आहत करे , पर लेख के साथ प्रकाशित व्यंग्य चित्र के चलते एक वर्ग को लगा कि उनकी भावना आहत हुई, और उन्होंने प्रतिवाद दर्ज किया था। अतः संपादन में व्यापक समझ और दूरंदेशी वांछित होती है।

आज सोशल मीडिया के स्वसम्पादन वाला इंस्टा युग है। इधर लिखा उधर दुनिया भर में गया । जब तक एक खबर पर भरोसा करो , उसका खंडन आ जाता है। खबरों का ट्रंप कार्ड संपादक के पास ही होता है, अतः उसे सब कुछ ठीक तरीके से फैक्ट चेक के बाद ही जारी करने का साहस रखना चाहिए। इस दृष्टि कोण से यह किताब अध्ययन मनन और सीखने , पढ़ते , गुनते रहने वाली सामग्री का विशद कलेवर समेटे हुए है।

मेरी समझ में असंपादित न्यूज की हड़बड़ी के चलते ही आगरा समिट विफल हो गई थी। अतः संपादन का महत्व निर्विवाद है।

पुस्तक में पृष्ठ-सज्जा और अभिकल्प (पृष्ठ 141-160) पर पूरा अध्याय है।

पुस्तक का समापन ‘पृष्ठ-सज्जा’ (Page Layout) के संतुलन और सौंदर्यबोध के साथ होता है।

एक संपादक को केवल शब्दों का ही नहीं, बल्कि रिक्त स्थान और विजुअल बैलेंस का भी ज्ञान होना चाहिए, यह इस खंड का मुख्य संदेश है। प्रकाशन रीडर्स फ्रेंडली होना चाहिए। छोटे अक्षरों में बेतहाशा पठनीय सामग्री उड़ेल देना उचित नहीं होता।

यह पुस्तक संपादन का संपूर्ण कोश है।

प्रो. अरुण कुमार भगत ने संपादन-कला के हर सूक्ष्म तंतु को स्पर्श कर उसे सरल शब्दों में विस्तार पूर्वक समझाया है। अध्यायों का प्रवाह ‘सिद्धांत’ से शुरू होकर ‘प्रस्तुति’ के अंतिम पड़ाव तक जाता है। ‘सूचना विस्फोट’ के इस दौर में, जहाँ विश्वसनीयता का संकट है, यह पुस्तक संपादकीय शुचिता और बौद्धिक प्रखरता का मार्ग प्रशस्त करती है।

पत्रकारिता जगत से जुड़े  हर छोटे बड़े के लिए यह पुस्तक एक मार्गदर्शिका है । किताब संपादन की जटिलताओं को समझकर उसे एक सार्थक सामाजिक सरोकार में बदलने की कला में पारंगत बनाती  है।

पुस्तक अमेजन पर सुलभ है। संदर्भ हेतु अपने स्टडी सेल्फ में रखने की अनुशंसा अपने पाठकों को करता हूं।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०१ ☆ “आपकी अरु” – लेखिका… अर्चना नायडू ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. सुलभा कोरे जी द्वारा लिखित  शिव और शिवालय – ज्ञात से अज्ञात तक…पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०१ ☆

☆ “आपकी अरु” – लेखिका… अर्चना नायडू ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

कृति : आपकी अरु

कहानी संग्रह

प्रकाशक इंडिया नेट बुक्स , नोएडा

लेखिका : अर्चना नायडू

☆ स्त्री मन की परतों को लिपि बद्ध करती कहानियाँ  – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ई. अर्चना नायडू जी द्वारा रचित कहानी संग्रह ‘आपकी अरु’ समकालीन हिंदी साहित्य में एक ताजीऔर मानवीय संवेदनाओं से भरपूर कृति है।

​यह संग्रह वर्तमान परिवेश की स्त्री विमर्श लेखन केंद्रित जीवंत समस्याओं और मानवीय रिश्तों के सूक्ष्म जालों को बड़ी ही कुशलता से बुनता है। पुस्तक की अनूठी विशेषता इसकी केंद्रीय पात्र ‘अरु’ है। लेखिका ने एक ही नाम के माध्यम से स्त्री के विभिन्न आयु वर्गों किशोरी, युवती, और प्रौढ़ा, की मानसिक अवस्थाओं और उनके संघर्षों का प्रभावी चित्रण किया है। एक तरह से उपन्यास ही है आपकी अरु । अरु के बिंब तथा परिवेश में हम आप और पाठिकाएं स्वयं के ही कई स्वरूप देख समझ सकते हैं । यह किताब महीने से ज्यादा मेरी तकिया के निकट टेबल पर अपनी स्थिति बदलती रही है।इसकी कहानियों में मध्यमवर्गीय परिवारों के संस्कार, आधुनिकता का द्वंद्व और टूटते-जुड़ते रिश्तों की कसक दिखाई देती है। अर्चना जी का लेखन ‘मालती जोशी’ जी की परंपरा को आगे बढ़ाता हुआ प्रतीत होता है, जहाँ सादगी ही सबसे बड़ा अलंकार है।

​’लिव-इन रिलेशनशिप’,   कहानी में लेखिका ने इस आधुनिक मुद्दे को पारिवारिक दृष्टिकोण से देखा है। जब अरु को पता चलता है कि उसका बेटा आदित्य और सौम्या एक साथ रहते हैं, तो वह क्रोध करने के बजाय समझदारी और सहजता दिखाती है। वह सौम्या से कहती है “तुमने बिरला मंदिर नहीं देखा है न, चलो हम परसों चलते हैं… हम मंदिर में ही तुम दोनों की इंगेजमेंट कर देते हैं। क्यों ठीक है न मेरी बहू रानी!”, यह संवाद पीढ़ीगत अंतराल को सहानुभूति से पाटने का सुंदर उदाहरण है।

इसी प्रकार ​’पुनर्मिलन बनाम रीयूनियन’ कहानी दबी हुई प्रेम भावना और वर्तमान कर्तव्य के बीच के संतुलन को दर्शाती है। कॉलेज के पुराने साथी ऋषि कुमार से मिलने पर अरु के मन में उद्वेलन होता है, लेकिन वह एक आदर्श भारतीय स्त्री की तरह अपनी भावनाओं को अनुशासित रखती है। अंत में वह  कंधे पर सिर रखकर मौन स्वीकृति देती है, जो भारतीय समाज की ‘प्रेम को दबाकर जीने वाली स्त्री’ के यथार्थ को स्पष्ट करता है।

​’आपकी अरु’ (शीर्षक कहानी) , कहानी पिता-पुत्री के निश्छल प्रेम और कर्तव्यपरायणता पर आधारित है। पिता की मृत्यु के शोक के बीच भी अरु अपनी परीक्षा देने जाती है क्योंकि उसके भाई ने कहा था, “अगर अरु यह एग्जाम देगी तो यह पापा के लिए अंतिम श्रद्धांजलि होगी”। अरु तनाव में भी अपनी जिम्मेदारी पूरी करती है, जो उसके चरित्र की दृढ़ता को रेखांकित करता है।

​कहानी लेखन का आर्ट इन कहानियों में परिलक्षित होता है। अर्चना नायडू की शैली सरल, सुबोध और प्रवाहमयी है। उनके वाक्य छोटे और स्पष्ट हैं, जो पाठक को पात्रों के साथ सीधे संवाद का अनुभव कराते हैं। उन्होंने ‘यथार्थ’ को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत किया है। भाषा में एक सहज लय है,  जो कहानी को पानी की धार की तरह बहने में मदद करती है। उनके पास समृद्ध शब्द भंडार तथा अभिव्यक्ति की क्षमताएं हैं।

​ इन कहानियों का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त विरोधाभासों और विडंबनाओं को दूर कर एक सकारात्मक राह दिखाना है। लेखिका का लक्ष्य केवल समस्या बताना नहीं, बल्कि ‘व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़ना’ और खत्म होते जा रहे मानवीय मूल्यों को बचाना है। ये कहानियाँ एक बेहतर मनुष्य बनने की मर्मस्पर्शी शिक्षा देती हैं।

