श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “राग द्वेष।)

?अभी अभी # ९०५ ⇒ आलेख – राग द्वेष ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

राग – द्वेष और निंदा – स्तुति को अध्यात्म में विकार के रूप में परिभाषित किया गया है। राग आसक्ति को कहते हैं। सांसारिक प्रेम भी राग की श्रेणी में आता है। घर परिवार, पत्नी, बच्चे और भौतिक वस्तुओं के प्रति आकर्षण मनुष्य के लिए एक अत्यंत स्वाभाविक एवं सहज स्थिति है। यही राग जब ईश्वर के प्रति होता है, तो उसका स्वरूप बदल जाता है।

अपने बच्चे से प्यार कौन मां नहीं करती ! उसकी साड़ी मेरी साड़ी से सफ़ेद कैसे ? ओनिडा टीवी का वह विज्ञापन याद कीजिए ;

Neighbour’s envy, owner’s pride. सौतिया डाह पर महिलाओं का ही कॉपीराइट नहीं, हम पुरुष भी इसके शिकार हैं। कहीं सिगरेट सौत है तो कहीं किताब अथवा आज की मुई फेसबुक। कृष्ण कुमार की जलती हुई सिगरेट किसी कन्हैया की बांसुरी से कम नहीं, जिसे आज की राधा ने कई बार के.के. के मुंह से निकाल ना फेंका हो। आज की अमृता प्रीतम एक आदर्श राधा है जिसने साहिर को एक सिगरेट की तरह पीया है और उसके धुएं से अपना कलेजा जलाया है। हम प्यार में जलने वालों को चैन कहां, आराम कहां।।

दो प्यार करने वालों के बीच रागात्मक संबंध होता है लेकिन तीसरे के बीच में आते ही द्वेष का जन्म हो जाता है। कहते हैं प्यार का फल मीठा होता है, लेकिन जब प्यार के वृक्ष पर ज़्यादा फल लद जाते हैं, तो प्यार बंट जाता है। हमारे प्यार की जड़ें किसी फलदार वृक्ष की जड़ों जितनी मजबूत नहीं, और ना ही हमारा प्यार उन ऊंचाइयों तक पहुंच पाया है, जिसकी मिसाल राधा और मीरा के रूप में दी जाती है। कृष्ण हमारे आराध्य हैं, लेकिन हमारे आदर्श आज भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम ही हैं। चोरी छुपे रास में और वृंदावन के रास में जमीन आसमान का अंतर है। हमारे समाज को आज भी रुकमणी ही पत्नी के रूप में ही स्वीकार्य है, राधा नहीं। प्रेम से बोलें राधे राधे।

जब सारे राग विराग हो जाते हैं, मोह का स्थान त्याग ले लेता है, तब कृष्ण की बांसुरी से प्रेम होता है। तब मन में द्वेष नहीं रास का जन्म होता है, बिन सुर ताल, पचीसों राग जन्म ले लेते हैं, पायल की झंकार गूंजने लगती है, मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई, जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।

कुछ लोग अपने प्यार को सहेजकर रखते हैं। उसमें बड़ा खतरा है। प्यार को लॉकर में बंद नहीं किया जा सकता। प्यार का अचार नहीं डाला जाता। अगर डालें भी तो उसे बांटें भी। प्यार को छुपाकर रखने से उसे नजर लग जाती है। ज्ञान की तरह, प्यार बांटने से बढ़ता है।

प्यार का पैमाना कभी खाली ना हो। प्यार सबसे किया जाय, प्यार सबको बांटा जाय, विरक्ति और वैराग्य वाले प्यार में न राग होता है, ना द्वेष। लेकिन इस विपक्ष और कांग्रेस का क्या किया जाए,

इसी ने तो मचा रखा है क्लेश। काश प्रेम में इतनी शक्ति होती। न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। कोई ऐसा प्रेम का पियाला पिला दे, कि हम राग द्वेष को भूल जाएं। किसी ने सही कहा है। ज़िन्दगी प्यार की दो चार घड़ी होती है। चाहे थोड़ी ही हो, ये उमर बड़ी होती है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments