हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१४ ☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री अरविंद तिवारी जी द्वारा लिखित  “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवालापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१4 ☆

☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला

लेखक – अरविंद तिवारी

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ : व्यंग्य की चटपटी प्लेट में समय का स्वाद – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य की अपनी तरह की यह गोलगप्पे वाली प्लेट हमें हास्य का स्वाद देने के बाद हमारे वैचारिक हाजमे को कितना दुरुस्त करती है? किताब बंद करने के बाद हमारे भीतर कितनी हँसी, कितनी खटास और कितनी डकारें बची रहती हैं? अरविंद तिवारी का व्यंग्य-संग्रह ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ पढ़ते हुए यही सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। गड्ढे, सेमिनार, पुरस्कार, पुस्तक मेले, ए.आई., साहित्यकार, आलोचक और अंततः गोलगप्पेवाला—ये पात्र और प्रसंग पुस्तक बंद होने के बाद भी मन में घूमते रहते हैं।

यह अरविंद तिवारी का चौदहवाँ व्यंग्य-संग्रह है। साहित्य और राजनीति इसके प्रमुख सरोकार हैं, लेकिन लेखक की दृष्टि प्रशासन, सामाजिक व्यवहार, प्रकाशन, पुरस्कार, मीडिया, चुनाव और नई तकनीक तक जाती है। ‘गड्ढों का विद्रोह’, ‘जाना एक सेमिनार में’, ‘ए.आई. वाला लोचा’, ‘शोक सभा के विशेषज्ञ’, ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ जैसी रचनाएँ समकालीन विसंगतियों के अलग-अलग चेहरे सामने लाती हैं।

संग्रह की शुरुआत ‘गड्ढों का विद्रोह’ से होती है। सड़क के गड्ढे सामान्यतः नागरिकों की परेशानी हैं, लेकिन तिवारी उन्हें व्यवस्था के स्वाभाविक अंग में बदल देते हैं। उनका कथन—“गड्ढा बिना सड़क के भी हो सकता है”—सिर्फ हास्य पैदा नहीं करता, बल्कि उस मानसिकता पर चोट करता है जिसमें पुरानी समस्या धीरे-धीरे समस्या न रहकर व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।

‘जाना एक सेमिनार में’ साहित्यिक दुनिया के महानगरीय मोह और छोटे शहर के लेखक की विडंबना को पकड़ता है। कई बार साहित्यकार से अधिक उसका शहर महत्वपूर्ण हो जाता है। यह विसंगति इसलिए अधिक चुभती है क्योंकि साहित्य की दुनिया भी उससे मुक्त नहीं है।

तिवारी की खासियत यह है कि उनका व्यंग्य केवल राजनीति पर नहीं चलता। वे साहित्यिक संसार को भी उसी निर्ममता से कटघरे में खड़ा करते हैं। ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’ साहित्यिक प्रतिष्ठा, औपचारिक मित्रता, पुरस्कार-व्यवस्था और बाजारवाद की पोल खोलते हैं।

‘किताब हाथोंहाथ ली गई’ में मुहावरा ही व्यंग्य का हथियार बन जाता है। किताब का हाथोंहाथ घूमना साहित्यिक मित्रता और दिखावे की विडंबनाओं को उजागर करता है। इसी तरह ‘पुरस्कार चुक गए हैं!’ में सब्जी मंडी की भाषा साहित्यिक पुरस्कारों की दुनिया में प्रवेश करती है। थोक, रिटेल, खरीददार और माल जैसे शब्द हँसाते तो हैं, लेकिन पुरस्कारों के बाजारीकरण का गंभीर प्रश्न भी खड़ा करते हैं।

‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ चुनावी संस्कृति के प्रदर्शन और राजनीतिक गणित को निशाना बनाता है। वहीं ‘ए.आई. वाला लोचा’ और ‘इस बार ए.आई. वाली दीवाली’ में नई तकनीक के बहाने आभासी छवि, प्रचार और असली-नकली की धुंधली होती सीमा पर टिप्पणी की गई है। इससे तिवारी की समकालीनता स्पष्ट होती है। वे पुराने मुहावरों के व्यंग्यकार हैं, लेकिन विषयों में पुराने नहीं हैं।

इस संग्रह की भाषा सहज, बातचीत के करीब और मुहावरेदार है। तिवारी असंगत चीजों को एक साथ रखकर नया व्यंग्यार्थ पैदा करते हैं—गड्ढा और व्यवस्था, सब्जी मंडी और पुरस्कार, आम और साहित्यकार, ए.आई. और दीवाली। यही उनका विशिष्ट व्यंग्य-कौशल है।

उनके व्यंग्य की एक और महत्वपूर्ण विशेषता आत्मव्यंग्य है। साहित्यिक संसार पर चोट करते हुए वे स्वयं को उससे बाहर खड़ा नहीं करते। यही ईमानदारी उनके व्यंग्य को उपदेश बनने से बचाती है। हाँ, कुछ रचनाओं में व्यंग्य की ऊर्जा इतनी अधिक है कि लेखक एक ही प्रसंग पर कुछ अधिक देर ठहर जाते हैं; किंतु यह उस लेखक की स्वाभाविक सीमा भी है जिसके पास कहने को बहुत कुछ है।

अरविंद तिवारी छोटी-सी विसंगति पकड़ते हैं और उसे इस तरह विस्तार देते हैं कि उसमें पूरा समय दिखाई देने लगता है। ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ की सार्थकता इसी में है कि यह दूसरों पर हँसने वाली किताब भर नहीं, बल्कि साहित्य और स्वयं साहित्यकार को भी हँसी के कटघरे में खड़ा करती है।

शायद हमारे समय की हर गंभीर चीज के भीतर सचमुच एक गोलगप्पा छिपा है। उसे फोड़ने के लिए व्यंग्यकार की उंगली चाहिए और उसमें चटपटा पानी भरने की कला भी। अरविंद तिवारी यह काम बखूबी करते हैं।

मेरी दृष्टि में यह संग्रह समकालीन हिंदी व्यंग्य की सशक्त धारा में अपनी जगह बनाता है। इसे पढ़कर मुस्कान आती है, लेकिन मुस्कान के पीछे एक असुविधाजनक सवाल भी रह जाता है—जिन विसंगतियों पर हम हँस रहे हैं, कहीं वे हमारी अपनी आदतें तो नहीं?

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४९ – कलयुग केवल नाम अधारा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४९ कलयुग केवल नाम अधारा… ?

