श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फ़जी़हत…।)

?अभी अभी # १०२१ ⇒ आलेख – फ़जी़हत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

फजीहत अरबी शब्द है !

जौहरि की गति जौहरी जाने, की जिन जौहर होय, की तरह जब तक किसी की फजीहत नहीं होती, वह इसका दर्द नहीं जान सकता। आप चाहें तो इसे शारीरिक संत्रास कह सकते हैं, और चाहें तो मानसिक भी। कहीं भी किसी भी परिस्थिति में, बिना किसी पूर्व सूचना के, किसी भी पल, कोई भी

इस अवस्था का शिकार हो सकता है।

जहां सभी सुविधा, सावधानी और सूझ बूझ काम नहीं आती तब अचानक ऐसी परिस्थिति निर्मित हो जाती है, जिसे आप फजीहत कह सकते हैं। इस अवस्था में कोई भी सर्व गुण संपन्न व्यक्ति लाचार और असहाय, परेशान सा, केवल उसे झेलता रहता है, लेकिन परिस्थिति सामान्य होने पर अपनी उस स्थिति का बखान करना नहीं भूलता, क्योंकि फजीहत में हमारा नुकसान कम, झल्लाहट अधिक होती है।।

किसी जरूरी काम के लिए घर से बाहर निकलना, द्वि – चक्र वाहन को पंक्चर देखना, चार पहिया वाहन की चाबी नहीं मिलना, साइकिल तक में हवा नहीं होना, और किसी तरह ऑटो करके उस काम को सम्पन्न करने की कोशिश करना, लेकिन उसमें भी, अगर किसी अप्रत्याशित घटना के कारण, सफलता हाथ ना लगे, और खाली हाथ वापस घर आना पड़े, तो इसे क्या कहेंगे। चलो, कोई बात नहीं, अगली बार देखेंगे !

जब हमारा मूड अच्छा होता है, तो विपरीत परिस्थितियां भी रास आती हैं, लेकिन अगर हम किसी कारण पहले से ही परेशान हैं, और उसमें अगर ऐसी स्थिति निर्मित होती है, तो हम असहज होकर भड़क उठते हैं। सिस्टम, समय, परिस्थिति और मानसिक संतुलन, सब गड़बड़ा जाता है।।

जब हालात बुरे होते हैं तो समय भी खराब चल रहा होता है। पिछले दस बारह सालों से हमारा समय अच्छा चल रहा है। क्या दिन थे वो भी। गर्मी की उमस भरी रातों में, किसी फॉल्ट के कारण, रात रात भर के लिए बिजली चली जाती थी। इन्वर्टर, इमरजेंसी लाइट, चार्जर और मोबाइल भी कब तक कम करते। परेशान हो, बिजली विभाग को कोसते हुए लोग सड़कों पर निशाचर की तरह, हवा खाने निकल पड़ते। आप क्या जानो डिजिटल इंडिया वालों, फजीहत क्या होती है।

गर्मी के मौसम में देसी खट्टे मीठे आमों से एक स्वादिष्ट मसालेदार व्यंजन बनता है, जिसे फजीता कहते हैं। इसमें आम तो आम, गुठलियों के दाम भी वसूल हो जाते है। इतना शानदार फजीता, कि समझ में ही नहीं आता, पहले गुठलियां चूसें अथवा पहले उंगलियां चाटें। अब गुठली तो आप चम्मच से नहीं चूस सकते ना। हेल्थ, हाइजीन वाले फजीते से बचें, वर्ना उनका फजीता भी बन सकता है।।

फजीहत और फजीते के परिवार में एक सदस्य और है जिसे फालूदा कहते हैं। खाने में यह स्वादिष्ट लगता है। मीठी रसभरी सिवैंया का जब ठंडी, रबड़ी – मलाईदार कुल्फी से मेल होता है, तब फालूदा का जन्म होता है।

नीमा जी की फालूदा कुल्फी खाएं, खुद जान जाएं।

लेकिन परेशानी तब होती है जब किसी की इज्जत का फालूदा निकल जाता है। किसी की फजीहत हो, चलेगी, फजीता बन जाए वहां तक भी ठीक है, लेकिन इज्जत का फालूदा ? ना बाबा ना ! Never, पक्का नको। आई शप्पथ।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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