​’आपकी अरु’ केवल कहानियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह बदलते हुए समाज का दर्पण है। जिस सहजता से अर्चना नायडू जी ने स्त्री मन की परतों को लिपि बद्ध किया है, वह आने वाले समय में निश्चित ही उन्हें कथा-साहित्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाएगा। भविष्य में यह पुस्तक उन पाठकों के लिए एक मार्गदर्शिका सिद्ध होगी जो आधुनिकता की चकाचौंध में भी अपनी जड़ों और संस्कारों की मिठास को जीवित रखना चाहते हैं। इस लेखन में मानवता को जोड़ने की जो प्रबल संभावना है, वह निसंदेह इसे एक दीर्घजीवी कृति बनाती है। मेरी अशेष मंगल कामनाएं अर्चना जी के इस सारस्वत प्रयास के साथ हैं। इंडिया नेट बुक्स से डॉ संजीव कुमार चुनिंदा साहित्य प्रकाशित कर रहे हैं, उन्हें भी बधाई।

पुस्तक अमेजन पर सुलभ है, खरीदकर पढ़ने लायक है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

सेवा निवृत मुख्य अभियंता विद्युत मंडल

स्वतंत्र लेखक ,आलोचक

ई अभिव्यक्ति के हिंदी संपादक.

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०० ☆ “साफ़ – सुथरा”  – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित  साफ़ – सुथरा…पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०० ☆

☆ “साफ़ – सुथरा  – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कृति : लघुकथा संग्रह साफ सुथरा

लेखक :सुरेश पटवा

प्रकाशक : मंजुल पब्लिकेशन भोपाल

मूल्य : 399 रु

समकालीन विसंगतियों के बीच एक ‘साफ़-सुथरा’ हस्तक्षेप  – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लघुकथा समकालीन साहित्य की एक ऐसी सशक्त विधा है, जो सीमित शब्दों में जीवन के अनगिन पहलुओं को छूने की सामर्थ्य रखती है। इसी विधा की गरिमा को केंद्र में रखते हुए सुरेश पटवा का नवीन लघुकथा-संग्रह ‘साफ़-सुथरा’ (मंजुल पब्लिकेशन, भोपाल) सामने आया है। यह संग्रह न केवल विधागत अनुशासन को बनाए रखता है, बल्कि समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय विमर्श को नई दिशा भी प्रदान करता है। संग्रह की विविध लघुकथाएँ सामाजिक सरोकारों, धार्मिक विडंबनाओं और मानवीय अंतर्द्वंद्वों की गहरी पड़ताल करती हैं, जिनसे लेखक की वैचारिक सघनता स्पष्ट रूप से उजागर होती है।

संग्रह की कथाभूमि अत्यंत व्यापक है। जहाँ एक ओर ‘तीन-तलाक’ जैसी कथा मुस्लिम समाज में व्याप्त धार्मिक पितृसत्ता के विरुद्ध स्त्री के पक्ष में मज़बूती से खड़ी होती है, वहीं ‘सौम्या का ख़्वाब’ शहरी मध्यवर्गीय मानसिकता की सूक्ष्म व्याख्या करती है। लेखक यहाँ मनोवैज्ञानिक गहराई से स्पष्ट करता है कि वास्तविक संघर्ष सपनों को देखने में नहीं, बल्कि उन्हें हर हाल में ज़िंदा रखने में है। राजनीति के क्षेत्र में सामाजिक रूप से हाशिये पर पड़ी अस्मिताओं, जैसे ट्रांसजेंडर समुदाय के उभार को ‘काँटे की टक्कर’ में बखूबी चित्रित किया गया है, जो हमारे लोकतंत्र की रूढ़ियों पर एक तीखा कटाक्ष है।

सुरेश पटवा के लेखन में दार्शनिकता और व्यंग्य का अनूठा संगम है। ‘भगवान’ जैसी कथा बच्चों के भोले प्रश्नों के माध्यम से ईश्वर की संकल्पना को संवेदनात्मक रूप में प्रस्तुत करती है, तो ‘लालच पर काबू’ आत्मनिरीक्षण के जरिए मनुष्यता की कसौटी को परिभाषित करती है। लोककथा की पुनर्रचना करती ‘राजा का परिधान’ आज के राजनेताओं के मिथ्याचार और चाटुकारिता पर प्रहार करती है, जहाँ सत्य कहने के लिए एक बच्चे जैसा निष्कलुष साहस अनिवार्य बताया गया है।

साहित्यिक जगत की विसंगतियों पर भी लेखक की दृष्टि पैनी रही है। ‘लंच का समय’ और ‘छपास सम्मान सुख में सेंध’ जैसी कथाएँ साहित्यिक आयोजनों के बौद्धिक दिखावे, खोखली आत्ममुग्धता और सम्मानों के पीछे छिपे सांस्कृतिक संकट को उजागर करती हैं। इसके विपरीत, ‘सच्चा हिंदुस्तानी’ जैसी रचनाएँ भारत की साझी संस्कृति और सहिष्णुता की पक्षधर बनकर उभरती हैं, जो यह संदेश देती हैं कि सच्ची राष्ट्रभक्ति धार्मिक कट्टरता से नहीं बल्कि मनुष्यता से शुरू होती है।

संग्रह की शीर्षक कथा ‘साफ़-सुथरा’ प्रतीकात्मकता के सहारे बाहरी स्वच्छता बनाम नैतिक गंदगी पर गहरा प्रश्न खड़ा करती है। यह कहानी अंतरात्मा की शुचिता को सर्वोपरि मानती है। अंततः, सुरेश पटवा का यह लेखन एक जागरूक दृष्टा का लेखन है, जो हास्य-व्यंग्य और तर्क की त्रयी से एक सशक्त सामाजिक आलोचना निर्मित करता है। यह संग्रह सिद्ध करता है कि लघुकथा केवल क्षणिक प्रभाव नहीं, बल्कि एक गहन विचार का बीज है, जो पाठक के मन में लंबे समय तक अंकुरित होता रहता है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ के कहणा (हरियाणवी काव्य संग्रह) – एडवोकेट नीलम नांरग ☆ समीक्षक – श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है  एडवोकेट नीलम नांरग जी की पुस्तक के कहणा पर श्री मनजीत सिंह की चर्चा।

☆ पुस्तक समीक्षा ☆ के कहणा (हरियाणवी काव्य संग्रह) – एडवोकेट नीलम नांरग☆ समीक्षक – श्री मनजीत सिंह ☆

किताब – के कहणा

कवयित्री – एडवोकेट नीलम नांरग (90344 22845)

पुस्तक समीक्षा – मनजीत सिंह (9671504409)

प्रकाशक – एस जैन पब्लिकेशन, रोहतक,

कीमत – 239 रूपये भारतीय

पृष्ठ -109

☆ ग्रामीण जीवन, स्त्री चेतना और सामाजिक यथार्थ का संवेदनशील चित्रण के कहणा काव्य – संग्रह ☆

नीलम नारंग की काव्य कृति “के कहणा” हरियाणवी भाषा में रचित एक अत्यंत संवेदनशील, सजीव और बहुआयामी कविता संग्रह है, जो अपने भीतर ग्रामीण जीवन की सुगंध, मानवीय संबंधों की ऊष्मा, स्त्री चेतना की दृढ़ता, सामाजिक सरोकारों की गंभीरता और प्रकृति के प्रति गहरे अनुराग को समेटे हुए है। यह कृति केवल कविताओं का संकलन भर नहीं है, बल्कि हरियाणा की मिट्टी, वहाँ के लोगों, उनकी सोच, उनके संघर्ष और उनके बदलते जीवन की एक सशक्त अभिव्यक्ति है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए ऐसा अनुभव होता है मानो पाठक किसी गाँव की पगडंडी पर चलते हुए वहाँ के जीवन को अपनी आँखों के सामने घटित होते देख रहा हो।

