(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक लघुकथा – “संस्कार प्रबल हैं…“।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७८ ☆
लघुकथा ☆ संस्कार प्रबल हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
राम नरेश जी एक लेखक हैं। उम्र के लिहाज से यात्रा ज्यादा तो नहीं करते पर करनी तो पड़ती है । वे अपने बेटे के पास पुणे आए। उनका बेटा आईटी सेक्टर में काम करता है। पुणे बड़ा महानगर है। उसका क्षेत्रफल संभवतः अस्सी किलोमीटर है। देखने के लिए कई स्थान हैं और आसपास भी कई तीर्थ स्थल और पर्वतीय स्थल हैं।
राम नरेश जी के एक प्रकाशक मित्र भी पुणे आए हुए थे। उन्हें पता चल गया था कि राम नरेश जी भी पुणे पहुंच रहे हैं तो उनके काव्य संग्रह की पचास प्रतियाँ लेते आए थे और राम नरेश जी को सूचना भी दे दी। दोनों शहर के उत्तरी दक्षिणी ध्रुव पर ठहरे थे और आसानी से एक दूसरे के पास आ जा नहीं सकते थे। किसी बीच के स्थान पर मिलने पर मंथन हुआ। प्रकाशक महोदय की एसएनडीटी विश्व विद्यालय में मीटिंग थी और राम नरेश जी भी वहां आ सकते थे। इसलिए तय हुआ कि एसएनडीटी कॉलेज के गेट पर मिल लेंगे। वहाँ तक आने जाने के लिए बस मैट्रो की सुविधा भी है। टैक्सी ऑटो रिक्शा तो मिल ही जाते हैं।
दोनों के बीच तय हुआ कि बारह बजे के आसपास मिलेंगे। राम नरेश जी जब चलने को हुए तो उनकी पत्नी ने कहा कि मैं भी साथ चलती हूँ, यहां अकेले क्या करूंगी। बहू बेटे अपने अपने काम पर गए और बच्चे स्कूल में तो वे घर में अकेली ही हैं। वे टैक्सी से कॉलेज के गेट पर पहुंच गए और दस मिनट के अंदर प्रकाशक महोदय भी पहुंच गए और उन्होंने पुस्तकें दे दीं।
महानगरों में ऐसे काम के लिए एक दूसरे के आवास पर जाना मुश्किल होता है क्योंकि समय, दूरी व सुविधा सब देखनी पड़ती है। प्रकाशक महोदय ने कहा कि यहाँ मैट्रो रेल का स्टेशन है और यहाँ से बहुत जल्दी स्वारगेट पहुंच जाएंगे और मैट्रो का आनंद भी उठा लेंगे। वहाँ से तो वाघोली के लिए काफी सुविधाएँ हैं। राम नरेश जी फिजूलखर्ची पसंद नहीं करते थे। कम पैसे खर्च होने के कारण उन्होंने मैट्रो से जाने का निर्णय ले लिया।
राम नरेश जी अपनी पत्नी के साथ मैट्रो रेल के स्टेशन पर लिफ्ट से चले गए । थैली में पचास पुस्तकें थीं। उनका वजन देख कर राम नरेश जी को अपनी आयु का आभास हुआ। थैली उठा कर चलने में दिक्कत तो हो रही थी। खैर टिकट लेकर प्लैटफॉर्म पर आए। गाड़ी आने में पांच मिनट थे। वे दोनों प्लैटफॉर्म पर पहुंचे तो एक बैंच पर दो लड़कियाँ बैठी थीं। एक लड़की उठ खड़ी हुई और राम नरेश जी की धर्पमत्नी से बोली, “बैठिए आंटी जी”। थोड़ा ना नुकुर के बाद वे बैठ गईं। फिर उस लड़की ने राम नरेश जी से भी बैठने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि उन्हें बैठने में कष्ट होता है इसलिए खड़े रहना ही अच्छा है और उस लड़की को धन्यवाद दिया। जब मैट्रो आ गई तो उस लड़की ने राम नरेश जी के हाथ से पुस्तकों का थैला ले लिया और उन्हें मैट्रो में चढ़ने दिया। ट्रेन में प्रवेश के बाद भी वह लड़की पुस्तकों के थैले को अपने पास ही रखे रही। राम नरेश जी ने मांगा तो बोली कि गाड़ी में झटके लगते हैं और संतुलन बनाए रखना मुश्किल होता है, आप गिर सकते हैं और मुझे तो मैट्रो रेल में चलने का अभ्यास है। फिर उसने पूछा कि पुस्तकें कैसी हैं तो राम नरेश जी ने बताया कि उन्हींकी लिखी हुई पुस्तकें हैं पर वे बंधी हुई है इसलिए तुम्हें दे नहीं सकता। वे लेखक हैं यह जानकर वह बहुत खुश हुई। फिर उसने अपना नाम बताया वंशिका,, और बताया कि वह पुणे में ही रहती है। उसके पिता होटल चलाते हैं। एसएनडीटी में बारहवीं में पढती है, रोज स्वारगेट से मैट्रो से ही आती है। राम नरेश जी जीवन में पहली बार मिली उस अपरिचित बच्ची की बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे। बात करते करते गंतव्य आ गया और उसने पुस्तकों का थैला राम नरेश जी को दे दिया और खुद उतर गई। उसकी मीठी वाणी, अनुशासन और शिष्टाचार देखकर राम नरेश जी को अपनी पोती की याद आ गई। वह भी उन्हें वजन नहीं उठाने देती। राम नरेश मन ही मन बुदबुदाए, समाज में अभी संस्कार प्रबल हैं।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “व्यंग्य – ऊँट के मुँह में जीरा” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२८ ☆
व्यंग्य – ऊँट के मुँह में जीरा श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
ऊँट के मुँह में जीरा डालने से न ऊँट का पेट भरता है, न जीरे की ही प्रतिष्ठा बढ़ती है। पर हमारे देश में यह व्यवस्था का स्थायी चरित्र बन चुका है। जहाँ देखिए, वहीं जीरे बाँटे जा रहे हैं और ऊँट मुस्कुराते हुए भूखे रहने का अभ्यास कर रहे हैं।
