श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक ज्ञानवर्धक आलेख  अंतर्कथा :अभिनवगीत की… भाग – ३ – उत्तर प्रसंग )

☆ “अंतर्कथा :अभिनवगीत की… भाग – ३ – उत्तर प्रसंग” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

(आज से प्रस्तुत है श्री राघवेंद्र तिवारी जी का अभिनव गीत पर एक शोध परक आलेख अंतर्कथा :अभिनवगीत की..”। इस आलेख को हम तीन भागों (आदि प्रसंग, मध्य प्रसंग और उत्तर प्रसंग) में प्रस्तुत कर रहे हैं.) 

☆ भाग – ३ – उत्तर प्रसंग ☆

गीत को नवगीत का नाम देते हुए राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने इसके लिए पाँच मूलभूत तत्वों की बात कही (जीवन-दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्व-बोध, प्रीति-तत्व और परिसंचय)। अनेकांश नवगीतकारों ने इस पंच- सूत्री सूक्त को प्रतिमान की मान्यता दे कर, नवगीतों की सर्जना की। किन्तु, शीर्ष नवगीतकार नचिकेता ने यह कह कर इन्हें नकार दिया कि ये ” वस्तुतः पारंपरिक गीतों के कला-प्रतिमानों और विचार-दृष्टि का नया नामकरण भर थे”(देखें पूर्वाभास अगस्त २०१६ )। अपनी अवधारणा की पुष्टि में वे कहते हैं:” नवगीत ने अपने अंतर्जगत में व्यक्तिनिष्ठता की जगह वस्तुनिष्ठता और नितांत निजी आत्मानुभूति की जगह सामाजिक- चेतना के विविध् रूपों को अभिव्यक्त करने का जोखिम उठाया है। नवगीत की इस सार्थक पहल कदमी ने पारंपरिक गीत की विषयवस्तु को ही नहीं बदला, उसकी अनुभूति की संरचना (भाषा, शिल्प, विचारधारा और अनुभूति का सम्मिलित रूप), अभिव्यक्ति-भंगिमा और रूपाकार को भी बदल दिया”। फिर भी “आधुनिकतावाद, अस्तित्ववाद और क्षणवाद नवगीत की वैचारिक अंतर्वस्तु रहा है और ये सारे प्रत्यय केवल जनविरोधी ही नहीं, मनुष्य विरोधी भी हैं”। नचिकेता की ये अवधारणाएं इस बात का संकेत हैं कि नवगीत को जन पक्षधर होना चाहिए अर्थात इनका मूल स्वर प्रगतिकामी किवां साम्यवादी होना चाहिए। इस सन्दर्भ में वे कार्ल मार्क्स को उद्धृत करते हैं कि मनुष्य की चेतना को सामाजिकता, सृजनशीलता और सौंदर्यबोध् की क्षमता का विकास सामाजिक विकास का परिणाम है। कला और साहित्य का विकास भी इसी का परिणाम है। सामाजिक परिवर्तन के साथ मनुष्य का सौंदर्यबोध बदलता है, सुन्दरता की कसौटी बदलती है। मनुष्य के सौंदर्यबोध का उसकी विश्वदृष्टि से घनिष्ठ संबंध होता है’।

सौंदर्यबोध की भारतीय अवधारणा आनंद और लोक- मंगल से जुडी है। लोक- मंगल वर्ग विशेष का नहीं, समस्त मानव समाज का। अपने ‘तुमि जखन गान गायिते बोलो’ में रवींद्रनाथ टैगोर कहते हैं : तूने जब मुझे गीत गाने को कहा \तो गर्व से मेरी छाती फटने को हुई। मेरी आँखें आँसुओं से डबडबा उठीं \और मैं एकटक तेरे चेहरे की ओर देखता रह गया। मेरा जीवन \जितना कटु, विषम और अस्तव्यस्त है, वह सब पिघल कर \तेरी गीत- सुधा में बदल गया। मेरी सब साधना, आराधना, पक्षी की

