(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपना अपना सच…“।)
अभी अभी # ९२६ ⇒ आलेख – अपना अपना सच श्री प्रदीप शर्मा
हम सब सच्चे, मेहनती और ईमानदार हैं, हमें यह किसी को बताने की, अथवा सिद्ध करने की जरूरत नहीं। वैसे हम स्वयं भी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि हम कितने सच्चे, मेहनती और ईमानदार हैं। आपकी आप जानो, हम तो सिर्फ अपनी बात कह रहे हैं।
सच तो खैर हम बचपन से ही बोलते आ रहे हैं। क्या आपने सुना नहीं, सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला ! हम तो बस, सुबह उठकर आईने में अपना मुंह देख लेते हैं और तसल्ली कर लेते हैं कि कहीं हमारा मुंह काला तो नहीं। हमें और हमारे सच को कहीं नज़र ना लगे, इसलिए सावधानी के लिए, एक काला टीका और लगा लेते हैं। सांच को आंच नहीं, फिर भी क्या भरोसा कहीं हमारे सच को किसी की नज़र लग गई तो।।
अब सच कोई ओढ़ने बिछाने की चीज तो है नहीं, न तो इसे घर में सजाया जा सकता है और न ही इसे अकेले घर में छोड़ा जा सकता है। जहां जाते हैं, इसे साथ में ले जाते हैं, कहते हैं अगर सच का साथ हो, तो कभी झूठ पास नहीं फटकता। कभी कभी जब गलती से सच का साथ अगर छूट जाता है तो झूठ उसका फायदा उठाकर हमारे साथ हो लेता है। वैसे अगर हम सच्चे हैं तो झूठ भी हमारा क्या बिगाड़ लेगा।
बचपन में हम ज्यादा सच झूठ नहीं समझते थे। हम सबको सच ही समझ लेते थे। फिर हमें समझाया गया, झूठ से बचकर रहो।
अब अगर झूठ कोई दोस्त हो तो समझ जाएं, कि इससे दूर रहा करो। जहां दोस्ती दुश्मनी जैसी ही कोई चीज ना हो, वहां क्या सच और क्या झूठ। सभी अपने लगते थे। सभी सच्चे लगते थे।।
बचपन में जब हम सही गलत ही नहीं समझ पाते थे, तो सच झूठ क्या समझेंगे। अब किसी नादान बच्चे ने मुंह में मिट्टी भर ली और मुंह नहीं खोल रहा तो उससे पूछा जाता है, नन्हे मुन्ने बच्चे तेरे मुंह में क्या है, और वह सर हिला कर कह देता है, कुछ नहीं।
मां को भरोसा नहीं होता, मुंह खोलकर मिट्टी निकालकर कहती, झूठ बोलता है, मिट्टी खाता है और कहता है, मुंह में कुछ नहीं। कुछ भी कहो, मिट्टी के साथ, झूठ का स्वाद भी मुंह को लग ही जाता है। वह बार बार झूठ बोलता है, मार खाता है।
सच यूं ही नहीं उगला जाता। पहले मां की मार, फिर मास्टरजी की मार, थाने में पुलिस की मार भले ही कितना भी सच उगलवा ले, परिस्थिति की मार एक ऐसा कड़वा सच है जो न तो निगलते बनता है और न ही उगलते।।
सत्य की सदा विजय होती है, यह हम अदालतों में देख ही रहे हैं, अतः इस पर ज्यादा प्रकाश डालने की जरूरत नहीं। आपसे सच बुलवाने के लिए शपथ पत्र लिया जाता है, जिसे हलफनामा अथवा एफिडेविट कहा जाता है।
शपथ ही कसम है, एक तरह की सौगंध। कसमें, वादे, प्यार, वफा सब बातें हैं, बातों का क्या, यह हम नहीं, फिल्म उपकार के प्राण ऊर्फ लंगड़ कह गए हैं।
कसम भी क्या चीज है कसम से ! पत्नी स्वादिष्ट भोजन परोस रही है। स्वाद में अधिक खाने में आ ही जाता है। एक फुल्का और ले लीजिए, अरे नहीं भाई, पेट भर गया है। लगता है खाना अच्छा नहीं बना, वर्ना एक तो और ले ही लेते। अच्छा, चलो नहीं मानती तो एक रख दो। पत्नी उत्साह में थोड़े चावल और ले आती है, आप परेशान हो जाते हैं। सच में अब बिल्कुल जगह नहीं है। आपको मेरी सौगंध, इतना सा तो ले ही लो। बेचारा सच, इस सौगंध से परेशान हो जाता है।।
सच भले ही परेशान हो, पराजित नहीं होता। आज कौन परेशान है और कौन विजयी, यह कहने की आवश्यकता ही नहीं है। सच का धंधा मंदा है, झूठ का कारोबार खूब फल फूल रहा है। सब अपने अपने सच और ईमान को सभाले हुए हैं। तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफिर जाग जरा।
कलि के बाद कलयुग आया, जिसे हमने मशीनी युग नाम दिया। अटल युग के बाद अब डिजिटल युग आ गया है, इंसान की चतुराई धरे रह गई है, झूठ को पकड़ने के लिए सच अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का रूप धारण कर आया है। शायद अब सच के नहीं, झूठ के परेशान होने के दिन आ गए हैं।।