इस संग्रह की सबसे प्रमुख विशेषता इसकी भाषा और अभिव्यक्ति है। हरियाणवी बोली की सहजता, उसकी खनक और उसकी आत्मीयता इस कृति को विशिष्ट बनाती है। कवयित्री ने भाषा को किसी साहित्यिक बंधन में नहीं बाँधा, बल्कि उसे उसी रूप में प्रस्तुत किया है जिस रूप में वह आम जन के जीवन में बोली और समझी जाती है। यही कारण है कि कविताएँ पढ़ते समय वे कृत्रिम नहीं लगतीं, बल्कि अपनेपन का गहरा अहसास कराती हैं। यह भाषा न केवल संप्रेषण का माध्यम बनती है, बल्कि भावों की सजीवता को और भी प्रखर करती है।

कविता संग्रह में स्त्री जीवन का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली और प्रेरणादायक है। “सयाणी छोरी”, “सुनो छोररयों”, “छोरियाँ” जैसी कविताओं में नारी के संघर्ष, उसकी मेहनत, उसकी आत्मनिर्भरता और उसके आत्मसम्मान को बहुत ही सशक्त रूप में प्रस्तुत किया गया है। यहाँ स्त्री किसी दया या सहानुभूति की पात्र नहीं है, बल्कि वह अपने अस्तित्व को पहचानने वाली, अपने अधिकारों के लिए खड़ी होने वाली और समाज में अपनी पहचान बनाने वाली सशक्त इकाई के रूप में सामने आती है। कवयित्री ने यह स्पष्ट किया है कि बदलते समय के साथ ग्रामीण स्त्री भी अपनी सीमाओं को तोड़ रही है और हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है।

इन कविताओं में स्त्री के प्रति समाज की संकीर्ण मानसिकता पर भी करारा प्रहार किया गया है। “कमजोर मर्द”, “कैडी नजर” और “ईबे बाकी सै” जैसी रचनाएँ इस बात को उजागर करती हैं कि किस प्रकार आज भी समाज में स्त्री को कई तरह की बाधाओं और भेदभावों का सामना करना पड़ता है। कवयित्री इन विषयों को केवल सतही रूप में नहीं छूतीं, बल्कि उनके पीछे छिपी मानसिकता को भी उजागर करती हैं। यह दृष्टिकोण इस कृति को केवल भावनात्मक ही नहीं, बल्कि विचारोत्तेजक भी बनाता है।

ग्रामीण जीवन की सादगी, उसकी सुंदरता और उसके भीतर छिपी जटिलताओं का चित्रण इस संग्रह में अत्यंत मार्मिक ढंग से किया गया है। “मेरे गाम”, “गाम आए हां”, “ईसा समय” जैसी कविताएँ उस पुराने समय की याद दिलाती हैं जब गाँवों में रिश्तों में अपनापन था, जीवन में सरलता थी और लोगों के बीच एक अटूट जुड़ाव था। आज के समय में जब शहरीकरण और आधुनिकता के प्रभाव से यह सब धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है, तब ये कविताएँ उस खोती हुई संस्कृति की याद दिलाती हैं और एक प्रकार की भावनात्मक टीस उत्पन्न करती हैं।

कवयित्री ने केवल अतीत की स्मृतियों को ही नहीं संजोया, बल्कि वर्तमान की सच्चाइयों को भी पूरी ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किया है। आज का ग्रामीण जीवन भी चुनौतियों से भरा हुआ है—पलायन, बेरोजगारी, बदलते मूल्य और रिश्तों में आती दूरी जैसी समस्याएँ इस कृति में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती हैं। कवयित्री इन समस्याओं को न तो अतिरंजित करती हैं और न ही उनसे मुँह मोड़ती हैं, बल्कि उन्हें उसी रूप में प्रस्तुत करती हैं जिस रूप में वे समाज में मौजूद हैं।

प्रकृति के प्रति कवयित्री की संवेदनशीलता इस संग्रह का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। “जल है तो कल है”, “गमले से संवाद”, “यो आदमी” जैसी कविताओं में पर्यावरण संरक्षण का संदेश स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कवयित्री ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि किस प्रकार मनुष्य अपने स्वार्थ के कारण प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर रहा है और इसके परिणामस्वरूप पर्यावरण संकट उत्पन्न हो रहा है। इन कविताओं में केवल चेतावनी ही नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा भी निहित है।

प्रेम और मानवीय संबंधों का चित्रण इस कृति को और अधिक व्यापक बनाता है। “नू ही चाहूं”, “दुआ सा प्यार”, “पचास पार का प्यार” जैसी कविताएँ प्रेम के विभिन्न रूपों को उजागर करती हैं। यहाँ प्रेम केवल आकर्षण या भावुकता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर पड़ाव पर अपने अलग-अलग रूपों में प्रकट होता है। विशेष रूप से परिपक्व आयु में प्रेम के चित्रण ने इस संग्रह को एक नई दृष्टि प्रदान की है, जो सामान्यतः कम ही देखने को मिलती है।

पारिवारिक संबंधों की गहराई और उनकी भावनात्मक जटिलता को भी कवयित्री ने बहुत ही संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। “मां”, “बाबू का साया”, “बापू की सोच” जैसी कविताएँ परिवार के भीतर के संबंधों को बड़ी ही सहजता और सच्चाई के साथ व्यक्त करती हैं। इन कविताओं में माता-पिता के त्याग, उनके सपनों और बच्चों के प्रति उनके निस्वार्थ प्रेम को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जो पाठक के मन को गहराई से प्रभावित करता है।

सामाजिक चेतना इस कृति का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है। “कुण सा धर्म”, “हिंदुस्तान चाहिए”, “किसै खेल” जैसी कविताओं में समाज में व्याप्त विभाजन, धार्मिक भेदभाव और राजनीतिक स्वार्थों पर प्रश्न उठाए गए हैं। कवयित्री ने इन विषयों को बड़ी ही स्पष्टता और साहस के साथ प्रस्तुत किया है। इन कविताओं में एकता, भाईचारे और मानवीय मूल्यों को महत्व देने का संदेश दिया गया है, जो आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है।

इस संग्रह में जीवन के विभिन्न चरणों और अनुभवों को भी बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। “बचपन की बात”, “सुपने”, “जिंदगी” जैसी कविताएँ जीवन के अलग-अलग पड़ावों को दर्शाती हैं। बचपन की मासूमियत, युवावस्था के सपने और जीवन के संघर्ष—इन सभी को कवयित्री ने बहुत ही सजीवता के साथ चित्रित किया है। यह विविधता इस कृति को और अधिक समृद्ध बनाती है।

कवयित्री की शैली की एक विशेषता यह भी है कि वे जटिल विषयों को भी बहुत ही सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत करती हैं। उनकी कविताओं में किसी प्रकार का भारीपन या बोझिलता नहीं है, बल्कि वे सीधे दिल से निकलकर दिल तक पहुँचती हैं। यही कारण है कि यह कृति केवल साहित्य प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी समान रूप से आकर्षक है।

हालाँकि, इस कृति में कुछ सीमाएँ भी हैं। कुछ स्थानों पर भाषा की अत्यधिक स्थानीयता के कारण अन्य क्षेत्रों के पाठकों को समझने में कठिनाई हो सकती है। इसके अलावा, कुछ कविताओं में विचारों की पुनरावृत्ति भी देखने को मिलती है, जिससे कुछ हद तक नवीनता में कमी महसूस होती है। लेकिन ये छोटी-छोटी कमियाँ इस कृति के समग्र प्रभाव को अधिक प्रभावित नहीं करतीं।