राम नाम अवलंब बिनु परमारथ की आस।

बरसत वारिद बूँद गहि चाहत चढ़न अकास।।

श्री राम का नाम परमार्थ अर्थात धर्म, अर्थ, काम मोक्ष प्रदान करता है। उनके नाम के बिना भवसागर से पार होने की कल्पना कुछ ऐसी ही है, जैसे कोई बारिश की बूँदों के सहारे आकाश में जाना चाहता हो। अर्थ स्पष्ट है, श्री राम का नाम तारणहार है।

श्री राम के नाम को, उनकी अतुल्य जीवनयात्रा को घर-घर और जन-जन तक जनभाषा में पहुँचानेवाले ग्रंथ का नाम है, रामचरितमानस।  कौशल्या हितकारी राम से रणकर्कश श्री राम  की कथा है रामचरितमानस, राजा राम से लोकनायक श्री राम होने की गाथा है रामचरितमानस। रामचरितमानस श्रीराम के व्यक्तित्व और कृतित्व की अशेष यात्रा है। रामचरितमानस में को अवधी भाषा में लिखा गया है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस अमर कृति का लेखन विक्रम संवत 1631 तदनुसार  ईस्वी सन 1574 को  मंगलवार श्री रामनवमी के दिन आरंभ किया था। यह लेखन 2 वर्ष 7 महीने और 26 दिन चला। विक्रम संवत 1633 अर्थात ईस्वी सन 1576 को श्री राम विवाह के दिन यह संपन्न हुआ।

रामचरितमानस में कुल सात खंड / अध्याय हैं, बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किन्धाकांड, सुन्दरकांड, लंकाकांड और उत्तरकांड।

मानस में संस्कृत और प्राकृत के कुल मिलाकर 18 छंदों में सृजन हुआ है। रामचरितमानस में कुल 10902 पद हैं। इनमें 9388 चौपाई हैं। मानस में 1172 दोहा हैं। इसमें 87 सोरठा हैं। इस महाकाव्य में 208 छंद हैं जिनमें हरिगीतिका, त्रिभंगी, तोमर, चौपैया सम्मिलित हैं। इस कालजयी ग्रंथ में 47 श्लोक हैं। इन श्लोकों में शार्दूलविक्रीडित, अनुष्टुप, प्रमाणिका, वंशस्थ, उपजाति, मालिनी, वसंततिलका, रथोद्धता, भुजंगप्रयात, तोटक, स्रग्धरा हैं।

यद्यपि स्थूल रूप से देखें तो रामचरितमानस,  रामकथा है, तथापि सूक्ष्म अवलोकन-अध्ययन  करें तो पाएँगे कि इसके अक्षर-अक्षर में जीवनमूल्य और नीतिमत्ता साक्षात दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि श्री राम का जीवनवृत्त ही ऐसा है। संभवत: यही कारण था, जिसने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त से लिखवाया,

राम, तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है।

कोई कवि बन जाय, सहज संभाव्य है।।

रामचरितमानस ने श्री राम को एक अनन्य व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया। राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं, लोकहितकारी हैं।राम एकमेवाद्वितीय हैं।

रामचरितमानस पढ़ना अर्थात सदाचार, नीतिमत्ता और जीवन के आदर्श पढ़ना। विशेषकर उत्तरभारत में तो मानस के दोहे और चौपाइयाँ, लोकोक्तियों के समान चलन में हैं।

अवधी में होने के कारण रामचरितमानस सार्वजनीन हुआ, जन-जन की जिह्वा का गान बना। जिस तरह बालक को दादी, नानी कहानी सुनाती हैं, कुछ उसी तरह हर आयुसमूह के लिए दादी, नानी की लोककथा बना रामचरितमानस। यही कारण है कि गोस्वामी तुलसीदास रचित मानस का पारायण आगे चलकर परम्परा बना।

वस्तुत: संसार रूपी सागर में हर मनुष्य एक घड़ा है, एक घट है। इस घट में रावण का निवास है पर श्रीराम का भी वास है। मनुष्य से अपेक्षित है कि वह भीतर के  श्रीराम का जागरण और अंतर्भूत रावण का मर्दन करे।अपने अवगुणों का दहन, और रामत्व का जागरण  ही रामचरितमानस का सच्चा पारायण है।

‘रामत्व’ की अनुकम्पा गोस्वामी तुलसीदास को प्राप्त हुई थी। तभी श्रीरामचरितमानस में आपने लिखा,

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।

बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥

अर्थात जगत में जितने जड़ और चेतन जीव हैं, सबको राममय जानकर मैं उन सबके चरणकमलों की सदा दोनों हाथ जोड़कर वन्दना करता हूँ।

गोस्वामी जी के कविरूप का ध्रुवतारा है रामचरितमानस। कहा गया है,

कलयुग केवल नाम अधारा।

सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा।

कलयुग में केवल श्री राम का नाम एक आधार है। उनके सुमिरन मात्र से, केवल उनके स्मरण से मनुष्य भवसागर पार हो जाता है।

श्री राम के चरित के माध्यम से जीवन की ज्ञात, अज्ञात स्थितियों को जानने, समझने और हल की दिशा पर प्रकाश डालने का माध्यम है रामचरितमानस। कालजयी साहित्य का सार्वकालिक उदाहरण है रामचरितमानस।

श्रावण शुक्ल सप्तमी को गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती थी। विश्व को रामचरितमानस जैसा अनन्य महाकाव्य  देनेवाले गोस्वामी जी को नमन।

 

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ औरत… (अनुवादित) – भाग २ – मूळ गुजराती लेखिका : गिरिमा घारेखान – हिन्दी अनुवाद : राजेन्द्र निगम ☆ भावानुवाद – उज्ज्वला केळकर ☆

उज्ज्वला केळकर

? जीवनरंग ?

☆ औरत… (अनुवादित) – भाग २ – मूळ गुजराती लेखिका : गिरिमा घारेखान – हिन्दी अनुवाद : राजेन्द्र निगम ☆ भावानुवाद – उज्ज्वला केळकर

(अनुवादित कथा).. (उत्तरार्ध)

 (गडद रंगाच्या दुपट्टयाने आपले केस झाकून, आपल्या लोकांवर हुकूम चालवणार्‍या समीराच्या गालावर जेव्हा तिचे सोनेरी केस यायचे, तेव्हा तो तिच्याकडे एकटक बघत रहायचा. ही सुरमा घातलेली मालकीण त्याला गावात असलेल्या त्याच्या प्रिय बहिणीची आठवण करून द्यायची.) 

इथून पुढे – –

सुश्री गिरिमा घारेखान

एका गुरुवारी रशिद आला नाही. सकाळपासून वाट बघणारी समीरा, दुपारपर्यंत बेचैन झाली. तिने रशिदला फोन लावला.

‘आपली वाट बघतेय! ’

‘अरे, जानेमन इथे काही काम आहे! ’

रशिदच्या या ‘जानेमन’ संबोधनात समीराला आज चैतन्य वाटले नाही.

आणखी काही चौकशी न करता तिने एवढेच विचारले,

‘पुढल्या गुरुवारी तरी येणार ना! ’

‘इंशाअल्लाह’ (अल्लाहची मर्जी असेल तर…) म्हणून रशिदने फोन ठेवून दिला.

त्यानंतर प्रत्येक गुरुवारी सकाळी समीरा खिड़कीजवळ उभी रहायची. आणि रशिदची वाट पहायची आणि नजर बाहेरच्या पोकळीशी धडकून परत फिरायची.

एक दिवस तिने माळ्याला एक मोठा वृक्ष उखडताना पाहिला. तिने कारण विचारताच, तो म्हणाला, ‘ मालकीण इथे अशी तयार मोठी झाडे लावली जातात. काही लागतात. काही लागत नाहीत. हा सुकलाय, म्हणून उखडलाय.

