श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “साहब बीवी और श्वान…“।)
अभी अभी # १००८ ⇒ आलेख – साहब बीवी और श्वान
श्री प्रदीप शर्मा
ताश के बावन पत्तों में गुलाम बेगम और बादशाह के अलावा एक जोकर भी होता है जो खेल के अलावा सर्कस में भी अपना महत्व रखता है।
आपने विमल मित्र के उपन्यास पर आधारित, और मीनाकुमारी और गुरुदत्त अभिनीत फिल्म साहब बीवी और गुलाम भी देखी ही होगी। साहब अंग्रेज ने जब कलकत्ते से व्यापार के बहाने हमारे देश में प्रवेश किया था तब वे अपनी मेम साथ में लाए थे। उनकी मेम भी मेम साहब ही कहलाती थी। देश गुलामी से तो आजाद हो गया, लेकिन साहब और मेम साहब हमारी नौकरशाही व्यवस्था में रच बस गए।
साहब का एक दूसरा नाम नौकरशाह भी होता है। नौकरशाह, एक ऐसा साहब होता है, जिसका बिना नौकर के काम नहीं चलता। आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में आप किसी से गुलामी तो नहीं करवा सकते लेकिन अगर कोई मानसिक रूप से गुलाम है तो उसका कोई इलाज नहीं।।
हर व्यक्ति आजकल अपने अधिकारों और दायित्व के प्रति सजग है। गए जमाने नौकरों से बेगार करवाने के। साहब के रिटायर होते ही नौकरशाही का ताना बाना इस तरह बिखर जाता है मानो किसी ने मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ दिया हो। कब तक वाहन, बंगले और ड्राइवर की सुविधा रहेगी। कभी तो बंगला खाली करना पड़ेगा। बेटी बेटे अच्छा हुआ, समय रहते विदेश सेटल हो गए। आजकल तो साहबों की औलादें भी बिगड़ने लगी हैं।
जिस तरह डूबते को तिनके का सहारा होता है, एक सेवानिवृत्त अफसर दंपति को एक अदद श्वान का सहारा होता है। वह बेचारा साहब का आदेश भी सुन लेता है और डांट खाने पर भी पूछ हिलाता रहता है।
साहब का दिल ही जानता है एक मंत्री के आगे उनकी क्या हालत हो जाती थी। आज उन्हें अपने श्वान से सहानुभूति है। एक सेवामुक्त साहब और मेम साहब का अगर कोई अपना है, तो बस यही एक बेजुबान श्वान।।
आज महानगरों के जंगल में ऐसे कई साहब बीवी हैं जिनके बुढ़ापे और अकेलेपन का सहारा सिर्फ एक श्वान है। बुढ़ापे की लाठी आजकल औलाद नहीं, एक वॉकिंग स्टिक ही होती है। एक जानवर वैसे भी इंसान से ज्यादा वफादार होता है। कानून भी आजकल यही कहता है। अगर घर में कोई नौकर रखो तो सावधानी के लिए पहले नजदीक के थाने में उसकी पूरी जानकारी दो।
युवा पीढ़ी हो अथवा कोई वरिष्ठ नागरिक, हर परिवार में कुत्ता पालना एक जरूरत है अथवा फैशन, यह कहना इतना आसान नहीं। हमारी लुप्त होती मानवीय संवेदनाओं की ओर यह स्पष्ट संकेत है। क्या हम इतने आत्म केंद्रित हो गए हैं कि केवल एक मूक प्राणी से ही हमारा संवाद संभव है।
स्वार्थ, राजनीति, राग द्वेष और एकाकीपन भले ही इसके लिए जिम्मेदार हो, लेकिन आर्थिक आधार कतई नहीं। लोग भले ही किसी कुत्ते को मुंह नहीं लगाएं, लेकिन रोज सुबह आगे कुत्ता और पीछे उसकी डोर थामे, उन्हें आसानी से घूमते देखा जा सकता है। एक और बुकर पुरस्कार साहब बीवी और श्वान। अनुवाद जारी है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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