डाॅ राकेश सक्सेना
(डाॅ राकेश सक्सेना जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त । कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक शोधपरक आलेख – वैश्वीकरण के दौर में कबीर का मानवतावादी दर्शन।)
☆ आलेख – वैश्वीकरण के दौर में कबीर का मानवतावादी दर्शन ☆ डाॅ राकेश सक्सेना
भक्तिकाल के कवियों में कबीरदास का स्थान अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है। वे केवल संत या कवि ही नहीं थे अपितु सामाजिक चेतना, मानवीय मूल्यों और समरसता के प्रतीक विश्वप्रेमी थे, जिस पर मानव समाज का विकास सम्भव है। उनकी साधना वनखण्डों व गुफाओं में ले जाने वाली नहीं, मन के साथ-साथ आचरण से सम्बन्ध रखने वाली लोकसाधना थी। उन्होंने मन की शुद्धि और साधु- सत्संग पर समान रूप से बल दिया। उनको समाज में अच्छे और बुरे दो ही तत्व दिखाई देते थे, इसलिए उन्होंने अच्छे तत्व की प्रशंसा करते हुए बुरे तत्व से बचने का उपदेश दिया। उनका दर्शन किसी विशेष धर्म, सम्प्रदाय या वर्ग तक सीमित नहीं था। मानवता के कल्याण की भावना उसमें उपलब्ध है। विज्ञान, तकनीक एवं संचार के साधनों ने आज जहाँ विश्व को एक वैश्विक गाँव में परिवर्तित कर दिया हो, सांस्कृतिक विघटन, उपभोक्तावाद, असहिष्णुता, सामाजिक असमानता और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण जैसी समस्याएँ सामने हों, ऐसे समय में कबीर का मानवतावादी दर्शन अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होता है।
कबीर की मानवतावादी विचारधारा में मनुष्य को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। उन्होंने धर्म, जाति और सम्प्रदाय की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर मानव की गरिमा को सर्वोपरि मानते हुए कहा– ‘ जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। ‘ कबीर के अनुसार मनुष्य की पहचान उसकी जाति या जन्म से नहीं, उसके ज्ञान और कर्म से होती है। वे जीवमात्र को एक ही परमपिता की संतान मानते हैं और सबको एक ही स्तर पर लाकर खड़ा कर देते हैं, किसी भी प्रकार के भेदभाव को स्वीकार नहीं करते, उदाहरणार्थ– ‘ एक बूँद से सब जग उपजा, कौन ब्राह्मण कौन शूद्र।’ वैश्विक दौर में जहाँ नस्लीय, धार्मिक और आर्थिक असमानताएँ हैं। कबीर का यह संदेश सामाजिक न्याय और समानता का आधार बन सकता है। कबीर ने हिन्दू और मुस्लिम दोनों सम्प्रदायों की धार्मिक कट्टरता की आलोचना करते हुए कहा कि ईश्वर किसी एक धर्म की सम्पत्ति नहीं है। वे धार्मिक आडम्बरों का विरोध करते हैं और सच्चे आचरण को महत्व देते हैं। वैश्विक दौर में धार्मिक संघर्ष, आतंकवाद, साम्प्रदायिक तनाव की घटनाएँ घटित हो रहीं हैं, ऐसे समय में ‘ राम- रहीम एक हैं ‘ की भावना वैश्विक शान्ति की दिशा में मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है।
कबीर के दर्शन में प्रेम, मानवता का आधार है, वह मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। बाह्य आचार प्रेम में बाधक होते हैं, इस कारण वे प्रत्येक प्रकार की उस संस्था का विरोध करते हैं जो प्रेम के मार्ग का रोड़ा बनती है, यथा– ‘ पोथी पढि-पढि जगमुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढै सो पंडित होय।। ‘ वैश्वीकरण के प्रतिस्पर्धा और स्वार्थी दौर में प्रेम और सहअस्तित्व की भावना अत्यन्त आवश्यक है। उपभोक्तावादी संस्कृति में सफलता का मापदंड धन और भौतिक सुख- सुविधाएँ हैं। वहाँ भी वे कहते हैं– ‘ साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय।।’ कबीर का यह विचार आज की भोगवादी संस्कृति के लिए एक नैतिक विकल्प है।
अंतत: हम कह सकते हैं कि कबीर का मानवतावाद किसी पश्चिम दार्शनिक अवधारणा का अनुकरण नहीं अपितु भारतीय लोकजीवन और अनुभव की उपज है। यही कारण है कि उनकी वाणी आज भी जनमानस में जीवित है और भविष्य के लिए एक नैतिक व मानवीय मार्गदर्शक है। वे सच्चे अर्थों में मानव समानता के समर्थक, धार्मिक सहिष्णुता के प्रवक्ता, सामाजिक न्याय के पक्षधर, उपभोक्तावाद के विरोधी, प्रेम और करुणा के उपासक, विश्व बंधुत्व के समर्थक, सांस्कृतिक समन्वय के प्रवक्ता हैं। उनका दर्शन मानवाधिकारों, जीवन मूल्यों एवं वैश्विक नागरिकता की अवधारणाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
डाॅ राकेश सक्सेना
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