त्यानंतर समीरा जेहा जेव्हा आरशात बघायची, तेव्हा तेव्हा, तिला सुकलेला वृक्ष दिसायचा. तिची बेचैनी दिवसेंदिवस वाढत जायची. रशिदच्या थांबलेल्या भेटी, आवाजातील रुक्षता, ठेवून दिले जाणारे टेलिफोन, तिला काय संकेत देतात?

आता तिला मखमली गालिचे, कारंजाचं पाणी आणि बागेतील फुले आनंद देत नव्हते. आता अंधरातून सुगंध आणि दिवसातून उजेड उडून गेला होता.

महिन्याहून अधीक काळ लोटला. काय रशिदला आता तिच्यात आजिबात रस उरला नव्हता? तिला काय केवळ काम करण्यासाठी इथे आणले गेले होते? हिंदुस्तानी हुशार मुलगी होती म्हणून? एकटेपण आता तिला खाऊन टाकत होतं. पिवळा खजूर आता पिकून लाल चुटूक झाला होता. काही दिवसांनी हे कामही बंद होईल. मग बोलण्यासाठी सईदची साथही मिळणार नाही.

समीराचे मन वारंवार उडून तिच्या गावी पोहोचत असे. तिथे त्या छोट्याशा घरात, किती शांती, आंतरिक समाधान होतं. घरात आणि बाहेर दिवसभर चिमणीसारखी चिवचिवाट करत उडत रहाणारी ती. इथे काय बनली? एक मसाला भरलेली मोरणी जी खोलीची शोभा वाढवत बसलेली. तिला वाटायचं, तिच्या अम्मीने तिला या सुखाच्या विहिरीत का ढकललं? अम्मीने तिच्या चमकणार्‍या भिंती बघितल्या, पण तिला हे माहीत नाही, की या भिंतींवर भावनांची आर्द्रता मुळीच नाहीये. या चमकदार भिंतींच्या विहिरीत मान उंचावून बसलेली समीरा प्रत्येक गुरुवारच्या सकाळी रशिदच्या येण्याची वाट बघायची आणि दुपारनंतर पुढच्या गुरुवारची वाट बघायची.

शेवटी तिच्या दु:खाच्या ढगांना चिरणारा एक गुरुवार उगवला. रशिद भल्या सकाळीच आला. त्याच्या चेहर्‍यावर समुद्राच्या लहरींप्रमाणे आनंद उसळत होता. त्याच्या ड्रायव्हरने गाडीतून मिठाईची पॅकेट्स काढली आणि बागेत काम करणार्‍या लोकांना वाटणं सुरू केलं.

सगळेच लोक मालकांना ‘मबरुक, मबरुक’ म्हणत होते.

रशिद जवळ जवळ पळत पळत समीराकडे आला. तिला उचललं. समीराच्या मनाच्या वळवंटात जसा काही पाऊस पडला. खूप दिवसांनंतर भेटलेल्या या खविंदाला लपेटून ती म्हणाली, ‘इतकी खुशी? धंद्यात काही विकास, प्रगती झाली काय? ’ रशिदने आपल्या हातांच्या ओंजळीत तिचा चेहरा धरला. ‘अरे, जीवनात तरक्की मिळालीय. मी अब्बा बनलो. मुलगा झालाय, मुलगा! ‘

समीराच्या कानातून जसं काही कुणी अ‍ॅसिड ओतलं. ते तिच्या सार्‍या शरीरात पसरलं. तिने रशिदला धक्का दऊन आपल्यासू दूर केलं. अजूनही तिचा तिच्या कानावर विश्वास बसत नव्हता. आ… प आप अब्बा?

आता रशिद काहीसा बेशरमपणे हसला. ‘आता सगळे प्रश्न विचारून माझा मूड खराब करू नकोस. बायकोशिवाय मी मस्कतमध्ये राहीन कसा? मी मर्द आहे. मर्द, अरब मर्द कळलं? मर्दाला बाई पाहिजेच पाहिजे. प्रत्येक जागी.

समीराचं काळीज फाटलं. बोलायला आता काही उरलं नव्हतं. अरब देशात शादी करून नबाबाच्या मालकिणीसह बक्षिसाप्रमाणे मिळणारी ही कटु वास्तविकता ती चांगल्या तर्‍हेने समजून चुकली. पण आता काय होणार? धागाच टाक्याला तोडू लागाला, तर शिलाई अशी होणार?

रशिद ने दुपारी खजुराचा सगळा हिशेब-ठिशेब बघितला आणि संध्याकाळी परत निघाला. खिडकीजवळ उभी राहून समीरा या उत्फुल्ल अरब मर्दाला जाताना बघत राहिली. सूर्य मावळला. आता बाहेर अंधार पसरला. समीरा खिडकीतून अंधारावर थुंकली. खोलीत आली आणि सात बल्बवाल्या झुंबरातील लाईट चालू केली. खोली झगमगू लागली.

समीराने मोबाईल हातात घेतला आणि सईदला फोन केला. थोड्याच वेळात आकाशात उगवणार्‍या सूर्याप्रमाणे सईद आला. त्याला पाहून समीराला वाटलं, तिचा जणू कोणी आत्मीय तिला मिळाला आहे. मग केरळचा पाऊस डोळ्यातून पाझरू लागला. मग रडत रडत ती म्हणाली, ‘‘सईद, तू मला सांगितलं नाहीस! तूसुद्धा? सईदच्या लक्षात सगळी परिस्थिती आली. आपली नजर खाली झुक्वून तो म्हणाला, ‘ आपण खूप निरागस आहात. हा अरब आहे. इथे पुरुष जिथे राहील, तिथे त्याला एक बाई हवीच हवी. समीरा गुपचाप ऐकत राहिली. सईदच्या बोलण्यामुळे तिची निरागसता क्षीण होत चालली. आता मालकाची पहिली ओमानी बायको आपल्या मुलात व्यस्त होत राहील.

‘असं ऐकालय, की आता मालक पाकिस्तानात जाऊन लग्न करून येणार आणि त्या मुलीला मस्कतमध्ये ठेवणार! ’

दगड झालेली समीरा कणा-कणात विखुरली. त्या कणांना एकत्रित करण्यास तिला काही वेळ लागला. मग सईदच्या डोळ्यात आपले सजल डोळे घालत म्हणाली, ‘तुझ्या मालकाने पैशाच्या जोरावर माझं जीवन उध्वस्त केलं. सईद, मी तुझ्यावर भरवसा ठेवू शकते का? मला इथले कायदे-कानू समजावून देशील का? ’

सईदला दिसले, चोवीस तास त्याचा पाठलाग करणारे, केरळच्या घरात बसलेले दोन डोळे. त्याने होकरार्थी मान हलवली. त्याला वाटलं, खुदाने त्याच्यावर महरबान होऊन, कुणाचं कर्ज चुकवण्याचा मौका त्याला दिलाय.

