श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ख़याल।)

?अभी अभी # ९०४ ⇒ आलेख – ख़याल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

उनके ख़याल आए, तो आते चले गए ! हम कभी विचार-शून्य नहीं रहते। विचारों का आवागमन निरंतर चला करता है। इन्हीं विचारों के प्रवाह में, अचानक हमें किसी का खयाल आ जाता है। कोई कितना भी कहता रहे, खयालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते। जिसे आना होता है, वह आ ही जाता है।

ख़याल भारतीय संगीत का एक प्रकार भी है ! मुझे अपने शहर की दो संगीत हस्तियों का एकाएक ख़याल आता है, एक सुश्री कल्पना झोकरकर और दूसरे पुष्टि-मार्ग के प्रवर्तक पद्मभूषण गोस्वामी गोकुलोत्सव महाराज। ईश्वर का स्मरण ही ख़याल है। संगीत हमें ईश्वर से जोड़ता है।।

ईश्वर हमारा उतना ही ख़याल रखता है, जितना एक माँ अपने बच्चे का ! जब तक बालक अबोध होता है, माँ की गोद ही उसका घर होता है, और माँ का आँचल ही उसके लिए छाँव। माँ की उंगली पकड़, वह चलना सीखता है। लेकिन एक बार पाँव पर खड़ा होने के बाद माँ भी निश्चिंत हो जाती है और बालक भी खेलने में उलझ जाता है।

जब भूख लगती है, तब ही उसे माँ का खयाल आता है।

हमारा भी कुछ ऐसा ही है ! हम भी किसी बालक से कम नहीं। जब तक हमारे हाथ में माया का खिलौना है, हमें ईश्वर याद नहीं आता, लेकिन जैसे ही मुसीबत हम पर हावी हुई, कोई दुःख का पहाड़ टूटा, हमें उस ऊपर वाले का खयाल आता है।।

हमारे अवचेतन में स्मृतियों का भंडार भरा पड़ा है ! कब किस परिस्थिति में किसी व्यक्ति अथवा घटना का स्मरण आ जाए, कहना मुश्किल है। गहरी नींद में हमें भले ही कुछ ख़याल ना हो, लेकिन सपनों में किस किसका ख़याल आ सकता है, आप कुछ कह नहीं सकते।

ख़याल ही सिमरन है, स्मरण है ! आशंका और असुरक्षा की भावना में डरावने ख़याल ही आते हैं। बच्चे तो क्या बड़े-बूढ़े भी सपनों में डर जाते हैं। हमारी सोच ही ख़याल है। सयाने कह गए हैं, कि ईश्वर से डरो, तो बाकी सब डर ग़ायब हो जाएँगे। अगर ईश्वर से डर के बजाय प्रेम कर लिया तो डर का खयाल भी नहीं रहेगा और सबसे प्रेम बढ़ेगा।।

जग को जीतने के लिए, और उस जगत-नियंता को सदा स्मरण करने के लिए ही शायद जगजीत यह ग़ज़ल कह गए हैं ;

तुमको देखा तो ये ख़याल आया

ज़िन्दगी धूप, तुम घना साया …।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments