मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
कविता – ये अजीब इत्तेफाक़ है…
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
दिल के प्याले में
स्याही भरी होती है
यादों में आए उबाल से
छलक कर बाहर निकल आती है
गीले हरुफ़ लिखती हुई
किसी इबारत, किसी तहरीर को
शक्ल देती है
कभी ये हरुफ़ जल्दी सूखते हैं
कभी एक लंबे अरसे को गीले
रह जाते हैं
छूना नहीं इन गीले हरुफ़ों को
रोशनाई फैल कर,
सफ़े को धुंधला कर देगी
ये धुंधलापन सालता रहेगा
कचोटता रहेगा
लिहाज़ा, स्याही के सूखने का इंतज़ार
तो करना ही होगा…!!!!!
© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