मौसम की तरह सच झूठ का चोला पहनने वालों की अब खैर नहीं। जब झूठ के कपड़े उतारे जाते हैं, तब ही नंगा सच नजर आता है। अगर आपने सच में, सच का दामन थामा है, तो आपको झूठ और पाखंड से डरने की जरूरत नहीं।
सच के सौदागरों और ठेकेदारों की कमी नहीं आजकल। उनके बहकावे में आकर कोई झूठा सच्चा सौदा ना कर बैठें। आपके सच को संभालें, क्योंकि आज के डिजिटल सच को भी साइबर क्राइम का खतरा है।।
🌷जब दिल गुनगुनाने लगे: हिन्दी फ़िल्मी गीतों का अमर जादू 🌷
कुछ फ़िल्में होती हैं।
कुछ कहानियाँ होती हैं।
और फिर होते हैं गीत — वे मधुर, काँपते हुए स्वर, जो चुपके से हमारी ज़िन्दगी में उतरते हैं और फिर कभी साथ नहीं छोड़ते।
हिन्दी सिनेमा ने हमें बहुत-से उपहार दिए हैं, पर सबसे अनमोल, सबसे स्थायी, सबसे आत्मा को छू लेने वाला उपहार है उसके गीत।
परदे से दृश्य उतर जाते हैं, सिनेमाघर बदल जाते हैं, कलाकार समय के साथ ओझल हो जाते हैं — पर गीत? वे चलते रहते हैं।
वे हमारे साथ बस-यात्राओं में होते हैं, विवाह की रातों में, बरसाती खिड़कियों के पास बैठी उदास शामों में, और सुबह की चाय के साथ आती धीमी धूप में।
हिन्दी फ़िल्म का गीत केवल गीत नहीं होता।
वह कविता है, जिसे सुरों का आकाश मिला है।
वह स्मृति है, जिसे लय का स्पर्श मिला है।
वह जीवन है, जो संगीत बनकर बह रहा है।
और जब शब्द, स्वर, संगीत और छायांकन एक साथ मिलते हैं — तब कुछ अलौकिक घटता है।
कुछ ऐसा, जो समय से परे हो जाता है।
🌷जब कविता ने परदे पर कदम रखा
हर महान गीत की शुरुआत शब्द से होती है।
वे शब्द, जो केवल तुकबन्दी नहीं थे, बल्कि धड़कनों की भाषा थे। हमारे गीतों को गढ़ा उन कवियों ने, जिन्होंने बाज़ार के लिए नहीं, मनुष्य के लिए लिखा। उनकी कलम में विरह भी था, विद्रोह भी; करुणा भी थी, करिश्मा भी।
उनकी एक पंक्ति दशकों तक स्मृति में गूँजती रहती है।
कभी प्रेम की तरह, कभी प्रार्थना की तरह, कभी प्रश्न की तरह।
“सजन रे झूठ मत बोलो…” — कितनी सरल पंक्तियाँ, पर जीवन का सारा दर्शन समेटे हुए।
“ये महलों, ये ताजों, ये तख़्तों की दुनिया…” — मानो सफलता की चकाचौंध के पीछे छिपे खालीपन पर सीधा प्रश्न।
कविता ने सिनेमा में आकर अपनी गरिमा नहीं खोई; उसने परदे को गरिमा दे दी।
🌷वे आवाज़ें, जो घर-सी लगती हैं
फिर आए वे स्वर — जिनमें मिठास भी थी, दर्द भी; चंचलता भी थी, तप भी।
कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें सुनकर लगता है जैसे कोई अपना पास बैठा हो।
जब कोई गायिका ऊँचे सुर में जाती है, तो वह केवल गाती नहीं — प्रार्थना करती प्रतीत होती है।
जब कोई गायक धीमे से शब्दों को थामता है, तो लगता है जैसे दिल की परतें खुल रही हों।
“चौदहवीं का चाँद हो…” सुनते ही मन में चाँदनी उतर आती है।
“मेरे सपनों की रानी…” की सीटी आज भी किसी साधारण दोपहर को उत्सव बना देती है।
“जाने कहाँ गए वो दिन…” में बीता हुआ समय जैसे आँखों के सामने लौट आता है।
और जब “जाने वो कैसे लोग थे…” सुनाई देता है, तो लगता है जैसे अधूरी मोहब्बत का कोई पुराना पत्र फिर खुल गया हो।
ये आवाज़ें केवल गायक-गायिकाओं की नहीं थीं — वे हमारी अपनी भावनाओं की प्रतिध्वनि थीं।
🌷धुनों के वे जादूगर
इन स्वरों के पीछे थे वे संगीतकार, जिन्होंने रागों में आत्मा भरी, लोकधुनों को शास्त्रीय गरिमा से जोड़ा, और पश्चिमी वाद्यों को भारतीय संवेदना में पिरो दिया।
उनकी रचनाएँ दृश्य को सजाती नहीं थीं; वे दृश्य को अर्थ देती थीं।
“ओ दुनिया के रखवाले…” में भक्ति की पुकार है।
“रमैया वस्तावैया…” में मिलन की सरल प्रसन्नता है।
“मेरा सुंदर सपना बीत गया…” में टूटे हृदय की करुणा है।
और फिर वह शाही वैभव — “प्यार किया तो डरना क्या…”
शीशमहल की चमकती दीवारों के बीच प्रेम का निर्भीक उद्घोष।
शब्द, स्वर और छायांकन — सब मिलकर प्रेम को अमर कर देते हैं।
🌷गीत, जो जीवन बन गए
कुछ गीत अब फ़िल्मों के नहीं रहे; वे हमारे हो चुके हैं।
“मेरा जूता है जापानी…” — कितनी सहज शरारत, कितना मासूम गर्व!
आज भी जब वह बजता है, तो भीतर कहीं एक भोला-सा आत्मविश्वास जाग उठता है।
कौन-सा विवाह ऐसा होगा जहाँ “ऐ मेरी ज़ोहरा जबीं…” पर मुस्कान न खिल उठे?
