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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #161 ☆ व्यंग्य – सावित्री-सत्यवान कथा ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार (वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य ‘सावित्री-सत्यवान कथा’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 161 ☆ ☆ व्यंग्य – सावित्री-सत्यवान कथा ☆ अंततः सत्यवान सिंह का अंत आ गया। नगर के प्रसिद्ध ज्योतिषी भविष्याचार्य ने उसकी कुंडली देखकर चार छः महीने पहले ही बता...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #138 ☆ संतोष के दोहे – शिक्षा ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष” (आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  “संतोष के दोहे – शिक्षा”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।) ☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 140 ☆ ☆ संतोष के दोहे – शिक्षा ☆ श्री संतोष नेमा ☆ पढ़ें-लिखें आगे बढ़ें, जिससे बनें नवाब कहते लोग पुरातनी, बढ़ता तभी रुआब   ज्ञान न बढ़ता पढ़े बिन, गुण का रहे अभाव शिक्षा जब ऊँची मिले, बढ़ता तभी प्रभाव   बढ़े प्रतिष्ठा सभी की, मिले मान सम्मान काम-काज अरु नौकरी, करती यह आसान   रोशन होती ज़िंदगी, पाता ज्ञान प्रकाश खुद निर्भर हो मनुज तो, यश छूता आकाश   शिक्षा देती आत्मबल,...
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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ ‘सूर्य ढळलेला माणूस…’ – भाग – 5 ☆ श्री आनंदहरी ☆

श्री आनंदहरी जीवनरंग   ☆ 'सूर्य ढळलेला माणूस…' - भाग - 5 ☆  श्री आनंदहरी  ☆  " मी इथे बसलो तर चालेल ना ? " आवाजाने मी ' नक्षत्रांच्या देण्यातून ', विचारातून भानावर आलो. आवाजाच्या रोखाने पाहिले. माझ्यापेक्षा अंदाजे पाच-सहा वर्षांनी लहान वाटणारी व्यक्ती मलाच विचारत होती, 'मी इथे बसलो तर चालेल ना ?' मला कितीतरी वर्षांपूर्वीचा प्रसंग आठवला. मी ही कबीरबाबांना असाच प्रश्न विचारला होता. " बसा हो." " धन्यवाद ! आपण ? " " मी ? मी, सूर्य ढळलेला माणूस ! " पूर्वीचा प्रसंग ऐकून नकळत माझ्या तोंडून मला त्यावेळी बाबांनी दिलेले उत्तरच बाहेर पडले. माझ्या उत्तराने ती व्यक्ती चमकली आणि माझ्या शेजारी येऊन बसत म्हणाली, " तुम्ही बाबांना भेटला होतात ?  ओळखत होतात त्यांना ? " " एकदा भेट झाली होती.. पण अजूनही लक्षात आहे. त्यालाही झाली असतील पंचवीसेक वर्षे." " पंचवीस वर्षे ? कसे शक्य आहे ? त्यांना जाऊन तर सत्तावीस वर्षे झाली. " " वर्षांचा हिशेब आठवणीत कुठे राहतो ? आठवणीत फक्त क्षणांची गर्दी असते. काही मोजक्याच क्षणांचीच गर्दी. बाबांची भेटही तशीच. काही क्षण घडलेली. त्यांचे नावही मला ठाऊक नव्हते....
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ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ ७ सप्टेंबर – संपादकीय – श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

