हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१७ ☆ “आठवाँ सुर” – लेखक – नौशाद ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है  नौशाद जी द्वारा लिखित  “आठवाँ सुर” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१७ ☆

☆ “आठवाँ सुर” – लेखक – नौशाद ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(किताब उपलब्ध करवाने हेतु, आभार Kavita Kafe UK – कविता कैफ़े यूके)

कृति – आठवाँ सुर

लेखक – नौशाद 

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, (लंदन)

☆ संगीत के उस्ताद का शब्द-संसार : ‘आठवाँ सुर’ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

नौशाद अली को हम हिंदी सिनेमा के महान संगीतकार के रूप में याद करते हैं। बैजू बावरा, मुगल-ए-आज़म, मदर इंडिया, अनमोल घड़ी जैसी फिल्मों का संगीत उनकी पहचान है।

लेकिन जब संगीत का यह जादूगर शब्दों के संसार में प्रवेश करता है तो पता चलता है कि उसके भीतर एक संवेदनशील शायर भी था। ‘आठवाँ सुर’ इसी शायर नौशाद अली से हमारा परिचय कराती है। पुस्तक उनकी शायरी का संग्रह है, जिसमें ग़ज़ल, शेर और आत्मानुभूति के स्वर एक साथ दिखाई देते हैं।

‘आठवाँ सुर’ शीर्षक अपने आप में बड़ा अर्थपूर्ण है। भारतीय संगीत में सामान्यतः सात स्वरों की चर्चा होती है, लेकिन नौशाद के लिए जीवन के अनुभवों, प्रेम, विरह, स्मृति, पीड़ा और मृत्यु से निकली अनुभूति जैसे किसी अनसुने आठवें स्वर की तरह है। यही स्वर उनकी शायरी में सुनाई देता है। संगीतकार नौशाद ने फिल्मों में सुरों से भावों को व्यक्त किया था, शायर नौशाद शब्दों से वही काम करते हैं। शायद यही कारण है कि उनकी ग़ज़लों में भी एक लयात्मकता सहज रूप से नज़र आती है।

 नौशाद की शायरी केवल प्रेम की रूमानियत तक सीमित नहीं है। उसमें जीवन की नश्वरता, बिछोह, स्मृति, आत्मसंवाद और मृत्यु का बोध भी है। एक जगह वे लिखते हैं   —

“क्यों मिली थी हयात याद करो

याद रखने की बात याद करो।”

दो छोटे-से मिसरे हैं, लेकिन इनके भीतर पूरी जिंदगी का प्रश्न खड़ा हो जाता है। जीवन क्यों मिला था? हमने उसका क्या किया? और जाते-जाते क्या याद रह जाएगा? यह प्रश्न शायर स्वयं से भी करता है और पाठक से भी।

इसी तरह उनका एक और शेर है—

“इक बे-क़रार दिल से मुलाक़ात कीजिए

जब मिल गए हैं आप तो कुछ बात कीजिए।”

यहाँ भाषा सहज है, लेकिन भाव में गहराई है। ‘बेकरार दिल’ और ‘मुलाकात’ जैसे पारंपरिक ग़ज़ल के रूमानी शब्दों के माध्यम से नौशाद उस आत्मीय क्षण को पकड़ लेते हैं जिसमें मिलने के बाद भी मन की बात कहने की बेचैनी बनी रहती है।

 संग्रह की विशेषता इसकी सादगी है। नौशाद कठिन शब्दावली या चमत्कारपूर्ण बिंबों के पीछे नहीं भागते। वे उर्दू ग़ज़ल की परंपरा में रहते हुए भी अपनी बात को अपेक्षाकृत सीधे ढंग से कहते हैं। प्रेम है तो उसमें आत्मीयता है, विरह है तो उसमें पीड़ा है, स्मृति है तो उसके साथ एक कसक है। इसीलिए उनके शेर पढ़ते हुए ऐसा नहीं लगता कि कोई केवल शायरी कर रहा है। लगता है जैसे कोई अपने जीवन का हिसाब-किताब पाठकों के सामने रख रहा हो।

उनकी शायरी की जड़ें परंपरा में हैं और वे स्वयं इस परंपरा से अनजान नहीं थे। पुस्तक के एक पृष्ठ पर उनका आत्मव्यंग्य पूर्ण शेर है—

“करना है शायरी अगर ‘नौशाद’

‘मीर’ का कुल्लियात याद करो।”

यह केवल मीर के प्रति श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि अपनी शायरी की सीमाओं की विनम्र स्वीकृति भी है। रचनाकार की पहचान इसी विनम्रता से होती है कि वह अपने पीछे खड़ी महान परंपरा को पहचानता है। नौशाद यहाँ अपने लिए भी एक कसौटी निर्धारित करते दिखाई देते हैं।

पुस्तक के आरंभिक पृष्ठों में आया उनका आत्मीय संस्मरण भी संग्रह को केवल शायरी की किताब नहीं रहने देता। उसमें परिवार, मृत्यु, स्मृति और अपने प्रियजनों से जुड़ा ऐसा मार्मिक प्रसंग आता है, जहाँ चार पंक्तियों में उनकी निजी पीड़ा कविता बन जाती है

“फिर उसी तरह कलेजे से लगा लो मुझको

गिरती दीवार हूँ लिल्लाह सँभालो मुझको।”

और आगे—

“जिसने फल-फूल दिये, प्यार दिया, साया दिया

मैं वही पेड़ हूँ मरने से बचा लो मुझको।”

यहाँ ‘पेड़’ केवल पेड़ नहीं रह जाता। वह जीवन, परिवार, आश्रय और बीतती उम्र का प्रतीक बन जाता है। यह प्रसंग पढ़ते हुए लगता है कि संगीतकार नौशाद के भीतर का शायर अपने जीवन के अंतिम सत्य से संवाद कर रहा है।

‘आठवाँ सुर’ की शायरी में याद एक महत्वपूर्ण भाव है। वे बीते हुये समय की बार-बार याद करते है। कभी प्रेम की याद के रूप में, कभी किसी बिछुड़े व्यक्ति की स्मृति बनकर और कभी अपने ही अतीत के आईने की तरह। एक शेर में वे कहते हैं—

“मैं लाख ढूँढूँ उसे ढूँढने से क्या होगा

मेरी तलाश में वो भी तो खो गया होगा।”

यहाँ तलाश का द्वंद्व बहुत सुंदर है। जिसे हम खोज रहे हैं, संभव है वह भी हमें खोजते-खोजते कहीं खो गया हो। प्रेम की यह पारस्परिक विडंबना शेर को साधारण विरह से उठाकर जीवन की व्यापक अनुभूति बना देती है।

नौशाद की शायरी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष समय और मृत्यु का बोध है। जीवन को वे स्थायी उपलब्धि की तरह नहीं देखते। उनके यहाँ संसार आता-जाता है, रिश्ते बनते-बिगड़ते हैं और अंततः मनुष्य स्मृतियों में बदल जाता है। यही दृष्टि उनकी शायरी को केवल प्रेम-कविता का संग्रह बनने से बचाती है।

इस दृष्टि से ‘आठवाँ सुर’ को नौशाद के संगीत से अलग करके देखना भी उचित नहीं होगा। संगीत में उन्होंने भारतीय शास्त्रीय परंपरा को लोकप्रिय सिनेमा की भाषा में प्रतिष्ठित किया, शायरी में उन्होंने उसी सांस्कृतिक संस्कार को शब्दों का रूप दिया। उनके संगीत की तरह उनकी शायरी में भी माधुर्य, अनुशासन और भाव प्रधानता दिखाई देती है। किताब से गुजरते हुए नौशाद की रचनात्मक दुनिया में संगीत और कविता दो अलग-अलग धाराएँ नहीं, बल्कि एक ही संवेदनशील मन से निकले दो स्वर समझ आतें हैं। उनके जीवन और कला की यही बहुआयामी पहचान उन्हें विशिष्ट बनाती है।