उम्र को ठेंगा दिखाता प्रेम — यही तो जीवन का सबसे सुंदर उत्सव है।
“एक चतुर नार…” की शरारत आज भी उतनी ही ताज़ी है।
हँसी और संगीत का ऐसा संगम, जो मन को हल्का कर दे।
और फिर वह गीत, जिसे सुनते ही आँखें नम हो जाती हैं —
“ऐ मेरे वतन के लोगों…”
यह केवल गीत नहीं, सामूहिक स्मृति है।
यह शहादत की याद है, यह कृतज्ञता की आँसू भरी सलामी है।
🌷हमारी साझा स्मृति
ये गीत मनोरंजन नहीं हैं; ये हमारी साझा डायरी हैं।
रेडियो के उन दिनों से, जब बिजली चली जाती थी और कोई ट्रांजिस्टर अँधेरे में गुनगुनाता रहता था…
रेलवे स्टेशन की चाय की दुकानों से…
कैसेट, सीडी और अब मोबाइल की प्लेलिस्ट तक —
इन गीतों ने हमारे जीवन के हर मोड़ पर साथ निभाया है।
पहला प्रेम।
पहली विफलता।
पहली तनख़्वाह।
पहली विदाई।
जब भी कहीं से कोई पुरानी धुन तैरती हुई आती है — किसी कार की खिड़की से, पड़ोसी के घर से, या अचानक किसी याद की तह से —
मन ठिठक जाता है।
एक हल्की-सी मुस्कान आ जाती है।
जैसे कोई पुराना मित्र अचानक सामने आ खड़ा हुआ हो।
🌷जब तक भावनाएँ हैं, गीत रहेंगे
समय बदलेगा।
तकनीक बदलेगी।
रुचियाँ बदलेंगी।
पर ये गीत रहेंगे।
क्योंकि ये समय से बँधे नहीं हैं — ये भावनाओं से जुड़े हैं।
और जब तक मनुष्य प्रेम करेगा, खोएगा, आशा करेगा, प्रतीक्षा करेगा —
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The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सूत उवाच…“।)
अभी अभी # ८९२ ⇒ आलेख – सूत उवाच श्री प्रदीप शर्मा
यारों, शीर्षक हमारे पर मत जाओ ! कल एक भूले बिसरे मित्र का फोन आया, प्रदीप भाई कैसे हो !
ठंड में कोई खैरियत पूछे तो वैसे ही बदन में थोड़ी गर्मी आ जाती है। क्या आपने कभी पतंग उड़ाई है, उनका अगला प्रश्न था। उन्होंने मेरे जवाब का इंतजार नहीं किया और दूसरा प्रश्न दाग दिया, क्या कभी मांजा सूता है ? जो प्रश्न उन्हें सूत जी से पूछना था, वह उन्होंने मुझसे पूछ लिया। इसके पहले कि सूत उवाच, मैं अवाक् !और मैं पुरानी यादों में खो गया।
आज जिसे हमारे स्वच्छ शहर की कान्हा नदी कहा जाता है, तब यह खान नदी कहलाती थी, और हमें इसकी गंदगी से कोई शिकायत नहीं थी। रामबाग और कृष्णपुरा ब्रिज के बीच, एक पुलिया थी, जिसे हम बीच वाली पुलिया कहते थे। यह हमारे घर और मिडिल स्कूल को आपस में जोड़ती थी। खान नदी के आसपास तब बहुत सा, हरा भरा मैदान था, जो हमारे लिए खुला खेल प्रशाल था। यह पुलिया सूत पुत्रों के लिए मांजा सूतने के काम आती थी। कांच को बारीक पीसने से लगाकर पतंग उड़ाने, काटने और लूटने का काम यहां बड़े मनोयोग से किया जाता था।।
ऐसा नहीं कि हमने कभी पतंग नहीं उड़ाई। जब भी उड़ाई, पतंग ने आसमान नहीं देखा, हमने हमेशा मुंह की खाई। जिसके खुद के पेंच ढीले होते हैं, वे दूसरों की पतंग नहीं काटा करते। लूटमार से हम शुरू से ही दूर रहे हैं, किसी की कटी पतंग भला हम क्यों लूटें।
हमारे इसी शांत स्वभाव के कारण हमने देवानंद की फिल्म लूटमार और ज्वेल थीफ़ भी नहीं देखी।
जब मांजा सूतने में हमने कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई तो मित्र ने अगला प्रश्न किया, अच्छा आपने सराफे की चाट तो खाई ही होगी और कभी दाल बाफले भी तो सूते ही होंगे और जब स्कूल में माड़ साब बेंत से सूतते थे, तब कैसा लगता था। पहले चाट और दाल बाफले और बाद में सुताई, यह क्या है भाई, हम फोन रखते हैं भाई। और हमने फोन रख दिया।।
हमारा यह मिडिल स्कूल वैसे भी सुभाष मार्ग और महात्मा गांधी मार्ग के बीच सैंडविच बना हुआ था। हमारे गांधीवादी हेडमास्टर ने हमसे चरखा भले ही नहीं चलवाया हो, तकली पर सूत जरूर कतवाया है।
हम यह भी जानते हैं कि सूत को सूत्र भी कहते हैं और पुरुष मंगलसूत्र नहीं,
यज्ञोपवीत धारण करते हैं, जो सूत के धागों से ही बनती है। सूत पुत्र दासी के पुत्र को भी कहते हैं और पवन के पुत्र को भी पवनसुत कहते हैं।।
आज तिल गुड़ का दिन है, जिन्हें मांजा सूतना है, मांजा सूतें, पतंग उड़ाएं, पेंच लड़ाएं, किसी की पतंग तो किसी के विधायक लूटें, हम तो बस मीठा खाएंगे मीठा बोलेंगे, मांजा नहीं, मज़ा लूटेंगे और भरपूर प्यार लुटाएंगे।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जीभारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त. सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “प्रतिकार“.)