सरकार हर 6 माह में मंहगाई राहत की घोषणा करती है, । कर्मचारी पूछता है, कितना? जवाब आता है, इतना कि समाचार की हेडलाइन बन जाए, मगर जेब की सिलवट भी न बदले। यानी ऊँट के मुँह में जीरा।
लेखक को वर्षों की तपस्या , प्रकाशक की मिन्नत , जोड़ तोड़ के बाद पुरस्कार घोषित होता है। पुरस्कार राशि देखकर लेखक भावुक हो गया। इसलिए नहीं कि रकम अधिक थी, बल्कि इसलिए कि यात्रा भत्ता उससे महँगा था । सम्मान का शॉल इतना बड़ा कि उसमें पूरा लेखक लिपट जाए, लेकिन लिफाफा इतना हल्का कि हवा भी उसे उड़ा ले जाए। साहित्य ने फिर कहा, “सम्मान अमूल्य होता है।” लेखक मन ही मन बोला, “हाँ, इसलिए उसका मूल्य कोई नहीं देता।”
आजकल संस्थाएँ भी जीरा वितरण अभियान चला रही हैं। पाँच सौ रुपये का मानदेय देकर लिखती हैं, “आपका अमूल्य सहयोग मिला।” अमूल्य सहयोग का मूल्य पाँच सौ! लगता है शब्दकोश भी अब महँगाई से डर गया है।
ज्यादा साहित्य प्रेमी आयोजक अपनी इज्जत बचाने के लिए स्वयं ही मानदेय को पत्रम पुष्पम लिख देते हैं, या सुदामा के चावल कहकर उसे थोड़ा ललित टच दे कर अपनी झेंप पता नहीं किससे मिटा लेते हैं।
डिजिटल दुनिया ने तो जीरे को और आधुनिक बना दिया है। घंटों का वेबिनार, दर्जनों स्लाइड, अंत में धन्यवाद और एक ई-प्रमाणपत्र।
प्रमाणपत्र डाउनलोड करते-करते बिजली का बिल ज़्यादा आ जाए तो आयोजक की आत्मा प्रसन्न हो जाती है कि ज्ञान का प्रसार सफल रहा।
शिक्षा में भी यही हाल है। बच्चों से कहा जाता है, बड़े सपने देखो। फिर स्कूल की लाइब्रेरी में तीन किताबें और उन पर चार ताले। खेलो, आगे बढ़ो, मगर मैदान पार्किंग बन चुका है। सपनों का ऊँट दौड़ना चाहता है, व्यवस्था उसे जीरा चबाने का प्रशिक्षण दे रही है।
महँगाई सबसे बड़ी जीरा विशेषज्ञ है। वेतन बढ़ा दो प्रतिशत, खर्च बढ़ा बीस प्रतिशत। फिर अर्थशास्त्री बताते हैं कि आपकी आय में वृद्धि हुई है। सचमुच हुई है, कैलकुलेटर पर, जेब में तो वही पुराना ऊँट बैठा जुगाली कर रहा है।
सोशल मीडिया ने इस मुहावरे को लोकतांत्रिक बना दिया है। किसी ने एक पौधा लगाया, सौ सेल्फियाँ खिंच गईं। किसी ने दो किताबें दान कीं, पचास पोस्ट लिख दीं। काम जीरा, प्रचार ऊँट। एक दर्जन केले मरीजो में बांटकर पुण्यात्मा बन कर ऊंट की तरह अस्पताल से निकलते नेता जी की फोटो अखबार में देखी ही होंगी ।
हम सब भी कहीं न कहीं इस खेल के हिस्सेदार हैं। रिश्तों में समय नहीं, लेकिन इमोजी भरपूर। पड़ोसी की खबर नहीं, मगर “टेक केयर” का संदेश तुरंत पहुँच जाता है। संवेदनाएँ भी अब इंस्टेंट जीरे की पुड़िया बन गई हैं। व्हाट्सएप पर ज्ञान त्वरित फॉरवर्ड कर देते हैं, किंतु अमल में नहीं लाते ।
दरअसल समस्या जीरे की नहीं, ऊँट की भूख को समझने की है। भूख बड़ी हो और समाधान प्रतीकात्मक, तो व्यंग्य अपने आप जन्म लेता है। समाज को रोटी चाहिए, हम उसे रिबन काटकर आशाई भरोसा परोस देते हैं। लेखक को सम्मान के साथ श्रम का मूल्य चाहिए, हम उसे स्मृति-चिह्न थमा देते हैं। नागरिक को सुविधा चाहिए, हम उसे घोषणा दे देते हैं।
अंत में लगता है कि इस मुहावरे का संशोधित संस्करण लिख देना चाहिए, “ऊँट अब जीरा नहीं माँगता, उसे इतना अनुभव हो गया है कि वह पहले लिफाफे का वजन तौलता है।”
और हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जीरा बाँटने वाले स्वयं को अन्नदाता समझते हैं।
एक मोठ्या मोठ्या उंच इमारतीचं नगर होतं. लोक खूप श्रीमंत होते. आधुनिक घरात रहात होते. आधुनिक तंत्रज्ञान वापरत होते. एका क्लिकवर सगळे पुढ्यात येत होते. भाजीपाला, समान सगळे क्षणात दरात येत होते.
हातात पैसाच पैसा होता. खाण्या पिण्याची चंगळ होती. आलिशान गाड्या होत्या. मुलं उत्तमोत्तम शाळेत जात होती. प्रत्येक हातात मोबाईल होता. टेबलवर संगणक होता. जग जवळ आलेले होते. नेटने जाळ्यात पकडलेले होते. सगळीकडे सुबत्ता होती. पण… कुठेतरी उणीव होती. आरोग्य मात्र बिघडलेले होते. डॉ.कडे मोठ्या रांगा होत्या. औषधांची दुकाने जोरात चालत होती. प्रत्येक माणशी काही ना काही आजार होता. मनस्वास्थ्य हरवले होते.
काय करावे कळेना. आरोग्य पैशाने विकत घेता येईना. सगळे होते चिंतेत.आपापल्या व्यथेत. तेवढ्यात एक माणूस आला. जणू देवदूतच भासला. खूप अनुभव त्याच्या गाठीला. एका मोठ्या कार्यक्रमात दाखल झाला. आनंदी राहण्याचा उपाय सांगतो म्हणाला. फक्त एक अट आहे म्हणाला. सगळे आवाज बंद करा. सर्वांनी जमिनीवर आसन धरा. लोकांनी तसेच केले. कारण सगळे होते शांतीचे आणि आनंदाचे भुकेले.
देवदूत म्हणाला खरेच मन:शांती व आनंद हवा असेल, तर माझे ऐकावे लागेल. एक व्रत करावे लागेल. सगळ्यांनी होकार भरला. प्रत्येक जण कान टवकारून ऐकू लागला. देवदूत बोलू लागला. चांगल्या गोष्टीची सुरुवात करायला श्रावण महिना आहे चांगला. फरक पडला तर कायम हे व्रत करा. आता फक्त सुरुवात करा.
