डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ अकेले आंगन का बचपन: एकल परिवारों में परवरिश का बदलता सच ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

अकेले आंगन का बचपन: एकल परिवारों में परवरिश का बदलता सच

संयुक्त परिवारों के सुरक्षा कवच से डिजिटल स्क्रीन तक: न्यूक्लियर पेरेंटिंग की चुनौतियाँ और समाधान

 

“दादी, आप हमारे साथ क्यों नहीं रहतीं?”

सात साल की नन्ही अन्वी ने वीडियो कॉल पर पूछा।

दादी मुस्कुराईं, लेकिन उनकी आँखों में हल्की नमी उतर आई।

“बेटा, तुम्हारे पापा का काम दूसरे शहर में है न।”

“अगर आप यहाँ होतीं तो कितना अच्छा होता। मम्मी ऑफिस जाती हैं, पापा भी व्यस्त रहते हैं। मैं स्कूल से आकर कभी-कभी अकेली हो जाती हूँ।”

दादी कुछ क्षण चुप रहीं।

फिर बोलीं, “जब तुम्हारे पापा छोटे थे तो घर में इतने लोग होते थे कि उन्हें अकेले रहने का मौका ही नहीं मिलता था।”

अन्वी ने मासूमियत से पूछा, “सच?”

“हाँ बेटा, तब घर में दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन सब साथ रहते थे।”

कॉल समाप्त हो गई, लेकिन यह छोटी-सी बातचीत आज के समय की एक बड़ी सच्चाई को सामने लाती है।

हमारे घर बड़े होते जा रहे हैं, लेकिन परिवार छोटे होते जा रहे हैं।

सुविधाएँ बढ़ रही हैं, लेकिन साथ घट रहा है।

 

और शायद सबसे बड़ा बदलाव बच्चों के बचपन में दिखाई दे रहा है।

एक समय था जब बच्चे केवल माता-पिता के नहीं, पूरे परिवार के होते थे। उनकी शरारतों पर दादी हँसती थीं, गलतियों पर चाचा समझाते थे और उदासी के समय कोई न कोई उनका हाथ थाम लेता था।

 

सच ही कहा गया है –

“एक बच्चे को बड़ा करने के लिए पूरे गाँव की जरूरत होती है।”

लेकिन आज अधिकांश परिवार न्यूक्लियर हो चुके हैं। माता-पिता और बच्चे – बस यही परिवार की परिभाषा रह गई है।

इस बदलाव ने अनेक सुविधाएँ दी हैं।

 

माता-पिता अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से ले सकते हैं। बच्चों की शिक्षा, खान-पान और जीवनशैली को अपनी सोच के अनुसार आकार दे सकते हैं। पारिवारिक हस्तक्षेप कम होता है और निजी स्वतंत्रता अधिक मिलती है।

 

लेकिन हर सुविधा की एक कीमत भी होती है।

न्यूक्लियर परिवारों की सबसे बड़ी चुनौती है – अकेलापन।

बच्चों का भी और माता-पिता का भी।

 

आज का बच्चा स्कूल से लौटकर अक्सर खाली घर में प्रवेश करता है। उसके स्वागत में दादी की आवाज़ नहीं होती, न चाचा की हँसी और न ही भाई-बहनों की भीड़।

ऐसे में उसके सबसे आसान साथी बन जाते हैं – मोबाइल, टैबलेट और टेलीविजन। धीरे-धीरे स्क्रीन नया परिवार बन जाती है।

यहीं से एक नया संकट जन्म लेता है।

डिजिटल दुनिया बच्चों का समय तो भर देती है, लेकिन भावनात्मक खालीपन नहीं भर पाती।

सोशल मीडिया दोस्ती का भ्रम दे सकता है, लेकिन कंधे पर रखा हुआ स्नेहिल हाथ नहीं दे सकता।

वीडियो गेम उत्साह दे सकते हैं, लेकिन साझा बचपन की यादें नहीं दे सकते।

 

संयुक्त परिवारों में बच्चे स्वाभाविक रूप से साझा करना सीखते थे। खिलौने भी साझा होते थे और जिम्मेदारियाँ भी। वे अलग-अलग उम्र के लोगों के साथ रहकर धैर्य, संवेदनशीलता और सामाजिक व्यवहार सीखते थे।

 

आज कई बच्चों के पास अपने खिलौने बहुत हैं, लेकिन खेलने वाले साथी कम हैं।

यह केवल बच्चों की समस्या नहीं है।

माता-पिता भी एक अलग संघर्ष से गुजर रहे हैं।

आधुनिक जीवन ने उन्हें अनेक भूमिकाएँ दे दी हैं।

वे कमाने वाले भी हैं, शिक्षक भी, मित्र भी, सलाहकार भी और हर समय उपलब्ध रहने वाले अभिभावक भी।

 

नतीजा यह है कि अनेक माता-पिता मानसिक थकान और तनाव का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञ इसे “पैरेंटल बर्नआउट” कहते हैं। कई बार माता-पिता अपराधबोध से भी घिर जाते हैं।

उन्हें लगता है कि वे बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे।

बच्चों को लगता है कि माता-पिता उन्हें नहीं समझते।

और इस तरह एक ही घर में रहते हुए भी भावनात्मक दूरी बढ़ने लगती है।

लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि संयुक्त परिवार ही एकमात्र समाधान हैं?

शायद नहीं।

 

समय बदल चुका है। हर परिवार संयुक्त परिवार में नहीं रह सकता। लेकिन संयुक्त परिवारों की कुछ खूबियाँ आज भी अपनाई जा सकती हैं।

 

सबसे पहले हमें अपने बच्चों के लिए एक “आधुनिक गाँव” बनाना होगा। ऐसा गाँव जहाँ रिश्तेदार न सही, लेकिन भरोसेमंद लोग हों। दादा-दादी दूर रहते हों तो नियमित संवाद हो। पड़ोसी, शिक्षक, कोच और  परिवार के मित्र भी बच्चे के जीवन का हिस्सा बनें। बच्चों को यह महसूस होना चाहिए कि उनके जीवन में केवल दो नहीं, कई ऐसे लोग हैं जिन पर वे भरोसा कर सकते हैं।

दूसरी बात, परिवार के भीतर गुणवत्तापूर्ण समय बढ़ाना होगा। कई बार बच्चों को घंटों का साथ नहीं चाहिए होता।

 

उन्हें कुछ ऐसे पल चाहिए होते हैं जब माता-पिता पूरी तरह उनके साथ हों।

एक साथ भोजन करना।

दिनभर की बातें सुनना।

सप्ताहांत में पार्क जाना।

रात को सोने से पहले कहानी सुनाना।

 

ये छोटी बातें बच्चों के मन में सुरक्षा का बड़ा भाव पैदा करती हैं।

तीसरी बात, हमें स्क्रीन को बेबीसिटर बनने से रोकना होगा। तकनीक आवश्यक है, लेकिन वह रिश्तों का विकल्प नहीं बन सकती। बच्चों को किताबों, खेलों, संगीत, प्रकृति और वास्तविक अनुभवों से जोड़ना होगा।

 

क्योंकि जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सीखें किसी ऐप से नहीं, अनुभवों से मिलती हैं।

अंततः परवरिश केवल बच्चों को बड़ा करने का नाम नहीं है।

यह उनके भीतर आत्मविश्वास, संवेदनशीलता और जीवन के प्रति भरोसा जगाने की प्रक्रिया है।

संयुक्त परिवारों में यह काम कई हाथ मिलकर करते थे। आज एकल परिवारों में यह जिम्मेदारी कुछ कंधों पर आ गई है।

 

लेकिन यदि हम रिश्तों का दायरा थोड़ा बढ़ा दें, संवाद को थोड़ा गहरा कर दें और बच्चों को स्क्रीन से अधिक इंसानों से जोड़ दें, तो यह चुनौती अवसर में बदल सकती है।

क्योंकि

बच्चे केवल घरों में नहीं पलते। वे रिश्तों में पलते हैं। और जहाँ रिश्तों की गर्माहट होती है, वहाँ अकेला आँगन भी धीरे-धीरे फिर से खिल उठता है।

 

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर

करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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