☆ कथा कहानी ☆ प्रतिकार —☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆
सुजाता कक्षा नौ की छात्रा थी. गाँव के आसपास केवल लड़कियों के लिए कोई स्कूल नहीं होने के कारण , वह जनता इन्टर कालेज, पथरवा में पढ़ती थी. यह स्कूल लड़के – लड़कियों सबके लिए था और सुजाता की तरह बहुत सी लड़कियां भी विभिन्न कक्षाओं में पढ़ती थी. लड़कों की संख्या लड़कियों से काफी अधिक थी, लेकिन डरने जैसी कोई बात थी नहीं और पढ़ाई भी स्कूल में ठीक होता था. सुजाता के साथ उसकी सहेली आरती, जो कक्षा दस में पढ़ती थी, उसके साथ ही गाँव से आती थी. दोनों खेतों के बीच बने पगडंडियों, छोटे रास्तों से आती थी. यह उनकी नित्य की दिनचर्या थी. रास्ते में कुछ अन्य गाँवों से भी छात्र – छात्राऐं मिलते जाते.
जाते समय सभी के बीच सामान्य पढ़ाई वा अन्य सामान्य बातें लगातार होती रहती थीं. कभी- कभी वे रास्ते में किसी खेत से गन्ना तोड़ कर चूस लिया करते थे अथवा लौटते समय अगर समय है, तो कोई खेल भी खेल लिया करते थे . यह उनकी रोज की दिनचर्या थी. स्कूल में पढ़ाई भी अन्य स्कूलों की तुलना में काफी अच्छी थी. स्कूल में प्रधानाचार्य छात्रों के अनुशासन पर बहुत ही ध्यान रखते थे, इसलिए छात्र भी ढ़ंग से रहते थे. सुजाता का भी स्कूल का दैनिक कार्यक्रम सामान्य गति से चल रहा था और वह मन लगा कर पढ़ाई करती थी.
इधर कुछ दिनों पहले उसके गाँव के ही राम अधार जी, जो बाहर नौकरी करते थे, सेवानिवृत्त होने के बाद गाँव में आ कर रहने लगे. उनका बहुत दिनों से गाँव से कोई खास समबन्ध नहीं था, केवल किसी के शादी- व्याह, या इसी प्रकार के किसी अवसर पर वे आते थे. उनके पास खेती काफी थी, जो उनके आदमी किया करते थे. वे भी बीच – बीच में आ कर खेती का काम देख लिया करते थे. उनका गाँव में बड़ा सम्मान था. लेकिन उनके लड़के- लड़कियों, या परिवार के अन्य सदस्यों के बारे में गाँव वालों को कोई खास जानकारी नहीं थी, क्योंकि पूरा परिवार एक साथ बहुत कम ही आता था. राम अधार जी सामान्यतः अपनी पत्नी जानकी के साथ ही आते थे और वह भी बहुत ही थोड़े समय के लिए आते. राम अधार जी अल्प, लेकिन मृदुभाषी थे.
उनके सभी बेटा- बेटी, बड़े हो चुके थे और उनकी शादियां हो चुकी थी. बेटे सब विभिन्न शहरों में नौकरी करते थे, इसलिए उनके साथ कोई बेटा नहीं आया, केवल पत्नी जानकी और उनका एक नाती संजय, उनके साथ गाँव आया और यही तीन लोग राम अधार जी के घर में रहते थे. संजय शहर छोड़ कर गाँव क्यों रहने आया, फिर अपने माता – पिता को छोड़ कर नाना- नानी के साथ क्यों रह रहा है, इसका कोई निश्चित कारण किसी को नहीं पता था, लेकिन गाँव का माहौल, जितनी मुंह उतनी बातें. कोई कहता कि इसका अपने माँ- बाप से पटता नहीं, इसलिए नाना – नानी के पास रहता है. नाना- नानी के यहाँ रहने से यह और बिगड़ गया है, इत्यादि.
चूंकि राम अधार जी का घर सुजाता के घर के पास ही था तो संजय के बारे यह सारी बातें, सुजाता के कानों में भी पड़ती थी, परन्तु वह इन बातों पर न तो ध्यान देती और न तो कुछ सोचती. अचानक सुजाता ने एक दिन संजय को अपने स्कूल में देखा तो वह चौंक गयी. चूंकि संजय ने कभी सुजाता को देखा नहीं था तो उसने ध्यान नहीं दिया. कुछ दिनों बाद सुजाता को पता लगा कि संजय का उसी के स्कूल में ग्यारहवीं कक्षा में प्रवेश मिला है. एक दिन रास्ते में संजय को उसने देखा भी और संजय की निगाह भी उस पर गयी. कुछ दिनों बाद संजय ने सुजाता को गाँव में भी देखा.
संजय गाँव से स्कूल अपनी सायकिल से आता – जाता था, और आते- जाते समय जोर- जोर से फिल्मी गाने गाता रहता था. पहले लड़के – लड़कियों ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन बाद में सबको बहुत ही खराब लगने लगा . एक दिन सुजाता ने कह ही दिया कि अगर हमेशा गाना गाना इतना ही जरुरी है तो धीरे- धीरे गाओ, सबको क्यों परेशान करते हो ? संजय ने कोई जबाब तो नहीं दिया लेकिन उसके चेहरे के भाव से लगा कि उसे सुजाता की सलाह अच्छी नहीं लगी.
इधर संजय , जिसे इतना तो पता था कि यह लड़की मेरे नाना के घर के आसपास ही कहीं रहती है, और उम्र में मुझसे छोटी है . उसने सोचा कि इसकी इतनी हिम्मत कैसे हुई कि मुझे अन्य लड़कियों के सामने कुछ कहे. संजय, माँ बाप का इकलौता बेटा था, नाना- नानी का दुलारा था और उसे घर में कोई समझाता अथवा डांटता नहीं था. उसे अपने मन का करना ही अच्छा लगता था तथा उसका चरित्र भी कुछ ठीक नहीं था. उसने सुजाता के इस बात को मन में रख लिया. वह सुजाता को सबक सिखाने के लिए अवसर खोज रहा था.
