डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – विजयादशमी और भारतीय जीवन- दर्शन: बाह्य विजय से आत्मविजय।)

☆ आलेख – विजयादशमी और भारतीय जीवन- दर्शन: बाह्य विजय से आत्मविजय ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

भारतीय संस्कृति में पर्व जीवन-मूल्यों, नैतिक आदर्शों और आध्यात्मिक चेतना को सम्प्रेषित करने वाले सांस्कृतिक माध्यम होते हैं। यहाँ की पर्व परम्परा में प्रकृति, धर्म, लोकजीवन,आध्यात्मिक और सामाजिकता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। विजयादशमी, दशहरा एक ऐसा महत्वपूर्ण पर्व है,जिसके केन्द्र में विजय की अवधारणा निहित है। विजया अर्थात् विजय और दशमी अर्थात् शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि। यह तिथि भारतीय मानस में उस क्षण का प्रतीक बन गई है जब धर्म, अधर्म पर, सत्य,असत्य पर और सद्गुण, दुर्गुण पर विजय प्राप्त करता है। रामकथा की परम्परा में यह दिवस एक ओर श्रीराम की रावण पर विजय से सम्बद्ध है तो दूसरी ओर शक्ति परम्परा में नवरात्र के पश्चात् देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय को भी इसी व्यापक विजय की अवधारणा से जोड़ा जाता है। इस प्रकार विजयादशमी भारतीय धार्मिक चेतना में पुरुषार्थ और शक्ति दोनों के विजय-पक्ष को अभिव्यक्त करती है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या विजय का अर्थ केवल बाहरी शत्रु को परास्त करना है? भारतीय दर्शन में इसका उत्तर है कि मनुष्य यदि संसार को जीत ले, पर स्वयं के मन, वासनाओं और अहंकार पर नियंत्रण न रख सके तो उसकी बाहरी विजय अधूरी है। इसी कारण भारतीय जीवन-दर्शन में आत्मसंयम,आत्मनिरीक्षण और आत्मविजय को अत्यधिक महत्व दिया गया है। मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष बाहर की दुनिया से पहले अपने भीतर चलता है। मनुष्य के निर्णय,व्यवहार और सम्बन्धों को प्रभावित करने वाली शक्तियाँ उसके अंतर्मन में ही स्थित होतीं हैं,इसलिए भारतीय दर्शन में स्व को समझना और नियंत्रित करना विजय की उच्चतर अवस्था है।

राम की रावण पर विजय को केवल दो राजाओं के बीच युद्ध के परिणाम के रूप में देखना,इस कथा की सांस्कृतिक अर्थवत्ता को सीमित कर देता है। राम और रावण भारतीय मानस में दो जीवन दृष्टियों के प्रतीक भी हैं। रावण अत्यन्त  विद्वान,शक्तिशाली और सामर्थ्यवान था किन्तु उसका ज्ञान उसके अहंकार पर नियंत्रण नहीं रख सका। उसके पास शक्ति थी लेकिन शक्ति के साथ संयम का अभाव था, वहीं पर राम के चरित्र में शक्ति के साथ मर्यादा जुड़ी हुई है। यही कारण है कि उनको मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया। राम की विजय इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि शक्ति का मूल्य तभी है जब वह धर्म और लोककल्याण से जुड़ी हो। इस संदर्भ में राम की विजय केवल रावण वध नहीं अपितु मर्यादा की पुनर्स्थापना है। दशहरा के अवसर पर रावण का विशाल पुतला दहन का उद्देश्य किसी व्यक्ति या समुदाय के प्रति घृणा पैदा करना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ मनुष्य के भीतर मौजूद अवांछित प्रवृत्तियों का दहन है। रावण के दस सिरों को परम्परागत रूप से विभिन्न मानवीय विकारों के प्रतीक रूप में देखा गया है। यदि मनुष्य हर वर्ष रावण का पुतला जलाए  लेकिन काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर आदि बढ़ते जाएँ तो उत्सव का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। विदित हो कि बाहरी विजय प्राय: परिस्थितियों, संसाधनों और दूसरों पर प्रभाव से सम्बन्धित होती है। आत्मविजय मनुष्य के चरित्र और चेतना से सम्बन्धित है। बाहरी विजय के लिए सेना, साधन,रणनीति और शक्ति की आवश्यकता हो सकती है लेकिन आत्मविजय के लिए विवेक, धैर्य, आत्मानुशासन और आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता होती है।

