श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घंटा घर…“।)
अभी अभी # ८८२ ⇒ आलेख – घंटा घर
श्री प्रदीप शर्मा
∆ bell tower ∆
घंटा, घर में नहीं, मंदिरों में होता है। घरों में और पूजा घरों में घंटियां होती हैं। कुछ पुरानी अंग्रेजों के जमाने की इमारतों में गुंबद की जगह टॉवर होते थे, जिसके चारों ओर चार बड़ी बड़ी घड़ियां होती थीं और उस इमारत को घंटा घर कहते थे। हमारे शहर में भी एक नहीं दो घंटा घर थे, (जो आज भी मौजूद हैं)
एक हुकमचंद का घंटा घर और एक टाउन हॉल, जिसे आजादी के बाद से गांधी हॉल कहा जाने लगा है।
जिस इमारत के ऊपर, चार बड़ी बड़ी घड़ियां नहीं, वह घंटाघर नहीं। घंटा, घंटाघर में नहीं, बड़े बड़े मंदिरों में होता है। मंदिर में घड़ी और घंटा दोनों हो सकते हैं लेकिन घंटाघर में घंटे का क्या काम। ।
घड़ी, कितनी भी बड़ी हो जाए, भले ही आसमान को छू ले, कभी घंटा नहीं बन सकती जब कि घंटी छोटी से छोटी और घंटा बड़े से भी बड़ा हो सकता है। घड़ी और घंटे में सबसे बड़ी समानता ही यही है कि दोनों ही बजते हैं। मंदिर के घंटे को तो बस हिलाया और बजा, लेकिन बेचारी घड़ी को बजने के लिए चलना पड़ता है। वह जहां है, वहीं चलती रहती है। वह कभी चलते चलते थकती नहीं। पुरानी घड़ियां जब थक जाती थीं, तो उनमें चाबी भरना पड़ती थी। घंटे अभी डिजिटल नहीं हुए, घड़ियां जरूर हो गई हैं, क्योंकि घड़ियां समय के साथ चलना जानती हैं।
जब लोगों के पास समय तो था, लेकिन घड़ियां नहीं थी, तब घंटों की आवाज से ही समय का बोध करवाया जाता था। चार बजे चार घंटे और ग्यारह बजे, ग्यारह घंटे बजाकर समय की जानकारी दी जाती थी।
पुरानी दीवार घड़ियां हर घंटे में बजकर ही टाइम बताया करती थी। रेलवे में आज भी टाइम कीपर होते हैं। गाड़ियों का टाइम टेबल यात्रियों के लिए बड़ा उपयोगी होता है।।
घड़ी छोटी हो या बड़ी, घर की हो या घंटाघर की, उसे हर पल, हर सेकंड, हर मिनिट और हर घंटे, चौबीसों घंटे, लगातार चलते ही रहना है। उसे मंदिर के घंटे की तरह, चैन कहां आराम कहां।
मंदिर के घंटे के अपने ठाठ हैं। मंदिर में ऊंचा लगा रहता है, बच्चों की पहुंच से दूर। जिसने घंटा नहीं बजाया, समझो, उसने मंदिर में प्रवेश नहीं पाया।
किसी के घर में प्रवेश के समय क्या हम घंटी नहीं बजाते। इंसाफ का मंदिर हो या भगवान का मंदिर घंटा तो बजाना ही पड़ता है। कानून अंधा हो सकता है, हमारा भगवान नहीं।
उसके न्याय पर आज भी हमें भरोसा है। तेरे भरोसे हैं नंदलाला। ।
घंटाघर की घड़ियां वहीं रह गईं, लेकिन वक्त बहुत आगे निकल गया। बेचारी पुरानी घड़ियां भी देखभाल मांगती हैं। आज किसे फुर्सत, घंटाघर की उन घड़ियों की ओर झांके भी। कभी कभी जब चौराहे पर लाल बत्ती के कारण ट्रैफिक रुकता है, तो उन पर जरूर नजर पड़ जाती है और अनायास बच्चों की हिंदी नर्सरी की यह पुरानी पंक्तियां याद आ जाती हैं ;
घंटाघर में चार घड़ी
चारों में जंजीर पड़ी।
जब जब घंटा बजता है
सोया मुसाफिर जगता है। ।
जिस इमारत का नाम ही बेल टॉवर अर्थात् घंटाघर हो, उनकी घड़ियों के घंटों की आवाज भी शायद कभी सुनने में आती हों, आज तो ध्वनि प्रदूषण और वातावरण के प्रदूषण में इनका अस्तित्व ही किसी चमत्कार से कम नहीं ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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