या व्रतात काय करावे? सांगतो ऐका लक्ष द्यावे. आठवड्यात एक दिवस हे व्रत करावे. सकाळी लवकर उठावे. प्रथम मोबाईल, इंटरनेट बंद करावे. मोकळ्या हवेत फिरून यावे. फिरता फिरता स्वसंवाद करावे. उत्साहात घरी यावे. आई वडील यांच्या जवळ बसावे. छान छान बोलावे. सर्वांनी एकत्र चहा, नाश्ता घ्यावा. घरात मुलांशी खेळावे. गप्पा गोष्टी कराव्यात. थोडे स्वयंपाक घरात डोकवावे मदती साठी विचारावे. जमेल ते काम करावे. दुपारी निवांत वेळी जुने कपाट आवरायला घ्यावे. त्यातील जुने फोटोंचे अल्बम बघावे. आठवणींना जागवावे. कपाट आवरताना मनही आवरावे. वाटले तर दुपारी आळसावून झोपावे. नाहीतर आवडते संगीत ऐकावे. एक दिवस स्क्रीनचा उपास करावा. आरोग्याचा मार्ग धरावा. आनंदाचा रस्ता शोधावा. रात्री सर्वांनी हसत खेळत, गप्पा मारत सहभोजन करावे. सर्वांनी एक दिवस हॉल मध्ये गाद्या घालून झोपावे. असे व्रत करावे. फायदे अनुभवावे. चांगल्या आरोग्यदायी परिणाम मिळण्या साठी आठवड्यातून एकदा हे व्रत करावे. पुढच्या वेळी येईन तेव्हा अनुभव सांगावे. एवढे सांगून देवदूत निघून गेला. व्रत आचरणात आणण्याचा प्रत्येकाने निश्चय केला.
आपणही असे आचरण करावे. हे आपल्या चार्जिंगचे साधन समजावे. एक दिवस सुट्टी मिळाली म्हणून इकडे तिकडे जाऊन टेन्शन घेण्या पेक्षा हे उपाय करून बघावे. आपणच आपला आनंद शोधावा.
व्रत कसे वाटले सांगावे. आवडले न आवडले जरुर सांगावे.
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – लौट आना, मेरे पंखों के साथी।)
साँझ नदी के जल पर धीरे-धीरे उतर रही थी। आकाश की आखिरी सुनहरी किरणें लहरों पर काँप रही थीं। पक्षियों के झुंड अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे, मगर नीर अब भी उसी किनारे पर अकेला बैठा था।
कभी इसी जगह पिहू उसके पास आकर कहती थी— “शाम चाहे कितनी भी लंबी हो, तुम मेरा इंतज़ार करना।”
नीर ने उस वाक्य को जीवन बना लिया था।
अचानक पीछे से धीमी-सी आवाज़ आई—“नीर…”
उसका हृदय जैसे एक पल को रुक गया।
वह पलटा।
सामने पिहू थी—कमज़ोर, थकी हुई और एक घायल पंख को समेटे हुए।
नीर कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर उसकी आँखें छलक उठीं।
“पिहू… तुम?”
पिहू ने काँपते स्वर में कहा—
“लौटना तो हर दिन चाहती थी… मगर पंखों ने साथ नहीं दिया।”
नीर उसके पास गया और अपना पंख उसके घायल पंख पर रख दिया।
“मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया।”
पिहू की आँखों से आँसू बह निकले—
“मुझे विश्वास था।”
नीर ने पूछा—
“कैसे?”
पिहू ने नदी की ओर देखते हुए कहा—
“क्योंकि हर शाम डूबते सूरज में मुझे तुम्हारी प्रतीक्षा दिखाई देती थी।”
कुछ पल दोनों मौन रहे।
फिर पिहू ने धीरे से पूछा—
“नीर, अगर मैं अब कभी उड़ न सकी तो?”
नीर ने उसके पंख को सहलाते हुए कहा—
“तो मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।”
“और अगर मैं चल भी न सकी?”
“तो यहीं बैठकर तुम्हारे साथ साँझ देखूँगा।”
पिहू ने अपना सिर उसके पंख पर रख दिया।
उस क्षण नीर को लगा—वर्षों से जिस लौटने की प्रतीक्षा थी, वह केवल पिहू का लौटना नहीं था; वह उसके विश्वास का लौटना था।
सूरज डूब चुका था।
नदी अँधेरी हो रही थी, मगर दोनों के बीच वर्षों बाद एक उजाला जन्म ले चुका था।
कुछ प्रेम कहे नहीं जाते, बस प्रतीक्षा में जीवित रहते हैं।
और जब कोई लौट आता है, तो पता चलता है—सच्चा अपनापन दूरी से नहीं, विश्वास से बँधा होता है।
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संदेशाला आलेल्या शाब्दिक प्रतिक्रियेच्या जागी भावचिन्ह पाहिल्यावर प्राप्तकर्त्याच्या मनात सूक्ष्म निराशा उत्पन्न होते. त्याच्या मनात प्रेषकाविषयी हा ‘उठवळ, तुटक, तुसडा, माणूसघाणा, व्यापारी, राजकारणी, धूर्त, स्वार्थी, आढ्य, औपचारिक आहे’ अशा प्रकारचे नकारात्मक भावना निर्माण होऊ शकतात, नव्हे होतात.
योग्य शब्द नाती जोडतात, वृद्धिंगत करतात, जिव्हाळा वाढवतात. अयोग्य शब्दांनी मात्र नाती दुरावू शकतात.
थोडक्यात प्रतिक्रिया देताना उठवळपणा करू नये. भावचिन्हे शक्यतो टाळावीत, शब्दानेच व्यक्त व्हावे आणि नाती जोडावीत, सांभाळावीत, वाढवावीत. याला म्हणतात सुसंवाद. इतर निव्वळ शिष्टाचार, व्यापार उपचार!