‘आठवाँ सुर’ पढ़ते हुए सबसे सुखद बात यह लगती है कि यहाँ एक प्रसिद्ध संगीतकार अपने स्थापित व्यक्तित्व का सहारा लेकर शायर बनने की कोशिश नहीं करता। वह अपने शब्दों के बल पर सामने आता है। कहीं वह प्रेमी है, कहीं विरही, कहीं आत्मालोचक, कहीं जीवन से सवाल करता हुआ मनुष्य और कहीं अपनी स्मृतियों में लौटता हुआ वृद्ध। यही मानवीयता इस संग्रह को मूल्यवान बनाती है।

अनुमान लगा सकता हूं कि ये संग्रह उनके जीवन के लंबे सफर में मन का चैन ढूंढने का, समय समय पर कागज पर अभिव्यक्त प्रयासो का संकलन है।

नौशाद के संगीत को सुनते हुए हम उनके सुरों के जादू में खो जाते हैं,  ‘आठवाँ सुर’ पढ़ते हुए उन्हीं सुरों के पीछे छिपे मनुष्य से हमारा परिचय होता है। सात सुरों के महान साधक ने शब्दों में जो अतिरिक्त स्वर खोजा, शायद वही इस पुस्तक का ‘आठवाँ सुर’ है, एक ऐसा स्वर, जिसे कानों से कम और मन से अधिक सुना जा सकता है।

उन्हें श्रद्धांजलि

#लंदन_डायरी, #पुस्तक, #bhawan

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ संध्यागंध… ☆ प्रा. भरत खैरकर☆

प्रा. भरत खैरकर

🌸 विविधा 🌸

☆ संध्यागंध… ☆ प्रा. भरत खैरकर ☆

दूरवरून गावाकडे बघताना विखुरलेली मातीची घरं.. विस्कटलेल्या माणसांचा समूह.. त्यांच्या जिवंत गाथा. निसर्गाने रचलेली.. काळाने घडवलेली आणि माणसाच्या श्रमांनी सजवलेली भूमी मी जेव्हा गावाच्या बाहेर एका कडेला उभा राहून सभोवताली पसरलेल्या या दृश्यांकडे पाहतो, तेव्हा माझ्या डोळ्यांत आयुष्याचा एक खोल अर्थ उलगडतो.

सकाळी उगवलेला सूर्य जेव्हा संध्याकाळी थकलेल्या पावलांनी डोंगरामागे उतरण्याच्या तयारीला लागतो, तेव्हा गावाला एक खास रूप येतं. शेतांच्या पिकांवर.. घरांच्या कौलारांवर.. पडलेली किरणं सोनेरी शाल पांघरतात. भाताच्या पिकावर चमकणारे सायंतीचे रूप.. बाजरीच्या कणसांवर घरी परतण्याआधी बसलेली पाखरं आणि शेतमजुरांच्या कपाळावरचा घाम.. या साऱ्यांचा मनोहर संगम संध्यागंधात एकरूप होऊन जातो.

गावाभोवतीच्या दऱ्याखोऱ्या काळाने कोरलेल्या खोल खोल गावच्याच ललाट रेषा असल्यासारख्या वाटतात. नदीचं वाहणारं पाणी खळखळाट करीत खाली उतरतं आणि त्या पाण्याच्या सुरेल लयीत गावाची धडधड.. धडपड आणि श्रम मिसळतात. हे सगळं एकाच वेळी भव्य.. आपुलकीचं.. आपलंसं आणि हवहवसं वाटतं.. उन्हाळ्यात याच डोंगररांगा गावपायथ्याशी वारा अन् गार सावली आणतात तर हिवाळ्यात डोंगराची शांतता अंगावर घेत गाव झोपून जातं!

गावाजवळच्या जंगलाचा सुगंध वेगळाच आहे. कडुलिंबाच्या पानांतून येणारा कडसर गंध, आंब्याच्या झाडाखाली पिकलेल्या फळांचा गोड वास, तर कधी करवंदाच्या काटेरी झुडपातून येणारी आंबटसर चव—या साऱ्यात माझ्या बालपणाच्या पाऊलखुणा दडलेल्या आहेत. पक्ष्यांचा किलबिलाट हे जंगलाचं गीत आहे. कोकीळेचा स्वर संध्याकाळी दुरून ऐकू आला की मनात एक मृदू आठवण दाटून येते.

आणि मग ती वेळ येते.. गुरंढोरं परतण्याची. हीच गावाची खरी संध्याकाळ. धुळीच्या पडद्यातून चालत येणाऱ्या गायी, बैल, म्हशी; त्यांच्या मानेतल्या घंटांचा झंकार; वासरांचे हंबरणे.. हे सगळं पाहिलं की पेंद्या, सुदामासह कृष्ण गाई राखून परतायचा त्याच ते धुळीचे माखलेलं “पांडुरंग “रूप आठवून गावकऱ्यांचा थकवा कुठल्या कुठे पळून जातो. गावकऱ्यांच्या चेहऱ्यावर हास्य ऊमलतं. लेकरं धावत अंगणभर हुंदडतात, “माझं वासरू आलं! ” अशी हाक मारत वासरांचे लाड करतात.. गोंजारतात.. घराघरांतल्या बायकाही हातात पाणी, गवत, वैरण घेऊन गोठ्याशेजारी उभ्या राहतात. गुरं-ढोरं अंगणात शिरली की जणू घरात प्राण फुंकला जातो!

याच वेळी गावावर एक वेगळाच गंध पसरतो. कुठे भाकरी भाजल्याचा, कुठे पिठल्याचा, कुठे खमंग फोडणीचा तर कुठे धुरकट लाकडाचा! सगळ्या घरांत चुली पेटतात आणि त्या धुरात कष्टाचा गोडवा मिसळतो. पुरुष मंडळी शेतावरून परततात, दिवसातील कष्ट आणि रानगप्पा घेऊन. कुणी मुलाला खांद्यावर घेतं, कुणी पत्नीला शेताची हकीकत सांगतं. त्या साध्या बोलण्यातही जीवनाचा गाभा.. मतितार्थ.. दडलेला असतो.

गावची ही संध्याकाळ म्हणजे फक्त एक वेळ नाही, तर तो एक संस्कार आहे! कष्टानंतरची विश्रांती, श्रमांतून मिळणारं समाधान, आणि निसर्गाशी एकरूप झालेलं जीवन आहे. शहरातल्या दिव्यांच्या झगमगाटात मला ही शांतता कधीच दिसली नाही. तिथे माणसं गर्दीतही एकटी वाटतात; पण इथे, या गावात, ती एकमेकांच्या जवळ असतात..

मी डोळे मिटून हा क्षण अनुभवतो. सूर्य डोंगरामागे हरवतो, आकाश गडद होतं, आणि तरीही गावाचा आत्मा उजळून निघतो. या क्षणी मला नेहमीच जाणवतं.. गाव म्हणजे फक्त भौगोलिक जागा नाही; गाव म्हणजे जीवनाची खरी शाळा आहे. आणि हा

संध्यागंध जीवनाची कस्तुरी आहे! त्यामुळे इथलं जगणं सुगंधी आणि मोहमयी होऊन गेलं आहे..