त्यानंतर जवळ जवळ दीड महिन्यांनंतर रशिद आला. नवीन कपडे नि अलकारांनी नव्या नवरीसारखी सजलेली समीरा त्याला येऊन बिलगली ना कुठली तक्रार, ना राग. रशिद मनातल्या मनात हसला. बायकांना कपडे, दागिने मिळाले, की त्यांना काही फरक पडत नाही. शब्दांमध्ये आपलं सारं स्त्रीत्व विरघळवून समीरा रशिदला म्हणाली, ‘दिलबर, आपण खूप काळ येत नाही. त्यामुळे इथे परेशानी होतेय.

‘काय बेगम? आपण बोला! आपल्या सगळ्या समस्या दूर करतो! ’ रशिदला वाटलं, ती एखाद्या नव्या दागिन्याची मागणी करेल.

‘आपण न येण्याने आपल्या घरच्या आणि खजुराच्या धंद्यातील लोकांचे पगार वेळेवर दिले जात नाहीत त्यामुळे ते ठीक तर्‍हेने काम करत नाहीत. बघा ना, खजूर उतरवण्यापूर्वीच किती पिकलाय! ’

खरं आहे! ’

आपण मंजूरी दिलीत, तर मला हा कारभार वाढवायचाय. पिकलेल्या खजुरातून बी काढून, त्यात बदाम भरून आपण परदेशी पाठवू शकू!

रशीदला या हिंदुस्तानी मुलीच्या बुद्धीचा गर्व वाटला.

‘मेरे सरताज, आपण मला इथली पॉवर ऑफ अ‍ॅटर्नी द्या. मग आपण कितीही काळापर्यंत आला नाहीत, तरी अडचण नाही! ’ रशिदच्या ओठांवर आपलं बोट फिरवत समीरा म्हणाली, ‘ आपल्याशिवाय मला मुळीच करमत नाही. पण आपली औरत आहे. मला माझ्या खाविंदांची खुशी पण बघायला हवी ना!

हातात घातलेल्या बांगड्या खणखणत, समीराने एक बदाम भरलेला खजूर रशिद च्या तोंडात घातला. त्या नरम खजुराबरोबर, तिचे बोलणेही रशिदच्या गळ्याखाली उतरलं.

एवढ्या अवधीत या बाईने इथला कारभार मोठ्या कुशलतेने सांभाळला होता. त्यामुळे तिची कुशलता आणि नियत यावर भरवसा न करण्याचं काही कारणच नव्हतं. जर त्याने पॉवर ऑफ अ‍ॅटर्नी दिली, तर तो पाकिस्तानहून ज्या उमलत्या कळीला आणणार होता, तिच्याबरोबर तो मस्कतला आरामात राहू शकणार होता.

रशिद शनिवारी निघून गेला. मंगळवारी संध्याकाळी, त्याचा ड्रायव्हर आला आणि सरियात (शरीयत)च्या अदालतीचे सगळे दस्तावेज देऊन निघून गेला. आता रशिदच्या सोहारच्या सगळ्या संपत्तीची पॉवर ऑफ अ‍ॅटर्नी समीराच्या जवळ होती. दस्तावेज हातात घेऊन हसणारी समीरा मनात म्हणाली, ‘ या मर्दाला प्रथमच कुणी औरत भेटली.’

सूर्यास्त झाला आणि आकाशात चंद्र उगवला. समीराने मोबाईल हातात घेतला आणि सईदला फोन केला. ‘काम झालं. शेवया बनवतीय. ही खुशी, आनंदाने साजरी करू या ना! ’

दूर कोणत्या तरी मशिदीत, सूर्यास्ताच्या वेळच्या नमाजाची अजान झाली. समीराने दुपट्टा डोक्यावर ओढ़ला आणि देवाला शुक्रिया म्हणण्यासाठी तिने नमाज पठण सुरू केलं.

– समाप्त –

☆☆☆☆

मूळ कथा : औरत

मूळ लेखिका : गिरिमा घारेखान. – मो. 8980205909.

गुजरातीतून हिंदी अनुवाद : राजेन्द्र निगम,  मो. 9374978556

मराठी अनुवाद – उज्ज्वला केळकर मो- 8369252454

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

मो. 836 925 2454, email-id – kelkar1234@gmail.com 

≈संस्थापक संपादक –  श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३४ ☆ कविता – सावन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – कविता – सावन)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३४ – साहित्य निकुंज ☆

☆ कविता – सावन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

काले बादल घिर-घिर आए,

नभ ने ली अंगड़ाई,

बरखा बरसी रिमझिम-रिमझिम ,

धरती खूब नहाई।

*

सौंधी-सौंधी खुशबू माटी की ,

मन को खूब रिझाया,

सूना-सूना मन का आँगन,

सावन गीत सुनाया।

*

झूले पड़े डाली-डाली,

हँसती हर अमराई,

कूक-कूक कर कोयल ने ,

प्रेम-पाती पहुँचाई।

*

मोती-सी बूँदें पत्तों पर,

फूलों पर मुस्कान,

छेड़ दिये सावन ने फिर ,

मन का मधुर गान।

*

भीगी पलकों में छिपी है,

अनकही कितनी कहानी,

सावन केवल ऋतु नहीं है,

सावन है मन की रानी।

*

आओ मिलकर गीत सुनाएँ,

इस मौसम की रीत,

बूँद-बूँद में प्रेम घुला है,

मन भावन  संगीत।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ रुद्राभिषेक का धार्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – रुद्राभिषेक का धार्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व।)

☆ आलेख – रुद्राभिषेक का धार्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

रुद्राभिषेक रुद्र व अभिषेक दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘ रुद्र ‘ भगवान शिव का एक नाम है। इसका अर्थ है रुद् धातु से रुदन या दु:ख को दूर करने वाला। शिव को रुद्र इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वे भक्तों के दु:खों, कष्टों व रोगों को हर लेते हैं। ‘ अभिषेक ‘ अभि+सिच् अर्थात् चारों ओर से स्नान कराना। इसका तात्पर्य है कि जल, दूध,घी, शहद, गंगाजल, बेलपत्र, आक, चंदन आदि से शिव को स्नान कराना। इस प्रकार इसका शाब्दिक अर्थ हुआ- भगवान शिव का अभिषेक। भारतीय सनातन परम्परा में यह अनुष्ठान सर्वाधिक प्रभावशाली माना जाता है, जो प्रकृति, चेतना, आत्मशुद्धि और लोककल्याण की भावना से जुड़ा है। इस आध्यात्मिक संस्कार व पूजा पद्धति का धार्मिक, दार्शनिक व वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व रहा है। सनातन परम्परा में भगवान शिव सर्वोच्च शक्ति हैं, जिनको आशुतोष भी कहा गया है। वे शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव हैं। श्रद्धा, विनम्रता और निष्काम भाव से किया गया रुद्राभिषेक ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह अभिषेक आत्मशुद्धि का माध्यम है। जल की प्रत्येक धारा भक्त को संदेश देती है कि अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, लोभ, ईर्ष्या व द्वेष को धोने का प्रयास करें। भगवान शिव समस्त सृष्टि के अधिपति हैं, इसलिए बेलपत्र, जल, पुष्प, चंदन, आक, धतूरा आदि प्राकृतिक सामग्री इस भाव की सूचक है कि प्रकृति की रक्षा ही शिव पूजा है। श्रावण मास वर्षा के द्वारा प्रकृति को नवजीवन देता है,मनुष्य को आत्मचिंतन हेतु प्रेरित करता है, इसलिए संयम,तप,जप शिवोपासना व रुद्राभिषेक हेतु यही समय सर्वाधिक उपयुक्त है।