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≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वेदना निग्रह रस…“।)
अभी अभी # १०७८ ⇒ आलेख – वेदना निग्रह रस श्री प्रदीप शर्मा
खिलते हैं गुल यहाँ, खिल के बिखरने को। जहाँ महादेवी की वेदना पर प्रसाद के आँसू निकल आते हों, वहाँ बच्चन की मधुशाला किस काम की। जहाँ सूरज की रोशनी कम हो, और हरदम आसमान में काली घटा छाई रहे, ऐसे में शहनाई शोभा नहीं देती। कहीं किसी कोने में, कोई दिल का दीया अगर जला दे, तो मन को बड़ा सुकून मिलता है।
कहीं मीत ना मिला रे मन का, तो कहीं मिल के बिछड़ गई अंखियां, हाय रामा ! ऊपर वाले का खेल बड़ा निराला है। किसी की झोली में खुशियों की सौगात तो कहीं गम बेशुमार। मन करता है, अखबार में इश्तहार दे दिया जाए, गुमशुदा की तलाश ! हमारी खुशी कहीं खो गई है। उम्र नाजुक, हंसता हुआ नूरानी चेहरा, लाने वाले का शुक्रिया, मेहरबानी, मुंहमांगा इनाम।।
होठों पे आए खुशी, क्या मजाल है। दिल का मुआमला है, कोई दिल्लगी नहीं। छोटी सी गुड़िया हो तो उदासी ज़्यादा समय तक टिकती नहीं। बच्चों को बहलाना कितना आसान है। गुड़िया, हमसे रूठी रहोगी, कब तक ना हँसोगी, देखो जी, आई रे हँसी आई। देखो जी, आई रे हँसी आई। लेकिन बड़ों का मामला जरा टेढ़ा होता है।
गम की अंधेरी रात में, दिल को न बेकरार कर, सुबह जरूर आएगी, सुबह का इंतजार कर। लेकिन जिसे सब्र नहीं, उसका क्या किया जाए। इंतजार और अभी, और अभी, और अभी। तुम्हारा इंतजार है।।
जब इंसान भीड़ में भी अकेला हो जाता है, किसी के साथ होता है, फिर भी कहीं खोया रहता है, तो वह दुनिया से नहीं, अपनों से नहीं, अपने आप से भी बहुत दूर चला जाता है। उसे न जाने क्यों ऐसा लगता है, ये दुनिया, ये महफिल, मेरे काम की नहीं। सबमें शामिल हो मगर, सबसे जुदा लगती हो, सिर्फ हमसे ही नहीं, खुद से खफा लगती हो। शुभचिंतक कह उठते हैं, सीधा सादा, अवसाद का मामला है।
होठ पर लिए, दिल की बात हम। जागते रहेंगे और, कितनी रात हम। तुम्हारा इंतजार है। दिल बहल तो जाएगा, इस खयाल से। हाल मिल गया तुम्हारा, अपने हाल से।
रात ये करार की, बेकरार है।
तुम पुकार लो। तुम्हारा इंतजार है।।
क्या वेदना में भी रस होता है ! किसी दूसरे के दुख में दुखी होना अलग बात है और खुद को अंधेरे बंद कमरे में कैद करना अलग बात है। मुबारक और को खुशियाँ, मुझे गम से मोहब्बत है।
बहुत इच्छा होती है, ऐसे गमजदा लोगों को पकड़कर बाहर लाया जाए, उन्हें ऐसे लोगों से मिलाया जाए, जो वाकई दुःखी और लाचार हैं। कुएं में कूद जाने से बेहतर है उन लोगों को निकाला जाए जो कुएं में पड़े हुए हैं। दुख दर्द का कुआं, अवसाद का कुआं। जहाँ कोई झांकना पसंद नहीं करता ;
अंधेरे में जो बैठे हैं,
नज़र उन पर भी कुछ डालो
अरे ओ रोशनी वालों !
एक रोते बच्चे को हंसाना अधिक आसान है, क्योंकि वहाँ अभी सुख दुख के संस्कार संचित ही नहीं हुए हैं। हवा के झोंको की तरह खुशी आती जाती रहती है।
प्रकृति में इंसान ज्यादा उदास नहीं रह पाता। जब एक चिड़िया चहकती है, तो उदास मन में आशा की किरण चमकती है। बारिश की बूंदें कितने आंसुओं को धो डालती है। संगीत की स्वर लहरियां एक बार अंतस में प्रवेश कर जाएं, तो अनहद नाद गूंज उठता है।।
क्या है कोई ऐसा वेदना निग्रह रस, जो महादेवी की वेदना को कम कर सके। गीता का तो पहला अध्याय ही अर्जुन विषाद योग है। हम तो यही चाहते हैं ;
☆ महावस्त्राचे पदर – भाग ८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
‘आत्या’ (माहेरच्या मायेचा एक हळवा कोपरा)
नात्यांना काही नावे असतात आणि काही नात्यांना सुगंध असतो. नाव उच्चारलं की नातं समोर येतं; पण काही नाती आठवली की मनात एखादा गंध दरवळतो… जुन्या घराचा, अंगणातल्या तुळशीचा, उन्हाळ्याच्या सुट्टीचा, चुलीवरच्या स्वयंपाकाचा आणि सगळ्यात महत्त्वाचं म्हणजे मायेचा!
‘नात्यांचं महावस्त्र’ विणताना आपण आतापर्यंत आईची ‘मायेची पैठणी’, बाबांची ‘सह्याद्रीची ढाल’, आजीची ‘संस्कारांची शिदोरी’, आजोबांचे ‘सुरकुत्यांमधील शहाणपण’, मामाचा ‘माहेरचा समृद्ध दुवा’ आणि मावशीची ‘आईची प्रतिछाया’ अनुभवली. या महावस्त्रात असाच एक अत्यंत हळवा, आपुलकीचा आणि माहेर-सासर या दोन घरांना जोडणारा रेशमी धागा म्हणजेच ‘आत्या’!
तुम्ही म्हणाल, कशासाठी सांगत आहात ही नाती? तर नात्यांनीच कुटुंब आणि समाज जोडला जातो. आपलं जीवन समृद्ध होतं ते नात्यांमुळेच ना! आपल्याला एकट्याला काय महत्त्व आहे?
जशी आईची बहीण म्हणजे मावशी, तशी वडिलांची बहीण म्हणजे आत्या. मावशी आणि आत्या… नावं वेगळी आहेत, नाती वेगळी आहेत; पण माया आणि प्रेम यात फरक नाही. कदाचित व्यक्तिपरत्वे थोडाफार फरक कोणाला जाणवू शकेल, पण त्याचा विचार इथे आपल्याला करायचा नाही.
वडिलांच्या बहिणीला आपण ‘आत्या’ म्हणतो. नात्यांच्या व्याख्येत ही माहिती अगदी पुस्तकी आणि बरोबर आहे; पण भावनेच्या कोशात ‘आत्या’ या शब्दाचा अर्थ एवढाच नसतो. आत्या घरातील सगळ्या नात्यांना व्यापून उरते. आत्या म्हणजे बाबांच्या माहेरची जिवंत आठवण.