 

© प्रा. भरत खैरकर

संपर्क – बी १/७, काकडे पार्क, तानाजी नगर, चिंचवड, पुणे ३३. मो.  ९८८१६१५३२९

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ११०२ ⇒ प्रतिभा-सम्पन्न ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्रतिभा-सम्पन्न …“।)

?अभी अभी # ११०२ ⇒ आलेख – प्रतिभा-सम्पन्न ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

वे एक सम्पन्न घराने से हैं ! पढ़ने-लिखने के शौकीन हैं । कॉलेज में पाँव रखने तक कई प्रेम-पत्र लिख चुके हैं, और गुलशन नंदा और रानू से लगाकर कई अल-मस्तरामों जैसे लेखकों के साहित्य का अध्ययन कर, घर में ही किताबों का पहाड़ खड़ा कर चुके हैं ।

पिताजी ने तो बहुत नोट छाप लिए ! उन्हें अब छपने का बहुत शौक है । बड़े अखबारों में संपादक के नाम बड़े-बड़े पत्र लिखे, जो छोटे होते-होते, जब चाँदी का जूता और लोहा-लंगर जैसे अखबारों में छपने लगे, तो उनका मन खट्टा हो गया । उनकी प्रतिभा कुंद होने लगी ।।

फिर एक समय ऐसा आया, कि उनके पिताजी ने उनका विवाह प्रतिभा नामक एक गुणवान कन्या से कर दिया । सम्पन्न तो वे पहले से ही थे, अब प्रतिभा-सम्पन्न भी हो गए ।

जिस तरह पूत के पाँव पालने में ही नज़र आ जाते हैं, व्यक्ति की प्रतिभा छुपाए नहीं छुपती ! वे जब अपनी नई नवेली के साथ बाज़ार घूमने जाते, लोग आपस में बातें करते ! वो देखो, प्रतिभा का धनी जा रहा है । वे बड़े दरियादिल थे, इसे अपनी तारीफ़ समझ बहुत खुश हो लेते ।।

धीरे धीरे उनकी प्रतिभा पाँव फैलाने लगी ! उनका छपास रोग, उचित अवसर पा, फिर उभर आया । उन्होंने एक प्रिंटिंग प्रेस डालने का विचार किया । उनकी better half प्रतिभा ने उन्हें एक सुझाव दिया ! क्यों जी ! क्यों न आप जिओ का एक 4-जी फोन खरीद, एक फेसबुक एकाउंट खोल लेते । वे कुछ समझे नहीं ।

उनकी प्रतिभा ने उन्हें समझाया ! आपकी खुद की एक 4″x 6″ की प्रिंटिंग मशीन होगी । न कागज़ माँगेगी, न स्याही । कोई कर्मचारी नहीं ! न पॉवर कनेक्शन और न ही कोई बिजली के बिल का झंझट । जितना चाहो, जब चाहो, अपने फोटो के साथ तबीयत से छापो । केवल एक चार्जर आपकी प्रिंटिंग प्रेस को शुरू करने में सक्षम है । जब भी आपकी प्रेस थक जाए, उसे कभी चार्ज, कभी रिचार्ज करा लिया करो ।।

उनकी छपने की आस चुटकियों में पूरी हो गई । अब उन्हें किसी अखबार, पत्रिका, और संपादक की दरकार नहीं । आज वे ही लेखक, संपादक और एक प्रिंटिंग मशीन के स्वामी हैं । उनकी कोई रचना अस्वीकृत नहीं होती । तत्काल बिना काट-छाँट के छप जाती है ।

अब उन्हें पाठकों की प्रतिक्रिया के लिए 24 घंटे भी इंतज़ार नहीं करना पड़ता । चट मंगनी, पट ब्याह जैसा, इधर छपा, उधर संपादक के नाम पत्र ! कोई तारीफ के पुल बाँध रहा है तो कोई उन्हें un-subscribe कर रहा है । लेकिन आज वे एक प्रतिभा-सम्पन्न स्वयंभू लेखक, कवि, साहित्यकार, चिंतक, विचारक और समाज सुधारक बन चुके हैं ।

उनकी ” प्रतिभा “को नमन ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “भारतीय सेनेचे पाच पांडव!” ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

श्री संभाजी बबन गायके

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “भारतीय सेनेचे पाच पांडव!” ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

☆

महाभारतात शंभर कौरवांचा पराभव करणारे सर्वच्या सर्व पाच पांडव एकाच आईच्या पोटी जन्मले नव्हते. युधिष्ठिर, भीम आणि अर्जुन हे कुंतीचे तर नकुल आणि सहदेव हे माद्रीचे पुत्र होते.

परंतू आधुनिक महाभारतात अर्थात १९७१मध्ये पाकिस्तानी कौरवांविरोधात प्राणपणाने लढून विजयश्री खेचून आणणारे आपले हे पाच पांडव मात्र एकाच आईच्या पोटी जन्मले होते!

तो डोक्याने पहिल्यापासून बराचसा तापट पण अभ्यासात, खेळांत अतिशय वाकबगार होता. वडील लष्करी विभागात कनिष्ठ लिपिकाची नोकरी करीत इंग्रज आमदनीमध्ये. त्यामुळे या मुलाला ब्रिटीश आणि पुढे भारतीय लष्करी अधिकारी, त्यांचा रुबाब जवळून अनुभवता आला. डेहरादून येथे स्थापन झालेल्या राष्ट्रीय संरक्षण प्रबोधिनी (N. D. A.)मध्ये पहिल्याच तुकडीत लष्करी अधिकारी प्रशिक्षणार्थी म्हणून हा नवतरुण त्याच्या अंगभूत कौशल्यांच्या बळावर गुणवत्तेवर निवडला गेला! त्याचे वडील आणि आई यांचा आनंदात गगनात मावेनासा झाला.

यथावकाश प्रशिक्षण सुरु झाले. आणि एक दुर्दैवी घटना घडली. एका अधिका-याने या नवोदित, प्रशिक्षणार्थी तुकडीतील एका गटाला जरा जास्तच शिक्षा दिली. त्याचा सूड म्हणून या तुकडीतील प्रशिक्षणार्थी तरुणांनी त्या अधिका-याच्या कार्यालयाची रात्री चोरून तिथे घुसून नासधूस केली. याचा तपास करताना अधिका-यांनी सर्व तुकडीवरच निलंबन कारवाई करण्याचे निश्चित केले. या गुन्ह्यात आपला कथानायक खरा नायक होता. पण आपल्यामुळे सर्वांचे नुकसान होऊ नये म्हणून याने सर्व दोष आपल्या शिरावर घेतला आणि अकादमीमधून निष्कासित अर्थात काढून टाकले जाण्याची शिक्षा स्वीकारली!

या धक्क्याने त्याच्या वडिलांचे हृदयविकाराच्या झटक्याने निधन झाले! आई खूप दु:खी-कष्टी झाली. हा थोरला मुलगा होता. त्याच्या पाठीवर आणखी चार भाऊ आणि दोन बहिणी होत्या. थोरल्यावर कुटुंबाचा भार आणि आशा-आकांक्षा होत्या, पण त्याच्या या कृतीने सर्व झाकोळले गेले! पण म्हणून या मुलाच्या आईने हिंमत गमावली नाही. तिने मुलाच्या प्रामाणिकपणाचे कौतुकच केले. आणि त्या मुलानेही मग लष्करात भरती होण्याचे स्वप्न साकार करण्याच्या जिद्दी पायी ‘शिपाई’ म्हणून लष्करी जीवन अंगिकारण्याचा निर्णय घेतला. परंतु NDA मधून झालेले निलंबन यात मोठा अडथळा असल्याने सर्वं मार्ग बंद झालेले होते! पण एका चमत्कार घडला!

प्रेमकुमार यांनी इंग्रजी भाषेत उत्तम प्राविण्य संपादन केले होते. त्यांनी त्यांच्या इतर भावांना आणि मित्रांनाही इंग्रजी शिकवण्याचा प्रयत्न केला होता. एकेदिवशी प्रेमकुमार जळणासाठी लाकूडफाटा गोळा करण्यासाठी मित्रांसमवेत डोंगरावर गेलेले असताना चांगल्या इंग्रजीत मित्रांशी संवाद साधत असताना लष्करी वसाहतीच्या एका इंग्रज लष्करी अधिका-याने त्यांचे बोलणे ऐकले. आणि त्या सर्व मुलांना क्रिकेटचा सामना खेळण्यासाठी आमंत्रित केले. त्या सामन्यात उत्तम कामगिरी केल्याने त्याची तिथल्या ब्रिटीश कमांडंट साहेबांशी परिचय करून देण्यात आला.

