श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

☆ कविता – मुसाफ़िर ☆

☆

मैं मुसाफ़िर तू मुसाफ़िर, रास्ते अनजान हैं

आदमी हूँ आदमी की, बस यही पहचान है

* 

आदमी बनकर रहा जो, जिंदगी में खुश रहा

सारे मज़हब के दिवाने, मिट्टी के मेहमान हैं

 *

क्यों बखेडा कर रहे हो, घर के अंदर में यहाँ

भारती है माँ हमारी, उस की हम संतान हैं

 *

माँ के टुकडे करने वाले, देश के गद्दार तुम

आरती का बन चुके हम, बस तेरे सामान है

 *

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सब सिपाही हैं यहाँ

देश पे कुर्बान हो तुम, तुम पे हम कुर्बान हैं

 *

उन शहिदों को पुछो, देश पर जो मिट गये

धर्म से बढकर तिरंगा, इस वतन की शान है

 *

आवो मेहनत को बनाएं, एक इज्जत का निशाँ

मुफ्त की रोटी पे पलते, कुछ यहाँ नादान हैं

☆

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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