दरअसल, यही स्थानीयता इस कृति की सबसे बड़ी ताकत भी है, क्योंकि यह हरियाणवी जीवन और संस्कृति को उसकी वास्तविकता के साथ प्रस्तुत करती है। यह कृति किसी सार्वभौमिक भाषा में लिखी गई होती तो शायद इतनी सजीव और प्रभावशाली न होती। इसलिए इसकी भाषा और शैली को उसकी मौलिकता के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

“के कहणा” केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज भी है, जो अपने समय और समाज की तस्वीर को सजीव रूप में प्रस्तुत करता है। यह कृति पाठकों को न केवल मनोरंजन प्रदान करती है, बल्कि उन्हें सोचने और अपने आसपास के समाज को समझने के लिए भी प्रेरित करती है।

कुल मिलाकर, नीलम नारंग की यह काव्य कृति हरियाणवी साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान के रूप में देखी जा सकती है। यह कृति अपने विषय, भाषा, शैली और संवेदनशीलता के कारण पाठकों के मन में एक विशेष स्थान बनाने में सफल होती है। इसमें निहित भावनाएँ, विचार और संदेश पाठक को लंबे समय तक प्रभावित करते हैं।

अंत में मैं यही कहना चाहता हूं कि “के कहणा” एक ऐसी कृति है जो अपनी सादगी में ही अपनी सबसे बड़ी शक्ति को समेटे हुए है। यह कृति हमें हमारे मूल्यों, हमारी संस्कृति और हमारे संबंधों की महत्ता का एहसास कराती है और हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। नीलम नारंग ने इस कृति के माध्यम से न केवल अपने साहित्यिक कौशल का परिचय दिया है, बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी बखूबी निभाया है। यह पुस्तक निश्चित रूप से पाठकों के लिए एक यादगार अनुभव साबित होती है।

*

समीक्षक : श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ कोई नाम न दो…  –  संपादक- डाॅ शैलेश गुप्त वीर ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ पुस्तक समीक्षा ☆

☆ कोई नाम न दो…  –  संपादक- डाॅ शैलेश गुप्त वीर ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

कृति–कोई नाम न दो

संपादक- डाॅ शैलेश गुप्त वीर

समीक्षक- इन्दिरा किसलय

प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन नई दिल्ली

पृष्ठ-200

मूल्य-349/-

☆ प्रेम का मनोविज्ञान -बदलाव की बयार-“कोई नाम न दो” – सुश्री इन्दिरा किसलय

श्वेतवर्णा प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित इस कृति में 79  लघुकथाएँ संग्रहित हैं। सम्पादक हैं बहुभाषाविद् डॉ. शैलेश गुप्त वीर। यूँ भी प्रेम को कोई नाम कैसे दिया जा सकता है। वह तो गूंगे का गुड़ है। शब्दों का सहारा लेकर  अंश-अंश ही व्यक्त हो पाता है। प्रस्तुत संग्रह समकाल में प्रेम की विविध स्थितियों, धारणाओं, सामाजिक मान्यताओं और मनोवैज्ञानिक जटिलताओं का  सूक्ष्म रूपायन करता है।

पुराकाल में निसर्ग के सान्निध्य में परवान चढ़ने वाला लैला-मजनू वाला प्रेम अब इतिहास हो गया या कहें कि छुई मुई संवेदना ने जाग्रत चेतना का दामन थाम लिया है।

स्वतंत्रता, शिक्षा से उत्पन्न जागृति, आर्थिक आत्मनिर्भरता, कानून की स्त्री सापेक्ष स्थिति और टेक्नोलॉजी के बढ़ते चरण मनोभावों को विशाल स्तर पर प्रभावित कर रहे हैं। उपभोक्तावाद और सोच का खुला आकाश, स्त्री-पुरुष समान अधिकारों के तल पर सामाजिक संरचना को आंदोलित कर रहा है।

लघुकथाओं के लघुतम कलेवर में प्रेम के बहुआयामी पार्श्व उभरे हैं जो समाज वैज्ञानिकों के लिए चेतावनी भी है और गहन चिंतन का विषय भी। जिज्ञासा सिंह ने ड्रिंक के केवल एक सिप में वर्जनाओं को तोड़ने की झिझक और सामाजिक मान्यताओं के बदलते स्वरूप का दर्शन करवाया है। सारी कहानियाँ सम्प्रेषणीयता की दृष्टि से अनुपम हैं। कृति में कहीं प्लेटोनिक लव है, कहीं समझदार, कहीं दैहिक आकर्षण, कहीं व्यवहार और कहीं अस्तित्व के प्रति प्रचंड जागरूकता, ऐसे कितने ही रूप रिश्तों में बदलाव की सूचना दे रहे हैं। क्रांति अचानक आकार नहीं लेती शनैः शनैः असंतोष का बारूद इकट्ठा होता है। सामाजिक क्रांति में वर्षों से संचित ताप सतह पर नजर आता है। शुद्ध शब्दों में इन कथाओं को प्रेम का मनोविज्ञान समझाती, स्वप्निल अनुभूति का रूहानी विस्तार करती हुई कथाएँ कह सकते हैं।

मनोज कुमार झा ने “लिव-इन रिलेशनशिप “का एक अलग ही रूप सामने रखा है। रंजना जायसवाल ने विवाह की परंपरागत प्रथा को एक तीखे सवाल से शीशा दिखाया है—-” पिता कहते हैं अनजान व्यक्ति से बात नहीं करनी चाहिए पर शादी कर लेनी चाहिए —–?

राजेंद्र वर्मा की”” घर “”में भी प्रेम विवाह और तलाक को समान अधिकार की पृष्ठभूमि में उकेरा गया है। शिवानी की आईना भी क्रांतिकारी कथा है। अंजू खरबंदा की दृष्टि में” प्रेम पगे रिश्ते “जीवन के स्वीकार की दास्तां है। वार्धक्य को भी प्रेम और  सलीके से जिया जा सकता है। कमल कपूर की “बूढ़े प्रेमपाखी “कहानी यही कहती है। डॉ शैलेश गुप्त वीर की “सच्चा प्यार “प्रणयी जोड़ों के लिए नेत्रोन्मीलक है। डाॅ मिथिलेश दीक्षित की निर्णयकथा प्रभावित करती है। इन्दिरा किसलय कृत “चाहे जो हो ” कहानी एक नौकरीशुदा स्त्री का असफल जीवन और भटकाव की दास्तां कहती है।

कथितव्य है कि इस संग्रह में प्रख्यात लघुकथाकार –सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, संतोष सुपेकर, अंजु दुआ जेमिनी, रघुविन्द्र यादव, विनोद सागर, उमेश महादोषी, योगराज प्रभाकर, सारिका भूषण आदि ने भी अपनी महनीय उपस्थिति दर्ज की है। शिल्प की दृष्टि से देखें तो कथाएं पर्याप्त न्याय कर रही हैं। कथ्य के वैशिष्ट्य के साथ संदर्भगत संवेदना, भाषा की स्पष्ट सामयिक अभिव्यक्ति पर जोर देने की बात संपादक” वीर जी “ने की है।

विगत दो दशक से लघुकथा ने पाठकों के हृदय में भरपूर स्थान पाया है। सुकेश साहनी की “फेस टाइम” ने एक ज्वलंत मुद्दे पर प्रकाश डाला है। सोशल मीडिया के रिश्तों पर पड़नेवाले प्रभाव को दर्शाया है।

नारी अस्मिता, तकनीकी विस्फोट, परंपरा और इक्कीसवीं सदी के बदलते परिदृश्य को चित्रांकित करती है हर लघुकथा। कथाओं की मारक क्षमता अद्वितीय है। कथा चयन हेतु संपादक वीर जी बधाई के पात्र हैं। निर्दोष मुद्रण, विषयानुरूप मुखपृष्ठ के साथ समस्त कथाएं लघुकथा के इतिहास में संपूर्ण अर्थवत्ता के साथ मौजूद हैं। ।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ श्री राज सागरी जी की – नदिया के ओ पार (काव्य संग्रह) ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆  श्री राज सागरी जी की – नदिया के ओ पार (काव्य संग्रह) ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री राज सागरी