पुढे लष्करी जवानांची भरती निघाली. प्रेमकुमार यांचा अर्ज अर्थातच त्यांच्या आधीच्या प्रकरणामुळे नाकारण्यात आला होता, पण विशेष बाब म्हणून ब्रिटीश कमांडंट साहेबांनी त्यांची शिफारस केली आणि अशा रीतीने प्रेमकुमार कुकरेती शिपाई म्हणून का असेना अंगावर लष्करी गणवेश परिधान करते झाले! त्यांना गढवाल रेजिमेंट मिळाली. पण तेथील अधिका-यांनी प्रेमकुमार यांना त्यांची क्रीडा पार्श्वभूमी, इंग्रजी संभाषण कला आणि अधिका-याला साजेसे नेतृत्वगुण लक्षात घेऊन त्यांना कुठल्याही बटालियनमध्ये न पाठवता रेजिमेंटमध्येच ठेवले. पण येथील जवान प्रेमकुमार यांना त्यांचे सहकारी जवान त्यांच्या पूर्वीच्या आयुष्यावरून चिडवत असत. यावर गांभीर्याने विचार करून प्रेमकुमार यांनी लष्करी अधिकारी होण्याचे मनावर घेतले. खूपच कष्ट घेत त्यांनी शेवटी IMA Indian Military Academy मध्ये प्रवेश मिळवला आणि ते अधिकारी बनले! त्यांना गढवाल रेजिमेंटमध्येच सेकंड लेफ्टनंट म्हणून नेमणूक मिळाली. त्यांचे NDA तुकडीतील प्रशिक्षणार्थी मित्र आता त्यांच्यापुढे चार वर्षे वरिष्ठ होते. त्यांपैकीच एका अधिका-याने कॅप्टन नय्यर जे त्यावेळी रेजिमेंटचे Adjutant होते, त्यांनी खास परवानगी घेत, स्वत: जाऊन प्रेमकुमार यांचे रेजिमेंटमध्ये स्वागत केले! एक चक्र पूर्ण झाले होते!

क्रिकेटचे उत्तम खेळाडू असल्याने प्रेमकुमार कुकरेती यांची भारतीय लष्कराच्या क्रिकेट संघात निवड झाली होते, ज्या संघाचे कर्णधार होते कर्नल हेमंत अधिकारी! प्रेमकुमार यांना राष्ट्रीय संघातून खेळण्याची सुवर्णसंधी मिळू शकली असती. पण जिथे धोका अधिक आहे, त्या भागात नेमणूक असल्यास अधिकचे वेतन, भत्ते मिळतात आणि शिवाय शौर्य गाजवण्याची इच्छा असल्याने प्रेमकुमार यांनी ही संधी नाकारली आणि ते लढाईवर रुजू झाले. १९६२ मध्ये झालेल्या भारत-चीन युद्धात त्यांनी शौर्य गाजवले! १९७१ मध्ये झालेल्या भारत-पाक युद्धात त्यांनी राजपूत बटालियनची धुरा सांभाळली!

त्या आधी त्यांनी आपल्या चारही भावांना लष्करात भरती होण्याची प्रेरणा, मार्गदर्शन आणि प्रोत्साहन दिले आणि ते चारही बंधू लष्कराच्या विविध विभागांत रुजूही झाले. एकाच आई-बापापोटी जन्मलेले पाच सैनिक भारतीय सैन्यात एकाचवेळी कार्यरत होते, ही एक जगावेगळी बाब ठरली!

या बहादूर सैनिकांची नावे आहेत मेजर जगदीश प्रसाद, मेजर धर्मलाल, लेफ्टनंट कर्नल राकेश, नायब सुबेदार सोहनलाल!

१९७१मध्ये युद्धाचे ढग जमा होऊ लागले होते. त्यावेळी हे पाचही कुकरेती बंधू लष्करात सेवेत होते. थोरला तर आघाडीवर तैनात होता अधिकारी म्हणून. बाकी सुट्टीवर घरी आलेले होते. त्यांच्या मातोश्रींनी या चौघांच्याही कपाळांवर कुंकूम तिलक रेखला आणि सर्वांना आशीर्वाद देत सीमेवर भारतमातेच्या रक्षणासाठी मार्गस्थ केले!

सीमेवर असलेल्या मेजर जनरल प्रेमकुमार यांचे पत्र घरी पोहोचले त्यात ते लिहितात, ”माझी काळजी करू नका. शत्रू लबाड असला तरी आपले जवानांचा निश्चय अभेद्य आहे. आम्ही चिखलातून, जंगलातून, गोळीबाराच्या वर्षावातून पुढे पुढे चाललेलो आहोत… आमचे प्रत्येक पाऊल विजयाच्या दिशेने पडते आहे… घरी आमच्या सर्व मुलांना, भाच्यांना, पुतण्यांना सांगा… तुमचे सर्व काका, तुमचे मामा, तुमचे वडील शत्रूला नामोहरम करण्यात व्यग्र आहेत… आम्ही इतिहास घडवतो आहोत! ”

लेफ्टनंट कर्नल राकेश कुकरेती यांच्या तुकडीवर पाकिस्तानी सेनेच्या मागे जाऊन त्यांच्यावर हल्ला चढवण्याची मोठी जोखमीची कामगिरी सोपवण्यात आली. आपले सैनिक सलग तीन दिवस विना अन्न, पाण्याचे नव्वद पेक्षा अधिक किलोमीटर्सचे अंतर पायी चालले… वरून पाकिस्तानी मारा होत होता, आपले हवाईदल पाकिस्तानवर तुफान हल्ला करीत होते… सर्वत्र प्रचंड धोका होता. त्याही स्थितीत आपल्या थोरल्या भावाला राकेश साहेबांनी रेडीओ संदेश करून गोळीबाराचा आवाज ऐकवला होता आणि अतिशय शांतपणे म्हणाले होते, विजय आपलाच होईल. आणि तसेच झाले. राकेश साहेबांच्या तुकडीने उपाशीपोटी असूनही पाकिस्तानचा कडवा प्रतिकार मोडून काढला.

दुस-या आघडीवर लढणा-या नायब सुबेदार सोहनलाल कुकरेती यांनी सुद्धा तुफान कामगिरी बजावली. त्यांची चौकी पाकिस्तानी आक्रमणाने पुरती घेरली गेली होती. रात्रीचा समय होता. मदतीसाठी दुसरी तुकडी येण्यास काही समस्या होती. या सैनिकांनी रात्रभर ती छोटी चौकी लढवत ठेवली… पाकिस्तान्यांना पुढे येऊ दिलेच नाही. सकाळी मदत पथक आल्यावरपाकिस्तानी पळून जाण्यात यशस्वी ठरले!

उर्वरीत दोघे बंधू मेजर जगदीश प्रसाद आणि मेजर धर्मलाल Corps of Electronics and Mechanical Engineers (EME)मध्ये कर्तव्यावर असताना प्रत्यक्ष सीमेवर तैनात राहून लढणा-या सैनिकांना साहाय्य पुरवीत होते.

१६ डिसेंबर, १९७१ रोजी भारताचा विजय जाहीर झाला. कुकरेती कुटुंबातील हे पाच पांडव विजयी होऊनच रणभूमीवरून माघारी आले होते… मातोश्री त्यांच्या स्वागतास आरतीचे ताट घेऊन उंब-याबाहेर उभ्या होत्या… त्या म्हणाल्या… माझ्या पोरांनी भारतमातेची शान राखली! धन्य ही माता आणि धन्य तिची कूस… जिने एक नव्हे, दोन नव्हे, पाच पाच शूर पुत्र जन्मास घातले!

सर्वांत थोरले प्रेमलाल कुकरेती आसाम रायफल्ससे डायरेक्टर जनरल पदी पोहोचले आणि त्यांना सेना मेडल ने सन्मानित करण्यात आले. सर्वांत धाकटे राकेश कुकरेती लेफ्टनंट कर्नल बनले आणि त्यांनी शौर्य चक्र प्राप्त केले. एवढेच नव्हे तर राकेश कुकरेती साहेबांचे चिरंजीवही, कार्तिकेय कुकरेती सेनेत लेफ्टनंट कर्नल बनले आणि त्यांनीही सेना मेडल पटकावले. दुसरे अर्थ कुकरेतीही लेफ्टनंट कर्नल असून त्यांना Mention in Dispatches हे कौतुक पदक प्राप्त झालेले आहे. जय हिंद.. जय हिंद की सेना!

