श्री रविकान्त वर्मा
☆ आलेख ☆ प्रस्थान ज्ञानरंजन का… मिलते रहेंगे ज्ञानरंजन! ☆ श्री रविकान्त वर्मा ☆
ज्ञानरंजन
ज्ञानरंजन उन विरल लेखकों में थे जिन्हें अपने जीते जी अपनी कृतियों को क्लासिक में बदलते देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। लगभग पच्चीस कहानियों में कम- से – कम दर्जन भर कहानियाँ निश्चित रुप से हिन्दी की कालजयी कहानियाँ हैं। इन पर लिखा गया है और आगे भी लिखा जाता रहेगा।
विचारक:- श्री सुरेश पांडेय
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एक ऐसा कथाकार जिसे अलविदा कह पाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है। वैसे भी ज्ञानरंजन अपनी रचनाओं से इतर अपनी जीवंत अभिव्यक्तियों में, अपने लेखन की विशिष्ट शैली में, अपने बेलौस और बिंदास अंदाज में और सबसे ज्यादा एक मोटीवेटर या उत्प्रेरक के रुप में लोगों के दिलों में बसे थे, बसे हैं, बसे रहेंगे।
ज्ञानरंजन आज के दौर की तरह के व्यावसायिक वक्ता या मोटीवेशनल स्पीकर भी नहीं थे। वो तो किसी को भी अपनी बातों से अंतरतम की गहराईयों तक छू जाते थे। साहित्यिक शब्दावलियों और अपने प्रेरक तर्कों से किसी भी उम्र के व्यक्ति को जिसमें स्त्री- पुरुष सब शामिल हुआ करते थे, ज्ञानरंजन उनकी अभिप्रेरणा बन जाते थे।
अक्सर लोग किसी के होने और न होने में उसकी तलाश और पड़ताल किया करते हैं। ज्ञानरंजन इसके अपवाद हैं। वो तो हमें हमेशा मिलते रहेंगे!
अपनी विशिष्ट लेखन शैली में! अपनी वक्तृत्व कला की प्रति ध्वनियों में! अपनी सहजता और सरलता में!
हर किसी के लिए हर वक्त आसानी से उपलब्ध होने के अंदाज में!
असाधारण सादगी में और किसी भी श्रेय से दूर रहने की दुर्लभ इच्छाशक्ति में दिखाई देंगे ज्ञानरंजन!
अकोला में जन्मे, इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में शिक्षा के संस्कार मिले और फिर जबलपुर में उन्होंने अपने अनुभवों को शाब्दिक विस्तार दिया। आगे चलकर इस विद्रोही कामरेड ने परंपरागत लेखन की अलग शैली में विचारों को कलमबद्ध करना शुरू किया।
नौकरीपेशा ज्ञानरंजन हिन्दी के प्रोफेसर थे। वैसे किसी भी लेखक के लिए उच्चतर शिक्षा का कोई ज्यादा या खास महत्व नहीं होता है। अनुभवों और बेहतर सामान्य बोध ही अच्छे लेखक होने की अनिवार्य शर्त मानी जा सकती हैं जो ज्ञानरंजन के पास भरपूर मात्रा में थी या कहें वे इसके धनीधोरी थे।
तभी तो बीसवीं सदी के साठ के दशक में लिखीं उनकी कहानियाँ तब के साहित्य समाज के लिए एक सनसनी का विषय होने के बावजूद आज अमरत्व पा चुकीं हैं।उनकी लिखीं गिनती की कुछ कहानियों ने ज्ञानरंजन के दृष्टि बोध का व्यापक परिचय दे दिया था।
उनकी सोच के कैनवास पर विचारों की अदभुत व्यापकता दीख पड़ती थी।समय के अनुरूप समाज के और मानवीय रिश्तों की पड़ताल में वो बेहद दक्ष थे।वस्तुतः आरंभिक दौर में या कहें किशोर वय और युवावस्था के दौर में वे एकाकी चिंतक और वैश्विक साहित्य के अध्येता रहे थे। जिनमें वे जीवन मूल्यों और मानवीय रिश्तों के विरोधाभास ढूंढा करते थे। परिष्कृत भाषायी संस्कार तो उन्हें विरसे में विश्व साहित्य के नामचीनऔर हिन्दी साहित्य के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न हस्ताक्षर स्व.रामनाथ “सुमन” से मिले थे।जो उनके पिता थे।
कालांतर के साथ उन्होंने स्वयं उसे तराशना शुरू किया। फिर तो साहित्य और शब्दशक्ति के उच्चतर सोपानों का स्पर्श करते हुए ज्ञानरंजन ने स्वयं की एक शैली निर्मित की। जो अनूठी और अतुलनीय थी और बेहद प्रभावी भी!
