श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्यार और कविता।)

?अभी अभी # ८८७ ⇒ आलेख – प्यार और कविता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लोग अक्सर किसी के प्यार में इतने खो जाते हैं कि उनके अंदर का कवित्व किसी निर्झर की तरह फूट पड़ता है और कविता का जन्म हो जाता है। प्यार में इंसान या तो अंधा हो जाता है,या फिर कवि। कुछ हम जैसे अभागे भी होते हैं, न घर के, न घाट के।

हमने बहुत कोशिश की, कि कवि बना जाए,कविता लिखी जाए। सुना है, कलम, दवात , काग़ज़ से ही कविता नहीं लिखी जाती,लिखने की प्रेरणा भी तो होनी चाहिए। प्रेरणा और प्रेम दोनों जब साथ होते हैं,तब किसी कविता का जन्म होता है। पहली बात, मेरा नाम प्रेम नहीं, प्रदीप है ! और दूसरी बात,कविता और प्रेरणा से मेरा दूर का भी कोई रिश्ता नहीं। स्कूल कॉलेज में भी मुझे याद नहीं, कभी किसी प्रेरणा अथवा कविता से मेरा कोई वास्ता रहा हो।।

वियोगी जी को पहला कवि माना गया है। शुक्र है,योगी जी को आखरी कवि नहीं। अटल जी तो कर्मयोगी थे और भीष्म पितामह की तरह आजन्म ब्रह्मचारी थे, फिर भी राष्ट्र प्रेम ही उनकी प्रेरणा रहा और राजनेता के साथ साथ ही, वे एक अच्छे कवि भी सिद्ध हुए।

कौन किस कारण से कवि हुआ, इससे हमें कोई मतलब नहीं। हम सिर्फ अपनी बात कर रहे हैं, हममें ऐसी क्या कमी थी, जो हम एक कवि नहीं बन पाए। शायद प्यार की कमी हो। प्यार का कोई स्कूल नहीं होता। आदमी को अपने आसपास ही प्यार तलाशना चाहिए।।

मेरी मां ने मुझे बहुत प्यार किया। ईश्वर ने मुझे एक नहीं,चार चार बहनें दीं,कई ढेर सारे यार दोस्त दिए,इनसे मुझे भरपूर प्यार मिला लेकिन फिर भी कविता लिखने की प्रेरणा नहीं मिल पाई। जीवन में एक पत्नी ही काफी होती है प्यार करने के लिए,वह भी आई,उसने भी मुझे भरपूर प्यार दिया,लेकिन शायद उस प्रेरणा का फिर भी अभाव ही रहा,जिससे कविता जन्म लेती है।

संयोग और वियोग ही जीवन है। मिलना और बिछड़ना भी लगा ही रहता है,लेकिन जो इसे महसूस कर पाता है,वह शायद कवि बन जाता है। क्या कविता के लिए सफल अथवा असफल प्रेम ही जरूरी है। मुझे लगता है,बार बार सुई,प्रेम के आसपास आकर ही अटक जाती है।।

तो इससे यह सिद्ध हुआ कि या तो मुझमें प्रेम का नितांत अभाव है या फिर किसी का प्यार मुझे एक कवि बनने की प्रेरणा नहीं दे रहा। मैं नहीं मानता,कोई प्रेमिका प्रेरणा बनकर जीवन में आती है,बच्चों की तरह हमारा हाथ पकड़ती है,और एक कविता लिखकर चली जाती है। नाच ना आवे,आंगन टेढ़ा।

कविता लिखने की मैंने बहुत कोशिश की,लेकिन जब भी लिखने बैठा,कुछ और ही लिख गया। कभी कभी तो मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि,माता सरस्वती तो मुझ पर प्रसन्न हैं लेकिन कविता मुझसे नाराज़ है। यह भी सच है कि मुझे कविता से जितना प्रेम है,उतना कवियों से नहीं।।

मेरे जीवन में एकमात्र एक कवि ही ऐसे आए,जिनमें मैंने कविता की सुबह देखी और कविता की शाम देखी। वे हमारे मालवी कवि स्व. रामविलास शर्मा थे,जिनसे संयोगवश मेरे आत्मिक संबंध हो गए। वे प्रकृति के कवि थे। जीवन के संघर्ष और विषाद को उन्होंने अपने पुरुषार्थ और हंसमुख स्वभाव से परास्त कर दिया था। मुझे उनसे ही लिखने की प्रेरणा मिली।

वे जब भी मिलने आते,अपने साथ मानो बहार लेकर ही आते।

खुलकर ठहाके लगाना ही उनकी पहचान थी।

हम कभी नहीं जान पाते, उन ठहाकों के पीछे कितना दर्द छुपा है। जब भी एकांत होगा,उनका दर्द उनकी कविता में बयां हुआ होगा,प्रतीक रूप में,व्यक्ति के रूप में नहीं। प्रकृति ही उनकी प्रेरणा थी,उनकी प्रेयसी थी,उनकी हमदर्द थी। उनका एक ही गुरुमंत्र मुझे जीवन में काम आया,नियम से कागज कलम लेकर बैठ जाएं, जो आता है,आने दें,उसे रोकें मत। नहीं आता है,कोई बात नहीं,इस नित्य कर्म बनाएं,कब तक नहीं आएगा। नहीं लिखेंगे,तो कब्ज हो जाएगी।।

उनकी आत्मीयता और प्रेरणा से भले ही मैं कवि नहीं बन पाया,लेकिन एक कवि हृदय को समझ तो पाया। कोई व्यक्ति हमारा आदर्श हो सकता है,वह आपको मार्ग भी दिखला सकता है,लेकिन चलना तो आपको है।

जीवन एक चलती फिरती कविता है। प्रेम ही इसकी

प्राणवायु है। हमारी वाणी में प्रेम हो मिठास हो,बस यही तो कविता है। प्रकृति हमें प्राकृतिक बनाती है,हमारा जीवन बनावटी कागज के फूलों का ना हो। उसमें प्रेम की खुशबू हो।

जब किसी के जीवन में कोई रत्नावली आती है,वह उसे तुलसीदास बना देती है। लोग रत्नावली को भूल जाते हैं,तुलसी के राम को नहीं भूलते। काश,हमारे जीवन में भी अगर कोई विद्योत्तमा आई होती,तो हम भी कवि कालिदास बन जाते।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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