पण मला वाटतं, बाबा लहान असताना ज्या गावी राहिले, ज्या घरात राहिले आणि आई-बाबा आदी ज्या व्यक्तींसोबत राहिले, ते ठिकाण म्हणजे त्यांचं माहेरच! एखाद्या स्त्रीला आपल्या माहेरची जेवढी ओढ असते, तेवढीच ओढ बाबांनाही त्यांनी बालपण जिथे घालवलं, ज्यांच्यासोबत घालवलं त्या नातेवाईकांची आणि मित्रांची असते. आणि आत्या म्हणजे बाबांच्या बालपणाची साक्षीदार! एकाच घरात वाढलेले, बरोबर जेवलेले, दंगामस्ती केलेले, छोट्या-मोठ्या कारणांवरून भांडलेले, रुसलेले आणि पुन्हा हसलेले. आपल्या बाबांना ‘अरे’ म्हणून हक्काने हाक मारणाऱ्या मोजक्या व्यक्तींमधली ती एक! आणि म्हणूनच कदाचित ‘आत्या’ या नात्यात आपल्या बाबांच्या बालपणाचा एक सुंदर तुकडा दडलेला असतो.
आईच्या माहेरची माणसं आपल्याला ‘मामा’, ‘मावशी’, ‘आजोबा’, ‘आजी’ म्हणून लहानपणापासूनच जवळची वाटतात. पण बाबांच्या माहेरची माणसंही तितकीच आपली असतात, हे जाणवायला कधी कधी थोडा वेळ लागतो. कारण वडील स्वतःच्या भावना फारशा बोलून दाखवत नाहीत; त्यांच्या माहेरच्या आठवणींचा कप्पा ते सहज उघडत नाहीत. पण जेव्हा आत्या घरी येते, तेव्हा बाबांच्या चेहऱ्यावर अचानक एक वेगळंच निष्पाप बालपण उमलतं.
”अरे, तू अजूनही तसाच आहेस!”
आत्याने बाबांना असं म्हटलं की आपण आश्चर्याने बाबांकडे पाहतो. कारण आपल्यासाठी ते शिस्तप्रिय बाबा असतात, पण आत्यासाठी तो अजूनही तिचा लहान भाऊ असतो! त्यांच्या बालपणीच्या खोड्या, भांडणं, रुसवे-फुगवे, शाळा, खेळ, आईचा धाक आणि वडिलांची शिस्त… सगळं काही तिच्या स्मरणात ताजंतवानं आणि जिवंत असतं. जसा अनेक वर्षांपूर्वीचा एखादा फोटोंचा अल्बम पाहताना आठवणी जाग्या होतात, तसाच बालपणीच्या आठवणींचा अल्बम आत्या आली की उघडला जातो. म्हणूनच आत्या म्हणजे केवळ एक नातं नाही; ती आपल्या वडिलांच्या हरवलेल्या बालपणाची खरीखुरी साक्षीदार असते.
बालपणात आत्या म्हणजे एक वेगळीच लाडकी व्यक्ती असते. उन्हाळ्याच्या सुट्टीत आत्याच्या गावाला जाणं म्हणजे जणू एखादी आनंदी सहलच! तिच्या घरात गेल्यावर आईच्या घरापेक्षा थोडं अधिक स्वातंत्र्य मिळतं. खाण्यापिण्याच्या बाबतीतही तिचा हात थोडा सैलच असतो. “अरे, घे ना अजून एक!” आई समोर असताना ज्या गोष्टीसाठी दहा वेळा विचार करावा लागतो, ते आत्याकडे एकदाच मागितलं की मिळतं! आणि आईने जर आत्याकडे आपल्या मुलाच्या खोड्यांची तक्रार केली, तर आत्या बहुतेक वेळा मुलांचीच बाजू घेते.
”असू दे गं… मुलंच आहेत. थोडं खेळणार, थोडा दंगा करणार!”
आत्याच्या या एका वाक्यात भाच्याला मिळालेला हक्काचा जामीन असतो! पण आत्या फक्त लाड करणारी नसते, वेळ आली तर ती प्रेमाने समजही देते. आई रागाने बोलते, बाबा शिस्तीने बोलतात आणि आत्या मायेने समजावते. तिच्या बोलण्यात अधिकार असतो, पण त्या अधिकाराला मायेची रेशमी किनार असते.
माझ्या लहानपणाच्या अनेक आठवणी आत्याशी जोडल्या गेल्या आहेत. त्या आठवणी लिहायच्या म्हटलं, तर आत्याच्या उल्लेखाशिवाय त्या पूर्ण होणारच नाहीत. तसं तर मला दीर्घकाळ आत्याची माया लाभली. मी लहान असताना, नोकरीला लागल्यानंतर तसेच पुढे लग्न झाल्यावरही तिने माझं भरभरून कौतुक केलं आहे. माझी आत्या कल्याणला राहायची. आत्या आणि तिचे यजमान यांनी माझ्या मनावर उत्तम संस्कारांचं शिंपण केलं, त्यातून मी खूप काही शिकलो.
माझं लहानपण एका अगदी छोट्या खेड्यात गेलं. पण आत्या कल्याणला राहत असल्याने मी दर सुट्टीत तिच्याकडे जायचो. ग्रामीण भागात राहत असलेल्या माझ्यासारख्या अजाण मुलाला शहरी संस्कृतीचा स्पर्श आणि ओळख तिच्यामुळे झाली. आत्याच्या यजमानांनी स्वतः माझ्यासोबत फिरून त्यावेळची मुंबई मला दाखवली आणि अनेक गोष्टींची माहिती दिली. त्यांनीच मला तेव्हा ‘मनाचे श्लोक’ हे पुस्तक भेट दिलं होतं. ते मला म्हणाले होते, “विश्वास, हे श्लोक पाठ कर. ते पाठ झाले की मला सांग.” त्याप्रमाणे मी तेव्हा सगळे श्लोक पाठांतर केले होते. त्यांनी त्यावेळी मला एक वही आणि पेन बक्षीस म्हणून दिले होते.
आज इतकी वर्षं उलटून गेली, तरी ती वही, ते पेन आणि सर्वात महत्त्वाचं म्हणजे ते ‘मनाचे श्लोक’ अजूनही माझ्या हृदयात कोरलेले आहेत. पुढे याच ‘मनाचे श्लोकां’शी माझं नातं इतकं दृढ होईल आणि त्यावर माझ्याकडून एक विस्तृत लेखमाला लिहिली जाईल, याची त्या वेळी मला कल्पनाही नव्हती! माझे आतेभाऊही माझ्यापेक्षा मोठे होते, पण त्यांनीही मैत्रीच्या नात्याने माझ्याशी वागून मला खूप प्रेम दिलं आणि बऱ्याच गोष्टी शिकवल्या.