भारतीय दर्शन में शिव परम चेतना के प्रतीक हैं, इसलिए रुद्राभिषेक मूर्तिपूजा से आगे बढ़कर ब्रह्मांडीय चेतना के प्रति समर्पण का द्योतक बन जाता है। यह अनुष्ठान सृष्टि, स्थिति और संहार का संतुलन करना भी सिखाता है। शिव संहार के देवता अवश्य हैं किन्तु भारतीय दर्शन में संहार केवल विनाश के लिए नहीं अपितु नवसृजन के लिए आवश्यक परिवर्तन है, जो नई सम्भावनाओं के द्वार खोलता है। रुद्राभिषेक में जल ऊपर से नीचे प्रवाहित होता है। यह इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य कितना भी ऊँचा हो जाए लेकिन विनम्र रहे। भगवान शिव के समक्ष सभी भेद समाप्त हो जाते हैं तथा पद, प्रतिष्ठा,जाति,धन आदि गौण हो जाते हैं। भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि पंचमहाभूतों से निर्मित है,इसलिए ये अनुष्ठान इनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी एक सांस्कृतिक माध्यम है। जलाभिषेक जल के महत्व को, दीप अग्नि को, धूप वायु को, भस्म पृथ्वी को तथा मंत्रों की ध्वनि आकाश तत्व का प्रतीक मानी जाती है। अद्वैत वेदांत के अनुसार परमात्मा और आत्मा का मूल स्वरूप एक ही है। रुद्राभिषेक का उद्देश्य बाह्य पूजन से आगे बढ़कर आंतरिक शिवत्व को जाग्रत करना है।

वैज्ञानिक दृष्टि से रुद्राभिषेक का प्रमुख आधार वैदिक मंत्रों का उच्चारण है, जो स्वर, लय और छन्द में गाए जाते हैं। ध्वनि विज्ञान के अनुसार नियमित लयबद्ध ध्वनि मन को एकाग्र करने एवं नियंत्रित श्वास- प्रश्वास के साथ मंत्रोच्चारण तनाव कम करने में सहायक बनते हैं। मनोविज्ञान की दृष्टि से जलाभिषेक चिंताओं का मानसिक विसर्जन करते हैं, सकारात्मक संकल्प लेते हैं। रुद्राभिषेक के समय भक्त का ध्यान एक बिन्दु पर केन्द्रित रहता है। यह प्रक्रिया ध्यान के अनेक सिद्धांतों से मेल खाती है, मानसिक तनाव में कमी आती है और क्रोध व आवेग पर नियंत्रण होता है। आज के भौतिकवादी युग में जहाँ मानसिक तनाव, सामाजिक विघटन, पर्यावरण संकट,उपभोक्तावाद, नैतिक मूल्यों का ह्रास है वहाँ रुद्राभिषेक प्रकृति के साथ संतुलित जीवन, संयमित उपभोग, विनम्रता, आत्मचिंतन, लोकमंगल के सार्थक भाव को सिखाता है।

सारत: रुद्राभिषेक भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का ऐसा अमूल्य अनुष्ठान है,जो धार्मिक दृष्टि से भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है। दार्शनिक दृष्टि से अहंकार,त्याग, आत्मबोध और ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ने की साधना है तो वहीं पर वैज्ञानिक दृष्टि से ध्यान, नियंत्रित श्वसन,लयबद्ध मंत्रोच्चारण,सामूहिक सहभागिता आदि में हितकर है, सामाजिक समरसता, लोकसंस्कृति का संरक्षण आदि का सार्थक व सशक्त माध्यम भी है। इस अनुष्ठान के द्वारा मनुष्य के व्यक्तित्व को परिष्कृत करके उसे समाज, सृष्टि व सृष्टा के प्रति उत्तरदायी बनाया जा सकता है।

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१३ ☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री अरविंद तिवारी जी द्वारा लिखित  “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवालापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१३ ☆

☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

☆ ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ : व्यंग्य की चटपटी प्लेट में समय का स्वाद – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

वरिष्ठ व्यंग्यकार अरविंद तिवारी की कृति पर विवेक रंजन श्रीवास्तव की पुस्तक चर्चा

व्यंग्य की अपनी तरह की यह गोलगप्पे वाली प्लेट हमें हास्य का स्वाद देने के बाद हमारे वैचारिक हाजमे को कितना दुरुस्त करती है? किताब बंद करने के बाद हमारे भीतर कितनी हँसी, कितनी खटास और कितनी डकारें बची रहती हैं? अरविंद तिवारी का व्यंग्य-संग्रह ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ पढ़ते हुए यही सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। गड्ढे, सेमिनार, पुरस्कार, पुस्तक मेले, ए.आई., साहित्यकार, आलोचक और अंततः गोलगप्पेवाला—ये पात्र और प्रसंग पुस्तक बंद होने के बाद भी मन में घूमते रहते हैं।

यह अरविंद तिवारी का चौदहवाँ व्यंग्य-संग्रह है। साहित्य और राजनीति इसके प्रमुख सरोकार हैं, लेकिन लेखक की दृष्टि प्रशासन, सामाजिक व्यवहार, प्रकाशन, पुरस्कार, मीडिया, चुनाव और नई तकनीक तक जाती है। ‘गड्ढों का विद्रोह’, ‘जाना एक सेमिनार में’, ‘ए.आई. वाला लोचा’, ‘शोक सभा के विशेषज्ञ’, ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ जैसी रचनाएँ समकालीन विसंगतियों के अलग-अलग चेहरे सामने लाती हैं।

संग्रह की शुरुआत ‘गड्ढों का विद्रोह’ से होती है। सड़क के गड्ढे सामान्यतः नागरिकों की परेशानी हैं, लेकिन तिवारी उन्हें व्यवस्था के स्वाभाविक अंग में बदल देते हैं। उनका कथन—“गड्ढा बिना सड़क के भी हो सकता है”—सिर्फ हास्य पैदा नहीं करता, बल्कि उस मानसिकता पर चोट करता है जिसमें पुरानी समस्या धीरे-धीरे समस्या न रहकर व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।

‘जाना एक सेमिनार में’ साहित्यिक दुनिया के महानगरीय मोह और छोटे शहर के लेखक की विडंबना को पकड़ता है। कई बार साहित्यकार से अधिक उसका शहर महत्वपूर्ण हो जाता है। यह विसंगति इसलिए अधिक चुभती है क्योंकि साहित्य की दुनिया भी उससे मुक्त नहीं है।

तिवारी की खासियत यह है कि उनका व्यंग्य केवल राजनीति पर नहीं चलता। वे साहित्यिक संसार को भी उसी निर्ममता से कटघरे में खड़ा करते हैं। ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’ साहित्यिक प्रतिष्ठा, औपचारिक मित्रता, पुरस्कार-व्यवस्था और बाजारवाद की पोल खोलते हैं।

