श्री यशोवर्धन पाठक

☆ संस्मरण ☆

☆ शिक्षा जगत के एक प्रेरक व्यक्तित्व – प्रतिष्ठित शिक्षाविद श्रद्धेय स्व. रामचन्द्र जी तिवारी ☆ श्री यशोवर्धन पाठक  ☆

(पुण्य तिथि पर शत शत नमन)

☆

आगे बढ़ते चलो, सफलता पीछे आयेगी,

कर्म करो वह आकर तुम्हें स्वयं रिझायेगी।

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि श्री श्रीकृष्ण सरल की उपरोक्त काव्य पंक्तियों की सार्थकता सिद्ध करने वाले संस्कारधानी के प्रतिष्ठित शिक्षाविद श्रद्धेय स्व. रामचन्द्र जी तिवारी के प्रेरक व्यक्तित्व के विषय में आज जब मैं अपने शब्दों के माध्यम से श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहा हूं तो मेरे मानस पटल पर तिवारी जी की शिक्षकीय कार्यकाल की वे सारी स्मृतियां जीवंत हो उठी हैं जो मेरे स्मृति कोष में एक अमूल्य धरोहर बन गई हैं। और बात शिक्षकीय जीवन की हो या फिर हमारे पारिवारिक जीवन की, आदरणीय तिवारी जी इस सुदीर्घ यात्रा में वे हमेशा मेरा संबल बने रहे।

केसरवानी कालेज जबलपुर में बी.एड. के अध्ययन काल में वे मेरे गुरु थे और पारिवारिक संबंधों के अंतर्गत मैं उन्हें चाचा जी कहकर संबोधित करता और अपने को गौरवान्वित महसूस करता। इस प्रकार दोनों ही स्थितियों में मुझे हमेशा संरक्षक, दिशा दर्शक और मार्गदर्शक के रुप में अपने सिर पर उनका वरदहस्त होने का अहसास होता रहा। कालेज के छात्रों के साथ भी उनके संबंध अत्यंत आत्मीय हुआ करते। कक्षा में अगर वे छात्रों के लिए गुरु की भूमिका में होते तो कक्षा के बाहर अभिभावक के रुप में अपने दायित्वों का निर्वाह भी करते। वे अपने छात्रों के बीच एक लोकप्रिय शिक्षक के रुप में प्रतिष्ठित थे। वे अपने छात्रों को सदा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते। उन्होंने न तो कभी अपने छात्रों को रुकने दिया और नहीं थकने दिया।

मेरा नज़रिया है कि वे व्यक्ति अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं जिन्हें विरासत में उन्हीं शैक्षणिक संस्थानों में अध्ययन करने का अवसर मिलता है जहां पर कि उनके अभिभावकों ने शिक्षा अर्जित की होती है। श्री रामचन्द्र जी तिवारी के यशस्वी सुपुत्रों को ये सौभाग्य मिला था कि उन्होंने जबलपुर की उस गौरवशाली शैक्षणिक संस्था माडल हाई स्कूल जबलपुर में अध्ययन किया जहां पर कि उनके पूज्य पिता ने भी अपनी शालेय शिक्षा पूर्ण की थी। माडल हाई स्कूल में उस समय प्रवेश पाना और पढ़ाई करना अत्यंत सम्मान की बात होती थी।

श्री रामचन्द्र जी तिवारी ने अपनी शालेय शिक्षा माडल हाई स्कूल से प्राप्त करने के बाद महाविद्यालयीन शिक्षा अपने समय के प्रतिष्ठित काले रार्बटसन से पूर्ण की। उन्होंने आर्थिक उपार्जन का माध्यम भी शिक्षकीय क्षेत्र को ही चुना और जबलपुर की एक.पी.नर्मदा हायर सेकेण्डरी स्कूल में सफलता पूर्वक एक अध्यापक के दायित्वों का निर्वाह किया। इसी दौरान तिवारी जी ने जबलपुर के कृषि महाविद्यालय में भी सक्रियता पूर्वक अपनी सेवाएं दीं और बाद में केसरवानी महाविद्यालय में प्रतिष्ठा पूर्वक शिक्षण कार्य किया और केसरवानी महाविद्यालय से ही सेवा निवृत्त भी हुए। यह उल्लेखनीय है कि तिवारी जी शैक्षणिक क्षेत्र के लिए इतने समर्पित थे कि उन्होंने आमगांव में एक हाई स्कूल की भी स्थापना की थी और बाद में यह स्कूल राज्य शासन को समर्पित कर दिया गया।

एक शिक्षक के रुप में श्री तिवारी जी का यह भी सोचना था कि छात्रों के मानसिक, बौद्धिक और शैक्षणिक विकास के साथ ही उनका शारीरिक विकास होना भी आवश्यक है और इसी सोच के अनुसार खेलकूद की गतिविधियों के अंतर्गत उनके मार्गदर्शन में JELCO की प्रतियोगिता की शुरुआत की गई। ये प्रतियोगिता JEAA जैसी थी। स्मरणीय है कि अपने अध्यापन काल के दौरान श्री रामचन्द्र जी तिवारी ने हिन्दी व्याकरण और इतिहास की भी पुस्तकों का लेखन और प्रकाशन किया जो कि पाठ्य पुस्तक के रुप में शैक्षणिक जगत में छात्रों के लिए अत्यंत उपयोगी और ज्ञानवर्धक सिद्ध हुई। श्री तिवारी जी की साहित्यिक गतिविधियों में भी सक्रिय भागीदारी थी। एक साहित्य साधक के रूप में विभिन्न शैक्षणिक और साहित्यिक संस्थाओं के साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों में भी उनका मार्गदर्शन और योगदान महत्वपूर्ण माना जाता था। शिक्षा जगत के लिए समर्पित और सक्रिय श्री रामचन्द्र जी तिवारी का जन्म दिनांक 25 जून 1923 को और स्वर्गवास दिनांक 18अक्टूबर 1923 को हुआ। समाज में ऐसे कम लोग ही होते हैं जो उद्देश्य पूर्ण जीवन का निर्वाह करते हुए सार्थक और सफल जीवन का एक ऐसा उदाहरण बन जाते हैं जिनसे हम आजीवन प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं और श्रद्धेय श्री रामचन्द्र जी तिवारी ऐसे ही कीर्ति पुरुष थे जिनके लिए किसी कवि की ये पंक्तियां पूरी तरह चरितार्थ होती हैं –

आदमी के, प्यार के, संघर्ष के जो गीत गाए,

जियेंगी सदियां उन्हें दिन रात छाती से ‌लगाए।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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