श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “तारीफ और खुशामद।)

?अभी अभी # १०९९  ⇒ आलेख – तारीफ और खुशामद ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

प्रेम का अगला पड़ाव प्रशंसा है ।अपनी तारीफ किसे पसंद नहीं !ढाई आखर अगर प्रेम का है तो तारीफ में तीन आखर हैं,जो शायद ही किसी को अखरते हों । प्रेम में एक बार दिखावा हो सकता है,तारीफ में नहीं । जिसमें प्रेम नहीं वह निष्ठुर और जो किसी की तारीफ नहीं करे,वह खुदगर्ज,घमंडी, आत्मकेंद्रित इंट्रोवर्ट ।

क्या गुजरती होगी उन गृह शोभाओं पर,जो घर के दस काम छोड़कर,बड़ी मेहनत,प्यार और मनोयोग से पति परमेश्वर के लिए प्याज के पकौड़े तलकर लाती है,पति महोदय चुपचाप बिना कुछ बोले,प्लेट साफ कर देते हैं,लेकिन उनके मुंह से तारीफ का तो एक शब्द भी नहीं निकलता ,अपितु कह उठते हैं,मिर्ची बहुत है,एक ग्लास पानी लाओ । क्या यह पकौड़ों पर और किसी की उम्मीद पर घड़ों पानी फेरना नहीं हुआ ।।

बच्चे भी तारीफ के बहुत भूखे होते हैं । खुश रहना उनकी फितरत रहती है । उन्हें अगर थोड़ा प्रेम, प्रोत्साहन ,प्रशंसा और हौसला मिल जाए तो बड़ा से बड़ा काम वे खुशी खुशी कर लेते हैं । बिना तारीफ और हौसले के भी क्या जवानों में कभी जोश आया है । आशा,उत्साह,उमंग और उम्मीद का ही दूसरा नाम सकारात्मकता है । कदम कदम बढ़ाए जा,खुशी के गीत गाए जा। ये जिंदगी है कौम की,तू कौम पे लुटाए जा ।

किसी के गुणों का बखान भी प्रशंसा की श्रेणी में आता है । सम्मान और प्रशंसा में चोली दामन का साथ है । प्रमाण पत्र,प्रशंसा पत्र ,पुरस्कार ,इनाम और पारितोषिक सब तारीफ के ही तो प्रकार हैं । जहां सफलता है,विजय है, अच्छा परिणाम है,वहां प्रशंसा ही प्रशंसा है ,स्तुति है,गुणगान है ।।

ईश्वर सर्व व्यापक है,सर्व शक्तिमान है । हम उसकी पूजा करते हैं,आराधना करते हैं,उनकी स्तुति और गुणगान करते हैं। स्तुति और गुणगान में भी अतिशयोक्ति अलंकार होता है ।भारत माता की जय हो अथवा अम्बे मात की । जय हे,जय हे,जय हे, और जय हो,जय हो,जय हो में पुनरावृत्ति दोष नहीं जोश कहलाता है । भक्ति भाव

में ही मंत्रों का जाप होता है,जहां एक स्तुति का ,मंत्र का 108 बार जाप किया जाता है,जिसे माला फेरना कहते हैं । हम जिसे ज्यादा स्नेह करते हैं,उसकी दिन भर माला फेरते रहते हैं । वह माला भी हो सकती है,कोई माया,ममता,शांति अथवा शकुंतला भी । एक मां के लिए उसके लाड़ले से बढ़कर कोई पूंजी नहीं होती । लाल तेरा जुग जुग जिये माता ।

जहां तारीफ काम नहीं आती,वहां खुशामद भी करनी पड़ती है । थोड़ी चिकनी,थोड़ी चुपड़ी, बातों में थोड़ी मिश्री घोलनी पड़ती है । बच्चों को खुशामद सिखलानी नहीं पड़ती । बड़ों को मतलब निकालने के लिए सीखनी पड़ती है । खुशामद से गलत काम भी आसानी से करवा लिया जाता है । आप खुशामद को हठ का परिवर्तित रूप भी कह सकते हैं,जिसमें अनुनय होता है, विनय होता है,थोड़ा मस्का,थोड़ा नवनीत होता है, थोड़ी तारीफ होती है तो थोड़ी चापलूसी भी । कितनी प्यारी होती है खुशामद ।।

बिना स्तुति, जप और प्रशंसा के तो शस्त्र और शास्त्र भी किसी काम के नहीं होते । शस्त्र और शास्त्र का भी उपयोग के पूर्व, विधिपूर्वक पूजन किया जाता है । अच्छे उद्देश्य से,सर्व जन हिताय और सर्व जन सुखाय की गई प्रशंसा,तारीफ अथवा स्तुति सार्थक होती है । केवल स्वार्थ सिद्धि के लिए की गई प्रशंसा अथवा स्तुति से आसुरी शक्तियां ही प्रसन्न होती हैं ।

सभी अच्छे कार्य तारीफ , प्रशंसा और खुशामद से ही संपन्न होते हैं । शिव जी के धनुष का संधान भी स्तुति के बाद ही संभव हो पाया था । आइए हम भी विश्व के मंगल के लिए स्तुति करें,आराधना करें,विनायक वंदना करें ;

जय जय हे गणेश !

काटो हमारे कलेश

आए शरण तुम्हारी

बलिहारी हो ।

जय जय गणपति

विजय हमारी हो ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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