‘किताब हाथोंहाथ ली गई’ में मुहावरा ही व्यंग्य का हथियार बन जाता है। किताब का हाथोंहाथ घूमना साहित्यिक मित्रता और दिखावे की विडंबनाओं को उजागर करता है। इसी तरह ‘पुरस्कार चुक गए हैं!’ में सब्जी मंडी की भाषा साहित्यिक पुरस्कारों की दुनिया में प्रवेश करती है। थोक, रिटेल, खरीददार और माल जैसे शब्द हँसाते तो हैं, लेकिन पुरस्कारों के बाजारीकरण का गंभीर प्रश्न भी खड़ा करते हैं।

‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ चुनावी संस्कृति के प्रदर्शन और राजनीतिक गणित को निशाना बनाता है। वहीं ‘ए.आई. वाला लोचा’ और ‘इस बार ए.आई. वाली दीवाली’ में नई तकनीक के बहाने आभासी छवि, प्रचार और असली-नकली की धुंधली होती सीमा पर टिप्पणी की गई है। इससे तिवारी की समकालीनता स्पष्ट होती है। वे पुराने मुहावरों के व्यंग्यकार हैं, लेकिन विषयों में पुराने नहीं हैं।

इस संग्रह की भाषा सहज, बातचीत के करीब और मुहावरेदार है। तिवारी असंगत चीजों को एक साथ रखकर नया व्यंग्यार्थ पैदा करते हैं—गड्ढा और व्यवस्था, सब्जी मंडी और पुरस्कार, आम और साहित्यकार, ए.आई. और दीवाली। यही उनका विशिष्ट व्यंग्य-कौशल है।

उनके व्यंग्य की एक और महत्वपूर्ण विशेषता आत्मव्यंग्य है। साहित्यिक संसार पर चोट करते हुए वे स्वयं को उससे बाहर खड़ा नहीं करते। यही ईमानदारी उनके व्यंग्य को उपदेश बनने से बचाती है। हाँ, कुछ रचनाओं में व्यंग्य की ऊर्जा इतनी अधिक है कि लेखक एक ही प्रसंग पर कुछ अधिक देर ठहर जाते हैं; किंतु यह उस लेखक की स्वाभाविक सीमा भी है जिसके पास कहने को बहुत कुछ है।

अरविंद तिवारी छोटी-सी विसंगति पकड़ते हैं और उसे इस तरह विस्तार देते हैं कि उसमें पूरा समय दिखाई देने लगता है। ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ की सार्थकता इसी में है कि यह दूसरों पर हँसने वाली किताब भर नहीं, बल्कि साहित्य और स्वयं साहित्यकार को भी हँसी के कटघरे में खड़ा करती है।

शायद हमारे समय की हर गंभीर चीज के भीतर सचमुच एक गोलगप्पा छिपा है। उसे फोड़ने के लिए व्यंग्यकार की उंगली चाहिए और उसमें चटपटा पानी भरने की कला भी। अरविंद तिवारी यह काम बखूबी करते हैं।

मेरी दृष्टि में यह संग्रह समकालीन हिंदी व्यंग्य की सशक्त धारा में अपनी जगह बनाता है। इसे पढ़कर मुस्कान आती है, लेकिन मुस्कान के पीछे एक असुविधाजनक सवाल भी रह जाता है—जिन विसंगतियों पर हम हँस रहे हैं, कहीं वे हमारी अपनी आदतें तो नहीं?

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

इन दिनों लंदन में

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८७ – देश-परदेश – हर दिन ना होत एक समान ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८७ ☆ देश-परदेश – हर दिन ना होत एक समान ☆ श्री राकेश कुमार ☆

उपरोक्त चित्र वर्षा ऋतु में होने वाली वर्षा से ठंडे खाद्य पदार्थों की बिक्री को प्रभावित करता हुआ बता रहा हैं।अब समय बदल चुका हैं।हम सब तो प्रकृति के विरुद्ध शंखनाद बजा चुके हैं। सर्दी के मौसम में रजाई में बैठ कर हीटर की गर्मी के पूरे मज़े लेने के लिए आइसक्रीम खाना आम बात हो चुकी है।

छाता खरीद कर अब लोग आइसक्रीम खाते हैं, इससे छाता विक्रेता भी खुश रहता है, और आइसक्रीम विक्रेता भी खुश। हम सब ने प्रकृति को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

कोल्ड ड्रिंक आदि ठंडे पेय का अब कभी भी ऑफ सीज़न नहीं होता है। ठंड में विवाह के समय मुफ्त के गर्म गुलाब जामुन के साथ वनिला आइसक्रीम की जुगलबंदी कुछ दशकों से लोक प्रिय हो चुकी हैं। गर्म खाद्य पदार्थ के बाद चिल्ड पानी पीना हो या ठंडी बियर के बाद  गरमा गर्म मुर्गा हलक से नीचे करने में हमारा स्वास्थ्य भी खराब नहीं होता है।

हमारा शरीर भी विचार करता होगा, हमें क्या जो करेगा वो ही ना भरेगा। रोग होने पर मौसम और हवा पर दोषारोपण कर हम  पाक साफ बन जाते हैं।

साठ के दशक यानि हमारे बचपन की बाते यदि आज के किसी जेन ज़ी से करो तो उल्टा जवाब मिलता है, “यू ओल्डीज़” हमेशा आदि मानव की तरह क्यों बिहेव करते हैं?

हमारी दादी तो गर्म भोजन करने के पश्चात तुरंत ठंडे जल से हाथ तक धोने के लिए मना करती थी। किसी भी मौसम में बाहर से घर प्रवेश के दस मिनट के बाद ही साधारण जल तक ग्रहण करने दिया जाता था। कारण पूछने पर परिवार के बड़े, बाहर और घर के टेम्प्रेचर के अंतर को शरीर को एडजेस्ट करने का कूलिंग पीरियड बता कर घर के छोटे बच्चों की जिज्ञासा को वैज्ञानिक तथ्य से शांत कर दिया करते थे। आज की युवा पीढ़ी तो गूगल की दलीलों से बुजर्गों की खिल्ली उड़ा देते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६८ ⇒ अट्टहास ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अट्टहास ।)

?अभी अभी # १०६८ ⇒ आलेख – अट्टहास ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(HEE HAW )

हँसने के कई तरीके होते हैं। जब हँसी छूटती है, तब वह भीड़ की तरह दिशाहीन होती है। कहीं मंद मंद हँसी, तो कहीं हँसी के फव्वारे। कभी कभी तो भरे हुए बादलों की तरह हँसी फूट पड़ती है। आखिर हँसी में ऐसा क्या है, कि जब यह वेग में होती है, तो रोके नहीं रुकती।