भारतच्या लष्करी इतिहासात कुकरेती बंधू ही मानाची पाच पानेच आहेत, असे अभिमानाने म्हणावेसे वाटते. त्यांच्याकडून प्रेरणा घेत अनेक तरुणांनी सेनेच्या सेवेचा ध्यास घेतला, ही उल्लेखनीय आहे! जय हिंद… जय हिंद की सेना..

 

© श्री संभाजी बबन गायके 

पुणे

9881298260

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – सच्ची पूजा ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ सच्ची पूजा ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

“माँ, चार धाम करके आया हूँ।”

“अच्छा! मन शांत हुआ?”

“बहुत। भगवान खुश हो गए होंगे।”

माँ मुस्कुराई, “पक्का?”

“क्यों?”

“कल शर्मा जी का दिल क्यों दुखाया?”

“वो गलत बोल रहे थे।”

“बहू से भी नाराज़ थे?”

“हाँ… थोड़ा।”

माँ चुप रही।

“क्या हुआ?”

“मंदिर में भगवान को खुश करते हो…”

“तो?”

“घर में इंसानों को क्यों दुख देते हो?”

वह चुप हो गया।

“माँ, पूजा-पाठ तो जरूरी है।”

“बिल्कुल।”

“फिर?”

“भगवान के घर हिसाब भी तो होगा।”

“कैसा हिसाब?”

माँ ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा-

“कितनी बार मंदिर गए, ये नहीं…

तुम्हारी वजह से कितने दिल रोए, ये गिना जाएगा।”

वह सिर झुका गया।

माँ ने बस इतना कहा-

“भगवान को ढूँढ़ने से पहले, इंसान को मत खोना।”

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३४१ ☆ काळाचा महिमा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३४१ ?

☆ काळाचा महिमा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

☆

उभा ठाकला भिंतीवरती

कक्षेमधेच काटे फिरती

*

वेगेवेगे कुणी धावतो

कुणी असा का हळू रांगतो

*

सेंकदाचा वेग भयंकर

तोच चालतो येथे भरभर

*

पुढे सरकतो हा मिनिटाने

कधी न जमले यास धावणे

*

याला नसते कधीच घाई

तासानंतर हलतो बाई

*

काळाचा या महिमा भारी

त्याच्या सोबत दुनिया सारी

*

आनंदाने तिघे भेटले

अन बाराचे टोल वाजले

☆

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “कायद्याचा नाही.. सामाजिक मानसिकतेचा पराभव…” ☆ श्री जगदीश काबरे ☆

श्री जगदीश काबरे

? मनमंजुषेतून ?

☆ “कायद्याचा नाही.. सामाजिक मानसिकतेचा पराभव…” ☆ श्री जगदीश काबरे ☆

 कायदा अस्तित्वात आहे, दंडाची तरतूद आहे, तरीही पर्यावरणाला हानी पोहोचवणाऱ्या वस्तूंचा वापर सुरूच राहतो, याचा अर्थ केवळ कायद्याची अंमलबजावणी अपुरी आहे असे नाही; तर नागरिकांच्या मनात कायद्याबद्दलची नैतिक बांधिलकीच निर्माण झालेली नाही. याला कायदेभंगाची सामाजिक मानसिकता म्हणतात. कायदा आहे, पण कायद्याची संस्कृती नाही, असे आपल्या देशाचे वास्तव आहे. लोकांच्या मनात ‘पोलिसांनी मला पकडले नाही, म्हणजे मी काही चुकीचे केलेले नाही’, अशी मानसिकता असेल, तर पंचवीस हजार रुपयांचा दंडही परिणामकारक ठरणार नाही. कारण पर्यावरणाचे नुकसान तात्काळ दिसत नाहीत, त्याचा फटका आपल्या बरोबरच पुढच्या पिढ्यांना चांगलाच बसतो.

यामागे सामाजिक अनुकरण, दिखाऊपणा आणि पर्यावरणीय परिणामांविषयीची उदासीनता हे तीन महत्त्वाचे घटक आहेत. एकाने थर्माकोलची सजावट केली की दुसरा करतो; प्लास्टिकच्या माळा स्वस्त आणि आकर्षक वाटतात, म्हणून सगळेच त्या विकत आणतात. आणि समारंभाची शोभा वाढवली जाते. अशी तात्कालीक क्षणभंगुर शोभा वाढवणारे आपण ‘अदरवाईज जंटलमन’ असतो. पण हा स्वतःच्या चुकीला योग्य ठरवणारा कुतर्क आहे. त्यामुळे प्रश्न केवळ प्लास्टिक किंवा थर्माकोलचा राहत नाही; तो नागरिकांच्या विवेकाचा प्रश्न बनतो. म्हणून या परिस्थितीला एका वाक्यात असे म्हणता येईल की, कायदा बदल घडवू शकतो; पण कायद्याचे पालन करण्याची मानसिकता बदलली नाही, तर कायदा कागदावरच राहतो. खरी पर्यावरण जाणीव म्हणजे दंडाची भीती वाटून थर्माकोल आणि प्लास्टिकचा वापरणे टाळणे नव्हे, तर दंड नसतानाही ते वापरू नये असे स्वतःला वाटणे होय.

प्लास्टिक आणि थर्माकोल यांचे सहज जैवविघटन होत नाही. ते पर्यावरणात बारीक बारीक तुकड्यांच्या स्वरूपात दीर्घकाळ टिकून रहाते. हे तुकडे कालांतराने सूक्ष्म आणि अतिसूक्ष्म कणांमध्ये बदलतात. हे कण हवा, पाणी आणि अन्नसाखळीमार्फत माणसाच्या पोटात जातात, आणि मानवी आरोग्यावर दीर्घकालीन परिणाम करतात. हे एक प्रकारचे स्लो पॉइझनिंग असते. म्हणून दिसत नाही म्हणजे नष्ट झाले, हा समज अत्यंत धोकादायक आहे. प्लास्टिकची फुले, थर्माकोलची सजावट कचऱ्यातून गायब झाली म्हणून समस्या संपलेली नसते; ती फक्त मोठ्या तुकड्यापासून अदृश्य होणाऱ्या सूक्ष्म कणांच्या रूपात बदललेली असते.

प्लास्टिक आणि थर्माकोचे दुष्परिणाम लगेच दिसत नाहीत; म्हणून काय फरक पडणार आहे, असा विचार हजारो लोक करतात आणि सामूहिकपणे ही मोठी समस्या निर्माण होते. जेव्हा त्याचे परिणाम पाणी, हवा, कचरा, आरोग्य किंवा हवामानाच्या रूपाने गळ्याशी येतात, तेव्हा मात्र दोष सरकारच्या माथी मारला जातो, प्रशासनाला दोषी धरले जाते. पण सामान्य माणसाला संकट दिसेपर्यंत त्याचा विवेक झोपलेला असतो आणि संकट आले की तो पश्चाताप करू लागतो. तेव्हा मात्र वेळ निघून गेलेली असते.

म्हणूनच म्हटले जाते की, खऱ्या अर्थाने सुजाण समाजाची ओळख संकट आल्यानंतर तो काय करतो यात नसते; संकट येण्यापूर्वी तो कोणती खबरदारी घेतो यात असते. कळले का? 

© श्री जगदीश काबरे

(लेखक विज्ञान आणि वैज्ञानिक दृष्टीकोन प्रसारक आहेत.)

jetjagdish@gmail. com

मो ९९२०१९७६८०

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

English Literature – Satire ☆ Witful Warmth # 117– The Senior Citizen… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.

His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.

His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.

Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.

