श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कलम के पहलवान…“।)
अभी अभी # ९७२ ⇒ आलेख – कलम के पहलवान
श्री प्रदीप शर्मा
कलम के धनी तो बहुत हुए हैं, कलम के सिपाहियों ने भी कई वैचारिक जंग जीती हैं, आज हम कलम के पहलवानों की चर्चा करेंगे। जैसा कि सर्वविदित है, मौसिकी हो या पहलवानी, उस्ताद से गंडा बंधवाने की प्रथा है। रियाज और वर्जिश की दरकार तो है ही।
बिन गुरु ज्ञान कहां से आए ! घिस घिस कर शालिग्राम की तरह, कलम घिस घिसकर ही कोई कलम का पहलवान बन सकता है। योग गुरु, संगीत के आचार्य और अखाड़े के उस्ताद की तरह एक कलम के पहलवान को भी अपने कलम गुरु की चिलम भरनी पड़ती है। कलम का गुरु द्रोणाचार्य की तरह नहीं होता। वह जिस शिष्य पर मेहरबान हो जाता है, उससे वह कलम पकड़ने वाली कोई उंगली गुरु दक्षिणा में नहीं मांगता, अपितु अपनी कलम ही उसे प्रसाद स्वरूप ईनाम में दे देता है।।
पूत के पांव पालने में, और कलम का सिर पहले दवात में होता था। दवात की स्याही में डुबो डुबोकर कलम कागज पर अक्षर बनाती थी। गुरुकुल का ज्ञान kores की स्याही की एक टिकिया से शुरू होता था। कागज़ के अखाड़े में कलम ने भी कोई कम घास नहीं छीली। कई बार कागज़ छलनी हुआ तो कई बार कलम क्षतिग्रस्त हुई। वह कलम का बाल्यकाल था। सरकंडे और पार्कर पेन का संधि काल था वह। होल्डर और स्याही की दवात की दास्तान है यह।
जिस तरह बंदर के हाथ में उस्तरा नहीं दिया जाता, किसी काला अक्षर भैंस बराबर वाले के हाथ में कलम नहीं पकड़ा दी जाती थी। मिट्टी से पैदा हुए हो, पहले मिट्टी का सम्मान करना सीखो। पट्टी तब कागद का काम करती थी और पेम, पट्टी पर ढाई आखर प्रेम का लिखना सीख जाती थी। आज भी जो विद्या, अध्यापन कक्ष के श्याम पट के दायरे में, खड़ू निर्मित चाक से प्राप्त होती है, वह किसी गुरुकुल के ज्ञान से कम नहीं। दुनिया के सभी गणित के सवाल इसी ब्लैक बोर्ड पर हल हुए हैं। हर बार एक नया सवाल हल किया जाता है और बाद में उसे पोंछ दिया जाता है।
ज्ञान की स्लेट कोरी की कोरी ही रह जाती है। गुत्थी इसी तरह सुलझती, उलझती जाती है।
मेरा जीवन कोरा कागज़, कोरा ही रह गया। जब कलम कागज़ पर चलती है, तो जगह कम पड़ जाती है। कागज़ भी मानो कलम से कहता प्रतीत होता है, रंग दे, रंग दे, रंग दे, मुझे तू रंग दे। कलम के पहलवान पीठ झुकाकर ज्ञानपीठ के लिए सृजन रत रहते हैं। कलम वही जो कलमकार को पुरस्कार ही नहीं, कार भी उपलब्ध करवाए। महा मंडलेश्वर की उपाधि ना सही विद्या वाचस्पति, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार और पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित होना तो बनता है।।
कलम का सदगुरु एक कलम के पहलवान को ज्ञानवान, बुद्धिमान और शक्तिमान बनाता है। जितने आचार्य, पंडित, और डॉक्टर साहित्य में पैदा हुए हैं, उतने अन्य किसी बौद्धिक क्षेत्र में नहीं हुए। आलोचक, समालोचक, समीक्षक यहां के शंकराचार्य हैं। साहित्य के सभी पीठ इनका सम्मान करते हैं। अगर आप एक सच्चे कलम के पहलवान हैं तो इन्हें कभी पीठ ना दिखाएं। इन्हें अपनी पीठ पर बिठाएं।
एक अप्रैल का ज्ञान भंग की तरंग में नहीं प्रस्फुटित होता। उसके लिए जन्मजात प्रतिभा संपन्न होना भी जरूरी होता है। अगर आपमें वह प्रतिभा नहीं है तो कलम के साथ पहलवानी ना करें, हवा आने दें। बेहतर है किसी साहित्य के उस्ताद अथवा विद्यालंकार से गंडा बंधवा ही लें।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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