(जन्म दिवस 1अप्रैल पर मंगल भाव सहित)

आज जब मैं बुंदेली साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर श्रद्धेय श्री राज सागरी जी की बुंदेली काव्य कृति नदिया के ओ पार के विषय में कुछ लिखने बैठा हूं तो मुझे सबसे पहले तो इस पुस्तक में सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं शिक्षाविद प्रोफेसर श्री राजेन्द्र तिवारी ऋषि की ये प्रतिक्रिया काफी प्रभावित कर रही है कि श्री राज सागरी ने खड़ी बोली, बुंदेली और उर्दू में साधिकार रचनाएं लिखी हैं। अपने चालीस वर्ष के साहित्यिक जीवन में पूरे प्रदेश और देश में हजारों पाठकों के मन में किसी न किसी रूप में अपनी रचनाओं को प्रतिष्ठित किया है और मंचों से काव्य पाठ करके हजारों हजार श्रोताओं को मंत्र मुग्ध किया है। बार बार श्रोता उनकी रचनाओं को सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं। साहित्य के त्रिवेणी संगम -प्रयाग राज सागरी के शीर्षक से श्री राजेन्द्र तिवारी ऋषि लिखते हैं कि वर्तमान में चुटकुले बाज तथाकथित कवियों के बीच राज सागरी जब काव्य पाठ करते हैं तो केवल वही मंच लूटते नज़र आते हैं। उनकी कविताएं न केवल मनोरंजन करती हैं बल्कि प्रेरणा भी देती हैं, ऊर्जा प्रदान करती हैं,नयी दिशा देती हैं। ऋषि के उपरोक्त नजरिए से ये बात तो स्पष्ट होती है की राज सागरी जी ने बुंदेली भाषा में काव्य सृजन करते हुए संस्कारधानी को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया है। उन्होंने दोहों और ग़ज़लों के माध्यम से बुंदेली को साहित्यिक क्षेत्र में प्रतिष्ठित करने में जो योगदान दिया है,वह अन्य साहित्यकारों के लिए प्रोत्साहन का विषय हो सकता है। राज सागरी की बुंदेली काव्य कृति नदिया के ओ पार में उनकी जो भी रचनाएं शामिल हैं वे समाज के विभिन्न पाठकों की रुचियों को ध्यान में रखकर सृजित की गई है। पाठकों को ये रचनाएं इसलिए भी पठनीय प्रतीत होती है क्योंकि बुंदेली भाषा में उन्हें ये रचनाएं अपने आसपास की घटनाओं और प्रसंगों पर आधारित महसूस होती हैं और फिर कवि ने भी अपने आसपास जो भी सामाजिक समस्याओं और स्थितियों को देखा परखा उसे पूरी ईमानदारी के साथ कलम के माध्यम से कागज़ पर उतार दिया।

राज सागरी जी की ग़ज़लों और दोहों की एक विशेषता और है कि उन्होंने आम आदमी की भाषा में आम आदमी के लिए बड़ी बेबाकी से लिखा है और पाठकों ने इसे बेहद पसंद भी किया है। कवि ने अपने काव्य सृजन को अपना श्रेष्ठ धर्म और कर्म माना है और यही संदेश उनकी रचना में भी दिखता है –

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गीत ग़ज़ल तुम गातई चलयो

जाग में नाम कमातई चलयो

0

कवि ने विद्वता के लिए आंखों की भाषा की समझ और सोच को भी अपनी रचना में प्रमुखता दी है और एक जगह लिखा भी है –

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मोरी बातई छोड़ दो, मैं तौ हूं नादान

आंखें तुम जो बांच लो, तौ समजूं विद्वान

0

राज सागरी जी राष्ट्रीय एकता के लिए सांप्रदायिक सौहार्द को आवश्यक मानते हैं और यही बात उनकी कविता में भी झलकती है। भारत माता कविता में उन्होंने लिखा भी है कि –

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हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई

हम चारों हैं भाई

हिन्दुस्तानी प्यार सिखाते

लड़ते नहीं लड़ाई

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राज सागरी जी का वैचारिक दृष्टिकोण उनकी बुंदेली कविता में भी परिलक्षित होता है। उनका सोचना है कि ग़लत काम करने वाले लोग निडरता से अपना काम करते हैं-

0

खा जैहें का जोन डरें हम

काय खों उनके पांव परें हम

प्यार सें बे हैरत लौ नयींया

उनपे बोलो काय मरें हम

ऐसीं बुद्धि दे अब ईसुर

कोई गलत नें काम करें हम

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वैसे तो श्री राज सागरी जी ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में काफी लिखा है लेकिन उन्हें बुंदेली भाषा में सृजन के लिए अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रियता अर्जित हुई है। खड़ी बोली में उनका काव्य संग्रह पल भर की पारो और तारे जमीन के भी चर्चित रहा। बाल साहित्य के अंतर्गत स्कूल चलें हम, उर्दू में कदम कदम और बुंदेली में ग़ज़ल संग्रह चलो अब घर खों चलिए और जाम- ए-गजल का प्रकाशन हो चुका है जो कि पाठकों के बीच अत्यंत पठनीय सिद्ध हुए हैं।

अमन प्रकाशन सागर से प्रकाशित नदिया के ओ पार में श्री राज सागरी जी की काव्य रचनाओं को पाठकों से वैसा ही प्यार मिलेगा जैसा कि पूर्व में प्रकाशित काव्य कृतियों को मिला है और सागरी जी ने भी इसीलिए कृति के प्रारंभ में ही पाठकों के प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त की है –

0

सारे जहां में आपने चमका दिया मुझे

मैं मुख्त़सर था आपने फैला दिया मुझे

0

मंगल भाव सहित

—– 

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४४ – पुस्तक समीक्षा – वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य: एक आकलन – लेखक/संपादक: राजकुमार जैन ‘राजन’ ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है श्री राजकुमार जैन राजनजी द्वारा संपादित पुस्तक – “वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलनकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४४

☆ पुस्तक समीक्षा – वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य: क आकलन – लेखक/संपादक: राजकुमार जैन राजन ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

पुस्तक का नाम: वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलन

लेखक/संपादक: राजकुमार जैन राजन

विधा: बाल साहित्य समीक्षा

प्रकाशक: ज्ञान मुद्रा पब्लिकेशन, भोपाल

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश

☆ बाल साहित्य की परख और पहचान का नया दस्तावेज़ ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

आज के डिजिटल युग में जब बच्चों का अधिकांश समय मोबाइल और इंटरनेट के बीच बीतने लगा है, तब अच्छी और संस्कारप्रद पुस्तकों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। किंतु समस्या यह है कि बाजार में उपलब्ध असंख्य पुस्तकों के बीच से बालकों के लिए उपयोगी और गुणवत्तापूर्ण साहित्य का चयन कैसे किया जाए। इसी प्रश्न का सार्थक समाधान प्रस्तुत करती है राजकुमार जैन ‘राजन’ की महत्वपूर्ण कृति वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलन। यह पुस्तक न केवल बालसाहित्य की श्रेष्ठ कृतियों का परिचय कराती है, बल्कि पाठकों, अभिभावकों और शिक्षकों को सही पुस्तक चयन की दिशा भी दिखाती है।

श्री राजकुमार जैन राजन

बचपन मानव जीवन का वह स्वर्णिम काल है, जिसमें अर्जित संस्कार जीवनभर साथ रहते हैं। किंतु वैश्वीकरण और आधुनिक जीवनशैली के कारण संयुक्त परिवारों का विघटन, माता-पिता की व्यस्तता और तकनीकी उपकरणों का बढ़ता प्रभाव बच्चों के प्राकृतिक बचपन को प्रभावित कर रहा है। माँ की लोरियाँ, नानी-दादी की कहानियाँ और दादाजी की पहेलियाँ अब लुप्त होती हुई धीरे-धीरे स्मृतियों में सिमटती जा रही हैं। ऐसे समय में बालसाहित्य बच्चों के संस्कार, ज्ञान, मनोरंजन और कल्पनाशीलता के विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बनकर सामने आता है।