Key Accolades and Works

  • Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
  • Satire Collections: ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’, ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’, ‘Gapodi Adda’
  • Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
  • Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
  • Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his satire The Senior Citizen.  

☆ Witful Warmth# 117 ☆

☆ Satire ☆ The Senior Citizen… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

At the stroke of ten precisely of a morning, there was wont to appear at the portal of the air-conditioned auditorium—that brisk, refrigerated sanctuary where municipal virtues are preserved against the foul heat of public scrutiny—one Mr. Vishwambhar Dayal, an antique gentleman of some seventy-eight summers, leaning heavily upon a knotty stick. In his trembling hands, as tenderly clasped as though it were the Last Will and Testament of a Christian soul, he bore a threadbare yellow shawl trimmed with tarnished brocade, and a small, bruised velvet case enclosing a rose—withered, desiccated, and altogether dead. Upon these relics his fingers passed incessantly with a ghostly sort of fondling.

Whenever the newest porter of the establishment—a stout lad whose sense of personal dignity seemed to increase in direct proportion to his total lack of employment—beheld him posted like an ill-favoured statue by the gates, he was pleased to dash his terracotta cup upon the board and roar with bureaucratic merriment: “Hark ye, father! When the Great Man himself, the District Magistrate, is coming this twenty-first of August—being Senior Citizens’ Day in the calendar of official benevolence—to dispense brand-new woollens and gilded felicitations, what madness possesses you to exhibit this tattered rag before our eyes, clutching it to your bosom like a pauper at the beadle’s parlour?”

Whereupon old Vishwambhar Dayal, wiping the clouded lenses of his spectacles with the hem of his plain cotton garment, would bestow upon the fellow a smile of infinite and mournful mildness: “Alas, my son, this frayed piece of drapery is no mere scrap of silk; it is the grand imperial mantle of an unseeing world’s hypocrisy, brought out from the wardrobe of conscience but once in a revolving year, to be hung about the neck of decrepitude amidst flourishes of trumpets and parliamentary claptrap.”

The assorted clerks, young gentlemen of high collars and small brains, who bustled about with red tape and inkhorns, made it their business to laugh him to scorn, declaring that the dotard’s intellect had evidently taken ship for parts unknown, leaving him to pelt stones of obstinacy against the noble edifice of Civic Piety. Yet the old man, untroubled by their barbed tongues, did but gather the crumbling petals of his dead flower between shaking fingers, and kept his patient vigil for the dust and rumble of the official carriages.

In process of time, the menials and underlings became so thoroughly acquainted with this silent apparition that they classified him comfortably as a harmless lunatic, and dismissed him from their thoughts with that neat dispatch characteristic of all public offices.

Whenever the Worthy Secretary of the Committee—a gentleman puffed up with an enormous cargo of bouquets, mementos, and importance—advanced majestically towards the rostrum, Mr. Dayal would hitch himself up by the aid of his knotty crutch, fold his venerable hands, and say, in the plaintive tone of a debtor at Chancery: “Kind sir, has the Magistrate set his illustrious hand and seal unto that petition touching a poor father’s pension and the Maintenance of Parents Act?”

At which the Secretary, twitching his spectacles in a frenzy of official irritation, would bark: “Bless my soul, old fellow! Until the digital portal has made up its electronic mind, and until the Revenue Office has vomited forth its supplemental report, not an inch shall the paper budge; and so you may go on perambulating this porch with your mouldy rag till the crack of doom!”

The old gentleman offered no retort; he merely crept back to his flagstone and fell to opening and shutting the velvet case with the vacant persistency of a child playing with a broken box. The populace whispered that he was doubtless an unchristian parent seeking to wrest some patrimony from an undutiful son by sheer force of public nuisance; but not a solitary soul in the parish possessed the wit to comprehend the dark and monstrous riddle that bound that dead rose to the majestic pageantry of Senior Citizens’ Day.

High noon arrived, and with it, the thunderous descent of the District Magistrate and his attending satellite, the Officer of Social Welfare, coming to blow the grand trumpet of Senior Citizens’ Day and unveil the day’s philanthropic festivities.

At the screeching of the official siren, the entire precinct was thrown into that delightful paroxysm of terror and obedience which only high rank can inspire: crimson carpeting was unfurled across the gravel with frantic haste, lest an ankle of the governing classes should encounter a pebble of the governed. The solemn lamps were ignited; hymns to filial piety and the veneration of silver hairs were recited from the platform; and when at length the Great Man emerged, hemmed in by an obsequious herd of journalists with ready quills, his discerning eye was arrested by the figure of Vishwambhar Dayal, sitting like a bundle of neglected bones in the shade of the archway, the yellow shawl upon his knees and the dry rose upon the shawl.

Perceiving here an admirable occasion to exhibit that tender, paternal sympathy which looks so charming in the morning gazettes, the Magistrate, accompanied by his scribes, bore down upon the old man with an air of majestic condescension: “Venerable father,” said he, with that honeyed benevolence which costs nothing and yields great harvest, “upon this auspicious anniversary we bow before the wisdom of your years. Disclose your grievance without fear, that the hand of Authority may strike off your afflictions. Has the bounty of the State’s Old-Age Honour failed to reach your hearth?”

Vishwambhar Dayal raised his dim and watery eyes to that august visage. With trembling hands, he took up the faded shawl and the desiccated bloom, and laid them straight into the well-manicured palm of the Magistrate: “Your Honour,” whispered he, with a quietude more terrible than thunder, “if Justice be indeed the business of your high office, look closely, I pray you, upon the corner of this silk, and know this poor dry corpse of a blossom.”

The Magistrate cast his eyes upon the hem, where, worked in tarnished gold, were the date of the preceding year’s festival and—staring out from the fabric like a ghost unbidden—his very own official signature!

The colour fled from the magistrate’s cheek as water from a leaky sieve; his hand shook so violently that the withered flower trembled upon his palm.

Two great, scalding tears broke from the old man’s rheumy eyes and splashed upon the dead petals.

“Sir,” said Vishwambhar Dayal, his voice cracking like dry timber under the burden of grief, “on this selfsame day, precisely twelve months ago, you stood upon that very stage and crowned me the most venerable citizen of this district, draping this golden thread about my shoulders and pressing this rose into my hand. But on the very morrow, when my son—a decorated officer of this government—thrust me out into the street without bread or roof, I dragged my decrepit limbs to your tribunal with an application under your celebrated laws of maintenance. For three hundred and sixty-four weary days your clerks demanded gold to move the files, while I lay starving upon the curbstone, beneath the cold stars, and not one servant of your righteous system came to inquire whether the old man lived or rotted. I have returned today, sir, merely to fling your State-bestowed velvet and your dried-up rubbish back into your lap. I come to declare unto your polished, civilized world, that to leave a father to starve as an outcast for three hundred and sixty-four days, only to set him upon a gilded pedestal for an hour on the three hundred and sixty-fifth, is the foulest, most abominable mockery that ever made angels weep!”

The Magistrate’s head drooped upon his breast, stricken with an overpowering shame; and across the vast hall there fell a hush so awful, so profound and penetrating, that the sleeping conscience of every man present awoke, shuddered, and was afraid.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक १०९ आणि ११० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक १०९ आणि ११० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. १०९ – – 

जनीं वाद वेवाद सोडूनि द्यावा ।

जनीं सूखसंवाद सुखें करावा ।

जगीं तो चि तो शोकसंतापहारी ।

तुटे वाद संवाद तो हीतकारी ।।१०९।।

अर्थ : वादविवाद किंवा व्यर्थ चर्चा करणे सोडून द्यावे. ज्यामुळे संवाद हा सुखसंवाद होईल अशा प्रकारे चर्चा करावी. अशा सुखसंवादामुळे मनाचे (शोक, संताप आदी)क्लेश दूर होतात. ज्यामुळे वादाचे किंवा शंकेचे निरसन होऊन परमार्थ मार्गावर चालणे सुकर होते, अशी चर्चा किंवा संवाद हितकारक असतो.

