डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ आलेख ☆ स्क्रीन की चमक में धुंधले होते रिश्ते… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“एक मिनट… बस ये मैसेज भेज दूँ…”
पिता ने मोबाइल स्क्रीन से नज़र हटाए बिना कहा।
बेटी कुछ देर चुप खड़ी रही।
फिर धीमे स्वर में बोली –
“पापा, आप हमेशा फोन से बात करते रहते हो…
हमसे कब बात करोगे?”
कमरे में अचानक एक अजीब-सी खामोशी उतर आई।
शायद किसी ने पहली बार महसूस किया कि घर में सब साथ होते हुए भी कहीं न कहीं एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।
तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है।
आज मोबाइल फोन हमारी दिनचर्या का ऐसा हिस्सा बन चुका है, जिसके बिना कुछ घंटों की कल्पना भी कठिन लगती है। काम, पढ़ाई, खरीदारी, बैंकिंग, मनोरंजन और संवाद – सब कुछ अब स्क्रीन पर सिमट आया है।
लेकिन सुविधा की इस चमक के पीछे एक सच्चाई धीरे-धीरे और स्पष्ट होती जा रही है –
स्क्रीन जितनी चमक रही है, रिश्ते उतने ही धुंधले होते जा रहे हैं।
आज सुबह उठते ही सबसे पहले लोग अपने प्रियजनों का चेहरा नहीं, मोबाइल स्क्रीन देखते हैं। रात को सोने से पहले भी आखिरी नजर फोन पर ही जाती है। दिनभर नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया और लगातार आती सूचनाएँ हमारे मन को हर समय व्यस्त रखती हैं।
विडंबना यह है कि हम दुनिया भर के लोगों से जुड़े हुए हैं, लेकिन अपने ही घर के लोगों से बातचीत कम होती जा रही है।
पहले परिवारों में साथ बैठकर चाय पीना, दिनभर की बातें साझा करना और बिना किसी कारण घंटों बातचीत करना सामान्य बात थी। आज वही समय मोबाइल स्क्रॉल करने में बीत जाता है।
एक ही कमरे में बैठे लोग अलग-अलग डिजिटल दुनिया में खोए रहते हैं।
बातचीत छोटी हो गई है।
धैर्य कम हो गया है।
और रिश्तों में वह सहजता भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है, जो कभी परिवारों की सबसे बड़ी ताकत हुआ करती थी।
सबसे अधिक प्रभाव बच्चों और युवाओं पर दिखाई दे रहा है।
आज बच्चे मैदानों से ज्यादा स्क्रीन पर समय बिताते हैं। परिवारों के भीतर संवाद की जगह वीडियो और रील्स ने ले ली है। कई बच्चे अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के बजाय मोबाइल में सुकून ढूँढने लगे हैं।
दूसरी ओर, बड़े भी इससे अछूते नहीं हैं।
कई बार माता-पिता बच्चों के साथ समय बिताने के बजाय उन्हें मोबाइल पकड़ा देते हैं। धीरे-धीरे स्क्रीन “परिवार” की जगह लेने लगती है।
सोशल मीडिया ने तुलना की एक ऐसी संस्कृति भी पैदा कर दी है, जहाँ लोग दूसरों की जिंदगी देखकर अपनी खुशियों को कम आँकने लगते हैं। हर समय “अपडेटेड” रहने की होड़ ने मन को बेचैन बना दिया है।
लोग अब जीने से ज्यादा “दिखाने” में व्यस्त हो गए हैं।
किसी यात्रा का आनंद लेने से पहले उसकी तस्वीर पोस्ट करना जरूरी लगने लगा है। खाने का स्वाद लेने से पहले उसकी फोटो खींची जाती है। धीरे-धीरे वास्तविक अनुभवों से ज्यादा उनका प्रदर्शन महत्वपूर्ण होने लगा है।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम ध्यान क्षमता को कम करता है, नींद को प्रभावित करता है और चिंता तथा अकेलेपन जैसी समस्याओं को बढ़ाता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि लोग अब “अकेले बैठना” भूलते जा रहे हैं।
हर खाली पल मोबाइल से भर दिया जाता है।
लेकिन इंसान को केवल सूचना नहीं, शांति भी चाहिए।
और शांति लगातार स्क्रीन देखने से नहीं, कभी-कभी उससे दूरी बनाने से मिलती है।
यही कारण है कि आज “डिजिटल उपवास” जैसी अवधारणा बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।
जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए उपवास किया जाता है, उसी प्रकार मन को भी समय-समय पर डिजिटल विश्राम की आवश्यकता होती है।
डिजिटल उपवास का अर्थ तकनीक छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ है – तकनीक के साथ संतुलित संबंध बनाना।
यदि दिन का कुछ समय मोबाइल और सोशल मीडिया से दूर बिताया जाए, तो व्यक्ति धीरे-धीरे मानसिक रूप से अधिक शांत महसूस करने लगता है। परिवार के साथ बैठना, किताब पढ़ना, संगीत सुनना, टहलना या बिना किसी स्क्रीन के कुछ पल स्वयं के साथ बिताना मन को भीतर से हल्का करता है।
विशेष रूप से परिवारों को कुछ छोटे नियम बनाने की आवश्यकता है।
जैसे –
भोजन के समय मोबाइल नहीं,
सोने से पहले स्क्रीन बंद,
और दिन में कुछ समय पूरी तरह ऑफलाइन।
ये छोटे बदलाव रिश्तों में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।
आज बच्चों को केवल डिजिटल शिक्षा नहीं, डिजिटल संतुलन भी सिखाने की आवश्यकता है। उन्हें यह समझाना होगा कि तकनीक उपयोग की वस्तु है, जीवन का केंद्र नहीं।
वहीं बड़ों को भी उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। यदि माता-पिता हर समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे, तो बच्चों से संतुलन की अपेक्षा करना कठिन होगा।
हमें यह समझना होगा कि तकनीक ने सुविधा दी है, लेकिन संवेदनाएँ अब भी इंसानी संवाद से ही जीवित रहती हैं।
एक मुस्कान,
एक बातचीत,
एक साथ बैठा हुआ परिवार –
इनका कोई डिजिटल विकल्प नहीं हो सकता।
“जहाँ बातचीत कम होने लगती है,
वहाँ रिश्ते धीरे-धीरे मौन में बदलने लगते हैं।”
अंततः, प्रश्न यह नहीं है कि मोबाइल हमारे हाथ में है या नहीं।
प्रश्न यह है कि क्या हमारा समय, हमारा ध्यान और हमारे रिश्ते अब उसके नियंत्रण में जा रहे हैं?
यदि इसका उत्तर हमें असहज करे, तो शायद समय आ गया है थोड़ा ठहरने का।
क्योंकि सच यही है –
स्क्रीन की चमक कुछ पल आकर्षित कर सकती है,
लेकिन जीवन की असली रोशनी रिश्तों से ही आती है।
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© डॉ रीटा अरोड़ा
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