एक दिन सुजाता को घर से स्कूल के लिए निकलने में देर हो गई और उसके साथ जाने वाले लड़के- लड़कियां जा चुके थे उस दिन सुजाता अकेले ही स्कूल जा रही थी. रोज उसी रास्ते वह स्कूल जाती थी, जाने पहचाने रास्ते,खेत, खलिहान व पगडंडियाॅं थी और वह अनेकों बार स्कूल अकेले गयी थी और आयी भी थी. कभी- कभी देर तक पढ़ाई होने के कारण अंधेरे में भी उसे आना पड़ता था. इस कारण उसके मन में भय जैसी कोई बात नहीं थी. वह जानी- पहचानी पगडंडियों पर चली जा रही थी. चारो ओर गन्ना का हरा भरा खेत था, कई खेतों में गेहूँ की पौधे लहरा रहे थे, सरसों की पीली फूलों से खेत रगें थे. सुजाता जल्दी स्कूल पहुँचने की धुन में चली जा रही थी. इतने में पीछे से संजय सायकिल से आ गया और पास आते ही बोला, अपने को तुम क्या समझती हो, मैं चाहे जो कुछ भी करुं, तुम कहने वाली कौन होती हो?
संजय के अचानक आ जाने और इस प्रकार से पिछले घटना के बारे में इस ढंग से बात करना सुजाता को अच्छा नहीं लगा. सुजाता रुक गई और उससे बोली कि तुम्हें जो करना है, वह करो, लेकिन अगर मेरे सामने किया तो ठीक नहीं होगा, मैं मना करुंगी. अभी रास्ते से हटो, स्कूल की देरी हो रही है. संजय ने कहा कि अभी तो ठीक है, लेकिन तुमसे एक दिन इसका बदला मै तो लेकर रहूँगा. सुजाता ने कहा कि जो करना होगा, कर लेना, अभी रास्ते से हटो! और सुजाता तेजी से चलते हुए स्कूल चली गई.
इस घटना का जिक्र उसने किसी से भी नहीं किया और वह भूल गयी. इस घटना को हुए एक सप्ताह बीता था, सुजाता अपनी अन्य सहेलियों के साथ स्कूल जा रही थी. अचानक संजय पीछे से आया और सुजाता को धक्का मार कर आगे तेजी से निकल गया. सुजाता जब तक संभले- संभले, तब तक संजय काफी आगे निकल चुका था. सहेलियों ने कहा कि रहने दो हो सकता है उसको जल्दी रही हो, इस कारण धक्का लग गया हो. लेकिन सुजाता के मन में यह लग गया कि इसने उस समय जो धमकी दी थी, यह उसी कारण हो सकता है. इसके बाद, इस प्रकार की घटना सुजाता के साथ कई बार हुई. एक बार हद्द तब हो गयी, जब संजय ने सुजाता को अकेले पा कर, न केवल उसे धक्का दिया वरन् उसका दुपट्टा भी खींच कर ले गया और कुछ दूर जा कर दुपट्टा फेंक दिया.
सुजाता को अब लगा कि यह तो बहुत ज्यादा हो गया है, उसे इसका प्रतिकार करना ही होगा. उसके मन में एक बार विचार आया कि वह अपने घर पर बाबूजी को बताये. फिर समझ में आया कि कहीं बाबूजी पढ़ाई छोड़ा न दें. फिर आया कि बाबूजी इसके नाना से शिकायत करेंगे, तो नाना की बात या डांट , यह उद्दंड संजय कितना मानेगा कि नहीं मानेगा, ऐसे अनेकों विचार सुजाता के मन में चलने लगा . अन्त में सुजाता ने सोचा कि यह समस्या तो मेरी है, मुझे स्वयं ही इसका समाधान निकालना होगा. क्योंकि आज संजय है, कल कोई दूसरा हो सकता है, और मुझे तो रोज घर से बाहर निकलना ही है, स्कूल आना ही है. सुजाता ने मन ही मन एक निश्चय कर लिया.
इसके बाद सुजाता रोज जानबूझ कर स्कूल के लिए थोड़ी देर से निकलने लगी कि वह स्कूल जाते समय अकेले ही रहे . एक दिन वह अकेले ही खेत के बीच के रास्ते से जा रही थी. एक तरफ गन्ने का खेत था तो दूसरी तरफ गेहूँ की खेती थी. दूर कहीं पर गन्ने के रस को कढ़ाई में ,गुड़ बनाने के लिए खौलाया जा रहा था,उसकी सोंधी- सोंधी खुशबू आ रही थी. सुजाता स्कूल जा रही थी और जाते – जाते इस बात का भी ध्यान रख रही थी कि संजय पीछे आ रहा है या नहीं. उसे संजय पीछे से आता हुआ दिखाई पड़ गया. संजय जैसे ही उसके बगल में आया, सुजाता ने उसकी सायकिल को जोड़ से पैर से धक्का दिया. संजय सायकिल सहित गेहूँ की खेत में गिरा. सायकिल छटक कर एक तरफ गिरा और संजय गेहूँ की खेत में. खेत में थोड़ी पानी होने के कारण कीचड़ हो गया था. संजय कीचड़ में बुरी तरह धंस गया. सुजाता ने उसकी सायकिल उठाई और उसके ऊपर फेंक दिया और फिर सायकिल पर चढ़कर सुजाता बोली कि लड़कियों को छेड़ने में बड़ा मजा आता है, अब तुम्हें मैं बताती हूँ. सुजाता ने बगल के गन्ने के खेत से गन्ना उखाड़ा और संजय को मारना शुरू कर दिया. संजय का पैर और पूरा शरीर, चूंकि कीचड़ में फंसा था , उसे उठने में थोड़ी परेशानी हो रही थी, लेकिन वह अपना बचाव कर रहा था, लेकिन सुजाता को गाली भी देता जा रहा था. शोर सुन कर आसपास खेतों में काम करने वाले किसान और अन्य लोग एकत्रित हो गये. लोगों ने कहा कि क्यों लड़ रहे हो, स्कूल जाओ.
