श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कामकाज करने को आतुर…“।)
अभी अभी # ११०८ ⇒ आलेख – कामकाज करने को आतुर
श्री प्रदीप शर्मा
– WORKAHOLIC –
काम ही पूजा है। WORK IS WORSHIP! सुबह और शाम, काम ही काम, क्यूं नहीं लेता बंदे, राम का नाम ? इस दुनिया में किसी को काम का नशा, तो किसी को राम का नशा। एक हमारे रामदूत हनुमान को ही देखिए;
राम काजु कीन्हें बिनु
मोहि कहां विश्राम‘। ..
नशा बुरी चीज है। काम का नशा, उससे भी बुरा है। हमारी ज़िंदगी भी किसी व्याकरण से कम नहीं। कर्ता, कर्म और क्रिया में ही उलझी रहती है। अक्सर ऐसे पल भी आते हैं हमारे दैनिक जीवन में, जब हम अकेले बैठे, कुछ सोच रहे होते हैं, और अचानक किसी की आवाज से हमारा ध्यान भंग हो जाता है क्या सोच रहे हो! और हमारे मुंह से अनायास ही निकल जाता है, कुछ नहीं। याने कुछ ना कुछ तो हमारे अंदर चल ही रहा होता है, इसे ही हलचल कहते हैं। कभी बाहर, कभी भीतर।।
काम प्यारा होता है, चाम नहीं! जो काम नहीं करते, उन्हें निकम्मा, आलसी, निठल्ला और नल्ला कहा जाता है। काम ही कर्म है, काम ही पुरुषार्थ। काम ही वह इंजिन है जिसके पीछे क्रोध, लोभ और मोह के डब्बे भी लगे होते हैं। भगवतगीता इसीलिए कर्म की शिक्षा तो देती है, लेकिन निष्काम कर्म की। अनासक्त कर्म की। क्या काम में डूबे रहकर भी, काम से मुक्त रहा जा सकता है। जिनके आदर्श रामभक्त हनुमान हैं, उनके लिए यह बिल्कुल असंभव नहीं।
सेवा और समर्पण से किया गया कर्म अनासक्त कर्म हो जाता है। जब हम अपने पुरुषार्थ का श्रेय किसी और को समर्पित कर देते हैं, तो वह पूजा हो जाता है, निष्काम हो जाता है। काम से बुरा है, कर्तापन का नशा। मैने यह किया, मैने वह किया। मैं नहीं होता तो आज इतना बड़ा परिवार नहीं होता, खून पसीने से सींचा है मैंने इस परिवार को और आज मेरी ही कद्र नहीं। अच्छा सिला दिया तुमने मेरे त्याग का।।
काम में नशा है, काम में रस है, सिर्फ तब तक, जब तक हमें फल की आशा है। जब सब करे कराए पर फ्लश फिर जाए, तो क्या किया जाए। सृजन ही जीवन है। जीवन में बहार भी आती है और पतझड़ भी। सूखे पत्ते खिर जाते हैं तो नई कोंपलें उनका स्थान ले लेती है। एक पीढ़ी जाती है तो दूसरी आ जाती है। सृष्टि का यह क्रम निर्बाध गति से चला करता है।
कर्म का चक्र भी इसी तरह चला करता है, हमारे जाने अनजाने! हम बच्चे से बड़े हो गए, बूढ़े हो गए, इसमें हमारा कोई योगदान नहीं, सांस लेने छोड़ने में हमारा कोई प्रयत्न नहीं होता। हम सोते नहीं, हमें नींद आ जाती है। प्यास लगती है तो हम पानी पीते हैं, भूख लगती है तो कुछ खा लेते हैं। भूख, प्यास, नींद हमसे कर्म करवा लेती है। इसी तरह बुद्धि, ज्ञान और विवेक हमसे अच्छे बुरे कर्म भी करवा लिया करता है। हम अकर्ता नहीं रह सकते।।
खाली दिमाग को शैतान का घर कहा गया है। व्यवसाय अथवा अध्यवसाय हमे व्यस्त, सक्रिय और सृजनरत रखता है। मनोयोग से किया कर्म फलीभूत होता है, अधूरे मन से काम करने से उत्साह और उमंग की जगह, जीवन में निराशा घर कर जाती है। कर्म के प्रति निष्ठा और लगन ही जीवन को नई दिशा देती है।
नशा बुरी चीज है। काम का नशा बुरा नहीं। बस काम बुरा नहीं होना चाहिए। अच्छे बुरे को केवल हानि लाभ से नहीं तौला जा सकता। सबके हित में किया गया कर्म ही सत्कर्म कहलाता है। मिलाओ हाथ, चलो, दोनों साथ साथ कामकाज का श्रीगणेश करें। चीयर्स!
© श्री प्रदीप शर्मा
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