आत्मविजय का अर्थ इच्छाओं का पूर्ण निषेध नहीं है। इसका अर्थ इच्छाओं, भावनाओं और प्रवृत्तियों को विवेकपूर्ण दिशा देना है। क्रोध मनुष्य में स्वाभाविक भाव है लेकिन क्रोध के नियंत्रण का अभाव हिंसा का कारण बन सकता है। इच्छा स्वाभाविक है किन्तु अनियंत्रित लोभ शोषण को जन्म दे सकता है। आत्मसम्मान आवश्यक है लेकिन अहंकार सम्बन्धों को नष्ट कर सकता है, इसलिए आत्मसंयम व्यक्ति को भावनाओं से मुक्त नहीं करता, वह उसे भावनाओं का विवेकपूर्ण नियंता बनाता है, यही आत्मविजय का सार है। अहंकार आत्मविजय का सबसे बड़ा अवरोध है। रावण की कथा का सबसे प्रमुख नैतिक पक्ष उसका अहंकार है। उसका पतन केवल बाहरी युद्ध में नहीं हुआ,उसके पतन की प्रक्रिया उसके अहंकार से प्रारम्भ हुई। अहंकार व्यक्ति को अपनी सीमाओं से अनभिज्ञ कर देता है। वह सलाह सुनना बन्द कर देता है,अपनी भूल स्वीकार नहीं करता और दूसरों के अधिकारों की उपेक्षा करने लगता है। आधुनिक जीवन में यही अहंकार- पद, ज्ञान,धन, सामाजिक प्रतिष्ठा, तकनीकी क्षमता आदि अनेक रूपों में दिखाई देती है, इसलिए रावण आज भी हम सभी के लिए प्रासंगिक है। रावण बाहर कहीं खड़ा हुआ पुतला ही नहीं , वह हमारे भीतर उत्पन्न होने वाली वह प्रवृत्ति है,जो हमें विश्वास दिलाती है कि हम कभी गलत नहीं हो सकते। समकालीन समाज में रावण के प्रतीक को भ्रष्ट आचरण,हिंसा, लोभ, छल, पर्यावरण के प्रति उदासीनता, सामाजिक भेदभाव, पारिवारिक विघटन आदि अनेक सामाजिक विकृतियों से जोड़ा जा सकता है। समाज में संघर्ष का सबसे बड़ा कारण मैं और मेरा की प्रधानता है। जब व्यक्ति अपनी पहचान, विचार अथवा हित को ही अंतिम सत्य मानने लगता है तब संवाद कठिन हो जाता है। आत्मविजय व्यक्ति को अपनी सीमाओं को स्वीकार करना सिखाती है, वह दूसरों की दृष्टि को समझने की क्षमता विकसित करती है।

विजयादशमी की शक्ति परम्परा में देवी दुर्गा की विजय विशेष महत्व रखती है। महिषासुर पर देवी की विजय को अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध शक्ति की स्थापना के रूप में देखा जाता है। यह परम्परा भारतीय संस्कृति में नारी को केवल करुणा और ममता के रूप में नहीं अपितु शक्ति और प्रतिरोध की चेतना के रूप में प्रस्तुत करती है। दशहरा मनाने की वास्तविक प्रक्रिया उत्सव,प्रतीक और आत्मचिंतन तीन स्तरों पर समझने की आवश्यकता है। यदि उत्सव आत्मचिंतन तक पहुँचता है तभी वह जीवन-दर्शन बनता है, इसलिए विजयादशमी, दशहरा मात्र पुतला दहन का पर्व नहीं होना चाहिए।  इसकी सार्थकता यही है कि यह आत्मपरीक्षण और आत्मपरिष्कार का पर्व बने।

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©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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