श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सूरज को अरज…“।)
अभी अभी # ८९० ⇒ आलेख – सूरज को अरज
श्री प्रदीप शर्मा
जगत भर की रोशनी के लिए
करोड़ों की जिंदगी के लिए
सूरज रे, जलते रहना
सूरज रे, जलते रहना…
जो खुद जलते रहते हैं और पूरे जगत को रोशन करते रहते हैं, इनके जलवों का क्या कहना। मन तो करता है, इन आदित्यनाथ की आरती उतारें, लेकिन वह तो सूरज को एक तरह से दीपक दिखाना ही हुआ।
इसमें कोई शक नहीं कि ऊपर वाले की सरकार और हमारी दिल्ली सरकार में ज्यादा अंतर नहीं, कहीं मुफ्त बिजली तो कहीं मुफ्त प्रकाश। लगता है आसमान में भी चुनाव होने वाले हैं। चुनाव हों अथवा ना हों, कोई फर्क नहीं पड़ता, सब जानते हैं, स्वर्ग का राजा तो इंद्र को ही रहना है। वैसे भी ज्यादा फर्क नहीं हमारे मंत्रिमंडल और उनके तारामंडल में। काम कोई भी करे, मेवा तो नवग्रह को ही मिलना है।।
क्या आप जानते हैं, ऊपर वाले की सरकार इतने वर्षों से टिकी क्यों हुई है, अजी सब कुछ मुफ्त मिल रहा है, हवा पानी, राशन, प्रकाश ! और इधर हमारी सरकारें है, उसका न केवल उपभोग करती है, विकास और कल्याण के नाम पर उन सुविधाओं की कीमत भी वसूल कर लेती है। अश्वशक्ति को हमने हॉर्स पावर बना दिया और आपकी शक्ति को सोलर एनर्जी। दोनों की मिलीभगत और सांठगांठ से धरती और स्वर्ग की सरकारें चल रही हैं। आप चाहें तो कह सकते हैं nexus between Man and the God.
एक आम आदमी आजकल सिर्फ उपभोक्ता नहीं होता, वह सरकार का भक्त भी होता है। अपनी सरकार के लिए वह जी जान लगा भी सकता है और नाराज होने पर तख्ता पलट भी सकता है।
चुनाव के वक्त जनता में जितनी शक्ति होती है, चुनाव के पश्चात उसकी सारी शक्ति चुने हुए प्रतिनिधियों में प्रवेश कर जाती है। कल तक जो दाता था, वह भिखारी बन जाता है। भगत के बस में है भगवान गाने वाला, बहुत ही जल्द, तू दाता मैं भिखारी बन जाता है।।
हम जानते हैं हमारी आवाज में इतना दम नहीं कि उस सर्वशक्तिमान की मर्जी के खिलाफ आवाज उठाएं, लेकिन एक भक्त और मतदाता, दोनों के कुछ अधिकार होते हैं, इस कारण दिनकर, उर्फ भास्कर, उर्फ भानुप्रकाश उर्फ आदित्यनाथ यानी सूर्यदेव से हम इतनी विनती तो कर ही सकते हैं कि भैया चुनाव के बाद नेता की तरह ठंड के मौसम में, बादलों में मत छुप जाया करो।
हे सूर्यदेव गर्मी में तो आपको उगने की बड़ी जल्दी मची रहती है तो ठंड में क्या हो जाता है। शाम को भी जल्दी बोरिया बिस्तर समेट लेते हो जब कि गर्मी में ओवरटाइम भी कर लेते हो। क्या यह आपकी मनमानी नहीं।।
हमारे लिए आप कोई हाड़ मांस के अवसरवादी नेता नहीं, साक्षात भगवान हो।
हम सुबह सबसे पहले आपको नमस्कार करते हैं, अपनी औकात अनुसार जल भी चढ़ाते हैं, चतुर्थी की ही तरह छठ का व्रत रखते हैं, और अर्घ्य भी चढ़ाते हैं। बस ठंड के दिनों में जरा हमारे बाल बच्चों का खयाल रख लिया करो। बेचारों को ठंड में भी स्कूल भागना पड़ता है।
हम जानते हैं अनशन, भूख हड़ताल और बंद जैसी गीदड़ भभकियों से आपका बाल भी बांका नहीं होना, अतः केवल अरज है, ठंड में थोड़ा अपने यूनिवर्सल हीटर का रेगुलेटर बढ़ा दिया करो और समय पर आ जाया करो। क्या आप भी इसे अपना सरकारी दफ्तर समझने लगे। कौन कहता है आप भी किसी की देखा देखी में १८ – १८ घंटे काम करो लेकिन क्या करें,
काटे नहीं कटते दिन रात ये। इसलिए सूरज रे, जलते रहना।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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