श्री सुहास रघुनाथ पंडित ई-अभिव्यक्ती – संवाद ☆ ७ सप्टेंबर – संपादकीय – श्री सुहास रघुनाथ पंडित – ई – अभिव्यक्ती (मराठी)  भगवान रघुनाथ कुलकर्णी अर्थात बी.रघुनाथ  कथा, कादंबरी व काव्य लेखन करणारे बी. रघुनाथ हे मराठवाड्यातील परभणीचे. त्यांनी हैद्राबाद येथे मॅट्रीक पर्यंत शिक्षण घेतले.कौटुंबिक परिस्थितीमुळे शिकणे शक्य नसल्यामुळे त्यांनी निजामाच्या सार्वजनिक बांधकाम खात्यात नोकरी स्विकारली. तरूण वयातच त्यानी लेखनाला सुरुवात केली. वयाच्या सतराव्या वर्षी त्यांची पहिली कविता हैद्राबाद येथील 'राजहंस' या मासिकात प्रसिद्ध झाली. तेथून त्यांचा साहित्यिक प्रवास सुरू झाला. कवितेशिवाय कथा, कादंबरी व निबंध लेखन हे त्यांचे लेखनाचे मुख्य प्रकार होते. कथा लेखन हीच आपली खरी ओळख आहे असे ते स्वतः मानत. सामाजिक, राजकीय, कौटुंबिक परिस्थिती अनुकूल नसतानाही त्यांनी केलेले कथा व कादंबरी लेखन मराठी साहित्यात महत्वाचे ठरते. आत्ममग्नतेला शब्दरूप देणारा लेखक असे त्यांच्या लेखनाचे वर्णन केले जाते.तसेच त्यांना प्रादेशिक कथा कादंबरीचे जनक मानले जाते. यावरून त्यांच्या लेखनाचे महत्व लक्षात येईल. निजामशाहीत असल्यामुळे त्यांच्या भाषेवर उर्दू भाषेचा प्रभाव जाणवतो. त्यांची कविता ही नवता व नाविन्याची आस लागलेली कविता आहे असे जाणकारांनी म्हटले आहे....
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ बेधुंद होऊन गाईले गीत… ☆ सुश्री संगीता कुलकर्णी

सुश्री संगीता कुलकर्णी  कवितेचा उत्सव  ☆ बेधुंद होऊन गाईले गीत… ☆ सुश्री संगीता कुलकर्णी ☆  कितीतरी दिवसांच्या विश्रांती नंतर पावसाचे हे जादू मंतर   समुद्रवरच मी  गेले थेट अधीर मनाने घेतली भेट   तुफान सरी बेभान वारा बेधुंद झाला आसमंत सारा   झोंबु लागला लडिवाळ वारा ताशा वाजवती शुभ्र धारा   पावसाचेच मग झाले गीत मनाचं झाले संगीत संगीत   भिजून घेऊ दे पावसा तुझ्यात थिरकत संगीत गात्रा गात्रात ©  सुश्री संगीता कुलकर्णी  लेखिका /कवयित्री ठाणे 9870451020 ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈...
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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ स्वामिनी मुक्तानंदा – भाग -1 ☆ सुश्री गायत्री हेर्लेकर

सुश्री गायत्री हेर्लेकर    जीवनरंग  ☆ स्वामिनी मुक्तानंदा – भाग -1 ☆ सुश्री गायत्री हेर्लेकर ☆ तपोवन आश्रमातील सत्संग हॉल. ऊद्यापासुन सुरु होणाऱ्या शिबिराच्या  परिचय कार्यक्रमासाठी जमलेले शिबिरार्थी उत्सुकतेने वाट बघत होते. दुपारी पडलेले रणरणते ऊन,मधेच जोरदार पाऊस,अन् आता धुसर वातावरण---निसर्गाच्या लहरीपणा अनुभव देणारा हा हिमाचलप्रदेश. बरोबर  ४-२५ ला स्वामिनी मुक्तानंदांनी मागील भव्य प्रवेश द्वारातुन  आत पाऊल टाकले.सर्वानी उभे राहुन अभिवादन केले.स्वामिनी  हात जोडुन प्रत्युत्तर देत हसतमुखाने,शांत गतीने मधल्या कार्पेटवरुन व्यासपीठाकडे निघाल्या. अंगावर संन्याशिनीची भगवी वस्त्रे, वर भगवीच शाल, गळ्यात तुळशीमण्यांची माळ. उंच शिडशिडीत बांधा, गोरा रंग यामुळे साठी उलटून गेली तरी मुळचे देखणेपण लपत नव्हते. केसात रुपेरी झाक आली असली तरी मानेवरचा अंबाडा भरगच्च होता. दोन अडीच  तप - ३० वर्षांपेक्षाही जास्त --केलेल्या साधनेने मुद्रेवर, शांत, प्रसन्न भावाचे तेज झळकत होते. व्यासपीठाच्या मागील शिशवी देव्हार्यातील गोपाळकृष्णाच्या सुंदर मूर्तीला वंदन करुन त्या स्थानापन्न झाल्या. डोळे मिटले. ओम् ओम्, ओम् ओंकार, नंतर, गुरुवंदना, नित्याचेच श्लोक, शांतीपाठ-- अशी प्रर्थना-हॉलच्या शांत वातावरणात घुमु लागली. हलकेच डोळे ऊघडुन हॉलवर नजर फिरवली. शिबिरार्थींची संख्या मर्यादित होती. नव्हे त्यांचा तसा आग्रहच असायचा. परत एकदा त्या शांतपणे प्रत्येकाचा चेहरा न्याहळु...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका – भाग – 15 ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका - भाग - 15 लोकपरंपराओं, लोकविधाओं- गीत, नृत्य, नाट्य, आदि का जन्मदाता कोई एक नहीं है। प्रेरणास्रोत भी एक नहीं है। इनका स्रोत, जन्मदाता, शिक्षक, प्रशिक्षक, सब लोक ही है। गरबा हो, भंगड़ा हो,  बिहू हो या होरी, लोक खुद इसे गढ़ता है, खुद इसे परिष्कृत करता है। यहाँ जो है, समूह...
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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆☆ लघुकथा – अपने लिए ☆☆ श्री विजय कुमार, सह सम्पादक (शुभ तारिका) ☆

