श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पूत के पांव…“।)
अभी अभी # ९३८ ⇒ आलेख – पूत के पांव
श्री प्रदीप शर्मा
पूत, पुत्र को कहते हैं जो पंजाब में जाकर पुत्तर हो, जाता है। राज किसी का भी हो, अगर वह पूत राजस्थान के किसी रणबांकुरे के यहां पैदा हुआ है, तो राजपूत ही कहलाएगा। कल तक जो पूत सपूत तो क्यूं धन संचय, पूत कपूत तो क्यूं धन संचय, कहते नहीं थकते थे, वे ही आज बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के मार्ग को प्रशस्त करते नज़र आ रहे हैं।
जरूर वे लोग भविष्य दृष्टा होंगे, जो पूत के पांव पालने में पहचान जाते होंगे। काहे का पंचांग और काहे का काल निर्णय। कौन अखबारों में आज जन्म लिए बालक का भविष्य पढ़े, बस पूत के पांव पालने में देखे, और जन्म कुंडली बना दी। कितने पप्पू और कितने चाय वाले होंगे हमारे देश में, काश किसी ने उनके पांव पालने में तब देख लिए होते तो आज देश और वंश दोनों धन्य हो जाते।।
पुत्र को तो हम पूत कह देते हैं, लेकिन पुत्री के लिए हमारा शब्दकोश खामोश है। बनारस में जिसे छोरा, छोरी कहते हैं, वही बंगाल में जाकर छोकरा, छोकरी हो जाता है। कहीं मद्रासी और बंगाली छोकरा छोकरी मिलकर फिल्मी गाने गाते हैं तो कहीं लड़के को पोट्टा और लड़की को पोट्टी कहकर बुलाया जाता है। बुजुर्ग लोग आज भी अपनी तीसरी पीढ़ी, अर्थात पोता और पोती को आशीर्वाद देते, देखे जा सकते हैं। पूतना कृष्ण लीला का एक महत्वपूर्ण चरित्र है, जिसका उद्धार नंद के बाल गोपाल ने किया था। वैसे भी पूतना जैसी संतान से तो नि:संतान रहना ही भला।
हमारी लोकोक्तियां, कहावतें और मुहावरे कभी कभी गागर में सागर का काम कर जाती हैं। इनमें कहीं वक्रोक्ति है तो कहीं व्यंग्य, कहीं कोई गंभीर संदेश है तो कहीं कोई छुपा हुआ राज। नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है, क्या पूत के पांव पालने में, का लेटेस्ट वर्शन नहीं लगता ?
बस आज की व्याख्या अगर सकारात्मक है तो कल की कहावत में एक नहीं, कई अर्थ निहित हैं।।
कौन अपनी औलाद को अच्छी तरह नहीं पालता !
जन्म और कर्म दोनों के अपने सिद्धांत हैं। भाग्य और पुरुषार्थ का जरूर पालने से भी कुछ संबंध रहा होगा। जब कोई नि:संतान दंपत्ति किसी मासूम बच्चे/बच्ची को गोद लेता है तो क्या देखकर लेता है, पांव या और कुछ ? अब उस बालक को जहां पलना है, वही उसका पालना हुआ।
क्या पालक का पूत के पालने अर्थात् पालन पोषण करने से भी कोई संबंध है। पूत के पांव कब तक पालने में रहेंगे, वह पालने से जमीन पर भी आयेगा, घुटनों घुटनों चलेगा, ठुमक चलत रामचंद्र की तरह अपने पांवों पर खड़ा भी होगा। अपने कुल का नाम रोशन करेगा। कहीं नंद यशोदा तो कहीं माता कौशल्या और महाराज दशरथ। पूत के पांव सिर्फ पालने में ही नहीं नजर नहीं आते, अच्छी तरह पालने पोसने और संस्कारों से भी नजर आ जाते हैं। पालने के साथ जरा पालक पर भी गौर किया जाए।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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