श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी कविता – “पूनम का चाँद…“।)
अभी अभी # ११२७ ⇒ कविता
पूनम का चाँद
श्री प्रदीप शर्मा
आसमान के ये अद्भुत नजारे,
चंदा, सूरज, तारे!
दिन में राज करता सूरज,
रात में गिनता तारे।
सोलह चंचल कला चंद्र की,
16 ही कला कृष्ण-चंद्र की।
अमावस की काली रात
बन जाती कृष्ण-जन्माष्टमी
तो पूनम की रात शरद-पूर्णिमा।।
अमृत बरसता आज अम्बर से
छन छन कर उतरती चाँदनी
छत पर आसमाँ से!
अमृत पेय बन जाती दुग्ध-खीर
चंदा की चाँदनी पी पी के।
निरोग करती काया
पुष्ट होता शरीर
भागता दूर दमा-अस्थमा!
शरद ऋतु का अनूठा
यह वरदान,भोले मानुस,
तू मान या न मान।।
पुरखों को तो श्राद्ध-पक्ष में
खूब खिलाई खीर!
हुए तृप्त वे,सदा संतुष्ट।
अब आई बारी आपनी
काया को कर पुष्ट।
अब कहाँ चाँदनी रात
में संभव नौका-विहार!
अपनी ही छत पर,
गैलरी अथवा मल्टी की
टेरेस पर।
किसी बाग-बगीचे में,
या झील के उस पार
मिल-जुलकर परिजन,
अथवा चार यार!
आओ मनाएँ
शरद पूर्णिमा का त्योहार।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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