डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’
(पूर्णिका’ के जनक साहित्याचार्य एडवोकेट डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’)
☆ आलेख – पूर्णिका की परिभाषा… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆
(ई-अभिव्यक्ति में प्रस्तुत “पूर्णिका की परिभाषा” पूर्णिका के जनक डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ द्वारा प्रस्तुत मौलिक परिभाषा है. यह पढ़कर उत्सुकतावश मुझे लगा कि आखिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (A I) इस सन्दर्भ में क्या कहता है? तो लीजिये आप स्वयं ही पढ़ लीजिये –
“पूर्णिका हिंदी साहित्य की एक आधुनिक काव्य विधा है, जिसमें न्यूनतम पांच नेह (पंक्तियों के छोटे-छोटे खंड) से अधिकतम बीस नेह तक भावपूर्ण रचना की जाती है। यह स्वतंत्र रूप में पूर्ण अनुभूति प्रस्तुत करती है।
परिभाषा
पूर्णिका को डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ द्वारा शोधित माना जाता है, जो न्यूनतम 5 से 20 नेह तक सजी काव्य रचना है। इसमें छंदबद्ध या मुक्तक शैली में भाव, रस और अलंकारों का समावेश होता है, जो स्वयं में पूर्ण होती है। यह मुक्तक काव्य से प्रेरित है, किंतु विशिष्ट नेह संरचना पर आधारित।
इतिहास
पूर्णिका का प्रारंभिक शोध जबलपुर, मध्य प्रदेश के डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ने किया। आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने इसे विश्ववाणी हिंदी की लोक हितैषी काव्य भंगिमा कहा। यह हालिया विधा है, जो 21वीं सदी में हिंदी साहित्य में लोकप्रिय हो रही है, विशेषकर दोहा, मुक्तक और ग़ज़ल जैसी विधाओं को समाहित कर।”
उपरोक्त जानकारी AI tool – Perplexity द्वारा प्रस्तुत की गई है.
– हेमन्त बावनकर, सम्पादक – ई-अभिव्यक्ति, पुणे
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पूर्णिका पांच नेह से लेकर बीस नेह तक में सजा कर कही जाए, पहली नेह को प्रारम्भी, अंतिम नेह को परचयी कहा जाए।
दो सुधि ( पंक्ति ) को मिला कर नेह रची जाए, ऊपर की पंक्ति अर्थात नेह की पहली पंक्ति को पूर्ण सुधि और नेह की – दूसरी पंक्ति को संपूर्ण सुधि कहा जाए। संपूर्ण सुधि के अंत में परिवर्तनीय और स्थानीय लगाकर लिखी जाए और जब किसी नेह की संपूर्ण सुधि में अंत में स्थानीय की जगह परिवर्तनी हो, तब इसे स्थानीय विहीन पूर्णिका कहा जाए। जब पूर्णिका के एक या दो नेह पढ़े जाएं तो उसे पूर्णिकांश कहा जाए। यथा नेह में मात्रा का विशेष ध्यान रखे बिना, बिना अटके बोलकर, गाकर पढ़ी जा सके यही सही पूर्णिका होगी।
पूर्णिका दुनिया के हर क्षेत्र, हर विषय, हर प्राणी, हर भाव-भाषा को विषय बना कर कही / लिखी जा सकती है।
अर्थात पूर्णिका कहने/ लिखने के लिए पूर्णिका – कार कोई भी विषय चुन सकते हैं ।।
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© डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’
पूर्णिका जनक, साहित्याचार्य एडवोकेट
संपर्क – 2451, आदर्श भवन, अनुराग मार्ग, गांधीनगर, न्यू कंचनपुर, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.) पिन – 482004
मो. – 9302189724, 09300128144, ई-मेल: salapnathyadav@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






आदरणीय पूर्णिका जनक डॉ सलपनाथ यादव प्रेम भाई जी आपको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 🙏