(वादविवाद – उलटसुलट प्रश्नोत्तरे /निरर्थक चर्चा, सुखसंवाद – मनाला समाधान देणारी चर्चा)

विवेचन : आधीच्या श्लोकात समर्थांनी संत, सज्जनांच्या सहवासात राहिल्याने आपल्या अंतरंगात जो बदल होतो तो परमार्थ मार्गावर चालण्यासाठी आपल्याला अत्यंत उपकारक ठरतो. त्याचप्रमाणे संतांशी निरर्थक वाद घालू नये असे सांगितले. या श्लोकामध्ये ते कोणता वाद किंवा चर्चा आपल्यासाठी हितकारक आहे ते सांगत आहेत. मनुष्य हा बुद्धिजीवी प्राणी आहे. त्यामुळे इतर प्राण्यांसारखे केवळ आहार, भय, मैथुन आणि निद्रा एवढ्याच गोष्टी त्याला जीवन जगण्यासाठी पुरेशा होत नाहीत. काहीतरी बौद्धिक खाद्य मिळाल्याशिवाय त्याची बौद्धिक भूक भागत नाही. जेव्हा मनुष्य परमार्थ मार्गावर वाटचाल करायची ठरवतो, तेव्हा अनेक शंका त्याच्या मनात घर करून असतात. एखाद्या अधिकारी व्यक्तीकडून त्या शंकांचे जोपर्यंत निराकरण होत नाही, तोपर्यंत अध्यात्म मार्गात त्याची प्रगती होत नाही. त्यामुळे आपल्या मनातील शंका दूर होऊन आपल्याला मार्गदर्शन मिळावे या हेतूने आपण गुरूंकडे जातो.

परंतु काही लोकांचा स्वभाव व्यर्थ वाद घालण्याचा असतो. अशा लोकांच्या वाद घालण्यात ज्ञानाची जिज्ञासा कमी आणि आपले ज्ञान दाखवण्याची वृत्ती जास्त असते. गुरूंकडे गेल्यावरही त्यांच्या या वृत्तीत बदल होत नाही. पण जे खरे संत असतात, ते फार बोलत नाहीत. ते साधकांच्या जिज्ञासेचे योग्य प्रकारे समाधान करतात. त्यातूनच साधकाने योग्य तो बोध घ्यायचा असतो.

अशा प्रकारची उदाहरणे समर्थ रामदास, स्वामी समर्थ किंवा गजानन महाराज यांच्या चरित्रात वाचायला मिळतात. ज्या विद्वान किंवा पंडितांना आपल्या ज्ञानाचा गर्व होता, त्यांचा गर्व त्यांनी हरप्रकारे उतरवला आहे. मंडन मिश्रा हे अत्यंत विद्वान होते. ते निरनिराळ्या पंडितांशी वाद घालून त्यांना चर्चेत हरवत असत. परंतु शंकराचार्यांबरोबर झालेल्या चर्चेत त्यांच्या ज्ञानाचा अहंकार गळून पडला आणि ते पुढे शंकराचार्यांचे अनुयायी झाले. अशी अनेक उदाहरणे संत चरित्रात आपल्याला सापडतात.

अशा चर्चांमधून जेव्हा शंकांचे निरसन होते, काहीतरी सार हाती लागते तेव्हा मनातील शोक, संताप आदी व्याधी साहजिकच दूर होऊन मन समाधानी होते, तृप्त होते. कोणत्याही शंका शिल्लक राहत नाहीत. असे निःशंक झालेले मन मग परमार्थ मार्गावर अधिक चांगल्या प्रकारे वाटचाल करू शकते. पण ज्यांना केवळ वादच घालायचा असतो, अशा लोकांबरोबर केलेल्या चर्चा या शोक संतापाचे कारण ठरतात. शाब्दिक हमरातुमरी होऊन बरेचदा चर्चा हातघाईवर येते अशी अनेक उदाहरणे आपण व्यवहारात पाहतो. अनेक संघटनांच्या, पतसंस्थांच्या किंवा गृहनिर्माण सोसायट्यांच्या वार्षिक सभांमध्ये वाद वाढत जाऊन अगदी हाणामारीची वेळ येते. अशा वेळी शोक आणि संताप या मानसिक क्लेश देणाऱ्या गोष्टी उद्भवतातच.

‘वादे वादे जायते तत्वबोध: ‘ असे आपण म्हणतो. ज्या वादातून किंवा चर्चेतून काहीतरी आवश्यक किंवा हितकारक असे तत्व हाती लागते अशाच चर्चा साहजिकच हितकारक ठरतात. अशा चर्चांना समर्थांनी ‘ सुखसंवाद ‘ असा अतिशय सुंदर शब्द वापरला आहे.

असा सुखसंवाद जेव्हा होतो, तेव्हा तो अतिशय हितकारक ठरून साधकाला परमार्थ मार्गावर चालण्यासाठी मार्गदर्शक होतो. पूर्वीच्या काळी ऋषीमुनींच्या आश्रमात त्यांचे आणि शिष्यांचे असे ‘ सुखसंवाद ‘ होत असत. त्यातूनच पुढे राम, कृष्ण यांच्यासारखे शिष्य निर्माण झाले. अशा शिष्यांनी आपल्या वागण्याने आदर्श निर्माण करून संपूर्ण मानवजातीला मार्गदर्शन केले.

स्वसंवाद : 

१. मी चारचौघांत किंवा समाजमाध्यमांवर जेव्हा एखाद्या विषयावर चर्चा करतो, तेव्हा त्यात माझा हेतू केवळ ‘माझे ज्ञान दाखवून वाद जिंकण्याचा’ असतो, की काहीतरी चांगले शिकण्याचा असतो?

२. संतांचे ग्रंथ वाचताना किंवा ज्येष्ठांशी बोलताना माझ्या मनात ‘जिज्ञासा’ असते, की मी केवळ माझेच मत खरे करण्यासाठी ‘तर्क-कुतर्क’ लढवत राहतो?

३. माझ्या घरातील किंवा कार्यालयातील चर्चा बऱ्याचदा ‘शोक-संताप’ वाढवणाऱ्या वादात बदलतात, की मन शांत करणारा ‘सुखसंवाद’ ठरतात?

४. समर्थांनी सांगितल्याप्रमाणे, मनातल्या शंकांचे वेळीच योग्य व्यक्तींकडून निरसन करून घेऊन, मी ‘निःशंक’ मनाने परमार्थ मार्गावर चालावे असे मला वाटते का?

=====

 श्लोक क्र. ११० – –

तुटे वाद संवाद त्याते म्हणावे । 

विवेके अहंभाव यातें जिणावे ।

अहंतागुणे वाद नाना विकारी ।

तुटे वाद संवाद तो हीतकारी ।।११०।।

अर्थ : ज्या चर्चेतून शंकेचे किंवा संशयाचे निराकरण होते त्या चर्चेला संवाद म्हणावे. विवेकाच्या साहाय्याने अहंकारावर मात करावी. अहंकारामुळे नाना प्रकारचे विकार निर्माण होतात. ज्या संवादातून वाद किंवा शंकेचे निराकरण होऊन काही तत्व हाती लागते, अशी चर्चा हितकारक समजावी.

(अहंभाव – अहंकार, अहंतागुणे – अहंकारामुळे, जिणावे – जिंकावे) 

विवेचन : मनुष्याच्या वैयक्तिक आणि सामाजिक जीवनात असे अनेक प्रसंग उद्भवतात की ज्यामुळे त्यांच्या मनात शंकांचे वादळ निर्माण होते. आध्यात्मिक जीवनात तर माणसे अनेक शंका मनात ठेवून वावरत असतात. जेव्हा एखाद्या अधिकारी व्यक्तीकडून या शंकांची समाधानकारक उत्तरे मिळतात, तेव्हा त्यातून काहीतरी मौलिक मार्गदर्शन मिळते. काहीतरी तत्व किंवा सार हाताशी लागते. अशी चर्चा जेव्हा होते तेव्हा तिला ‘ संवाद ‘ म्हणता येईल असे समर्थ म्हणतात. अशी चर्चा किंवा संवाद तेव्हाच होऊ शकतो जेव्हा दोन्ही पक्षातील मंडळी चर्चेतील व्यक्तींपेक्षा मुद्द्यांना अधिक महत्व देतात. जेव्हा विषयापेक्षा व्यक्तींना अधिक महत्व प्राप्त होते, तेव्हा चर्चेत संवाद न होता वादच जास्त होतात आणि फारसे काही हाती लागण्याची शक्यता कमी असते. चर्चा करण्याचा अहंभाव जेवढा जास्त, तेवढी ती चर्चा ‘ संवादाच्या ‘ पातळीवर न राहता वादाच्या पातळीवर उतरते.