हमारे अंदर गम और खुशी के गोदाम हैं, आप चाहें तो उन्हें गोडाउन भी कह सकते हैं। गोदाम अक्सर भरते रहते हैं, और खाली होते रहते हैं। आजकल इन्हें कोल्ड स्टोरेज भी कहा जाने लगा है। जब चीजों के दाम बढ़ते हैं, तब गोदाम भरे रहते हैं, और जब चीज़ों के दाम घटने लगते हैं, तो गोदाम खाली होते चले जाते हैं। गोदाम का भरना और खाली होना, वस्तुओं के दाम बढ़ने और घटने, से जुड़ा रहता है। दाम के अप और डाउन होने, अर्थात् घटने बढ़ने से गोडाउन की सेहत पर असर पड़ता है।।

हँसना सेहत के लिए अच्छा है। सेहत सुधारने के लिए आजकल लोग हेल्थ क्लब की तरह लाफ्टर क्लब भी जाने लग गए हैं। रोना तो इंसान जन्मजात लेकर आया है, लेकिन वह बड़ा होकर हँसना भूल गया है। हँसने की कोचिंग क्लास है लाफिंग क्लब, जहां हँसना सिखाया जाता है।

गम के गोदाम अक्सर भरे हुए ही रहते हैं और खुशी के खाली, क्योंकि गम के खरीददार कम होते हैं, और खुशी तो इंसान हर कीमत पर खरीदने को तैयार होता है। पहले खुशी खरीदने के लिए ढेर सारा पैसा लेकर बाजार जाना पड़ता था, आजकल खुशी भी ऑनलाइन पेमेंट पर अमेजान और फ्लिपकार्ट पर चढ़कर घर चली आती है। गम पर डिस्काउंट बढ़ता जा रहा है, पर कोई खरीद नहीं रहा। खुशी, लोग खुशी खुशी अपने घर ले जा रहे हैं।।

हँसना, खुशी जाहिर करने का पारंपरिक तरीका है। यूं तो हँसी के कई भेद हैं, लेकिन प्रमुख भेद पुरुष और स्त्री की हँसी का है। महिलाएँ, हँसती नहीं, खिलखिलाती हैं। लगता है, कहीं घंटियाँ बज रही हों।

चूड़ी की खनक और पायल की झंकार उनकी हँसी में शामिल होती है, क्योंकि ईश्वर ने उनके गले में सुर और स्वर दिया है।

पुरुष का स्वर खुरदुरा होता है क्योंकि रिश्ते में वे किसी के बाप लगते हैं। जितनी मोटी आवाज़, उतनी ही मर्दानी आवाज़ और ऊपर से हँसी के ठहाके। हा, हा, हि ही और हु हू की पूरी बारहखड़ी हं, ह:, ह : ह :। बिना कुछ कहे, कहकहे ही कहकहे के ऐसे फव्वारे छूटते हैं, कि लोग भीग जाने के अंदेशे से, चार कदम दूर ही खड़े रहते हैं।।

एक और धांसू हँसी होती है, जिसे अट्टहास कहते हैं। अट्टहास शब्द से ही ऐसा प्रतीत होता है, मानो अचानक कोई चट्टान की हँसी फूट पड़ी हो। हमारे धार्मिक सीरियल में अक्सर राक्षसों को हँसते हुए दिखाया जाता है। वह हँसी थमने का नाम ही नहीं लेती। हर एक दो डायलॉग के बाद फिर वही हँसी का टेप। आप इस हँसी को अट्टहास का परिहास भी कह सकते हैं, क्योंकि इस हँसी पर किसी को हँसी नहीं आती।

कभी कभी हँसते हँसते भी, आँखों में आँसू निकल आते हैं तो कभी रोते रोते भी हँसी निकल आती है। हँसना, रोना सहजता की निशानी है। किसी बात पर हँसना, किसी घटना पर हँसना अथवा परिस्थिति पर हँसना बुरा नहीं लेकिन किसी पर हँसना मना है। जो झरने की तरह फूटे, वह हँसी। फिर चाहे वह ठहाका हो, कहकहा हो, या फिर अट्टहास। लेकिन इस बात का जरूर रखें खयाल, कोई बीमार, दुखी, लाचार ना हो आसपास।।

खुशियों में शामिल हों, लोगों को अपनी खुशी में शामिल करें। गम के गोदाम खाली पड़े रहें, खुशियों को कैद ना करें, आज़ाद करें। सुना है खुशी बांटने से बढ़ती है और हँसी की फुहार भी तो रंगबिरंगी होली की फुहार ही होती है। जिस चेहरे पर हंसी ना,

वह काहे की हसीना। अब तो हँसी ना, हँसी ना …!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ रुग्ण मानसिकता…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा  – रुग्ण मानसिकता…!

☆ लघुकथा ☆ रुग्ण मानसिकता…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

(आज के समय में दम तोड़ती हुई संवेदना से उपजी लघुकथा…!)

 

रमिया जिन साहब के घर झाड़ू-पोंछे और बर्तन साफ़ करने का काम करती है। उनकी उम्र यही कोई अस्सी और मेम साहब की लगभग पचहत्तर की होगी। पति-पत्नी दोनों पढ़े-लिखे और सेवानिवृत्त हैं। बेटा और बेटी लक्ष्मी जी की कृपा से साधन-सम्पन्न हैं।

पिछले दिनों रमिया के साहब की आधी रात के लगभग अचानक साँस हलक में अटकने से पलक झपकते निधन हो गया। मेम साहब ने रमिया को मोबाइल लगाकर दुखद समाचार दिया कि साहब नहीं रहे हैं। वह भागी-भागी साहब के घर पहुँची और रात भर मेम साहब के आँसू पोंछती रही।

मेम साहब आँसू बहाते हुए बोली- ‘हाय राम! देख, तो री! रमिया… मेरे दाँए पड़ोसी को कैंसर और बाँए पड़ोसी को हार्ट की बीमारी है, बावजूद उनको कुछ नहीं हुआ और मेरे अच्छा-ख़ासा, खाता-पीता, चलता-फिरता आदमी मेरी आँखों के सामने चल बसा।

यह सुनकर कम पढ़ी-लिखी, पर समझदार रमिया ने अपना सर दीवार से ठोक लिया और सोचने लगी… क्या कथित शिक्षित और सभ्य कहे जाने वाले लोग ऐसी रुग्ण मानसिकता के होते हैं जो अपनों की मौत पर बीमार पड़ोसियों के मरने की कामना करते हैं…!

