डॉ. सिद्धार्थ वर्मा

संक्षिप्त परिचय

डायरेक्टर मिरेकल मेडीकेयर, जबलपुर म. प्र., प्रोफेसर ◊ डॉ भगतसिंह राय कॉलेज, सिवनी ◊ पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर ◊ सी एस एस मेडिकल कॉलेज, प्रयागराज ◊ स्वास्थ्य एवं जन जागरूकता विशेषज्ञ  ◊ कई राष्ट्रीय स्वास्थ्य अभियानों से जुड़े हुए ◊ समाज में वैज्ञानिक सोच के प्रचार-प्रसार हेतु सक्रिय।

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – कहाँ गई स्पोर्ट्समैन स्पिरिट?

☆ आलेख ☆ कहाँ गई स्पोर्ट्समैन स्पिरिट? ☆ डॉ. सिद्धार्थ वर्मा ☆

कहाँ गई स्पोर्ट्समैन स्पिरिट?

जब खेल का आकाश राजनीति के बादलों से ढक जाए।

कभी खेल का मैदान मंदिर जैसा पवित्र हुआ करता था — जहाँ पसीने की हर बूँद प्रार्थना थी, हर जीत विनम्रता और हर हार एक नई सीख। वहाँ राष्ट्रध्वज से पहले मनुष्यता का सम्मान होता था, और प्रतिद्वंद्वी शत्रु नहीं, सहयात्री माना जाता था। पर आज उसी मैदान पर प्रश्न खड़ा है — क्या खेल अब भी अपनी आत्मा के साथ जीवित है?

खेल केवल शरीर की प्रतिस्पर्धा नहीं, आत्माओं का संवाद है। यह वह भाषा है जो बिना शब्दों के देशों को जोड़ती है, वह पुल है जो सीमाओं के ऊपर से गुजरता है। ओलंपिक के पाँच छल्लों में गुँथी मित्रता हो या विश्व कप की चमक में छिपा संघर्ष — हर जगह खेल ने मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का प्रयास किया है। रंतु समय की धूल में यह पुल अब धीरे-धीरे दरकने लगा है।

हालिया घटनाएँ — बांग्लादेश का टी-20 विश्व कप से बाहर होना और उस पर पाकिस्तान का समर्थन — केवल खेल समाचार नहीं, बल्कि हमारे समय की एक गहरी कथा है। यह कथा बताती है कि कैसे निर्णय अब बल्ले और गेंद से नहीं, बल्कि कूटनीति की मेज़ पर तय होने लगे हैं। यहाँ प्रश्न किसी एक देश का नहीं, उस प्रवृत्ति का है जो खेल की आत्मा को राजनीति की बेड़ियों में बाँध रही है।

जब राजनीति मैदान में उतर आए

राजनीति का खेल में प्रवेश कोई नई घटना नहीं। इतिहास के पन्नों में ओलंपिक बहिष्कारों की स्याही अभी सूखी नहीं है। रंगभेद के अंधकार में डूबा दक्षिण अफ्रीका हो या शीतयुद्ध की ठंडी हवाओं में जमे खेल — हर युग ने देखा है कि सत्ता ने खेल को अपने स्वार्थ का औज़ार बनाया।

पर आज यह हस्तक्षेप अपवाद नहीं, आदत बनता जा रहा है। खेल का वह मैदान, जो संवाद का सेतु था, अब आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा बन रहा है। वहाँ अब तालियों से अधिक नारे गूँजते हैं और खेल से अधिक राजनीति खेली जाती है।

स्पोर्ट्समैन स्पिरिट : घायल आत्मा

स्पोर्ट्समैन स्पिरिट कोई नियम पुस्तिका का शब्द नहीं, वह खेल की आत्मा है। वह भावना है जो प्रतिद्वंद्वी की आँखों में सम्मान खोजती है, जो निर्णायक की सीटी को सिर झुकाकर स्वीकार करती है, जो हार में भी गरिमा बचाए रखती है।

पर जब खिलाड़ी यह जानने लगें कि उनकी किस्मत प्रदर्शन से नहीं, राजनीतिक समीकरणों से तय होगी, तो यह आत्मा घायल हो जाती है। योग्य हाथ खाली रह जाते हैं और अयोग्य निर्णय मंच पा जाते हैं। दर्शक भी यह सोचने लगते हैं कि वे खेल देख रहे हैं या किसी सत्ता-नाटक का दृश्य।

लाभ या भ्रम?

राजनीति के शिल्पी यह मानते हैं कि खेल मंच से दिया गया संदेश दूर तक जाता है। सच है — जाता है। पर वह संदेश अक्सर शांति का नहीं, विभाजन का होता है।

क्षणिक तालियाँ मिल जाती हैं, राष्ट्रवादी ज्वार उठ जाता है, पर भीतर-ही-भीतर रिश्तों की जड़ें सूखने लगती हैं। खेल, जो “सॉफ्ट डिप्लोमेसी” का सबसे सुंदर फूल हो सकता था, अविश्वास का काँटा बन जाता है।

कचरा राजनीति और टूटते आदर्श

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि राजनीति ने शालीनता त्याग दी है। अब न मंच पवित्र है, न माध्यम। शिक्षा हो, संस्कृति हो या धर्म — सब प्रचार के औज़ार बन चुके हैं। खेल भी इस गंदे प्रवाह से अछूता नहीं रहा।

इसका सबसे गहरा घाव बच्चों के मन पर पड़ता है। खेल उन्हें ईमानदारी सिखाता था, पर अब वे सीखते हैं कि ताकत और चालाकी ही सबसे बड़ा हुनर है। जिन नायकों को देखकर वे सपने बुनते थे, आज वही उन्हें निराशा का पाठ पढ़ा रहे हैं।

जिम्मेदारी किसकी?

अंतरराष्ट्रीय खेल संस्थाएँ यदि आज भी मौन रहीं, तो इतिहास उन्हें कठघरे में खड़ा करेगा। उन्हें राजनीति से स्वतंत्र, निर्भीक और पारदर्शी निर्णय लेने होंगे। सरकारों को भी यह स्वीकार करना होगा कि खिलाड़ी सैनिक नहीं होते और ट्रॉफियाँ युद्ध-विजय का प्रतीक नहीं।

आज खेल को बचाना केवल खिलाड़ियों या संगठनों की जिम्मेदारी नहीं, हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है। हमें फिर से उस मैदान की तलाश करनी होगी जहाँ प्रतियोगिता में भी करुणा हो, जीत में भी शालीनता और हार में भी मुस्कान।

वरना आने वाली पीढ़ियाँ किसी सूने स्टेडियम में खड़ी होकर पूछेंगी —

कहाँ गई वह स्पोर्ट्समैन स्पिरिट,

और किसने उसे राजनीति की धूल में गुम कर दिया? ”

© डॉ. सिद्धार्थ वर्मा

डायरेक्टर मिरेकल मेडीकेयर, जबलपुर म. प्र.

article.pbs2025@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Pankhuri Verma
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अद्भुत लेखन! दिल को छू लेने वाली बात 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻

Pahal
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