काही नाती केवळ भेटीगाठींनी टिकत नाहीत; ती आठवणींच्या मुळांनी टिकतात. काळ जसजसा पुढे जातो, आपण मोठे होतो आणि मग शिक्षण, नोकरी, संसार, मुलं… प्रत्येक जण आपापल्या जगात रमतो. आत्याच्या घरच्या फेऱ्या कमी होतात, फोनवरच्या गप्पा कमी होतात. ‘नंतर बोलू’ म्हणता म्हणता असे अनेक ‘नंतर’ निघून जातात; पण नात्यातील ‘अंतर’ कधीच वाढत नाही.
आजच्या काळात कुटुंबाची व्याख्याही बदलली आहे. पूर्वी एकत्र कुटुंबात आत्याचं येणं-जाणं सहज असायचं. घर मोठं होतं, माणसं जास्त होती, अंगण मोठं होतं, माणसांची मनंही मोठी होती आणि वेळही भरपूर होता. पण आता काळानुसार सगळ्याच गोष्टींचा संकोच झाला आहे. माणसं जवळ असूनही वेळ दूर निघून गेला आहे. पूर्वी आत्या अचानक दारात उभी राहायची, “काय गं, आलीस?” असा प्रश्न विचारण्याआधीच घरात तिच्या स्वागताची तयारी व्हायची! आज कोणीच अचानक येत नाही. आधी फोन येतो—”वेळ आहे का? तुम्ही घरी आहात का?” सगळ्याच गोष्टी बदलल्या.
आत्याच्या नात्यात आणखी एक सुंदर गोष्ट असते. ती आपल्या आईची नणंद असली, तरी अनेकदा आईची जिवाभावाची मैत्रीणही असते. दोघी एकत्र आल्या की जुन्या आठवणींची पेटी उघडते. बाबांच्या बालपणातील गमतीशीर किस्से बाहेर येतात आणि मग आपल्याला कळतं—आपले बाबा ज्या व्यक्तीला ‘माझी बहीण’ म्हणतात, तिच्यासाठी ते अजूनही ‘दादा’ किंवा ‘भाऊ’च आहेत. लग्नातील किंवा इतर कौटुंबिक कार्यक्रमांच्या आठवणी निघतात; घर काही क्षण का होईना, पुन्हा हसतं-खेळतं होतं.
भावाबहिणीचं नातंही अतिशय विलक्षण असतं. लहानपणी एकमेकांशी क्षुल्लक गोष्टीवरून भांडणारे, मोठे झाल्यावर एकमेकांच्या संकटात धावून जाणारे! संसाराच्या वाटेवर दोघे वेगवेगळ्या घरात गेले, तरी मनाच्या एखाद्या कोपऱ्यात त्यांचं माहेरचं घर कायम राहतं; आणि त्या माहेरच्या घराची एक जिवंत खूण असते—‘आत्या’.
म्हणूनच, दुर्दैवाने जेव्हा वडील जग सोडून जातात, तेव्हा आत्याला होणारं दुःख फक्त भावाच्या जाण्याचं नसतं; तिच्या आयुष्यातील एक संपूर्ण मोठा अध्याय बंद झाल्याचं असतं. ‘माझा भाऊ’ म्हणत ज्याच्याशी ती आयुष्यभर बोलली, भांडली, हसली, रुसली… त्याचा आवाज अचानक कायमचा शांत झालेला असतो. त्या वेळी आत्याच्या डोळ्यांतून वाहणारे अश्रू पाहताना आपणही अंतर्मुख होतो. तेव्हा जाणवतं की नाती केवळ रक्तावर आधारित नसतात, आठवणींची मुळे त्याहून खूप खोल गेलेली असतात!
आत्या आणि भाचा-भाची यांचं नातंही तितकंच सुंदर. आई-वडिलांच्या शिस्तीच्या चौकटीबाहेर मायेची एक मोकळी खिडकी उघडी ठेवणारी व्यक्ती म्हणजे आत्या! भाच्यांच्या यशात मनापासून आनंद मानणारी आणि त्यांच्या अपयशातही त्यांना प्रेमाने धीर देणारी. आज भाचा मोठा झाला, त्याला स्वतःची मुलं झाली, तो स्वतः बाबा झाला; तरी आत्याच्या नजरेत तो अजूनही तोच छोटासा मुलगा असतो. “किती मोठा झालास रे!” हे वाक्य आत्या जितक्या वेळा म्हणते, तितक्या वेळा आपल्याला जाणवतं की तिच्या मनात आपण कधीच मोठे झालेले नसतो. आणि आजच्या कृत्रिम जगात ही गोष्ट किती दिलासा देणारी असते!
आत्याला हिंदीत ‘बुआ’ म्हणतात. अनेक हिंदी चित्रपटांतून, मालिकांतून आणि कथांमधून हे नातं आपल्याला डोकावताना दिसतं. पण भाषा बदलली की नातं बदलत नाही. ‘आत्या’ म्हटलं की जशी आपल्या मनात मायेची एक ओळखीची प्रतिमा उभी राहते, तशीच ‘बुआ’ म्हटलं की हिंदी भाषिकांच्या मनातही! शब्द वेगळे, उच्चार वेगळे; पण नात्याची ऊब मात्र तीच! ‘बुआ’ या शब्दातही एक वेगळीच गोडी आहे. हिंदी घरात कदाचित “बुआ के घर चलो!” असं म्हटलं की बालपणाला आनंदाची चाहूल लागते, आणि मराठी घरात “आत्याकडे चल!” म्हटलं की बालपणाला पंख फुटतात! पण दोन्हीकडे स्वागत करणारा मायेचा हात मात्र अगदी सारखाच असतो. कारण नाती भाषेच्या सीमा मानत नाहीत—‘आत्या’ असो की ‘बुआ’!
आजच्या डिजिटल युगात नाती एका क्लिकवर जोडली जातात आणि एका क्लिकवर दूरही जातात. व्हिडिओ कॉलवर चेहरे दिसतात, संदेशांमध्ये शुभेच्छा येतात. पण आत्याने हातावर ठेवलेला उबदार हात, डोक्यावरून फिरवलेली मायेची थाप आणि “काळजी घे रे!” म्हणताना तिच्या आवाजात उतरलेली खरीखुरी काळजी… याला जगात कोणत्याही डिजिटल तंत्रज्ञानाचा पर्याय नाही.
