श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्रतिभा-सम्पन्न …“।)
अभी अभी # ११०२ ⇒ आलेख – प्रतिभा-सम्पन्न
श्री प्रदीप शर्मा
वे एक सम्पन्न घराने से हैं ! पढ़ने-लिखने के शौकीन हैं । कॉलेज में पाँव रखने तक कई प्रेम-पत्र लिख चुके हैं, और गुलशन नंदा और रानू से लगाकर कई अल-मस्तरामों जैसे लेखकों के साहित्य का अध्ययन कर, घर में ही किताबों का पहाड़ खड़ा कर चुके हैं ।
पिताजी ने तो बहुत नोट छाप लिए ! उन्हें अब छपने का बहुत शौक है । बड़े अखबारों में संपादक के नाम बड़े-बड़े पत्र लिखे, जो छोटे होते-होते, जब चाँदी का जूता और लोहा-लंगर जैसे अखबारों में छपने लगे, तो उनका मन खट्टा हो गया । उनकी प्रतिभा कुंद होने लगी ।।
फिर एक समय ऐसा आया, कि उनके पिताजी ने उनका विवाह प्रतिभा नामक एक गुणवान कन्या से कर दिया । सम्पन्न तो वे पहले से ही थे, अब प्रतिभा-सम्पन्न भी हो गए ।
जिस तरह पूत के पाँव पालने में ही नज़र आ जाते हैं, व्यक्ति की प्रतिभा छुपाए नहीं छुपती ! वे जब अपनी नई नवेली के साथ बाज़ार घूमने जाते, लोग आपस में बातें करते ! वो देखो, प्रतिभा का धनी जा रहा है । वे बड़े दरियादिल थे, इसे अपनी तारीफ़ समझ बहुत खुश हो लेते ।।
धीरे धीरे उनकी प्रतिभा पाँव फैलाने लगी ! उनका छपास रोग, उचित अवसर पा, फिर उभर आया । उन्होंने एक प्रिंटिंग प्रेस डालने का विचार किया । उनकी better half प्रतिभा ने उन्हें एक सुझाव दिया ! क्यों जी ! क्यों न आप जिओ का एक 4-जी फोन खरीद, एक फेसबुक एकाउंट खोल लेते । वे कुछ समझे नहीं ।
उनकी प्रतिभा ने उन्हें समझाया ! आपकी खुद की एक 4″x 6″ की प्रिंटिंग मशीन होगी । न कागज़ माँगेगी, न स्याही । कोई कर्मचारी नहीं ! न पॉवर कनेक्शन और न ही कोई बिजली के बिल का झंझट । जितना चाहो, जब चाहो, अपने फोटो के साथ तबीयत से छापो । केवल एक चार्जर आपकी प्रिंटिंग प्रेस को शुरू करने में सक्षम है । जब भी आपकी प्रेस थक जाए, उसे कभी चार्ज, कभी रिचार्ज करा लिया करो ।।
उनकी छपने की आस चुटकियों में पूरी हो गई । अब उन्हें किसी अखबार, पत्रिका, और संपादक की दरकार नहीं । आज वे ही लेखक, संपादक और एक प्रिंटिंग मशीन के स्वामी हैं । उनकी कोई रचना अस्वीकृत नहीं होती । तत्काल बिना काट-छाँट के छप जाती है ।
अब उन्हें पाठकों की प्रतिक्रिया के लिए 24 घंटे भी इंतज़ार नहीं करना पड़ता । चट मंगनी, पट ब्याह जैसा, इधर छपा, उधर संपादक के नाम पत्र ! कोई तारीफ के पुल बाँध रहा है तो कोई उन्हें un-subscribe कर रहा है । लेकिन आज वे एक प्रतिभा-सम्पन्न स्वयंभू लेखक, कवि, साहित्यकार, चिंतक, विचारक और समाज सुधारक बन चुके हैं ।
उनकी ” प्रतिभा “को नमन ।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