पुस्तकें सार्वकालिक हैं। वास्तव में वे प्रकाश-स्तंभ हैं, जिनकी रोशनी में बच्चे जीवन की समस्याओं का समाधान खोजते हैं और अपने व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। इंटरनेट भले ही सूचनाओं का विशाल भंडार हो, किंतु पुस्तक से प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी और गहन होता है। इसलिए बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए पुस्तकों का कोई विकल्प नहीं है। पुस्तकें ही बच्चों में तर्कशीलता, चिंतन मनन और कल्पनाशीलता में  महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इस महत्व को देखते हुए यहां पर बालसाहित्य समीक्षा का महत्व बढ़ जाता है। आज बड़ी संख्या में बालसाहित्य लिखा और प्रकाशित हो रहा है, परंतु उसकी समीक्षा अपेक्षाकृत कम देखने को मिल रही है। इस अभाव को दूर करने का महत्वपूर्ण कार्य राजकुमार जैन ‘राजन’ ने किया है। उनकी यह पुस्तक वर्ष 2021 में प्रकाशित लगभग साठ श्रेष्ठ हिंदी बाल पुस्तकों की समीक्षाओं का संकलन है। यह संकलन बालसाहित्य की विविध विधाओं—कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, विज्ञान साहित्य, हाइकु और एकांकी—को समेटते हुए एक समृद्ध गुलदस्ते का रूप ले रहा है।

इस पुस्तक की विशेषता इसकी संतुलित और सकारात्मक समीक्षा दृष्टि है। लेखक ने कृतियों के छिद्रान्वेषण के बजाय उनके गुणों को रेखांकित करते हुए बालोपयोगिता पर विशेष ध्यान दिया है। उनकी समीक्षा शैली अत्यंत सरल, स्पष्ट और व्यवस्थित है। प्रत्येक समीक्षा में तीन प्रमुख आधार दिखाई देते हैं।

पहला आधार हैं संबंधित विधा का संक्षिप्त परिचय देना। दूसरा, कृतिकार के साहित्यिक व्यक्तित्व का उल्लेख करते हुए उसकी रचनाधार्मिता को सामने लाना है। तीसरा आधार है, कृति का समग्र मूल्यांकन करना। इसी पद्धति के आधार पर इन्होंने पुस्तक का मूल्यांकन किया है। इस पद्धति के कारण पाठकों को न केवल पुस्तक के विषय-वस्तु की जानकारी मिलती है, बल्कि उस साहित्यिक परंपरा और रचनाकार की दृष्टि को भी समझने का अवसर मिलता है।

पुस्तक में अनेक उल्लेखनीय कृतियों की समीक्षाएँ सम्मिलित हैं। जैसे “बिल्ली पढ़े किताब”, “अटकूँ-मटकूँ”, “मछुवारा का बेटा”, “जंगल का रहस्य”, “अंतरिक्ष में डायनासोर”, “इंद्र धनुष” तथा “विटामिनों से मुलाकात” आदि की समीक्षाएं सम्मिलित है। इन कृतियों के माध्यम से बच्चों के लिए मनोरंजन, ज्ञान, विज्ञान, नैतिक मूल्यों और कल्पनाशीलता का सुंदर समन्वय सामने आया है।

उसकी भूमिका लिखते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. उषा यादव और डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’ ने भी इस कृति को अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी बताया है। उनका मत है कि यह पुस्तक भविष्य में हिंदी बालसाहित्य के इतिहास लेखन में भी सहायक सिद्ध होगी। वास्तव में यह कृति अभिभावकों, शिक्षकों, शोधार्थियों, संपादकों और बालसाहित्य प्रेमियों आदि सभी के लिए उपयोगी होकर उनके लिए मार्गदर्शक का कार्य करेगी। ऐसी आशा की जा सकती है।

निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि राजकुमार जैन ‘राजन’ की यह पुस्तक हिंदी बालसाहित्य की गुणवत्ता और व्यापकता को सिद्ध करती है। यह कृति बताती है कि हिंदी में आज भी उत्कृष्ट बालसाहित्य लिखा जा रहा है, आवश्यकता केवल उसे पहचानने और पाठकों तक पहुँचाने की है। अपने समर्पण, परिश्रम और निष्पक्ष दृष्टि के माध्यम से लेखक ने बालसाहित्य समीक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है। साथ ही इस पुस्तक में अलका जैन आराधना की भी पुस्तकों की समीक्षाएं सम्मिलित की गई है। उनका योगदान भी उल्लेखनीय है।

यह पुस्तक न केवल जानकारी प्रदान करती है, बल्कि बालसाहित्य के प्रति नई जागरूकता भी उत्पन्न करती है। निश्चित ही वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलन हिंदी बालसाहित्य की परख और पहचान का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ सिद्ध होगी। इसके लिए लेखक को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।

——–

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९९ ☆ “व्यंग्य पच्चीसी” – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित  “व्यंग्य पच्चीसीपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९९ ☆

☆ “व्यंग्य पच्चीसी” – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक : व्यंग्य पच्चीसी

लेखक : सुरेश पटवा

प्रकाशक : मंजुल पब्लिकेशन, भोपाल

मूल्य : ₹250

☆ विसंगतियों के विरूद्ध तीखा प्रतिकार है ‘व्यंग्य पच्चीसी’- – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी साहित्य जगत में अपनी बहुआयामी लेखनी से विशिष्ट पहचान बनाने वाले वरिष्ठ रचनाकार सुरेश पटवा अब व्यंग्य की दुनिया में अपनी नई कृति ‘व्यंग्य पच्चीसी’ के साथ उपस्थित हैं। मंजुल पब्लिकेशन, भोपाल द्वारा प्रकाशित यह संग्रह पटवा जी के गहन अनुभवों और समाज की विसंगतियों पर उनके पैनी दृष्टि का जीवंत दस्तावेज है।

 

विविधतापूर्ण लेखन का विस्तार

१९५२ में जन्मे सुरेश चंद्र पटवा एक ऐसे सिद्धहस्त लेखक हैं, जिनकी स्वीकार्यता उनके भाषाई कौशल और पाठकीय संप्रेषणीयता से स्व-प्रमाणित है। बाल साहित्य, प्रकृति वर्णन, इतिहास, फिल्म जगत और मनोविज्ञान जैसे विविध विषयों पर अधिकारपूर्वक लिखने वाले पटवा जी ‘प्रयोगवादी’ रचनाकार हैं। ‘हिन्दू प्रतिरोध गाथा’ जैसी ऐतिहासिक कृति हो या ‘जंगल की सैर’ जैसी बाल रचना, उन्होंने हर विधा में अपनी शोधपरक दृष्टि का परिचय दिया है।

परंपरा और आधुनिकता का संगम

‘व्यंग्य पच्चीसी’ पटवा जी का प्रथम व्यंग्य केंद्रित संग्रह है, जो समकालीन व्यंग्य लेखन की स्थापित सीमाओं को तोड़ता है। इनके आलेख किसी अखबार की शब्द-सीमा में बंधे न होकर विषय का विस्तार से विश्लेषण करते हैं। संग्रह में शामिल ‘अथ श्री मोबाइल कथा’ और ‘स्वर्गीय फेसबुकिया से संवाद’ आज के डिजिटल युग की विद्रूपताओं पर करारा प्रहार करते हैं। बिना पढ़े संदेश फॉरवर्ड करने की अंधी दौड़ और आभासी दुनिया में सक्रियता की होड़ को उन्होंने बड़े ही रोचक ढंग से उकेरा है।