श्री विजय कुमार   (आज प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित पत्रिका शुभ तारिका के सह-संपादक श्री विजय कुमार जी  की एक विचारणीय लघुकथा  “अपने लिए“।) ☆ लघुकथा – अपने लिए ☆ श्री विजय कुमार, सह सम्पादक (शुभ तारिका) ☆ किसी बड़ी कारपोरेट कंपनी में कार्यरत कर्मचारियों की तरह वर्दीनुमा कपड़े पहने कुछ सुंदर नौजवान युवक-युवतियों ने कार्यालय-कक्ष में प्रवेश किया और एक-एक कर अपनी कंपनी की तरफ से दिए गए उत्पाद सभी को दिखाने लगे। सभी को कंपनी-संचालक द्वारा एक बंधे-बंधाये प्रबंधन कोर्स की तरह प्रशिक्षित किया गया था और वह एक रट्टू तोते की तरह बोलकर अपने उत्पादों की अच्छाइयां और उनके अनूठे उपयोगों के बारे में बता रहे थे। साथ ही, एक के साथ एक मुफ्त या एक के दाम में दो का भी प्रलोभन दे रहे थे, जैसा कि ग्राहकों को लुभाने, या सरल शब्दों में कहें तो फंसाने का एक कारगर उपाय होता है। कुछ साथी कर्मचारी इस अंत में दिए गए मारक जाल में आ गए थे, और अपनी आवश्यकताओं या पसंद के...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका – भाग – 3 ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका - भाग - 3 एकता शब्द व्यक्तिगत रूप से मुझे अँग्रेजी के ‘यूनिटी’ के अनुवाद से अधिक कुछ नहीं लगता। अनेक बार राजनीतिक दल, गठबंधन की विवशता के चलते अपनी एकता की घोषणा करते हैं। इस एकता का छिपा एजेंडा हर मतदाता जानता है। हाउसिंग सोसायटी के चुनाव हों या विभिन्न देशों...
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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ #125 – विजय साहित्य – आला आला कवी…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते कवितेचा उत्सव # 125 – विजय साहित्य ☆ आला आला कवी…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆  (अतिशयोक्ती अलंकार) आला आला कवी वाचू लागला वही चार तासांनी म्हणे ही होती फक्त सही....!   कविता त्याची नाजूक खसखशी पेक्षाही छोटी मुंगी सुद्धा त्यांच्यापुढे शंभर पट मोठी...!   आला आला कवी किती त्याचे पुरस्कार रद्दिवाला म्हणे घेतो हप्त्यात चार..!   आला आला कवी चला म्हणे घरी दाखवतो तुम्हाला स्वर्गातली परी...!   आला आला कवी पिळतोय मिशा शब्दांच्या कोट्यांनी भरलाय खिसा...!   आला आला कवी खांद्याला झोळी शब्दांच्या भाकरीत पुरणाची पोळी...!   आला आला कवी चोरावर मोर जोरदार घेई टाळ्या कोल्हाट्याचं पोर...! © कविराज विजय यशवंत सातपुते सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009. मोबाईल  8530234892/ 9371319798. ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈ ...
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