श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सत्य सनातन…“।)
अभी अभी # ९०२ ⇒ आलेख – सत्य सनातन
श्री प्रदीप शर्मा
प्रेम की ही तरह ढाई अक्षर के सत्य के बारे में भी सब कुछ साफ, स्पष्ट और उजागर है, जैसा कि हमारे पंडित नरेन्द्र शर्मा ने उद्धोषित किया है, सत्य ही शिव है, सत्य ही सुंदर है, सत्यं, शिवम्, सुंदरम् और सत्य की सदा विजय होती है और अगर सत्य सनातन हो तो सोने में सुहागा। तेरी जय हो, महाविजय हो।
सत्य और प्रेम का भले ही कोई कॉपराइट ना हो लेकिन सनातन के बारे में आपका क्या कहना है।
सभी जानते हैं कि सत्य और प्रेम की तरह जो शाश्वत है, वही सनातन है। सत्य की खोज पर कई ग्रंथ उपलब्ध हैं लेकिन सनातन खोजा नहीं जा सकता। न ये ज़मीं थी, न आसमां था, मगर ये सच है, सत्य सनातन फिर भी वहां था।।
आपके पास जो आएगा, वो जल जाएगा ! सूर्य एक आग का गोला है, हमारी धरती माता भी सूर्य का ही एक अंश तो है, इस हिसाब से हम भी सूर्य पुत्र ही हुए। वैज्ञानिक चांद पर पहुंचकर खुश हो गए, और थोड़ा अंतरिक्ष में घूम फिर लिए, अब क्या बाल हनुमान बनने का इरादा है। कभी सोचना भी मत। बहुत यान और पक्षेपास्त्र हवा में उड़ा लिए, पहले जरा हवा में उड़ना तो सीख लो, फिर हमारे सूर्यनारायण को चुनौती देना। ऐसा कोई फायरप्रूफ जैकेट अभी पैदा नहीं हुआ, जो सूरज जैसे आग के गोले के आसपास भी फटक सके।
जब धरती पर ज्वालामुखी फटता है तब विज्ञान कहां जाता है।
सूर्य को सविता भी कहते हैं, ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरैण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योन: प्रचोदयात्। जिस तरह गणेश जी ने पूरी पृथ्वी की परिक्रमा की जगह, अपने माता पिता की ही परिक्रमा कर ली, उसी तरह आप केवल गायत्री मंत्र और सूर्य नमस्कार के जरिए सूर्य की परिक्रमा कर सकते हैं।।
लो जी, भरोसा नहीं होता।
जिस परम ब्रह्म से इस ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ है, वह घट घट व्यापक है। हम यहां किसी को अणु परमाणु का ज्ञान नहीं बांट रहे। आज के युग में सतयुग की बातें शोभा नहीं देती। यह अवतार और चमत्कार का युग है। कोई दसवें कल्कि अवतार की राह देख रहा है तो कोई किसी मसीहा की। कोई दुआ कर रहा है कि खुदा करे कि कयामत हो, और तू आवे।
भले ही हम कलयुग में हों, हमारे आदर्श आज भी सतयुग, त्रेता और द्वापर के ही हैं। आपस में ही अवतार अवतार का खेल खेलकर खुश हो लेते हैं। कष्ट इतने हैं कि कहे नहीं जाते। जो सुन ले, वही हमारा मसीहा, हमारा परमात्मा। एक बेरोजगार दस जगह अर्जी लगाता है, जहां मंजूर हो गई, वहां की चाकरी शुरू। अगर स्टार्ट अप में खुद का धंधा चल निकला तो वारे न्यारे, वर्ना हम खानाबदोश जनम जनम के बेचारे।।
आज के भौतिकवादी युग में न तो हमें सत्य खोजने की फुर्सत है और न ही ईश्वर के अनुसंधान की।
जिधर से बुलावा आ जाता है, हम चले जाते हैं। ओशो आए और चले गए, कृष्णमूर्ति भी बहुत कुछ देकर चले गए, लेकिन भक्तों और जिज्ञासुओं की प्यास बुझने का नाम ही नहीं ले रही। श्रीश्री रविशंकर सुदर्शन क्रिया लेकर चले आए तो बाबा रामदेव पूरा पतंजलि ही उठा लाए।
आज चित्रकूट के घाट पर सभी संतों की भीड़ जमा है। हमेशा की तरह कुछ विरोध की लहर जरूर उठ रही है लेकिन समर्थन की आंधी इस बार ऐसी उठी है कि सब कुछ आर पार हुआ लगता है। इस बार धर्म ध्वजा हिंदुत्व की नहीं, सनातन धर्म की है।
किसी भी प्रोडक्ट को अगर नया पैकेज और ब्रांड दे दिया जाए, तो उसकी मार्केटबिलिटी बढ़ जाती है। हमें सनातन पसंद है।
मार्केट रिपोर्ट और कई संतों, बुद्धिजीवियों के प्रमाण पत्र भी इस सनातन धर्म के पक्ष में आ चुके हैं। सनातन ही सत्य है, सत्य ही सनातन है। आपका क्या खयाल है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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