श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जड़ भरत…“।)
अभी अभी # ८८५ ⇒ आलेख – जड़ भरत
श्री प्रदीप शर्मा
आज हम दशरथनंदन, राम लक्ष्मण के भाई महात्मा भरत का नहीं, ऋषभदेव जी के सबसे श्रेष्ठ पुत्र भरत जी का स्मरण करने जा रहे हैं। ये बड़े भगवत भक्त थे और इनके ही नाम पर हमारे देश का नाम भरत खण्ड पड़ा।
कैसा होगा वह सनातन युग, जहां राजा हजारों वर्षों तक सुखपूर्वक राज करते थे, और तत्पश्चात् संसार छोड़कर वानप्रस्थ और सन्यास भी ग्रहण कर लेते थे। हमारे भरत महाराज भी राजपाट और समस्त राजसी सुख वैभव त्याग अपने आश्रम में एक तपस्वी का जीवन बिता रहे थे कि एक दिन एक मृगशावक पर इनका मन पसीज गया और उसकी सेवा आसक्ति में इतने जड़वत हो गए कि आज की भाषा में इनकी मति मारी गई। हिरण के बच्चे के मोह में प्राण इतने अटके कि पहले एक जन्म हिरण का लिया और बाद में एक जन्म जड़ भरत का। अपने मोह और आसक्ति से जब दो जन्मों बाद छूटे तब अपनी पुनः अपनी वास्तविक अवस्था को प्राप्त हुए। विष्णु पुराण और भागवत पुराण में जड़ भरत की कथा का वर्णन है। ।
हम अपने आदर्श अवतारों और महापुरुषों तक ही सीमित रखते हैं। उनकी पूजा, भक्ति, आराधना और उनकी चरण रज हमारे माथे पर लग जाए, और हमें क्या चाहिए। हम गृहस्थ, संसारी जीव हैं, अपनी सीमाएं और प्रतिबद्धताएं भली भांति जानते हैं। मोह और आसक्ति हमारे जीवन में आसानी से आ तो सकती है, लेकिन इतनी आसानी से जा नहीं सकती।
फिर भी अगर कोई हमें जड़ भरत अथवा गोबर गणेश कहे तो हम बुरा मान जाते हैं। इच्छा होती है, दो मिलाकर जड़ दें। जब कि हम यह भी जानते हैं कि जड़ भरत की हम दस जन्मों तक बराबरी नहीं कर सकते और गोबर तो कितनी पवित्र चीज है। अब गणेश जी के बारे में भी मुंह खुलवाओगे क्या।
उनका तो हमें इष्ट है।
क्यों आखिर सब गुड़ गोबर करने पर तुले हो। ।
यह एक गंभीर पोस्ट है। मैं जब आत्म चिंतन करता हूं, तो अनायास पिछली कई घटनाएं स्मृति में आ जाती हैं और मुझे यह आभास होता है कि हमारी वर्तमान स्थिति भी किसी जड़ भरत से बेहतर नहीं।
मेरा कॉलेज का एक मित्र था, मुझसे अधिक बुद्धिमान और साधन संपन्न ! जीवन में दोस्ती बराबरी वालों से करना चाहिए, लेकिन स्कूल कॉलेज में जिससे दोस्ती होती थी, वही बराबरी का हो जाता था। वह दोस्त भी कुछ ऐसा ही था। वैसे हमने कभी एक दूसरे के लिए जान नहीं छिड़की लेकिन उसके बड़े से बंगले में हमेशा एक विदेशी किस्म का कुत्ता रहता था, जिस पर वह जान छिड़कता था। ।
समय ही हमें मिलाता है और हमारे बिछड़ने में भी समय का ही हाथ होता है।
एक नौकरीपेशा आदमी जीवन के साठ वर्षों के संघर्ष के बाद जब जिंदगी जीना शुरू करता है तो कभी बीमारी तो कभी कोविड – 19 दस्तक दे देती है। मेरे मित्र ने अपनी रुचि अनुसार सेवा निवृत्ति का समय काटने के लिए विदेशी किस्म के श्वान पाल लिए थे। कुत्ता स्वामिभक्त होता है, घर की रखवाली भी करता है, लेकिन कालांतर में वह घर का एक महत्वपूर्ण सदस्य हो जाता है, उसका भी एक नाम होता है, पहचान होती है। क्या उसके प्रति हमारी आसक्ति स्वाभाविक नहीं। तो क्या हम एक जड़ भरत से बेहतर हुए ?
यह प्रश्न शायद मेरे जेहन में कभी आता ही नहीं, अगर एकाएक मेरा यह अभिन्न मित्र, मेरी जिंदगी से हमेशा के लिए कोराना पॉजिटिव का शिकार बन, इस दुनिया से विदा नहीं हो जाता।
जड़ भरत के जीवन में तो बस एक हिरण का बच्चा आया था। हमारी स्थिति क्या है। क्या समय हमें संभलने अथवा जागने का मौका देता है, कभी नहीं।
एक परीक्षक की तरह आता है वह पल, प्रश्न पत्र हाथ से छीन ले जाता है और कह देता है, your time is over . मेरे दोस्त के साथ यही हुआ, उसे कहां संभलने अथवा कुछ भी संभालने का मौका दिया। हमारे साथ भी यही होना है। कितना अच्छा हो, एक क्लियर ऑल का बटन दबा दिया जाए, सभी माया, मोह, ममता और आसक्ति को डिलीट कर दिया जाए और जगजीत सिंह को गुनगुनाया जाए ;
कुछ ना कुछ तो ज़रूर होना है।
सामना आज उनसे होना है।।
लेकिन हमें किसी भी हाल में, जड़ भरत नहीं बनना है..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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