वय वाढतं तसं माणसाला महागड्या भेटवस्तूंपेक्षा माणसं अधिक हवीहवीशी वाटतात—विशेषतः आपल्या माहेरच्या आठवणींशी जोडलेली माणसं. कारण ज्या घरातून ती कधीतरी सासरी गेली, त्या घरातील माणसं, आवाज, हसणं-रडणं, रुसवे-फुगवे, सण-उत्सवांची लगबग… सगळं तिच्या मनात कुठतरी जिवंत असतं. तिच्या माहेरच्या आठवणींचा शेवटचा धागा कधी कधी तिच्या भावाच्या मुलांशी जोडलेला असतो.
म्हणूनच आत्याला भेटणं म्हणजे केवळ एका नातेवाईकाला भेटणं नव्हे! ते आपल्या वडिलांच्या बालपणाला भेटणं असतं. आपल्या कुटुंबाच्या जिवंत इतिहासाला भेटणं असतं. आणि आपल्या स्वतःच्या बालपणातील एका सुंदर पानाला पुन्हा अलगद स्पर्श करणं असतं.
‘आत्या’ हे नातं माहेरच्या अंगणातल्या त्या जुन्या, समृद्ध झाडासारखं असतं… ज्याच्या सावलीत आपण कधीतरी खेळलो होतो, ज्याच्या फांद्यांवर कधी झोका घेतला होता; आणि आयुष्याच्या उन्हात खूप पुढे आलो, तरी ज्याची शीतल सावली मनातून कधीच जात नाही… आत्या म्हणजे त्या सावलीचं मायेचं नाव!
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री अरविंद तिवारी जी द्वारा लिखित “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २१4 ☆
☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला
लेखक – अरविंद तिवारी
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ : व्यंग्य की चटपटी प्लेट में समय का स्वाद – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
व्यंग्य की अपनी तरह की यह गोलगप्पे वाली प्लेट हमें हास्य का स्वाद देने के बाद हमारे वैचारिक हाजमे को कितना दुरुस्त करती है? किताब बंद करने के बाद हमारे भीतर कितनी हँसी, कितनी खटास और कितनी डकारें बची रहती हैं? अरविंद तिवारी का व्यंग्य-संग्रह ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ पढ़ते हुए यही सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। गड्ढे, सेमिनार, पुरस्कार, पुस्तक मेले, ए.आई., साहित्यकार, आलोचक और अंततः गोलगप्पेवाला—ये पात्र और प्रसंग पुस्तक बंद होने के बाद भी मन में घूमते रहते हैं।
यह अरविंद तिवारी का चौदहवाँ व्यंग्य-संग्रह है। साहित्य और राजनीति इसके प्रमुख सरोकार हैं, लेकिन लेखक की दृष्टि प्रशासन, सामाजिक व्यवहार, प्रकाशन, पुरस्कार, मीडिया, चुनाव और नई तकनीक तक जाती है। ‘गड्ढों का विद्रोह’, ‘जाना एक सेमिनार में’, ‘ए.आई. वाला लोचा’, ‘शोक सभा के विशेषज्ञ’, ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ जैसी रचनाएँ समकालीन विसंगतियों के अलग-अलग चेहरे सामने लाती हैं।
संग्रह की शुरुआत ‘गड्ढों का विद्रोह’ से होती है। सड़क के गड्ढे सामान्यतः नागरिकों की परेशानी हैं, लेकिन तिवारी उन्हें व्यवस्था के स्वाभाविक अंग में बदल देते हैं। उनका कथन—“गड्ढा बिना सड़क के भी हो सकता है”—सिर्फ हास्य पैदा नहीं करता, बल्कि उस मानसिकता पर चोट करता है जिसमें पुरानी समस्या धीरे-धीरे समस्या न रहकर व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।
‘जाना एक सेमिनार में’ साहित्यिक दुनिया के महानगरीय मोह और छोटे शहर के लेखक की विडंबना को पकड़ता है। कई बार साहित्यकार से अधिक उसका शहर महत्वपूर्ण हो जाता है। यह विसंगति इसलिए अधिक चुभती है क्योंकि साहित्य की दुनिया भी उससे मुक्त नहीं है।
तिवारी की खासियत यह है कि उनका व्यंग्य केवल राजनीति पर नहीं चलता। वे साहित्यिक संसार को भी उसी निर्ममता से कटघरे में खड़ा करते हैं। ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’ साहित्यिक प्रतिष्ठा, औपचारिक मित्रता, पुरस्कार-व्यवस्था और बाजारवाद की पोल खोलते हैं।
‘किताब हाथोंहाथ ली गई’ में मुहावरा ही व्यंग्य का हथियार बन जाता है। किताब का हाथोंहाथ घूमना साहित्यिक मित्रता और दिखावे की विडंबनाओं को उजागर करता है। इसी तरह ‘पुरस्कार चुक गए हैं!’ में सब्जी मंडी की भाषा साहित्यिक पुरस्कारों की दुनिया में प्रवेश करती है। थोक, रिटेल, खरीददार और माल जैसे शब्द हँसाते तो हैं, लेकिन पुरस्कारों के बाजारीकरण का गंभीर प्रश्न भी खड़ा करते हैं।
‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ चुनावी संस्कृति के प्रदर्शन और राजनीतिक गणित को निशाना बनाता है। वहीं ‘ए.आई. वाला लोचा’ और ‘इस बार ए.आई. वाली दीवाली’ में नई तकनीक के बहाने आभासी छवि, प्रचार और असली-नकली की धुंधली होती सीमा पर टिप्पणी की गई है। इससे तिवारी की समकालीनता स्पष्ट होती है। वे पुराने मुहावरों के व्यंग्यकार हैं, लेकिन विषयों में पुराने नहीं हैं।
इस संग्रह की भाषा सहज, बातचीत के करीब और मुहावरेदार है। तिवारी असंगत चीजों को एक साथ रखकर नया व्यंग्यार्थ पैदा करते हैं—गड्ढा और व्यवस्था, सब्जी मंडी और पुरस्कार, आम और साहित्यकार, ए.आई. और दीवाली। यही उनका विशिष्ट व्यंग्य-कौशल है।
उनके व्यंग्य की एक और महत्वपूर्ण विशेषता आत्मव्यंग्य है। साहित्यिक संसार पर चोट करते हुए वे स्वयं को उससे बाहर खड़ा नहीं करते। यही ईमानदारी उनके व्यंग्य को उपदेश बनने से बचाती है। हाँ, कुछ रचनाओं में व्यंग्य की ऊर्जा इतनी अधिक है कि लेखक एक ही प्रसंग पर कुछ अधिक देर ठहर जाते हैं; किंतु यह उस लेखक की स्वाभाविक सीमा भी है जिसके पास कहने को बहुत कुछ है।
अरविंद तिवारी छोटी-सी विसंगति पकड़ते हैं और उसे इस तरह विस्तार देते हैं कि उसमें पूरा समय दिखाई देने लगता है। ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ की सार्थकता इसी में है कि यह दूसरों पर हँसने वाली किताब भर नहीं, बल्कि साहित्य और स्वयं साहित्यकार को भी हँसी के कटघरे में खड़ा करती है।
शायद हमारे समय की हर गंभीर चीज के भीतर सचमुच एक गोलगप्पा छिपा है। उसे फोड़ने के लिए व्यंग्यकार की उंगली चाहिए और उसमें चटपटा पानी भरने की कला भी। अरविंद तिवारी यह काम बखूबी करते हैं।
मेरी दृष्टि में यह संग्रह समकालीन हिंदी व्यंग्य की सशक्त धारा में अपनी जगह बनाता है। इसे पढ़कर मुस्कान आती है, लेकिन मुस्कान के पीछे एक असुविधाजनक सवाल भी रह जाता है—जिन विसंगतियों पर हम हँस रहे हैं, कहीं वे हमारी अपनी आदतें तो नहीं?