तरह पंख फैलाकर आनंद से \उड़ने की कामना करने लगी। मेरे गीतों की रागिनी\मुझे श्रुति -मधुर लगती है, कर्ण-प्रिय लगती है। मैं जानता हूँ, \उन गीतों में के बल पर मैं तेरे सामने आने का साहस \कर सकता हूँ। टैगोर का यह गीत कवि की करुणानुभूति और श्रुति- मधुर, कर्ण -प्रिय रागात्मकता से जटिल- विषम जीवन को आनंद से आप्यायित करने की बात करता है। आज कविता में वह करुणानुभूति नहीं रही जो मनुष्य को करुणार्द्र कर, उसे पाशविक वृत्तिओं से मुक्ति दिला सके। सच पूछा जाए तो कविता वह है जो मनुष्य में अंतर्भूत मनुष्यता को उद्भूत कर सके। ऋचा कहती है हम मनुष्य की भांति रहना और जीना चाहते हैं। मनुष्यता से सम्पन्न हम आलोक का अन्वेषण करें (मनुष्वत्वा नि धीमहि मनुष्वत् समिधीमहि। अग्ने मनुष्वदङ्गिरो देवान् देवयते यज (ऋक. 5.21.1)। जरूरत है परुष को संवेदन शील बनाने की। मनीषियों ने मनुष्यत्व के लिए कुछ मूल्य निश्चित किए हैं। कुछ यम-नियम अर्थात व्यक्ति की सामाजिक और वैयक्तिक नैतिकता (यम= संयम अर्थात सामाजिक नैतिकता) नियम अर्थात व्यक्तिगत नैतिकता। आधुनिक और वस्तुनिष्ठ बुद्धिवादियों ने इन्हें मनुवादी सोच कह कर नकार दिया। भोगवादी संस्कृति हावी है, जिसमें पदार्थ से परे कुछ नहीं है। एक ओर तीव्र गति से मानवीय मूल्यों का क्षरण हो रहा है। तो दूसरी तरफ बढ़ रहा है संहारक शक्तियों का प्रभुत्व। इससे सृष्टि की सृजनात्मकता दिन पर दिन क्षीण हो रही है। आदमी प्रकृति से कट कर कृत्रिम जीवन जीने को विवश है। विश्व का तापमान बढ़ रहा है। पर्यावरण के विघटन ने ऐसा भयावह वातावरण पैदा कर दिया है, जिसमें मनष्य क्या, समस्त चराचर जगत संकट में है। ऐसे संकटापन्न वातावरण में अभिनव गीतकारों से अपेक्षा है कि वे :

–मानवीय मूल्यों का उन्नयन करें

–भोगवादी अपसंस्कृति से जन्में मनुष्यता के विस्थापन को अवरुद्ध करें

–मनुष्य को निसर्ग के संसर्ग में लाने के लिए कृत -संकल्प हों

–संहारक, विस्तारवादी और नव-साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध आवाज बुलंद करें

— वर्गभेद और वर्ग संघर्ष की छद्म नारेवाजी से बच कर वर्ग- सहयोग को समृद्ध करें

— कविता को खंड -खंड होने से बचा कर, उसे समग्र रूप में रूपांकित करें जिससे वैचारिक खेमेबंदी यथा नारी, दलित, आदि वासी, किसान -मजदूर विमर्श जैसी विभाजक रेखाओं से बचा जा सके। अभिनव गीत हर मजबूर आदमी की आवाज हो। आयातित जीवन दर्शन और, वैचारिकी के स्थान पर कविता का मूल उत्स देशज हो। आंचलिक।

मुझे आशा ही नहीं, पूरा विश्वास है कि अभिनव गीत एक ऐसे अभिनव साहित्यिक समाज की निर्मिति में अग्रगामी भूमिका अदा करेगा जहाँ समता और समरसता की अखंड आनंदमयी संस्कृति का अभ्युदय हो (समरस थे जड़ या चेतन सुन्दर साकार बना था \ चेतनता एक विलसती आनंद अखंड घना था–कामायनी)।

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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