श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गाय – भैंस।)

?अभी अभी # ८९८ ⇒ आलेख – गाय – भैंस ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या आपने कभी भैंस पर निबंध लिखा है ! अगर परीक्षा में भैंस पर निबंध आता, तो हम क्या लिखते । गाय तो खैर हमारी माता है, भैंस से हमारा क्या नाता है । जब भी ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं, हमारी अक्ल अक्सर या तो मारी जाती है, या घास चरने चली जाती है ।

एक समय था, जब हिंदू मुसलमान की तरह गाय और भैंस भी एक ही बाड़े में रहा करते थे । गाय के अगर बछड़े और बछड़ी होती थी तो भैंस के पाड़ा और पाड़ी । बछड़ा तो फिर भी बड़ा होकर बैल बनकर खेत जोत लेता था और बैलगाड़ी चला लेता था, लेकिन भैंस के अगर पाड़ा हुआ तो किस काम का हुआ ।।

गाय के तो कई वर्ण होते हैं, लेकिन भैंस का तो सिर्फ श्याम वर्ण ही होता है । गुणवत्ता में भले ही अंतर हो, लेकिन दोनों का दूध सफेद ही होता है । भैंस मोटी चमड़ी की होती है इसलिए इसका दूध भी चर्बी ही चढ़ाता है । गाय के दूध में जो गुण हैं, वे भैंस के दूध में नहीं पाए जाते । अधिकांश देशों में भैंस का दूध नहीं पीया जाता, शायद वहां के लोग भैंस कम पालते हैं और गाय अधिक । हो सकता है, उनको भैंस का दूध हजम ही नहीं होता हो ।

गो मूत्र और गाय के गोबर की जो उपयोगिता है, वह तो हम सभी जानते हैं, लेकिन भैंस के संबंध में कोई संत महापुरुष प्रकाश नहीं डालता । यह क्या कि बस भैंस का दूध निकाला और उसे भूल गए । भैंस को भले ही बुरा ना लगे, हमें यह भेदभाव अच्छा नहीं लगता ।।

आज भी मेरे घर में पहली रोटी गाय की ही निकलती है लेकिन मेरे यहां दूध सांची गोल्ड ही आता है ।

उसमें अच्छी मोटी मलाई आती है, जिससे घी भी अच्छा निकलता है ।

गोकुल के गोपाल कृष्ण गाय के ब्रांड एंबेसडर रहे हैं । छोटी छोटी गैया, छोटे छोटे ग्वाल, छोटे से, छोटे से मेरे मदन गोपाल । यही तो अंतर है कृष्ण के द्वापर और आज के कलयुग में ।वे कन्हैया जो गइया चराते थे, गोपियों संग रास रचाते थे, बांसुरी बजाते थे, मटकी फोड़ माखन चुराते थे, गोवर्धन पर्वत उंगली पर उठाते थे, कंस को मार, कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता का ज्ञान भी दे गए और इधर हमारे आज के कुलदीपक लालू यादव, भैंस का चारा ही खा गए । एक ने कारागार में जन्म लिया और संसार को तारा और दूसरे ने पहले चारा खाया, फिर जेल की हवा खाई । जय जय कृष्ण कन्हाई ।।

जो गाय कभी आवारा पशु कहलाती थी, आज गौशालाओं में सुरक्षित है ।संत महात्मा और सज्जन जन सेवक बन गऊ माता की तन, मन और धन से सेवा कर रहे हैं । घी दूध की नदियां जब बहेंगी तब बहेंगी, आम आदमी के काम तो आज भी भैंस ही आ रही है । भैंस भले ही पानी में चली जाए, उसके दूध में पानी तो दूध वाला ही मिलाता है, इसीलिए आजकल भैंस का दूध भी पतला आता है ।

जिस तरह हम बेटियां बचा रहे हैं, हमें अपनी गऊ वंश को भी बचाना है । वत्सला की श्रेणी में सिर्फ तीन ही माताएं आती हैं, वसुंधरा, हमारी माता और गौ माता, जिनकी गोद में हम जन्म लेते, ह्रष्ट पुष्ट हो बड़े होते हैं, और पुनः उनकी ही गोद में समा जाते हैं । भैंस का क्या है, बेचारी अनासक्त कर्मयोगी की तरह दूध देती रहती है, उसके लिए तो उसका तबेला ही हवा बंगला है ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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