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३४९ ☆ कलयुग केवल नाम अधारा…
राम नाम अवलंब बिनु परमारथ की आस।
बरसत वारिद बूँद गहि चाहत चढ़न अकास।।
श्री राम का नाम परमार्थ अर्थात धर्म, अर्थ, काम मोक्ष प्रदान करता है। उनके नाम के बिना भवसागर से पार होने की कल्पना कुछ ऐसी ही है, जैसे कोई बारिश की बूँदों के सहारे आकाश में जाना चाहता हो। अर्थ स्पष्ट है, श्री राम का नाम तारणहार है।
श्री राम के नाम को, उनकी अतुल्य जीवनयात्रा को घर-घर और जन-जन तक जनभाषा में पहुँचानेवाले ग्रंथ का नाम है, रामचरितमानस। कौशल्या हितकारी राम से रणकर्कश श्री राम की कथा है रामचरितमानस, राजा राम से लोकनायक श्री राम होने की गाथा है रामचरितमानस। रामचरितमानस श्रीराम के व्यक्तित्व और कृतित्व की अशेष यात्रा है। रामचरितमानस में को अवधी भाषा में लिखा गया है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस अमर कृति का लेखन विक्रम संवत 1631 तदनुसार ईस्वी सन 1574 को मंगलवार श्री रामनवमी के दिन आरंभ किया था। यह लेखन 2 वर्ष 7 महीने और 26 दिन चला। विक्रम संवत 1633 अर्थात ईस्वी सन 1576 को श्री राम विवाह के दिन यह संपन्न हुआ।
रामचरितमानस में कुल सात खंड / अध्याय हैं, बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किन्धाकांड, सुन्दरकांड, लंकाकांड और उत्तरकांड।
मानस में संस्कृत और प्राकृत के कुल मिलाकर 18 छंदों में सृजन हुआ है। रामचरितमानस में कुल 10902 पद हैं। इनमें 9388 चौपाई हैं। मानस में 1172 दोहा हैं। इसमें 87 सोरठा हैं। इस महाकाव्य में 208 छंद हैं जिनमें हरिगीतिका, त्रिभंगी, तोमर, चौपैया सम्मिलित हैं। इस कालजयी ग्रंथ में 47 श्लोक हैं। इन श्लोकों में शार्दूलविक्रीडित, अनुष्टुप, प्रमाणिका, वंशस्थ, उपजाति, मालिनी, वसंततिलका, रथोद्धता, भुजंगप्रयात, तोटक, स्रग्धरा हैं।
यद्यपि स्थूल रूप से देखें तो रामचरितमानस, रामकथा है, तथापि सूक्ष्म अवलोकन-अध्ययन करें तो पाएँगे कि इसके अक्षर-अक्षर में जीवनमूल्य और नीतिमत्ता साक्षात दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि श्री राम का जीवनवृत्त ही ऐसा है। संभवत: यही कारण था, जिसने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त से लिखवाया,
राम, तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है।
कोई कवि बन जाय, सहज संभाव्य है।।
रामचरितमानस ने श्री राम को एक अनन्य व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया। राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं, लोकहितकारी हैं।राम एकमेवाद्वितीय हैं।
रामचरितमानस पढ़ना अर्थात सदाचार, नीतिमत्ता और जीवन के आदर्श पढ़ना। विशेषकर उत्तरभारत में तो मानस के दोहे और चौपाइयाँ, लोकोक्तियों के समान चलन में हैं।
अवधी में होने के कारण रामचरितमानस सार्वजनीन हुआ, जन-जन की जिह्वा का गान बना। जिस तरह बालक को दादी, नानी कहानी सुनाती हैं, कुछ उसी तरह हर आयुसमूह के लिए दादी, नानी की लोककथा बना रामचरितमानस। यही कारण है कि गोस्वामी तुलसीदास रचित मानस का पारायण आगे चलकर परम्परा बना।
वस्तुत: संसार रूपी सागर में हर मनुष्य एक घड़ा है, एक घट है। इस घट में रावण का निवास है पर श्रीराम का भी वास है। मनुष्य से अपेक्षित है कि वह भीतर के श्रीराम का जागरण और अंतर्भूत रावण का मर्दन करे।अपने अवगुणों का दहन, और रामत्व का जागरण ही रामचरितमानस का सच्चा पारायण है।
‘रामत्व’ की अनुकम्पा गोस्वामी तुलसीदास को प्राप्त हुई थी। तभी श्रीरामचरितमानस में आपने लिखा,
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।
बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥
अर्थात जगत में जितने जड़ और चेतन जीव हैं, सबको राममय जानकर मैं उन सबके चरणकमलों की सदा दोनों हाथ जोड़कर वन्दना करता हूँ।
गोस्वामी जी के कविरूप का ध्रुवतारा है रामचरितमानस। कहा गया है,
कलयुग केवल नाम अधारा।
सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा।
कलयुग में केवल श्री राम का नाम एक आधार है। उनके सुमिरन मात्र से, केवल उनके स्मरण से मनुष्य भवसागर पार हो जाता है।
श्री राम के चरित के माध्यम से जीवन की ज्ञात, अज्ञात स्थितियों को जानने, समझने और हल की दिशा पर प्रकाश डालने का माध्यम है रामचरितमानस। कालजयी साहित्य का सार्वकालिक उदाहरण है रामचरितमानस।
श्रावण शुक्ल सप्तमी को गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती थी। विश्व को रामचरितमानस जैसा अनन्य महाकाव्य देनेवाले गोस्वामी जी को नमन।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
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≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