श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “साहित्य और समाज…“।)

?अभी अभी # ११११ ⇒ आलेख – साहित्य और समाज ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

साहित्य, साहित्य है और समाज समाज!  जब से एम बी ए बाज़ार में आए है, सोशल वर्क में स्नातकोत्तरों की भरमार हो गई है। मानव संसाधन भी कम पीछे नहीं!  सब मिल-जुलकर समाज सेवा कर रहे हैं। कुकुरमुत्तों की तरह उग आए एन जी ओ और राजनेता मिल-जुलकर समाज सेवा कर ही रहे हैं। इसी कारण हमारा समाज आज इतना उन्नत और सभ्य हो चला है।

साहित्य समाज का दर्पण है!

कभी-कभी दर्पण को भी झाड़ना-पोंछना पड़ता है। आखिर साहित्य है क्या, यह पूछो तो लोग हिंदी साहित्य का इतिहास उठा लेते हैं। कुछ हजारीप्रसाद और महावीरप्रसाद की ओर देखने लगते हैं। भारतेन्दु से नज़रें हटती हैं, तो प्रेमचंद और प्रसाद में साहित्य ढूंढने लगते हैं।।

आम तौर पर जो किताबों में छपा है, वह ही साहित्य कहलाता है!  फिर आप चाहे उसे कहानी, कविता, उपन्यास, समीक्षा, आलोचना, कुछ भी नाम दे दें। जो व्यक्त है, प्रकाशित है, वही साहित्य है। जो अभी व्यक्त नहीं हुआ, अभिव्यक्त नहीं हुआ, पत्रिकाओं अथवा पुस्तकों में प्रकाशित नहीं हुआ वह साहित्य कैसे कहलाया जा सकता है।

बहुत कुछ है समाज में, जो निरंतर घटित हो रहा है, जो व्यक्त भी है, अव्यक्त भी!  समाज में, व्यक्ति में, घुटन भी है, जो कभी व्यक्त हो पाती है, कभी अंदर ही दबी रह जाती है। अभिव्यक्ति मौन भी होती है, मुखर भी। यह वो अभिव्यक्ति है जो अभी कलमबद्ध नहीं हुई है। आप चाहें तो इसे सुप्त-साहित्य भी कह सकते हैं।।

कुछ विरले रेणु, बाबा नागार्जुन और धूमिल हुए हैं, जिन्होंने इस परती की कथा को कलमबद्ध किया है, अपनी कविताओं की कड़ी में पिरोया है। एक सच्चा देवेंद्र सत्यार्थी था, जो झोला उठाकर चला था, धरती के इस अंचल के लोक-गीत समेटने। आज एक और सत्यार्थी है, जो बाल श्रमिकों की दबी समस्या को पूरे जग में उजागर कर रहा है। उस विनोबा को भी हम भूल गए, जिसने कभी भूदान आंदोलन चलाया था। डाकुओं का हृदय परिवर्तन करने का बीड़ा एक जयप्रकाश ने उठाया।

लेकिन वह सब इतिहास में दफन हो गया।

आज साहित्य अपनी चाल चल रहा है, और समाज अपनी। आज के समाज सुधारक दर्पण में झांकना ही नहीं चाहते। आज जयप्रकाश जैसा कोई राजनेता नहीं, जो नक्सलियों का आत्म-समर्पण करा सके। जिन डाकुओं ने आत्म-समर्पण किया, उनकी भी हँसी उड़ाई गई। लेकिन सच तो यह है कि गब्बर सिर्फ़ शोले में कैद होकर रह गया है। आज हमने उसे नक्सल नाम दे दिया है।।

हम प्रेमचंद की कहानियों को पसंद कर सकते हैं लेकिन उसके विचारों को नहीं। क्योंकि विचारों की क्रांति को तो हमने कब से तिलांजलि दे दी है। आज की सियासत को वही साहित्य मान्य है जो सहिष्णु हो, सकारात्मक हो, समाज को जोड़ता हो।

आइए, नये साहित्य की रचना करें, जो उत्सव-प्रिय हो। हमारे दर्शन और संस्कृति को प्रतिबिम्बित, परिभाषित करता हो। हमने उसे नया नाम भी दिया है, लिटरेरी फेस्टिवल। हम चाहते हैं, यह लोकल नहीं, ग्लोबल हो। फिर से समाज और साहित्य हाथ में हाथ बाँधे, साथ-साथ चले। क्या आप हमारे साथ हैं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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