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (10 अगस्त से 16 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (10 अगस्त से 16 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि हनुमान जी के पास राम नाम का रसायन है। इसका अर्थ हुआ हनुमान जी के पास राम नाम रूपी दवा है। श्री हनुमान जी श्री रामचंद्र जी के सेवक हैं इसलिए उनके पास राम नामरूपी दवा है। इस दवा का उपयोग हर प्रकार के रोग में किया जा सकता है। दुनिया में सिर्फ श्रीराम नाम ही एक ऐसी दवा है जिसे सभी रोग ठीक हो जाते हैं। श्री हनुमान जी को याद करने के अद्भुत ग्रंथ श्री हनुमान चालीसा में लिखा है कि :-

राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥

इस चौपाई के संपुट पाठ करने से सभी रहस्यों की प्राप्ति होती है।

नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

मैं पंडित अनिल पाण्डेय आज आपको 10 से 16 अगस्त तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा परंतु सबसे पहले इस सप्ताह के ग्रहों के विचलन के बारे में बता रहा हूं।

इस सप्ताह सूर्य, बुध और गुरु कर्क राशि में, मंगल मिथुन राशि में, शुक्र कन्या राशि में शनि मीन राशि और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।

आईये अब राशि वार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपको अपनी प्रतिष्ठा में वृद्धि प्राप्त होगी। अगर आप ध्यान देंगे तो प्रतिष्ठा में अधिक वृद्धि हो सकती है। आपका और आपके जीवन साथी को स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। आपको अपने संतान से थोड़ा सहयोग प्राप्त होगा। कचहरी के कार्यों में आपको सावधान रहना चाहिए। आपके शत्रु शांत रहेंगे। छात्रों की पढ़ाई ठीक-ठाक चलेगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में मामूली तनाव रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 10, 11 और 12 तारीख कार्यों करने के लिए सफलता दायक है। 15 तारीख के दोपहर के बाद से और 16 अगस्त को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

वृष राशि

यह सप्ताह आपके भाई बहनों के लिए उत्तम है। उनको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। उनके धन में वृद्धि होगी। आपके साथ उनका संबंध अच्छा रहेगा और आपको उनका अच्छा सहयोग भी प्राप्त हो सकता है। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। कर्मचारियों अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रहेगा। जैसे पहले चल रहा था वैसे ही चलेगा। आपके संतान को थोड़ा कष्ट हो सकता है। छात्रों की पढ़ाई में बाधा पड़ सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 15 तारीख सफलता प्राप्त करने में मददगार है। सप्ताह के बाकी दिन पहले जैसे ही रहेंगे। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का सुंदर योग है। थोड़े से परिश्रम से ज्यादा धन की प्राप्ति होगी। भाग्य से इस सप्ताह आपको मदद नहीं मिल पाएगी। भाग्य के भरोसे बिल्कुल ही ना बैठे। अपने परिश्रम पर विश्वास करें। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। इसके अलावा माता जी के स्वास्थ्य के प्रति भी आपको सतर्क रहना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 15 और 16 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मददगार है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कर्क राशि

यह सप्ताह आपके लिए अत्यंत अच्छा हो सकता है। आपको बस परिश्रम और सही सोच के साथ कार्य करने की आवश्यकता है। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। भाई बहनों के स्वास्थ्य में थोड़ी कमजोरी हो सकती है। भाई बहनों से आपके प्रयासों के कारण संबंध सुधार सकते हैं। भाग्य से मामूली सहयोग प्राप्त होगा। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आप अपने दुश्मनों को साधारण से प्रयास से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 10, 11 और 12 तारीख विभिन्न प्रकार से लाभदायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार के दिन दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

सही ढंग से कार्य करने पर कचहरी के कार्यों में सफलता की उम्मीद है। आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य से मामूली मदद मिलेगी। आपके संतान को सुख प्राप्त होगा। संतान का आपको सहयोग मिलेगा। शत्रुओं को आप आसानी से हरा सकते हैं। छात्रों की पढ़ाई ठीक चलेगी। परीक्षाओं में उनको सफलता प्राप्त होगी। भाग्य के स्थान पर अपने परिश्रम पर आपको यकीन करना चाहिए। भाग्य से आपको मामूली मदद ही मिल पाएगी। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 15 तारीख फलदायक है। 10, 11 और 12 तारीख को आपको सावधानी के साथ सचेत रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

कन्या राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक है। विवाह के उत्तम प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि भी संभव है। नए प्रेम संबंध भी बन सकते हैं। धन आने का अच्छा योग है। व्यापार में आपको लाभ होगा। व्यापारियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह बहुत ध्यानपूर्वक कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं होंगे। आपके माता जी का और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 15 तारीख के दोपहर के बाद का समय तथा 16 तारीख अनुकूल है। 13, 14 और 15 के दोपहर तक का समय सचेत रहने का है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

तुला राशि

अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको अपने अधिकारियों की प्रशंसा प्राप्त होगी। कार्यालय में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी। उनको अच्छे प्रोजेक्ट मिल सकते हैं। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु परास्त नहीं होंगे। भाग्य से आपको इस सप्ताह मदद मिलने की उम्मीद नहीं है। आपको अपने कर्म पर विश्वास करना पड़ेगा। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 10, 11 और 12 तारीख परिणाम दायक है। 15 और 16 तारीख को आपको सजग रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से अच्छी मदद प्राप्त होगी। भाग्य से आपके कई कार्य हो सकते हैं। इस सप्ताह आपको अपने भाग्य पर अपने परिश्रम के साथ भरोसा करना चाहिए। दुर्घटनाओं से आपको सावधान रहना चाहिए। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति भी इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहना चाहिए। धन प्राप्ति हेतु बहुत ज्यादा प्रयास करना इस सप्ताह आपके लिए हानिप्रद हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 15 तारीख शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन ठीक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपको दुर्घटनाओं से डरने की विशेष आवश्यकता नहीं है। दुर्घटनाओं में आपको कोई नुकसान नहीं होगा। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। आपका स्वास्थ्य इस सप्ताह उत्तम रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 15 और 16 तारीख कार्यों को करने के लिए लाभप्रद है। 10, 11 और 12 तारीख को आपको सतर्क रहकर अपने कार्यों को मुस्तैदी से करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

मकर राशि

यह सप्ताह आपके जीवन साथी के लिए अत्यंत सुंदर रहेगा। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। उनको ऐश्वर्य और वैभव प्राप्त होगा। उनकी मानसिक स्थिति भी अत्यंत अच्छी रहेगी। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से परास्त कर सकते हैं। भाग्य आपको कुछ विशेष ढंग से मदद करेगा। भाग्य की मदद आपको सीधे-सीधे प्राप्त नहीं होगी। परंतु आपके कई कार्य अच्छे भाग्य के कारण हो जाएंगे। व्यापारियों का व्यापार ठीक चलेगा। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। माता और पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 10, 11 और 12 तारीख विशेष रूप से परिणाम मूलक है। 13, 14 और 15 तारीख को आपको सजगता के साथ अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। उनको समाप्त करने के लिए आपको प्रयास करने चाहिए। आपके प्रयासों को सफलता प्राप्त होगी। कचहरी के कार्यों में आपको थोड़ी बहुत सफलता प्राप्त हो सकती है। परंतु सावधानी आवश्यक है। धन आने का योग है। दुर्घटनाओं से आप इस सप्ताह बाल बाल बचेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 15 तारीख के दोपहर तक का समय उत्तम है। सप्ताह के बाकी दोनों में आपको सावधान रहकर कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मीन राशि

 यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम रहेगा। उनको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। अगर वह नौकरी में है तो वहां उनको अच्छा प्रोजेक्ट या अच्छी सीट मिल सकती है। विवाह के प्रस्ताव के बारे में इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। धन आने की उम्मीद की जा सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 15 की दोपहर के बाद से लेकर और 16 तारीख प्रभावशाली है। 13, 14 और 15 की दोपहर तक आपको सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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