अहंकारी व्यक्तींची बुद्धी चंचल असते. त्यांचे चित्त चर्चेतील मुद्द्यांवर एकाग्र होत नाही. आपलेच म्हणणे खरे करण्याच्या मागे अशा व्यक्ती असतात. असा अहंकार जिंकण्याचा काही मार्ग आहे का? याचे उत्तर समर्थ पुढील ओळीत देतात. ते म्हणतात विवेकाने अहंकाराला जिंकावे. विवेक म्हणजे काय योग्य, काय अयोग्य याचे भान आणि ज्ञान असणे. विवेकी व्यक्ती दुसऱ्याचे मत सुद्धा काळजीपूर्वक ऐकतात. आपले जर कुठे चुकत असेल, तर त्यात दुरुस्ती करण्याची किंवा आपल्या विचारात बदल करण्याची त्यांची तयारी असते.

म्हणून व्यक्तींना गौण स्थान असावे आणि चर्चेच्या विषयाला अधिक महत्व दिले गेले पाहिजे. पण बरेचदा असे होत नाही. संवादात भाग घेणाऱ्या व्यक्तींच्या मनात स्वतःबद्दल, स्वतःच्या ज्ञानाबद्दल अहंकार असतो. अशा वेळी चर्चेतून काही तत्व हाती न लागता समोरच्या व्यक्तीचा द्वेष, मत्सर, तिरस्कार इ. प्रकारचे नाना विकार निर्माण होतात. संत ज्ञानेश्वर आणि त्यांच्या भावंडांचा समाजाने संन्याशाची मुले म्हणून छळ केला आणि वाळीत टाकले होते. आळंदीच्या विद्वानांना स्वतःच्या ज्ञानाबद्दल प्रचंड अहंकार होता. सुरुवातीला विठ्ठलपंतांनी केलेला युक्तिवाद किंवा नंतर ज्ञानेश्वरांनी केलेला युक्तिवाद ऐकून घेण्याच्या मनःस्थितीत ते नव्हतेच. अशा परिस्थितीत संवाद शक्यच नव्हता. तेव्हा ज्ञानेश्वरांना आळंदीच्या पंडितांनी पैठणहून शुद्धिपत्र आणायला सांगितले गेले. पैठणच्या विद्वानांसोबत त्यांची धर्मशास्त्रावर चर्चा झाली. त्यावेळी ज्ञानेश्वरांनी पशु-पक्षी, प्राणी आणि माणूस यांच्यामध्ये एकच आत्मतत्व असल्याचे प्रतिपादन केले. सुरुवातीला त्यांचा त्यावर विश्वास बसला नाही परंतु जेव्हा ज्ञानेश्वरांनी रेड्याकडून वेद वदवून दाखवले, तेव्हा तेथील पंडितांना त्यांच्या सांगण्याची खात्री पटली. या चर्चेच्या वेळी सुरुवातीला तेथील पंडितांमध्ये स्वतःच्या ज्ञानाबद्दल अहंकार होता. पण ज्ञानेश्वरांनी अत्यंत नम्रपणे चर्चेच्या विषयाला अधिक महत्व देऊन आपला मुद्दा पटवून दिला. या चर्चेतून माणूस आणि इतर प्राणी यांच्यात एकच आत्मतत्व विद्यमान असल्याचा निष्कर्ष हाती लागला. ही चर्चा निकाली निघाली. हा विवेक आणि नम्रतेने अहंकारावर मिळवलेला विजय होता. असा संवाद हितकारक असतो असे समर्थांना सांगायचे आहे.

अशा प्रकारच्या चर्चा कौटुंबिक किंवा सामाजिक संवादासाठी देखील उपयुक्त आहेत. त्यामुळे कौटुंबिक आणि सामाजिक वातावरण अधिक निकोप राहू शकेल. पण इथे वाद, संवाद यांचा हेतू अध्यात्म मार्गातील साधकांच्या शंका निवारण व्हाव्यात आणि ते परमार्थ मार्गावर अग्रेसर व्हावेत हा आहे. इतर व्यावहारिक चर्चा किंवा वादविवाद इथे अपेक्षित नाही.

स्वसंवाद 

१. एखाद्या चर्चेत भाग घेताना माझा हेतू समोरच्या व्यक्तीला ‘चुकीचे ठरवून स्वतःचा अहंकार सुखावणं’ हा असतो, की विषयातील सत्य जाणून घेण्याचा असतो?

२. “विवेके अहंभाव यातें जिणावे” या समर्थांच्या सूत्राप्रमाणे, जर माझे कुठे चुकत असेल तर मी माझे विचार बदलण्याची किंवा माझी चूक मान्य करण्याची नम्रता दाखवतो का?

३. माझ्या बोलण्यामुळे किंवा वाद घालण्याच्या प्रवृत्तीमुळे माझ्या मनात नकळत समोरच्या व्यक्तीबद्दल द्वेष, मत्सर किंवा तिरस्कार यांसारखे ‘नाना विकार’ तर निर्माण होत नाहीत ना?

४. ज्ञानेश्वर माउलींनी सांगितल्याप्रमाणे मी माझ्या ज्ञानाचा किंवा अनुभवाचा अभिमान बाजूला ठेवून सर्वांभूती एकच आत्मतत्त्व पाहण्याचा प्रयत्न करतो का?

– क्रमशः श्लोक १०९ आणि ११०

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

English Literature – Articles ☆ Words of the Buddha ☆ Shri Jagat Singh Bisht ☆


Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of Happiness. He served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!

🌸 Words of the Buddha 🌸

Udāna 2.11 — Mucalindavagga

«Freedom from lust is happiness in the world,

the going beyond all sensual desires.

But the crushing out of the conceit “I am” —

this is the highest happiness.»

🪷 हिन्दी भावानुवाद

«इस संसार में राग से मुक्त होना सुख है,

सभी कामनाओं और इन्द्रिय-विषयों से परे हो जाना सुख है।

किन्तु ‘मैं हूँ’ के अहंकार का पूर्ण क्षय —

यही परम सुख है।»

🌿 Pāli

«Sukhā virāgatā loke

kāmānaṃ samatikkamo

asmimānassa yo vinayo

etaṃ ve paramaṃ sukhaṃ.»

✨ A reflection

The Buddha points to a happiness deeper than the pleasures of the senses.

When craving loosens its hold, the mind becomes freer. And when even the subtle conceit of “I”, “me” and “mine” falls away, one touches a happiness beyond ordinary worldly pleasure.

 🌼 चिन्तन

 बुद्ध हमें सुख की एक गहरी दिशा दिखाते हैं।

जब इच्छाओं और आसक्तियों की पकड़ ढीली पड़ती है, मन स्वतंत्र होने लगता है। और जब ‘मैं’ और ‘मेरा’ का सूक्ष्म अहंकार भी मिट जाता है, तब मन उस परम शान्ति और सुख को स्पर्श करता है जो बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं है।

 🙏 May we learn to let go — a little more each day.

 #Buddha #WordsOfTheBuddha #Dhamma #Udana #Mindfulness #Happiness #InnerPeace #Meditation #Wisdom #Buddhism

 ♥ ♥ ♥ ♥

Compiled by:

Jagat Singh Bisht

Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker

FounderLifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Please share your Post !

Shares