सुजाता ने कहा कि आज मैं इसे नहीं छोडूँगी, बहुत परेशान करता है. खैर किसी प्रकार से लोगों ने दोनों को छुड़ाया. सुजाता तो स्कूल चली गई, लेकिन संजय कपड़े गन्दे हो जाने के कारण, वापस घर लौट गया. संजय के नाना राम अधार ने पूछा कि स्कूल क्यों नहीं गए और यह कपड़े पर कीचड़ कैसे लगा है, संजय ने एक झूठी कहानी बना कर उन्हें सुना दिया. लेकिन गाँव का मामला, सब एक- दूसरे को थोड़ा बहुत तो जानते पहचानते ही थे, शाम ढलते- ढलते गाँव भर में सुबह स्कूल के रास्ते में हुई घटना की जानकारी पूरे गाँव को हो गई. सुजाता के घर वालों ने विशेषकर उसके पिता, पृथ्वी सिंह जी ने सुजाता से कहा कि मुझे क्यों नहीं बताया? उसका हाथ- पैर तोड़ देता . सुजाता ने कहा बाबूजी समस्या मेरी थी, तो उसका मुझे ही समाधान करना था, आप मेरे साथ कहाँ – कहाँ जाते और मेरी रक्षा करते!
इधर राम अधार जी को जब इस घटना की पूरी जानकारी हुई तो वह पृथ्वी सिंह जी के पास आये और सुजाता से अपने संजय के व्यवहार के लिए माफी मांगी और कहा सुजाता तुम मेरी बेटी जैसी नहीं, बल्कि मेरी बेटी ही हो . दूसरे दिन राम अधार बाबू ने संजय को यह कह कर कि वह उनके साथ गाँव में रहने लायक नहीं है, उसे उसके घर वापस भेज दिया.
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “एक समस्या टली–...”)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “एक समस्या टली-...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
☆
गाड़ी की चकील* टूटी है
जुँआ चरमराता ।
जैसे वह हो प्रणव गीत का
नायक उद्गाता* ॥
और अँधेरी रात
बैल के कंधे कसे – कसे ।
जैसे कर्जे में आसामी
लगते फँसे – फंसे ।
खीसे* की है नींव, कि
उसकी हिली हुई समझो |
वही आदमी करने निकला
मग में जगराता *॥
बित्ता बित्ता रेंग रही यह
सुविधा नासपिटी ।
जीवनरेखा लगे जहाँ पर
है सिमटी – सिमटी ।
गर्मी की यह प्यास गले
को भीषण सुखा रही –
बैलों की जोड़ी आपस का
तोड चली नाता ॥
माँग चूँग कर थका, चलाता
रहा बैल गाड़ी ।
एक समस्या टली, दूर
तो दूजी है ठाँड़ी ।
हाल* उतरती दिखी तभी
बायें पहिये की किन्तु ,
धैर्यवान क्या कभी विपति में
ऐसे घबराता ?
☆
* चकील= पहिये को गाड़ी से पृथक न होने देने के लिये लगाया गया कील रूपी सपोर्ट ।
* उद्गाता= उच्चस्वर में गाने वाला, सामवेद का गायक
* जगराता= रात्रि जागरण
* खीसा= जेब
* हाल= बैलगाड़ी के लकड़ी के पहिये के लिये लोहेका टायर
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “डाॅ अनोख सिंग…“।)
अभी अभी # ८६३ ⇒ आलेख – डाॅ अनोख सिंग श्री प्रदीप शर्मा
कुछ लोग अनोखे होते हैं तो कुछ लोगों के नाम में कुछ अनोखापन होता है, लेकिन डाॅ अनोख सिंग तो यथा नाम तथा गुण थे यानी एक अनोखे दिलचस्प इंसान। किसी व्यक्ति के आगे डॉक्टर लगते ही यह भ्रम हो जाता है कि जरूर वह कोई डॉक्टर होगा, और वाकई अनोख सिंग एक डॉक्टर ही थे।
भले ही जात न पूछो साधु की, लेकिन किसी डॉक्टर की डिग्री तो परख ही लेनी चाहिए। चिकित्सा एक व्यवसाय है और आजकल जितने रोग उतने डॉक्टर ! एलोपैथी की तरह ही कई समानांतर चिकित्सा आज उपल्ब्ध है, जिनमें एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर प्रमुख हैं। डा अनोख सिंग एक्यूपंक्चर चिकित्सा में पारंगत थे और दमा यानी अस्थमा का इलाज करने माह में एक बार भटिंडा से इंदौर आते थे। वे नियमित रूप से माह के हर पहले रविवार और सोमवार को आते मरीजों का इलाज करते थे। ।
उनके पास कोई जादू की छड़ी अथवा भभूत नहीं थी, लेकिन हां एक झोला जरूर था जिसमें कुछ सुइयां थीं, जो मरीजों को चुभाई जाती थी। डॉक्टर तो वैसे भी कसाई ही होते हैं, जब कि यह तो सिर्फ सुई ही चुभाता था। हमारे शरीर में हर बीमारी के कुछ पॉइंट्स होते हैं, जिनमें कहीं एक्यूप्रेशर काम करता है तो कहीं /एक्यूपंक्चर।
सर्दी जुकाम, नजला और खांसी जब बेइलाज हो जाती है, तो वह सांस का रोग बन जाती है। कई इलाज हैं अस्थमा के एलोपैथी में ! गोली, इंजेक्शन, और सबसे अधिक कारगर इन्हेलर। बस मुंह खोलें और फुस फुस करते हुए दवा मुंह के अंदर। मछली की तरह तड़फता है एक दमे का रोगी, जब उसकी सांस उखड़ जाती है। एलर्जी टेस्ट से निदान में सहायता अवश्य मिलती है। कुछ लोग तो साउथ जाकर मछली का सेवन भी करने को तैयार हो जाते हैं तो कुछ आयुर्वेद पर भरोसा करते हैं। ।
अगर मैं भी सांस का शिकार ना होता तो शायद इस अनोखे इंसान से मिल भी नहीं पाता। किसी भुक्तभोगी सज्जन ने मुझे ना केवल इनकी जानकारी ही दी, एक दिन इनसे मेरा एक मरीज के रूप में परिचय भी करा दिया। छः फिट का एक आकर्षक खुशमिजाज सरदार, मानो अभी फौज से ही लौटकर आया हो।
नाम बताइए ? मैने अपना नाम बताया, पी के शर्मा !
उन्होंने मुझे घूरा अथवा निहारा, फिर बोले, महाराष्ट्र में हमें एक पी के झगड़े मिले थे, और हंस दिए।
हमारा उपचार शुरू हुआ, हमें भी छाती सहित कुछ जगह सुइयां चुभाई गई। खटमल मच्छर के काटने से थोड़ा अधिक दर्द भी महसूस हुआ, लेकिन असहनीय नहीं। केवल बीस मिनिट का खेल था सुइयां चुभाने का। हिदायतों का पिटारा लिए हमने उनसे विदा ली। ।
नीम हकीम, खतरे जान ! हम जहां भी गए हैं, अंध श्रद्धा नहीं, कुछ शंका लेकर ही गए हैं। सोचा अगर तत्काल असर ना भी हुआ तो अपनी दर्द निवारक सांस की गोली तो पास है ही। कुछ दिन तक हम अपनी सांस ढूंढते रहे लेकिन सांस ने उखड़ने से साफ इंकार कर दिया। हमें लगा डॉक्टर तेरा जादू चल गया।
अगले माह डॉक्टर ने फिर बुलाया था। मरीजों की भीड़ कहां नहीं, कितनी बीमारियां कितने रोग ! मुझे देखकर मुस्कुराए, कैसे हो झगड़े साहब ? यानी यहां मेरा नामकरण भी हो चुका था। अब मैं उनसे झगड़ा करने से तो रहा, क्योंकि उन्होंने मुझे पी.के.झगड़े के इतिहास के बारे में पहले ही बता दिया था। वे जितने आत्मीय थे, उतने ही मजाकिया भी।
हंसते हंसते सुइयां चुभाना कोई उनसे सीखे। ।
हर मरीज से उनका वार्तालाप बड़ा रोचक होता था। एक रिश्ता जो मन को भी मजबूत करे और रोगी में विश्वास का संचार करे। कई क्रॉनिक पेशेंट्स को स्ट्रेचर पर लाया जाता था, दूर दूर से रोगी इसी आस से आते थे, कि सांस में कुछ फायदा हो। लेकिन अगर हर डॉक्टर मसीहा ही होता तो शायद इस संसार में कोई रोगी ही नहीं होता।
हर व्यक्ति के जीवन में उतार चढ़ाव आते है, डाॅ अनोख सिंग भी आखिर थे तो एक इंसान ही। एक बार उन्हें लकवा मारा, फिर उठ खड़े हुए, बेटे की मौत का सदमा भी हंसते हंसते झेला, लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी। जब भी वापस आते, उसी उत्साह और उमंग के साथ। जिस माह नहीं आते, मरीज निराश हो जाते। ।
मैं हमेशा उनके लिए मिस्टर पी.के.झगड़े ही रहा। हमेशा सबसे मेरा परिचय यही कहकर कराते, ये झगड़े साहब हैं, लेकिन कभी हमसे नहीं झगड़ते। कोरोना काल में उनका आना जो एक बार बंद हुआ तो हमेशा के लिए ही हो गया। कोरोना ने उनको भी नहीं छोड़ा।
आज जब भी कभी थोड़ी सांस उखड़ती है अथवा किसी अस्थमा के मरीज को देखता हूं, तो अनायास ही इस अनोखे इंसान की याद आ जाती है। कुछ सुइयां रिश्तों की भी होती हैं, जब याद आती है, बहुत चुभती है। एक ऐसा दर्द जो मर्ज को ही गायब कर दे। क्या इसे ही रिश्तों का मीठा दर्द कहते हैं, सुइयां चुभाने वाले डाॅ अनोख सिंग अगर आज होते, तो जरूर जवाब देते। ।
आमची पिढी खूप निरागस होती, आज्ञाधारक होती, आई-वडील सांगतात मोठी माणसं सांगतात ते योग्य बरोबर !शिक्षकांबद्दल तर कमालीचा आदर, सर्वांना अगदी घरच्यांना आणि विद्यार्थ्यांनाही! मुलगा ऐकत नाही असे होत नव्हते. भरपूर खेळलोत, बिन खर्चाचे खेळलोत. खूप आनंद मिळवला. संध्याकाळचे डबे, असेल ते भरून बागेत गेलो सहभोजनाचा आनंद लुटला.. गच्चीवरच्या अंगती पंगती केल्या.. गोष्टी सांगितल्या गोष्टी ऐकल्या.. भरपूर दंगामस्ती केली.. पुस्तक वाचली… काही जणांनी थोडीशी बदमाशी पण केली पण ती बेताचीच.. !
आता पिढी बदलली आहे. न ऐकणं ही वृत्ती झाली आहे. पालकही आपल्याला मिळालं नाही ते त्यांना द्यायचं या वेडाने पछाडलेले आहेत.
