श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “॥ गणगौर॥ “।)
अभी अभी # ९५९ ⇒ आलेख – ॥ गणगौर॥
श्री प्रदीप शर्मा
लोग जब मुझसे जन्म तारीख पूछते हैं तो मेरा जवाब होता है 1 अप्रैल लेकिन जब कोई मुझे जन्म तिथि पूछता है तो मुझे गणगौर बोलना पड़ता है।
वैसे व्रत तिथि और वार त्यौहार के बारे में मेरी जानकारी इतनी पुष्ट नहीं है लेकिन फिर भी केवल इतना याद है कि जिस दिन मेरा जन्म हुआ उस दिन गणगौर थी।
संयोग से आज ईद है और गणगौर भी, यानी मेरी जन्म तिथि भी आज ही है। बचपन में केवल मां को मेरा जन्मदिन याद रहता था। जब स्कूल में दाखिला लिया तब जन्म तारीख 1 अप्रैल लिखाई गई बस तब से रेकॉर्ड में 1 अप्रैल ही दर्ज है। अपनी खुशी के लिए आज भी मैं अपना जन्मदिन गणगौर के अवसर पर ही मनाना पसंद करता हूं, क्योंकि गणगौर से मेरी मां और ननिहाल की स्मृति जुड़ी हुई है।।
जन्मदिन के अवसर पर अगर कोई पर्व अथवा उत्सव भी हो तो सोने में सुहागा, एक तरह से हमारा जन्मदिन पूरी दुनिया मनाती है। तिथि और तारीख का यह अंतर हमेशा जन्मदिन को दो तारीखों में बांट देता है। क्या ऐसा कोई उपाय नहीं की हमारी जन्मदिन की तिथि और तारीख एक ही दिन कर दी जाएं।
वैसे दो दो बार पैदा होना, और दो विभिन्न दिनों पर जन्मदिन मनाना भी इतना बुरा नहीं। एक जन्मदिन पारिवारिक खुशी का और एक समाजिक, औपचारिक और व्यावहारिक जगत का। आज घर घर गणगौर की पूजा होती है, व्रत उपवास होते हैं, गुड़ के गुने के साथ साथ ही पकवान, मिष्ठान्न भी बनाए जाते हैं। नवरात्रि का उत्साह इस खुशी को और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है।।
आप बधाई दें, अथवा ना दें, आज का दिन मेरे लिए विशेष है, क्योंकि ना फोन पर जन्मदिन की बधाई और ना ही फेसबुक, व्हाट्सएप पर जन्मदिन के शुभकामना संदेश। खुद ही अपना जन्मदिन मनाओ और खुश हो लो, अपने परिवार के बीच ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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