साहित्यिक जगत पर कटाक्ष

संग्रह की रचनाएं जैसे ‘प्रखर साहित्यजीवी’ और ‘व्यंग्य लेखन की परेशानी’ लेखकों के ही आपसी अंतर्विरोधों और साहित्यिक परिवेश के वर्तमान हाल को उजागर करती हैं। वे बड़ी बेबाकी से लिखते हैं— “साहित्यजीवी भैया, असल में ईनाम वाली किताब और बिकने वाली किताब अलग-अलग होती हैं।” लोकभाषा का पुट और संवाद शैली उनके व्यंग्यों को और भी मारक बनाती है। ‘मैथी में पका नीम चढ़ा करेला’ जैसे शीर्षकों के माध्यम से वे भाषाई उन्मुक्तता के साथ समाज और व्यवस्था पर चोट करते हैं।

अनुभव की परिपक्वता

अपने बैंक अधिकारी के सेवाकाल के अनुभवों को उन्होंने ‘छिद्दी का बकरी लोन’ जैसे व्यंग्य में पिरोया है, जो भ्रष्टाचार की जड़ों तक ले जाता है। वहीं ‘ओम बजटाय नमः’ और ‘अथ श्री कल्कि पुराण कथा’ जैसे शीर्षक दर्शाते हैं कि उन पर हरिशंकर परसाई जैसी महान व्यंग्य परंपरा का गहरा प्रभाव है, जिसे उन्होंने अपनी मौलिकता के साथ आगे बढ़ाया है।

निष्कर्ष

व्यंग्य केवल हंसाने के लिए नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करने के लिए होता है। पटवा जी की यह कृति पाठक के मानस पटल पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। बदलते समय के साथ जब घटनाएं खुद को दोहराती हैं, तब ये व्यंग्य और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। निश्चित ही, ‘व्यंग्य पच्चीसी’ के माध्यम से सुरेश पटवा जी समकालीन व्यंग्य परिदृश्य में एक सक्षम और संभावनाओं से भरपूर व्यंग्यकार के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ेंगे।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ दलित चेतना की मुखर आवाज़ है कविता संग्रह- ‘बंद दरवाजे’ ☆ समीक्षा – श्री दयाल चंद जास्ट ☆

श्री दयाल चंद जास्ट

 

पुस्तक चर्चा ☆ दलित चेतना की मुखर आवाज़ है कविता संग्रह- ‘बंद दरवाजे’ ☆ समीक्षा – श्री दयाल चंद जास्ट

पुस्तक – बंद दरवाजे (कविता-संग्रह)

कवि : जयपाल (94666-10508)

कीमत  150/- पेपर-बैक पृष्ठ-85

प्रकाशकः यूनिक पब्लिशर्स, कुरुक्षेत्र (90009-68400)

आज हमारा देश आजाद है।सवर्णों के जोर-जुल्म आज भी देखने को मिलते हैं।आज भी हिन्दू-धर्म में वर्ण व्यवस्था के कारण उपजी जाति व्यवस्था का कीचड़ समाज की समानता को विकृत कर रहा है।अभी हाल ही में प्रकाशित श्री जयपाल जी का काव्य संग्रह बंद दरवाजे दलित चिंतन की मुखर आवाज़ है। उन्होनें समाज का सामाजिक ऑपरेशन,आर्थिक परीक्षण,तथा नैतिक मूल्यांकन किया है।अवलोकन के दौरान दलित वर्ग के लिये दरवाजे बंद पाये गये,उनके जीवन को निम्न समझा गया,मनुस्मृति के अग्निकुंड में डाला गया। इस पुस्तक में श्री जयपाल जी अपनी कविताओं के माध्यम से समाज को जागृत करते हैं तथा समाज में दलितों के प्रति घृणित स्थिति के सब दरवाजे तोड़ते हैं,वे तर्क-वितर्क के साथ जबरदस्त विचार प्रस्तुत करते हैं।वह सवर्णों के जुल्म और अत्याचारों को आज भी पहले की तरह देख रहे हैं।उनकी कवितायेँ जिन संघर्षों से निकलकर आई हैं समाज की सच्ची तस्वीर नजर आती है और वह अपनी बात तर्क-वितर्क के साथ ललकारता है।

श्री जयपाल

आज के दौर में भी दलितों के लिये उनके दिमाग के दरवाजे बंद हैं

मैं क्या कहूँ उस गाँव को

जो सबका है पर उसका नहीं

उन गाँव के कुत्तों को

जो मुझे देखकर ही भौंकते हैं।

जनकवि श्री जयपाल जी की कविताओं में दलित महिलाओं की आवाज़ भी मुखर होकर बोलती है और यह पुस्तक सदियों से चली आ रही महिलाओं के प्रति सडांध युक्त मानसिकता को मिटाना चाहती है।वह ठाकुर के कुएं से बिना झिझक पानी भरना चाहती है। यह पुस्तक ब्रह्म हत्या और दलित हत्या के अन्तर को पाटना चाहती है। सवर्ण-समाज को दलित लडके द्वारा सवर्ण जाति की लड़की से शादी करना अखरता है,दलित व्यक्ति के सरपंच बन जाने से  सवर्णों को दस्त लग जाते हैं । लेकिन अपने लिये उन्हे वोट चाहिए फिर तो वे पाँव तक पकडते हैं ,उन्हे भूख बहुत लगती है,वे झूठे बेर भी खा जाते हैं,चुनाव के समय वे दलितों के घर की गाय का गोबर और मूत तक पी सकते हैं। जूठी पत्तल के माध्यम से दलित महिला के तन-मन पर क्या गुजरती है, जूठी-पत्तल  कविता में बड़ी ही मार्मिक स्थिति का वर्णन है।

कुछ पँक्तियाँ देखिये-

गालियां खाकर,फटकार पाकर

बड़ी मुश्किल से जंग जीतकर

आती थी माँ बच-बचाकर

छिप-छिपाकर कुत्तों बिल्लों से

माँ आती थी घंटों इंतजार करवाकर।

वह मुखर होकर खड़ी हो जाती है और ‘मैं चाहती हूँ’, कविता के माध्यम से स्पस्ट कर देती है-

छोड़ देना चाहती हूँ वे रास्ते

जो सिर्फ मेरे लिये ही बनाये गये हैं

मोड़ देना चाहती हूं वे हवाएं

जो मेरे सवालों को उड़ा ले जाती है।

ये पँक्तियाँ हर महिला के लिये महत्वपूर्ण  हैं।इस कविता संग्रह में जाति के दंश को झेलती हुई बस्तियां , सवर्णों की घिनौनी हरकतों  और अत्याचारों को तो सहती हैं, मौसम की मार भी सहती है।हम उनके लिये कितना भी नाच लें या गा लें लेकिन फिर भी जाति उनके दिलों में उतर गई है– जाति है कि जाति नहीं।इन बस्तियों में रहने वाले लोगों को वे गंदी नाली के कीड़े और न जाने क्या-क्या कहते हैं।मुखिया के नाम शोक-पत्र कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए –

ना रस्सा टूटा,ना खूँटा ही

हम ही टूट गये बँधे-बँधाए

और सवर्णों की पगड़ी सदा कलफदार रही।’यह हमारा समय है’ कविता में कवि ने शूद्रों और सवर्णों दोनों के एक होने की कल्पना की है । वक्त की मार सब पर पड़ती है  

वह तुम्हारा समय था

केवल तुम्हारा

उसमें हम कहीं नहीं थे

थे भी तो तुम्हारी जूती के नीचे

यह हमारा समय है तुम्हारा भी है

यहीं रहना है हमें भी और तुम्हें भी

अपने समय के सवालों का जवाब देते हुए।

सिरफिरे कविता में  फिर से शंबूक का सिर,एकलव्य का अंगूठा नजर आने लगा है। हमारा मारा जाना उनका विकास-क्रम है। प्राकृतिक रूप से शरीर की एक समान संरचना जाति के कारण कुछ लोग पवित्र बने हुए हैं और कुछ अपवित्र। तथाकथित लोगों को घुड़चढ़ी का सवाल,घुड़चढ़ी से खतरा,घोड़ी और घुड़चढ़ी जैसी कविताएँ अप्रत्याशित जंग नजर आती हैं।उन्हें घोड़ी पर चढ़ना देश के शासन पर चढ़ने जैसा लगता है।एक बार फिर कठिनाइयों का वक्त आने लगा है,एक बार फिर कवि अपने काव्य-संग्रह के माध्यम से ये सब भेदभाव बिना लाग-लपेट के उठाता है।दलितों को संविधान से जीवन में  संपूर्ण बदलाव की स्वतंत्रता भी मिली लेकिन कवि मानता है कि कुछ नहीं बदला।कवि जोर देकर कहता है- 