…. मध्यंतरी एक प्रसंग घडला… मी माझ्या संस्थेच्या दारात रीक्षेची वाट पाहत उभी होते दोन ते अडीच वर्षाची एक मुलगी रस्त्याच्या मधून वेडी वाकडी कशीही चालत होती पळत होती मागे आई मावशी वगैरे चार-पाच बायका होत्या. रस्ता रहदारीचा, सायकल गाड्या येत होत्या. मी त्या मुलीलाही जरा ओरडले, तिला धरून ठेवलं. शेवटी तिच्या आईला थांबून घेतलं आणि सांगितलं “अहो ती मुलगी वाटेल तशी पळते तुम्ही सगळ्या गप्पा मारताय तुमचं लक्ष नाही…. त्यावर त्या बाई म्हणाल्या
“काय करावं ऐकतच नाही “.. प्रत्येक पालकाचे हेच म्हणणे आहे… काय करावं ऐकत नाही…. सैराट चित्रपटात एक दृश्य दाखवल आहे आमदाराचा मुलगा प्राध्यापकांच्या तोंडात मारून वर्गातून बाहेर जातो प्राचार्य त्याबाबत बोलण्यासाठी घरी जातात त्या शिक्षकांची ओळख करून देतात त्यावर आमदार साहेब म्हणतात काय करावं आमच्या प्रिन्सला रागच आवरत नाही बघा एवढा वाक्यावर तो प्रसंग संपतो ही काय पद्धत आहे ना? शिक्षकाचे थोबाडीत मारायचं… ? ते उत्तम शिकवत आहेत आणि हा फोनवर बोलतोय…. हे शिक्षण सम्राटांच्या शाळा कॉलेजातले वास्तव आहे !आज एक घटना ऐकली वाघोलीच्या कुठल्यातरी शाळेतील एका वांड व्रात्य मुलाची…. विकृतपणे तो वर्गात त्रास देत होता तेव्हा शिक्षिकेने त्याचे तोंडात दिली त्याने व त्याच्या पालकांनी शाळेकडे तक्रार केली शाळेने अर्थात काहीतरी समजूत काढली असेल पण पालकांचे समाधान झाले नाही. त्यांनी एफ आयआर दाखल केला. बहुदा पोलिसांनी मध्यस्थी केली. त्यावर पालक म्हणाले “एका गोष्टीवर मी माफ करेन.. माझा मुलगा त्या बाईंच्या थोबाडीत मारेल” काय ही मानसिकता हाच मुलगा पुढे जेव्हा त्यांच्या थोबाडीत मारेल तेव्हा या गोष्टीची जाणीव त्यांना होईल.
हल्ली गेट-टुगेदर होतात तेव्हा मुल सांगतात, ” बाई आम्हाला पूर्वीसारखे एक एक छडी मारा ना”… अरे त्या छडी मध्ये प्रेम होत प्रेम तू सुधारावा म्हणून केलेली ती धडपड होती. लोकांच्या लेकरांना मारायची हौस नसते शिक्षकाला… परवाच मी एका लेखात लिहिलं होतं ते एका माणसाने आठवण सांगितली होती मी खूप खोडकर होतो अभ्यास करत नव्हतो पण बाईने मला मारून तयार करून घेतलं आणि त्यांच्या अंतिम काळी मला जवळ बोलून म्हणाल्या मी तुला खूप मारलं रे मला क्षमा कर विद्यार्थी सुधारावा म्हणून मारलेली छडी किंवा केलेली शिक्षा ही शिक्षकाच्या काळजाला लागलेली असते हे कोणाला जाणवत नाही.
बालदिनी पालकांनी खरोखर आपण उत्तम पालक आहोत का याच एकदा परीक्षण कराव तुमचं मुल तुमचा जीव आहे याची जाणीव आम्हाला असते ते उत्तम व्हावे चांगलं नागरिक व्हावं यासाठी सजगपणे प्रयत्न करावे लागतात नको ते छाटावं लागतं चांगलं ते वाढू द्यावं लागतं ते बालक निरागस असतं त्याला कळत नाही दंगा धोपा खोड्या या त्याच्या सहज प्रवृत्ती असतात पण त्याला योग्य वळण देणं हे आपल्या सगळ्यांचेच काम आहे पूर्वी समाजातले लोक सुद्धा एखाद्या मुलाचं वर्तन चुकीचं असेल तर त्याला सांगत असत.
एकदा सिविल हॉस्पिटल च्या बाजूने तीन मुलं एका मोटरसायकलवर बसून रस्त्यावरच्या माणसांची टवाळी करत ओरडत चालली होती गाडीला प्रचंड स्पीड होता आणि कोर्टासमोर त्यांची गाडी स्लिप झाली अपघात झाला रस्त्यावरून जाणाऱ्या ज्या लोकांची तेथे टवाळी करत होते त्याच लोकांनी त्यांना दवाखान्यात ऍडमिट केले. हे कसले वागणे? याच्या समर्थन होऊ शकत नाही. अकरावी पास झालेल्या मुलाला वडिलांनी मोठ्या हौसेने बुलेट घेऊन दिली मित्रांसमवेत हिंडायला गेला अपघात झाला आणि जागीच खलास बापाने मृत्यू भेट दिला असं झालं …
…. कोणत्या वयात मुलाला काय द्यावं ते वापरायला तो जबाबदार आहे का कशाचाच विचार नाही एक समाज असा आहे की तो आपल्या मुलांबाबत प्रचंड सतर्क आहे आणि दुसरा बेदरकार… त्यांना प्रचंड काम आहे आणि पैसा कमवायचा आहे त्यामुळे वेळ नाही…. खालच्या माणसाला पैसा मिळवल्याशिवाय गत्यंतर नाही त्यामुळे त्याला वेळ नाही …
…. पण गंमत म्हणजे सगळ्यांची स्वप्न मुलं आहेत… प्रत्येकाला वाटतं आपलं मूल काहीतरी वेगळं व्हावं पण त्या दिशेने जाणार पालकत्व मात्र दिसत नाही….. !असो
विषय खूप मोठा आहे लिहावं तेवढं कमी आहे लिहण्यापेक्षा काहीतरी कृती करावी असं वाटतं त्या निरागस सर्व बालकांना आजच्या बालक दिनानिमित्त अनेक आशीर्वाद आणि शुभेच्छा!!!