प्रख्यात लेखक निर्मल वर्मा ने भी उनके शब्द विन्यासों की ताकत और भावार्थ को अनेक मंचो से सराहा था। उनकी संस्मरणात्मक पुस्तक कबाड़ खाना इसका एक उत्कृष्ट प्रमाण है। संस्कार धानी में उनकी एक बड़ी फैन फालोइंग है पर कहने में जरा भी गुरेज़ नही कि लेखकों की एक बेहद पकी हुई फसल भी उनके लेखन के समकक्ष नहीं पहुंच पाई है। यही ज्ञानरंजन का वैशिष्ट्य है।
पिछली सदी की जिन तीन साहित्यिक विभूतियों ने शहर जबलपुर को वैश्विक पहचान दी उस कड़ी के ये आखिरी स्तंभ थे।
छायावादी कविता के कुछ शेष बचे रचनाकारों में एक रामेश्वर शुक्ल “अंचल” और अपने धारदार व्यंग्य और सामाजिक और वैयक्तिक विसंगतियों को उधेड़ने वाले हरिशंकर परसाई तो हमें पिछली यानि बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ही छोड़ कर जा चुके हैं।
पर ज्ञानरंजन नयी सदी के एक चौथाई हिस्से तक पूरी सक्रियता और तत्परता से हिन्दी साहित्य की उपादेयता और सार्थकता सिद्ध करने की कोशिशों में लगे रहे।
उनमें न तो नायकत्व का आग्रह था और न ही महत्वपूर्ण समझे जाने की कोई अतिरिक्त लालसा।
प्रोफेसर रहते हुए भी वे छात्रों को अचंभित करते थे। धाराप्रवाह में हिन्दी के किसी भी विषय पर उनका आख्यान विद्यार्थियों को हतप्रभ और आल्हादित कर देता था। न केवल भारतीय छात्र वरन् विदेशी विद्यार्थी भी उनके घर पहुंच जाया करते थे।
उनका व्यक्तित्व अंग्रेज कवि लार्ड बायरन और कथाकार – नाटककार ऑस्कर वाइल्ड की तरह दुर्निवार आकर्षण से युक्त था। उनमें अप्रतिम चुम्बकीय आकर्षण था। वे एक साथ अभिभूत और आल्हादित दोनों करते थे। लोग उनसे मिल कर गौरवान्वित महसूस करते थे। यहाँ तक कि उनसे मिलकर लोग दूसरों से पूरे आत्मविश्वास के साथ कहते मैं ज्ञान जी से कहकर आपका काम करवा दूंगा। और वे अपने ऊपर अतिरिक्त दबाव लेकर कोई भी काम पूरा करने की जद्दोजहद में जुट जाया करते थे।
अपने समय से आगे के लोगों में उनका शुमार किया जा सकता है। वे उपदेशक भी नहीं थे। हमेशा जीवन के शाश्वत सच्चेपन के साथ ही अभिव्यक्त होते थे। तभी तो वे लोगों के दिलों को छू लिया करते थे।
और शायद कोई भी जटिल काम उनकी सादगी और करिश्माई जनसंपर्क से पूरा भी हो जाया करता था।
ये काम किसी के रोजगार से जुड़े हो सकते थे। या फिर लेखकीय पहचान या फिर लव मैरिज और कन्यादान के भी हुआ करते थे। संगीत, पेटिंग एक्टिंग, स्वर साधना से जुड़े कलाकार और फोटोग्राफी से जुड़े लोग भी हमेशा उनके ईर्द गिर्द रहा करते थे। उनका पत्र व्यवहार अनूठा था आज के मोबाइल नेटवर्क से भी ज्यादा मजबूत और बेहद कारगर!
