डॉ राकेश ‘चक्र’
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
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आप “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०८ ☆
☆ राकेश चक्र के स्वास्थ्य सम्बन्धी दोहे … ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆
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जीवनचर्या साध ले, रहना है यदि स्वस्थ।
मनमानी की बावरे, रोग बढ़ें मद मस्त।।
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अलमुनियम के पात्र में, जो भी भोज पकायं।
रोग बढ़ें तन बावरे, मूरख समझ न पायं।।
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सूर्योदय की धूप में, ले तू मित्र नहाय।
दही, पनीर, सब तेल से, अस्थि सबल हो जाय।।
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नर्व टॉनिक बी ट्वेल्व है, भोग अंकुरित अन्न।
पालक, सेव , अनार में, मिलें विटामिन टन्न।।
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चीनी, नमक, रिफाइंड से, रह ले प्यारे दूर।
यदि ना चेता बाबरे, आएँ रोग हुजूर।।
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रक्त चाप उनका बढ़े, करें कपट, मद, क्रोध।
वाणी मधु रख बावरे, जीवन बने सुबोध।।
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योग, ध्यान नियमित करो, तन-मन निर्मल होय।
सोए पैर पसार के, नहीं चैन भी खोय।।
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आपाधापी जो करें, रक्त चाप बढ़ जाय।
हार्ट फेल हो बावरे, जीवन कब बच पाय।।
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सोच समझ कर भोज कर, अल्ल-मल्ल मत खाय।
भूख लगे पर खाए नित, जीवन भर मुस्काय।।
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अति करता जो बावरे, ‘चक्र‘ सदा पछताय।
जिह्वा, मन को साध ले, जीवन भर सुख पाय।।
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घूँट-घूँट कर नीर पी, घूँट-घूँट कर दूध।
चबा-चबा कर भोज कर, बढ़े पेट ना गूद।।
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समय सोय से जाग ले, रहना है यदि स्वस्थ।
योग, सैर कर बावरे, यही मंत्र है मस्त।।
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मोबाईल, टीवी का, जो करते दुरुपयोग।
जो भी देखें लेट के, भोगें फिर दुर्योग।।
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रात रतजगा जो करें, रहते हैं अस्वस्थ।
मोबाइल में डूबकर, करें स्वयं को त्रस्त।।
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सब कुछ अति का हो रहा, गर्मी हो या शीत।
मोबाइल में डूबकर, खत्म हो रही प्रीति।।
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© डॉ राकेश चक्र
(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)
90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र. मो. 9456201857
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






