श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कुम्हार का गधा…“।)
अभी अभी # ९३० ⇒ आलेख – कुम्हार का गधा
श्री प्रदीप शर्मा
एक समय था जब गधा इतना अकेला नहीं था। सबसे बड़ा बोझ अकेलेपन का होता है। क्या दिन थे वे भी, जब एक गधा भी पीठ पर बोझा लादे शान से कुम्हार के साथ चलता था। लेकिन समय का फेर देखिए। आज कुम्हार भी उसका साथ छोड़ गया। एक कुत्ते की तरह वह भी न कुम्हार के घर का रहा, न ईंट के भट्टे का। एक कुत्ते के तो फिर भी दिन बदल गए, लेकिन बेचारे गधे को तो किसी ने घास तक नहीं डाली।
अगर आपकी याददाश्त अच्छी हो तो आपने भी यदाकदा एक गधे को कुम्हार के मटकों के साथ सजा धजा सड़कों पर निकलते देखा होगा। गधे की पीठ पर एक रस्सियों की जाल में ठंडे पानी के मटके लदे हुए रहते थे। कुम्हार पति पत्नी दोनों मटके बेचने, गधे के साथ ही निकलते थे। कुम्हार पति मटकों की होम डिलीवरी करता और कुम्हार की पत्नी गधे और मटकों की रखवाली करती हुई आवाज लगा लगाकर मार्केटिंग करती थी।।
गधा शुरू से ही मेहनती रहा है। गधा हम्माली के लिए तो वह अभिशप्त है ही, लेकिन आज उसके नसीब में बोझा ढोना भी नहीं लिखा है। जो पूछ परख उसकी गांव में कभी थी, वह आज शहरों में कहां। बेचारी गऊ माता तक को इन शहरियों ने आवारा पशु समझ गोशाला में पहुंचा दिया तो उसकी क्या औकात। उसकी हालत तो एक कुत्ते और सुअर से भी गई बीती हो गई है। कुछ कस्बे टाइप जिलों में उसे आज भी सड़कों पर विचरने की छूट मिली हुई है, लेकिन वह कोई गाय या कुत्ता नहीं, जो कोई उस पर तरस खाकर दो रोटी ही डाल दे। वह तो पूरी तरह से घास पर ही निर्भर है। सबका मालिक एक होगा, लेकिन आज एक गधे का कोई मालिक नहीं।
जब आज मजदूर को ही मजदूरी नहीं मिल रही है तो बड़े बड़े डंपर, और आइशर वाहन छोड़, कौन गधे की पीठ पर ईंटें लादेगा। कुम्हार ने भी एक चार पहिए वाला ठेला खरीद लिया है, ऐसे में यह चार पांव वाला गधा किस काम का।
एक गधे से तो टट्टू और खच्चर अच्छा जो किसी काम तो आता है। एक व्यस्त घोड़ा भले ही घास से यारी ना करे, लेकिन एक उपेक्षित गधे के पास तो घास से यारी के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा है। सरकार को सबके रोजगार की चिंता है, एक गधा कहां का मतदाता है जो सरकार उसके भी रोजगार की घोषणा करे।।
केवल एकमात्र कृश्न चंदर ही ऐसे लेखक हुए हैं जिन्होंने न केवल एक गधे की आत्मकथा लिख इस प्राणी को अमर किया, अपितु उसे संसद तक में प्रवेश दिलवा दिया।
ईश्वर की इस सृष्टि में कोई प्राणी अनुपयोगी नहीं। अतः कोई आश्चर्य नहीं अगर पुस्तक मेले की तरह गधों का भी मेला लगता हो, उनकी भी खरीद फरोख्त होती हो। अजी गधों की तो बोली भी लगती है। जरूर गधों में भी कुछ श्रेष्ठ गधे होंगे, जो पारखी निगाहों से बच नहीं पाते होंगे।।
गधा न तो किसी सम्मान का भूखा है तथा न ही इसमें अस्मिता बोध ही है। एक कुम्हार शायद इसके मनोविज्ञान से वाकिफ हो, वैसे किसी कुत्ते अथवा गाय की तरह इसे इसके नाम से पुकारा जाए, तो भी यह किसी को ज्यादा भाव नहीं देता।
काश इसे यह पता होता कि इसकी कुछ खूबियों के कारण कुछ इंसानों की इस प्राणी से तुलना की जाती है। अगर इसे यह बात पता भी चल जाए, तो भी शायद इसके मुंह से ये शब्द तो फिर भी कतई ना निकले ;
गधा खुश हुआ ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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