श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सेवा …“।)
अभी अभी # ८९१ ⇒ आलेख – सेवा
श्री प्रदीप शर्मा
- Service •
प्रेम में अगर ढाई अक्षर हैं, तो सेवा में तो सिर्फ दो ही अक्षर हैं। प्रेम का पाठ पढ़कर अगर कोई पंडित हो सकता है तो सेवा करने से उसे मेवा भी मिल सकता है। पोथी पढ़ पढ़कर अगर कोई पंडितजी बन जाए और ढाई आखर की डिग्री ले आए, तो वह शासकीय सेवा में लग जाए और प्रेम से मेवा खाए। A, B, C, D, E, F, G, क्लास में बैठे पंडित जी।
आओ प्यार करें, तो बहुत सुना है, आओ सेवा करें, कोई नहीं कहता। इसका तो यही मतलब हुआ कि जितना आसान प्यार है, उतनी ही कठिन सेवा है। अगर भक्तों ने प्यार ही पूजा है, का उदघोष किया, तो किसी ने काम ही पूजा है (work is worship) का नारा भी दे दिया। हमारे योगेश्वर कृष्ण ने अगर अपनी बाल लीलाओं में प्रेम का सन्देश दिया तो कुरुक्षेत्र में निष्काम कर्म का ज्ञान भी दिया।।
अगर कर्म को ईश्वर की सेवा समझकर किया जाए, तो वह निष्काम हो जाता है। सेवा के भाव में, नि:स्वार्थ भाव निहित है।
अगर आप प्रेम से कहीं शासकीय सेवा कर रहे हो, तो आप दोनों काम कर रहे हैं, प्रेम का प्रेम और सेवा की सेवा और ऊपर से तन की सेवा के लिए वेतन रूपी मेवा भी।
सेवा शब्द बड़ा व्यापक है। सेवा को अंग्रेजी में सर्विस भी कहते हैं। नौकरी चाकरी अगर मजबूरी का शब्द है तो सेवक एक सम्मानसूचक उद्बोधन है। अंग्रेजी में जो सेवा करते हैं, उन्हें सर्वेंट कहते हैं। जो अधिकारपूर्वक सेवा करते हैं, वे सिविल सर्वेंट कहलाते हैं। हमने उन्हें राजपत्रित अधिकारी के पद पर सुशोभित कर दिया।।
जो ईश्वर की सेवा करते हैं, वे दास भी कहलाते हैं। कल ही एक ईश्वर के सेवक, सुर के सेवक, येशुदास का जन्मदिन था। अगर एक दास हो तो ठीक, भक्ति काल में तो सूरदास, तुलसीदास, रैदास, हरिदास, कुंभनदास के अलावा कई अष्ट छाप के कवि अपने इष्ट के दास थे। आज भी आपको घर घर असंख्य मात्रा में रामदास, कृष्णदास, रामस्वरूप और भगवानदास जैसे दास नजर आ जाएंगे।
अजी साहब, दास की तो बस पूछिए ही मत। हमारा दासबोध तो देखिए, हमने दासप्रथा ही अपना ली थी। सब मालिकों, जमींदारों, जागीरदारों के अपने अपने दास थे। राजा महाराजा हों और उनकी दास दासियां ना हो, असंभव। हमारे मंदिरों का भी जवाब नहीं।
दासी तो ठीक, देवदासी तक हमारे मंदिरों की शोभा बढ़ाती थी।।
आज अगर आप कहीं सर्विस करते हैं तो ईमानदारी से काम करते हैं, पसीना बहाते हैं, सुबह से शाम तक मेहनत करते हैं, लेकिन अपना स्वाभिमान गिरवी नहीं रखते। आप नौकरी ही करते हैं किसी की चाकरी नहीं। आजकल मुफ्त की तनख्वाह वैसे भी कौन देता है। हम कोई विधायक, सांसद, नेता, अथवा मंत्री जैसे सेवक तो हैं नहीं।
ये भक्त भी बड़े अजीब होते हैं। कोई रामभक्त हनुमान राम काज को आतुर, तो कोई मीरा अरज लगाती है, श्याम मोहे चाकर राखो जी। कोई भक्त है, कोई दास है, कोई सेवक तो कोई चाकर है। अगर आप ढूंढेंगे तो शायद किंकर भी मिल जाए। लेकिन मुफ्त में कौन आजकल without any cause कामकाज करता है, और किसी की चाकरी, तो कतई नहीं। वैसे भी किसी नेता की चाकरी भी, नसीब वाले को ही मिलती है।।
आजकल मुफ्त सेवाओं पर प्रतिबंध है। सभी सेवाएं सशुल्क हैं। जो कभी सेवा शुल्क था, आज वही जीएसटी कहलाता है। आज के युग में हर सेवा एक सुविधा है। अगर कहीं किसी सेवा सुविधा में त्रुटि है तो कंज्यूमर फोरम, यानी उपभोक्ता समिति भी है।
हर सुविधा भोगी एक उपभोक्ता है। आजकल तो 4 जी और 5 जी सुविधा भी उपलब्ध है। आप बस, सेवा का अवसर दें।
सेवा से पैसा ही नहीं, पुण्य भी कमाया जा सकता है।
सोचो साथ क्या जाएगा, अगर आपके पास पैसा है तो दीन दुखी, दिव्यांगो की सेवा ही कर दें, दान, चंदा, ही नहीं आप स्वयं भी सेवा कार्य में अपने आपको समर्पित कर सकते हैं।
शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो, जिसमें निःस्वार्थ सेवकों की कमी हो।।
छोटा मुंह बड़ी बात, समाज सेवा से बड़ी कोई निःस्वार्थ सेवा नहीं। सेवक बनें, देशसेवक बनें, स्वयंसेवक बनें। हमारी अगर बोली कभी फल जाए तो हम तो यह भी कह गुजरें, आप देश के प्रधान सेवक बन जाएं, कांटों का ताज आपके सर पर हो, लेकिन फिर भी आप तन, मन और धन से देशवासियों की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दें।
शुरुआत आज से ही करें।
बस बिना किसी लोभ लालच के सेवा में जुट जाएं। विकास की चकाचौंध में आज भी कई ऐसे घर हैं, जहां अंधेरा है, कहीं अशिक्षा का, तो कहीं गरीबी और मुफलिसी का।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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