मै एक हजार साल पहले की नहीं

आज के भारत की बात कर रहा हूँ।

हजारों साल से दलित बस्तियाँ  देवी-देवता,धर्म-ग्रंथ,धर्म-स्थल आदि के उत्पीड़न का शिकार रहे हैं।इस उत्पीड़न के बाद भी कवि मानवीयता  के गुण को नहीं छोड़ता।स्वर्ग-नरक की बिडंबना मनु के समर्थन के गीत गाती है लेकिन कवि समाज को सजग करने का काम करता है ,वह सतगुरु रविदास जी के बेगमपुरा और संविधान की प्रस्तावना पर काम करता हुआ नजर आता है।धर्म का आडम्बरपना और जाति का डायनासोर इक्कीसवीं सदी में भी निगलने को तैयार है। इस काव्य- संग्रह की प्रत्येक रचना दिमाग के बंद दरवाजों को धक्के मार-मारकर खोलती है।श्री जयपाल श्री ओम प्रकाश वाल्मीकि व श्री मोहन दास नैमिशराय आदि दलित चिंतन के कवियों के समान स्वतंत्रता,समानता,बन्धुत्व का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।

श्री जयपाल जी की कविताओं में सरलता,स्पष्टता और आँदोलन-धर्मिता नजर आती है।उनकी मुहावरे में कविता है और कविता में मुहावरा है।भाषा की दृष्टि से कविताएँ भावपूर्ण एवं अर्थपूर्ण हैं।कहीं-कहीं अलंकार भी स्वतः समा गये हैं।उनकी कवितायेँ साहित्यिक दृष्टि से ऐतिहासिक हैं।कवि महोदय को बंद दरवाजे काव्य संग्रह के लिए बहुत-बहुत बधाई और साधुवाद !!

समीक्षाश्री दयाल चंद जास्ट

मो – 9466220146

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ अब पछताये होत का (काव्य संग्रह) – डॉ. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆ अब पछताये होत का (काव्य संग्रह) – डॉ. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(26 मार्च जन्म दिवस के अवसर पर विशेष )

आज जब मैं प्रतिष्ठित साहित्यकार और शिक्षाविद डॉ. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी जी की चर्चित काव्य कृति अब पछताये होत का को गंभीरता से पढ़ने के बाद उस पर कुछ लिखने बैठा हूं तो मुझे इस कृति की शुरुआत में साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन के निदेशक डॉ. विकास दवे की यह बात काफी प्रभावित कर रही है कि इस संग्रह की सबसे अच्छी बात  है रचनाओं के मनुष्य जीवन से सरोकार, उस पर सोने पर सुहागा यह कि वे आत्यांतिक मानवीय चिंतन प्रक्रिया से उपजे हैं। ये इस संग्रह की दो सशक्त भुजाएं हैं। डा. विकास दवे जी की ये प्रतिक्रिया कृति की उपयोगिता और पठनीयता को उजागर करती हैं। दवे जी लिखते है कि अभिजात जी लम्बे समय से लेखन के  क्षेत्र में सक्रिय हैं । आपकी रचनाओं के विषय चयन और प्रस्तुतियां पाठकों को लुभाएगें ।कृति की काव्य रचनाओं का अध्ययन और उस पर मनन करने के बाद पाठकों को उपरोक्त प्रतिक्रिया पूर्ण रूप से सही लगेगी ।  अब पछताऐ होत का संग्रह में  कवि की सार्थक सोच के अनुसार राष्ट्रीय, सामाजिक और पारिवारिक परिवेश की ऐसी कविताएं शामिल हैं जो कि सुधार वादी दृष्टिकोण को लेकर विभिन्न वर्गों के लिए प्रेरक संदेश देती नजर आती हैं ।इस कृति की एक विशेषता यह भी है कि इसमें त्रिपाठीजी ने पाठकों की पसंद का पूरी तरह ध्यान रखा है और काव्य रचनाओं को तीन भागों में विभाजित करके शामिल किया है याने संग्रह में गीत, ग़ज़ल और दोहे तीनों ही पाठक वर्ग को पढ़ने को मिल सकते हैं।  ये रचनाएं पढ़ने के बाद पाठक वर्ग भी इस बात को सहर्ष स्वीकार करेगा कि ये रचनाएं पठनीय और प्रभावी तो हैं ही साथ में प्रोत्साहन और प्रेरणा के लिए भी महत्वपूर्ण हैं ।इस संग्रह का  शुभारंभ कवि ने राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अपने एक मुक्तक से किया है जो कि पाठकों को प्रेरित भी करेगा और प्रभावित भी –

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जिनने अपना लहू लुटाया

उनको शीश झुकाने आये

कविताओं के शंखनाद से

सोया मुल्क जगाने आये

रात नहीं काले बादल का

छाया घुप्प अंधेरा है

सारे भारत वासी जागो

हम ये बात बताने आये

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संघर्ष की धूप में तपना और सुख की छांव में पलना दोनों ही को कवि जीवन की सफलता के लिए आवश्यक मानता है और उन्होंने इसे स्वीकार भी किया है –

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सुख और दुख दोनों साथी हैं

हमने दोनों को अपनाया

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मित्रता के निष्ठा पूर्वक निर्वाह को कवि ने अपने ही नजरिए से देखा है और जो महसूस किया है उसे अपनी रचना में व्यक्त भी किया है –

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हमने जिससे हाथ मिलाया

उसने ही दर दर भटकाया

दोस्त से बढ़ के दुश्मन अच्छा

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इस कृति में काव्य सृजन करने वाले डा अभिजात कृष्ण त्रिपाठी जी का हमेशा से सोचना रहा है कि अगर आम आदमी की भाषा में आम आदमी के लिए सृजन किया जाये तो वह अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रिय और पठनीय होता है। इसीलिए इस संग्रह में अधिकांश कविताएं बुंदेली भाषा में रचित की गई हैं और  ये रचनाएं इसीलिए अत्यंत रोचक और मनमोहक प्रतीत होती है।भाई श्री त्रिपाठी जी की बुंदेली भाषा में रचित कविताओं में भी  पाठकों को सार्थक संदेश ही नजर आयेगा –

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आईने की बात को तूं काहे झुठलात

सूरत जैसी होत है बेंसयी बौ दिखलात

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साहित्यिक और शैक्षणिक क्षेत्र के स्वनामधन्य प्रेरक और प्रणम्य व्यक्तित्व स्व. पंडित हरिकृष्ण जी त्रिपाठी के यशस्वी पुत्र डा. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी का लेखन और साहित्यिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्र में उनकी सक्रियता आज सराहना और प्रेरणा का विषय है । बुंदेली के सशक्त हस्ताक्षर श्रद्धेय श्री राज सागरी जी की ये पंक्तियां मेरे विचार से डा. अभिजात कृष्ण जी त्रिपाठी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर खरी उतरती हैं  और इन्हीं पंक्तियों में आज जन्म दिवस पर मंगल भाव व्यक्त करने के लिए भी उपयुक्त समझ रहा हूं –

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इल्मो अमल में राज बहुत कामयाब हूं

मेरा कोई जवाब नहीं लाजवाब हूं

पन्ने पलटते जाओ तो देखोगे दोस्तों

पढ़कर जिसे न भूल सको वो किताब हूं

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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