श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शुद्ध घी और चित्त शुद्धि…“।)
अभी अभी # १०१० ⇒ आलेख – शुद्ध घी और चित्त शुद्धि
श्री प्रदीप शर्मा
क्या शुद्ध घी और शुद्ध चित्त का आपस में कोई संबंध है,शुद्ध घी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है,इसमें दो मत नहीं,अधिकांश लोग बाजार का अमूल घी अथवा केबीसी ब्रांड गोवर्धन घी पर भरोसा करते हैं । कुछ भाग्यशाली गुजरात की गिर देसी गाय पालते हैं,और उसके शुद्ध सात्विक,ऑर्गेनिक देशी घी का सेवन करते हैं ।
कुछ लोग होते हैं, जो अपने ही घर पर उपलब्ध दूध का घी बनाकर उसका सेवन करते हैं । घर पर बनाए जाने वाला शुद्ध घी
का तरीका हमारे चित्त शुद्धि के तरीके से बहुत मेल खाता है । गुरु को रंगरेज तो कहा गया है,लेकिन किसी हलवाई को सदगुरु नहीं कहा गया । गुरु रंगरेज की तरह हमारे चित्त को अगर रंग सकता है तो घी बनाने का तरीका हमारे चित्त को शुद्ध करने के तरीके से पूरी तरह मेल खाता है ।।
काश जितनी चिंता हम शुद्ध घी की करते हैं,उतनी ही चिंता हमें अपने चित्त की शुद्धि की भी होती । घी बनाने से चित्त शुद्ध करने का नुस्खा हमने ईजाद किया है,लेकिन इस पर हमारा कोई कॉपीराइट नहीं, मैं जब घर पर घी बनाता हूं तो मुझे ऐसा लगता है, मैं अपना चित्त शुद्ध कर रहा हूं । एक पंथ दो काज ।।
सबसे पहले हम दूध को गर्म करते हैं,दूध की चाय बनती है,बच्चे दूध पीते हैं और हम उसकी मलाई निकाल लेते हैं । बिना मलाई के घी नहीं बनता । अपने आपको तपाए बिना चित्त कभी शुद्ध नहीं हो सकता ।जप,तप,साधन,सेवा,सत्संग सभी चित्त शुद्धि के साधन माने गए हैं ।
लो जी दूध को तपाया और मलाई निकाल ली । जितना दूध है,उतने की ही मलाई निकलेगी,इसलिए रोज दूध गर्म होगा,तपेगा,और उसकी मलाई निकलेगी,जिसे एक बर्तन में एकत्रित कर लिया जाएगा । मलाई निकालने अथवा खाने से चित्त शुद्ध नहीं होता । थोड़ा धैर्य धारण करना पड़ता है । इस मलाई में चाहें तो थोड़ा दही मिलाते जाएं,और मलाई फ्रीजर में रखते जाएं । पहले तप और उसके बाद धीरज, मन ललचाता है,मलाई के लिए । मन पर कंट्रोल भी जरूरी है चित्त शुद्धि के लिए ।।
चलिए कुछ दिन यही चलता रहा । अच्छी मलाई जमा हो गई । अब इसे एक बड़े बर्तन अथवा मटकी में रवई से ,खूब सारा पानी डालकर मथ लिया । थोड़ा परिश्रम और ऊपर मक्खन तैरने लग गया । कृष्ण की सभी बाल लीलाएं,मटकी,माखन और गोपियों के आसपास ही घटित होती रहती हैं । माखन चोर की तरह किसी का दिल चुराएं,मक्खन नहीं ।
लो जी यहां तो मक्खन देखते ही मुंह में पानी आ गया,और साथ में मलाई वाली छाछ भी । हम तो तर गए । लेकिन महाराज,अभी कहां चित्त शुद्धि हुई,घी तो अभी निकला ही नहीं । कंट्रोल कंट्रोल, नो चित्त शुद्धि विदाउट कंट्रोल ।।
जी हां अब मक्खन छाछ से अलग होगा,जैसे विकार चित्त से अलग होते हैं,चित्त शुद्धि के समय । लेकिन अभी तो मक्खन की भी परीक्षा होगी,उसको भी संयम और विवेक की अग्नि में तपना होगा । बिना भाड़ में गए कभी चना सिका है,बिना भट्टी के कभी रसोई पकी है।
तेज आंच में मक्खन की तरह चित्त की परीक्षा हो रही है,कड़ी परीक्षा,तेज आंच,धैर्य की परीक्षा,और आखिर वह घड़ी आ ही जाती है,जब शुद्ध विकार युक्त घी चित्त शुद्ध की तरह कढ़ाई में तैरने लगता है ।
साथ में कुछ विकार जलकर खाक नहीं होते,मावा बन जाते हैं । नर,सत्संग से क्या से क्या हो जाए । संसार में असार कुछ भी नहीं,फिर ज्ञानियों द्वारा सार सार ही ग्रहण किया जाता है,और थोथा उड़ा दिया जाता है ।।
हमने घी बनाने का तरीका नहीं सीखा,चित्त शुद्धि का तरीका सीखा । सतगुरु की सीख ऐसी ही होती है,इसीलिए उसे रंगरेज कहते हैं । आप अपने गुरु स्वयं बनें,घर पर ही घी बनाएं,अपना चित्त शुद्ध करें । मैंने अपनी मां से सीखा,तेरा तुझको अर्पण,क्या लागा मेरा ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