उनके जनसंपर्क का का कैनवस बहुरंगी, विविधतापूर्ण और व्यापक था।
साहित्य और मीडिया की प्रभावी हस्तियों पर उनका नाम तारी रहता था।
एक बेफिक्र जीवनशैली, एक लापरवाह पर संवेदनशील सोच और कभी सधा हुआ तो कभी अनगढ़ से जीवनयापन की बदौलत ज्ञानरंजन तैयार हुए थे।
वे कभी उनमुक्तता तो कभी दायरों वाली सोच के साथ आगे बढ़ते रहे। जो अमूमन सबके साथ ही घटित होता है।
पढ़ना और सिर्फ अच्छा पढ़ना उनका प्रिय शगल था। मानवीय रिश्तों की पड़ताल में मसरुफ़ियत कुछ ज्यादा ही थी। उनका समग्र व्यक्तित्व सह अस्तित्व बोध
का प्रतीक और उसके उत्कर्ष से भी आप्लावित था।
युवा ज्ञानरंजन में भी उस दौर के युवाओं की तरह प्रेम के लिए अतिरेक और प्रबल आग्रह भी थे। यही वजह है जीवन संगिनी भी आग्रहों के इसी उहापोह से ही हासिल हो सकी।
वैसे भी एक अच्छा जीवनसाथी आपके किसी भी प्रशस्तिपत्र से कम नहीं होता है। ज्ञान जी इस मामले में सौभाग्यशाली रहे। अस्सी पार की सुनयना ज्ञानरंजन अब उनकी भाव संपदा के साथ एकाकी हैं। लेकिन चौबीस कैरेट का साथ तो वो निबाह चुकीं हैं।
जहाँ तक उनके लेखन की बात की जाए तो कह सकते हैं वो व्यावसायिक लेखक नहीं थे। न तो वो सेलेबल थे न ही सेलिब्रिटी। वो तो सहज अनुभूतियों को लयबद्धता से वाक्यों में बदलते थे। फेंस के आसपास से वैश्विक सोच तक उनकी अनुभूतियों का दायरा था। उनका समय पारंपरिक लेखन का समय था न कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का। ज्ञानरंजन ने उसी परंपरा को विस्तार दिया। नया शिल्प दिया। अनूदित वैश्विक और भारतीय साहित्य की पत्रिका “पहल” का कुशल और सार्थक समायोजन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
सदी के बदलते ही इस तरह का लेखन हाशिये में और शेल्फों की शोभा बन कर रह गया था। लेखन शैली मोबाइल की भाषा शैली में बदलने लगी ! कंटेंट और ब्लॉग लेखन शुरू हो गया था।ब्रॉडकास्ट पर पॉडकास्ट भारी पड़ने लगा तब ज्ञानरंजन सरीखे उमदराज़ लेखकों के लिये ये बौद्धिक संक्रमण का समय बन गया था । सिनेमा में भी बुजुर्ग फिल्म मेकर्स कैमरे के पीछे से हटने लगे थे।
पर इससे परंपरागत लेखन और उसके समकालीन बनीं फिल्मों का औचित्य कम नहीं होता है और न ही फीका पड़ता है। हर रचनात्मक प्रयास अपने समय का सच होता है। और ये भी सच है कि हर व्यक्ति अपने समय को ही जीता है।
ज्ञानरंजन ने भी अन्यान्य की तरह अपने समय को जिया और भरपूर जिया।
एक अविस्मरणीय यात्रा थी ज्ञानरंजन की वो भले ही थम चुकी है पर कहते हैं न किसी का भी कोई विकल्प नहीं होता है। ज्ञानरंजन का भी कोई विकल्प नहीं होगा।
लेखन अपना कलेवर बदलेगा, तकनीक बदलेगी, कंटेंट बदलेगा, लेखक बदलेंगे लेकिन जिस तरह ट्रेन आगे बढ़ती रहती है पर स्टेशन अपनी खासियत के साथ वहीं खड़े रहते हैं। ज्ञानरंजन एक जंक्शन बन कर हमेशा खड़े रहेंगे।
वे एक कथा लेखक थे।”कथाकार” शब्द उनकी पहचान था। उनकी कथा पूर्णविराम के साथ पूरी हो चुकी है।
अब तो बरसों-बरस ज्ञानरंजन पर सिर्फ उपसंहार लिखे जाते रहेंगे।
साहित्य के माध्यम से विश्व संस्कृति को ज्ञानरंजन का अवदान अतीत और व्यतीत दोनों का अतिक्रमण करता है। साथ ही कालातीत और कालजयी की नयी परिभाषा गठन की अप्रतिम चुनौती देता है। ज्ञानरंजन के अस्तित्व का यही औचित्य है और यही उसकी सात्विक सार्थकता भी!
पुलिसवाला परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।
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आलेख – श्री रविकान्त वर्मा
मो.न.:- 9589972355
साभार – श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






