श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दृष्टि और दर्शन…“।)
अभी अभी # १००४ ⇒ आलेख – दृष्टि और दर्शन
श्री प्रदीप शर्मा
∆ SIGHT & VISION ∆
जिस ओर निगाहें जाती हैं,उसके ही दर्शन पाती हैं । आप चाहे इसे आंख कहें,नयन कहें,नेत्र कहें अथवा लोचन,ईश्वर इतना दयालु है कि एक के साथ एक फ्री देता है । वह जानता है,हम अक्सर आंखें चार ही करते हैं ।
अगर हमारे चेहरे पर सिर्फ एक आंख होती तो हम कैसे लगते। छोड़िए दो आंखों को,आप तो बस इतना बताइए,अगर इनमें रोशनी ही नहीं होती,तो ये आँखें किस काम की होती । क्या यह दुनिया,यह महफिल,हमारे किसी काम की रहती । क्या आपने कभी सोचा है,एक जन्म से दृष्टिबाधित व्यक्ति का संसार कैसा होता है।
कैसी है हमारी दृष्टि ! आँखें होते हुए भी कुछ लोग सिर्फ सिर्फ किसी की आंखों में डूब जाना चाहते हैं। उन्हें दुनिया नजर नहीं आती,बस किसी के दो मस्त मस्त नैन ही नजर आते हैं । गोरी तेरे नैना हैं जादू भरे । हम पर जुलम करे । वैसे कुछ हद तक यह सच भी है। तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है ।।
क्या दुनिया वही है,जो हमें अपनी आंखों से दिखाई देती हैं। क्या हम इन दो सीमित आंखों से इतनी बड़ी दुनिया देख सकते हैं। हमारी आंखों का क्या है, जो उसके सामने आता है,वह हमें दिख जाता है ।
हमारे पीठ पीछे क्या चल रहा है,यह तो छोड़िए,आप जिसे देख रहे हैं,उसके मन में क्या चल रहा है,बेचारी आँखें कहां पढ़ पाती हैं ।
हम आंखों से पढ़ पाते हैं,कुछ लोग आंखों से बहुत कुछ पढ़ लेते हैं । आंखों आंखों में बात भी होती है, प्यार भी होता है और नैन लड़ाए जाते हैं तो कभी मटकाए जाते हैं।
अगर सहगल के शब्दों में कहें तो ;
मैं क्या जानूं क्या जादू है
इन दो मतवाले नैनों में,जादू है
मन पूछ रहा है अब मुझसे
नैनों ने कहा है क्या मुझसे
जब नैन मिले,नैनों ने कहा
अब नैन बसेंगे नैनों में ..
क्या सब कुछ हमें आंखों से ही दिखाई देता है !
जब हम किसी को आंखें दिखाते हैं,तब हमारे मन में कुछ और ही चल रहा होता है । जो व्यक्ति हमारे सामने नहीं,हम उसे भी देख लेने की धमकी देने लगते हैं। कई बार हमारी आंखें भी धोखा खा जाती हैं । एक बार कोई इंसान हमारी नजर से गिरा,तो वह फिर हमें फूटी आँखें नहीं सुहाता ।
हम जब रात को सो जाते हैं,तो नींद में भी हम बंद आंखों से सपने देखना शुरू कर देते हैं और तब तक देखते रहते हैं,जब तक हमारी आंख नहीं खुल जाती। सपनों में आंखों का क्या काम ?
हमारी खुली आंखों में भी कभी कभी हमारे सुनहरे भविष्य के सपने तैरने लगते हैं । आप बस आराम से आंख बंद किए पड़े रहिए,आपके विचार आपको ,जहां आप चाहेंगे,वहां पहुंचा देंगे ।जिसे हम thought कहते हैं,उसका विजन बहुत बड़ा है। वह आंखों का नहीं,सिर्फ कल्पना शक्ति और संकल्प का कमाल है ।
लोग मंदिर जाते हैं,खुली आंखों से अपने इष्टदेव का दर्शन करते हैं,पूजा आरती में शामिल होते हैं,प्रसाद ग्रहण करते हैं लेकिन जब कुछ मांगने की बारी आती है तो एक बच्चे की तरह आंख बंद कर लेते हैं,मानो अभी आंख खोलते ही हाथ में टॉफी टपक पड़ेगी । हम बंद आंखों से भगवान से क्या मांग रहे हैं,यह केवल हम ही जानते हैं । क्या आंखें बंद करने से भगवान थोड़े करीब आ जाते हैं। ध्यान में शायद यही होता हो,प्रार्थना में भी शायद यही होता है ।।
एक संसार हमारे भीतर भी है जहां मन की आंखों का साम्राज्य है और यही मन बाहर की दुनिया से एकाकार हो, आस्था,लगन, निष्ठा, परिश्रम और आत्म विश्वास के धरातल पर जीवन को एक ऐसी दिशा देता है जो हमारी मंजिले मकसूद है,जहां हमारी नज़रों के सामने हमें अपने सपने सच होते नज़र आते हैं ।
अंदर बाहर की दृष्टि ही हमारा वास्तविक व्यापक जगत है। हमारी अन्तर्दृष्टि हम पर सदैव नजर रखती है। बाहर की आंखें एक बार धोखा खा जाएं,अंदर की नज़र कभी धोखा नहीं खाती । हमेशा आंखें खुली रखें । जब कभी विराट के दर्शन करना हो,आँखें मूंद लें,अंदर प्रवेश कर जाएं । उजाला ही उजाला,प्रकाश ही प्रकाश। उधर एक आकाश,इधर कई आकाश ।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





