श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “धूप का किला” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १४७ ☆
☆ धूप का किला ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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पानी रे पानी रे
चोंच नहीं डूबी चिड़िया की
कितना उथला पानी रे।
बह गया पसीना
काया तो गीली तक
हुई नहीं
बादल ने धरती की
छाया भी अभी तलक
छुई नहीं
छानी रे छानी रे
खपरैलों से झरती,गढ़ती
धूप का क़िला छानी रे।
मारती है चाँटा
रेत नदिया के गालों पर
टँगते हैं कलश
भरें अब तक शिवालों पर
धानी रे धानी रे
चाहती है धरती की देह
चूनर उजली धानी रे
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
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