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श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एकअतिसुन्दर सार्थक रचना “समस्याओं का बाजार।  इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 11 ☆

☆ समस्याओं का बाजार

मौसम चाहें कोई भी समस्याओं का रोना कभी खत्म नहीं होता। ये एक ऐसा खुला बाजार है जहाँ मॉल  कल्चर का दौर चल रहा है। इसे बिडंवना ही कहेंगे  कि कोई इस बात से परेशान है कि तन कैसे ढका जाए तो वहीं कोई इस बात को लेकर माथापच्ची कर रहा है कि कौन सी ड्रेस पहन कर पार्टी की शान बना जाए।  एक से एक परिधान बाजार में उपलब्ध हैं बस दुकान में जाइये। चेंजिंग रूम तो मानो आपके इंतजार में पलक पाँवड़े बिछा कर बैठा है। आजकल लोग एक ड्रेस भी  ठोक बजा कर लेते हैं। जब 100% पसंद आयी तभी अन्यथा दूसरी दुकान का रास्ता पकड़ लेते हैं। वैसे भी शहर में तरह – तरह के मॉल हैं जहाँ आकर्षक योजनाओं का अंबार लगा हुआ रहता है। कहीं एक के साथ एक फ्री की योजना तो कहीं अच्छी ख़रीददारी पर  डिस्काउंट कूपन, जो अगली खरीददारी में सहायक होगा,  तो कहीं आपके खाते में पॉइंट जुड़ रहे हैं जो भविष्य के लिए हैं। कहते हैं हर दिन एक सा नहीं होता सो पैसे वाले लोग जमकर खरीदारी करते हैं ताकि जब वक्त बदले तो पॉइंट सुरक्षित रहें। एक प्रकार से एफ डी ही समझिए ऐसा मैं नहीं कह रही ये तो मॉल वाली सेल्स गर्ल ने बताया है;  जिसके काउंटर पर सबसे अधिक सेल होती है। हो भी क्यों न उसे मार्केटिंग का सबसे बढ़िया तजुर्बा है, हमेशा मीठी वाणी बोलना, सुंदर ड्रेसअप व आकर्षक व्यक्तित्व की मल्लिका जो ठहरी । मेरी दीदी ने मुझे फोन करके बताया कि उनको “एक बैग पसंद आया जिसकी कीमत 10,000 थी पर सेल्सगर्ल  ने जल्दी- जल्दी मुझे समझाया कि आप तो हमारी नियमित ग्राहक हैं  दिखाइए आपके पास तो बहुत से पॉइंट होंगे, उसने गणना की तो मेरे 8 हजार रुपये के पॉइंट थे बस 2 हजार ही देने पड़े। अब  मेरे तो मानो पंख लग गए इतना सुंदर पर्स मेरे पास वो भी इतनी कम राशि देने के बाद।”

ऐसे ही बहुत से किस्से हैं जब समस्याओं का बाजार अपने चरम पर होता है। अभी तक  ऐसा लगता था मानो ये समस्या केवल कमजोर, पीड़ित, शोषित, दलित व अल्पसंख्यक की वपौती है पर जब गहरायी में झाँका तो समझ में आया कि यहाँ भी आभिजात्य वर्ग का ही कब्जा है। उनके पास तो इतनी समस्याएँ हैं कि उनको न दिन को चैन न रात को आराम। बिना नींद की गोली नींद ही नहीं आती। सूरज बाबा के दर्शन तो मानो दुर्लभ ही हो चुके हैं।  एक बात समझ में नहीं आती कि वैसे ही जीवन में बहुत आपाधापी है इस पर भी हम ऐसी – ऐसी समस्याओं से लड़े जा रहे हैं जहाँ यदि चाहें तो बच सकते हैं। क्या जरूरत है कि आईने में निहार- निहार कर ही ड्रेस ली जाए क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जो आपको आरामदायक हो, देखने में अच्छी हो, और अंग प्रदर्शन पर जोर न देती हो ऐसा चयन किया जाय; क्या जरूरत है इतनी मारा- मारी के बाद भी हम भारतीय संस्कृति को भुलाते हुए पश्चिम सभ्यता की ओर बढ़ें जबकि वे हमारी सनातन संस्कृति से जुड़ रहे हैं।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

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